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	<title>मनोज कुमार सिंह &#8211; The Harishchandra &#8211; Hindi</title>
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		<title>अपने पाठक से बतियाने लगती है मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Jul 2023 11:05:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="689" height="429" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="प्रेमचंद का किसान क्या आज भी हाशिए पर है?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand.jpg 689w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-300x187.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-675x420.jpg 675w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-313x195.jpg 313w" sizes="(max-width: 689px) 100vw, 689px" title="अपने पाठक से बतियाने लगती है मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं 1">हिंदी साहित्य के अद्वितीय , अनूठे और अमर कहानीकार एवं उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित लगभग तीन सौ कहानियों और बारह उपन्यासों का अध्ययन करते समय पाठकों के मन, मस्तिष्क और हृदय में गाॅवो का सहज , सरल,  ठेठ , देशज और देहाती अंदाज तथा गरीब और गांव की व्यथा सजीव होने लगती हैं। आधुनिक [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="689" height="429" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="प्रेमचंद का किसान क्या आज भी हाशिए पर है?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand.jpg 689w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-300x187.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-675x420.jpg 675w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-313x195.jpg 313w" sizes="(max-width: 689px) 100vw, 689px" title="अपने पाठक से बतियाने लगती है मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं 2">


<p>हिंदी साहित्य के अद्वितीय , अनूठे और अमर कहानीकार एवं उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित लगभग तीन सौ कहानियों और बारह उपन्यासों का अध्ययन करते समय पाठकों के मन, मस्तिष्क और हृदय में गाॅवो का सहज , सरल,  ठेठ , देशज और देहाती अंदाज तथा गरीब और गांव की व्यथा सजीव होने लगती हैं। आधुनिक हिंदी साहित्य को अत्यंत समृद्धशाली बनाने और बुलंदी प्रदान करने वाली उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियों और उपन्यासों को पढ़कर पाठक पिढि- दर- पिढि संवाद करता हुआ नजर आता है। उनके उपन्यास हो या कहानियां अपने पाठकों खुलकर स्वछंद भाव से बतियाने लगती है। पाठक और कहानियां एक दूसरे से इस तरह घुल-मिल जाती हैं जैसे एक दूसरे से जान-पहचान बहुत पुरानी हो ।  मुंशी प्रेमचन्द की साहित्यिक प्रतिभा इस दृष्टि से उत्कृष्ट है कि &#8211; उनकी कहानियों के चरित्र वर्तमान दौर के पाठकों से सहज संवाद करती हैं । उनकी कहानियों  के चरित्र और उनके दौर से रूबरू होना हमारे समाज की एक स्वाभाविक जरुरत बन जाता है ।  हिन्दी साहित्य परम्परा में मुंशी प्रेमचंद की महानता यह है कि-उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से काल्पनिक, तिलिस्मी, अय्यारी, देव लोक की सुन्दर परियों और स्वर्ग  -नरक की किस्सों कहानियों से भरी लेखन परम्परा को ध्वस्त कर गाँवों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक  जन-जीवन का यथार्थवादी चित्र परोसने का उत्कट और साहसिक प्रयास किया। मुंशी प्रेमचंद की साहित्यिक कुशाग्रता इस दृष्टि से अनूठी है कि -उन्होंने अपनी कहानियों में चुन-चुन कर देशज शब्दों का प्रयोग किया है और भाषा शैली भी देशज है। इसके साथ उनकी कहानियों के किरदार आम जनजीवन की समस्यायों से लड़ता -जूझता आम आदमी है। इसलिए उनकी कहानियां वर्तमान को जागरूक और संघर्ष के लिए उत्प्रेरित करती नजर आती हैं।</p>
<p>दो सौ वर्षों की ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की प्रतिपूर्ति में भारतीय गाॅवो की आत्मनिर्भरता, स्वावलंबन, स्वाधीनता और सुख-चैन  का क्रूरता और निर्लज्जता से दमन कर दिया था। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा इन लूटे-पिटे गाॅवो की दुर्दशा तथा दुर्व्यवस्था और इसमें रहने वाले लोगों की व्यथा ,विवशता और जलालत और जहालत भरी जिन्दगी की दुश्वारियों को अपनी रचनाओं के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद ने मार्मिक और यथार्थवादी रूप से प्रस्तुत करने का श्लाघनीय प्रयास किया है। सामंतवाद, पुरोहितवाद और महाजनी व्यवस्था के सम्मिलित शोषण से कराहते आम आदमी की कातर कराहो और चीखो को अपनी रचनाओं में मुंशी प्रेमचंद ने प्रखर आवाज दिया हैं। सामंतवाद के शोषणकारी हंथकंडो, आम आदमी को आर्थिक रूप से निचोडने वाले पुरोहितवाद के कर्म-काण्डो और महाजनी व्यवस्था के लूट-खसोट और सफेदपोश डाकाजनी  पर विविध कहानियों के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद ने करारा प्रहार किया है। मुंशी प्रेमचंद की साहित्यिक प्रतिभा इस दृष्टि से अद्वितीय है कि- उन्होंने आम आदमी से लेकर रसूखदार लोगों के भाव, स्वभाव, मनोभावों, मनोविकारों और मनुष्य के मन,  मस्तिष्क और हृदय में उमडती- घूमड़ती विविध हलचलों की अपनी सर्जनाओं द्वारा सटीक, तार्किक और वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की है। इसके साथ ही समाज में प्रभुत्त्वशाली वर्ग द्वारा स्थापित परम्पराओं, रीति-रिवाजों और कुसंस्कारो के समक्ष नतमस्तक आम आदमी की विवशता को भी मुंशी प्रेमचंद ने तार्किक और न्यायसंगत तरीके प्रस्तुत किया है। मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी &#8221; सदगति &#8221; में कर्मकाण्डो के समक्ष आम आदमी की विवशता साफ-साफ दिखाई देती है। दलित समुदाय से आने वाला &#8221; दुखी&#8221; महज साइत निकलवाने के लिए पंडित घासीराम की बेगारी करते करते मर जाता हैं।</p>
<p>इस दौर में जब देश के चन्द पूंजीपतियों ,औद्योगिक घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में सरकारें किसानों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर रही हैं मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कहानी &#8216; पूस की रात &#8216; के मुख्य पात्र हलकू किसान का संघर्ष वर्तमान दौर के छोटे और मझोले किसानों को प्रेरणा और उर्जा प्रदान करता है। हांड कपा देने वाली ठंड भरी रात में कर्ज में डूबा हलकू बर्बर जंगली जानवरों से फसल की रक्षा करने के लिए खेत अगोरने के लिए निकल पडता है। इस तरह अपने जमीन के एक टुकड़े के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन न्योछावर कर देना देश के अंदर चल रहे अनगिनत किसान आंदोलनों को प्रेरणा दे सकता हैं। कर्जदारी और खेती-किसानी की अन्य समस्याओं से उजडते किसानों की व्यथा तथा बेदखली से किसान से मजदूर के रूप में बदलते किसानों की पीड़ा को पूष की रात की कहानी के माध्यम से समझा जा सकता है। स्वाधीनता उपरांत औपचारिक रूप से जमींदारी और जागीरदारी को समाप्त कर दिया गया। परन्तु आधुनिक समय में बहुराष्ट्रीय कंपनियों, पूँजीपतियों और औद्योगिक घरानों के रूप में नये जमींदारों और जागीरदारों का उदय हुआ है। इन नये नवेले जमींदारों के पक्ष मे सरकारे कर्ज की जंजीर और जंजाल में डूबे लाखों करोड़ों किसानों को जमीन से बेदखल कर रही हैं , जिससे छोटी जोत के किसान आज तेजी से मजदूर बनते जा रहे हैं।</p>
<p>मुंशी प्रेमचंद की हर कहानी मनुष्यता को स्थापित करने का सार्थक प्रयास है। ईदगाह जैसी कहानी में पुरूखो के प्रति सम्मान और समर्पण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। नन्हा सा बालक हमीद मेले में खेल-खिलौने न खरीद कर अपनी दादी के लिए चिमटा खरीद कर लाता है। इस कहानी में बाल मन की कोमलता, अपनी दादी के प्रति सहज प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच जाता है। इस कहानी ने भावनाओं के ईमानदार लेखक के रूप में मुंशी प्रेमचंद को अमर कर दिया। अंग्रेजों की न्याय व्यवस्था खर्चीली, उबाऊ और समयघोटु थी। इसकी प्रतिक्रया में मुंशी प्रेमचंद ने भारतीय जनमानस में प्रचलित पंचायत प्रणाली द्वारा न्याय व्यवस्था का पंच परमेश्वर की कहानी के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इस पंच परमेश्वर की कहानी  में भारतीय न्याय व्यवस्था में व्याप्त  निष्पक्षता और इंसानियत का बेहतर चित्रण किया है। पंच परमेश्वर की कहानी में न्यायाधीश के रूप में अलगू चौधरी दोस्ती और दुश्मनी से ऊपर उठकर न्याय करते हैं। पंच परमेश्वर की कहानी में न्याय के अतिरिक्त हिन्दू और मुस्लिम जीवन पद्धति में बढते साहचर्य, समन्वय और सहकार का तार्किक चित्रण पाया जाता हैं।</p>
<p>वर्तमान दौर में बढती प्रतीकात्मक राजनीति को उस दौर में मुंशी प्रेमचंद ने दूरदर्शिता पूर्वक समझने, परखने और रेखांकित करने का प्रयास किया था। वर्तमान दौर में व्यापक और बुनियादी हितों के बजाय प्रतीकात्मक और भावनात्मक मुद्दों पर राजनीति का चलन-चलन बढता जा रहा हैं। बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण और बेहतर चिकित्सा जैसे मुद्दे संसद और विधानसभा के पटल से लेकर टीवी चैनलों पर होने वाली बहसों से गायब है।  ईमानदारी, सच्चाई और सचरित्रता जैसी भावात्मक चीजे भौतिक वस्तुओं की तरह खरीदी-बेची जा सकती हैं। बढते बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति में भौतिक वस्तुओं की तरह भावात्मक चीजे भी खरीदने- बेचने का विषय बनती जा रही है। इसको मुंशी प्रेमचंद ने अपने दौर में समझ लिया था। नमक के दरोगा की कहानी में ईमानदार दरोगा अलोपीदीन को बेहतर वेतन और सुविधाओं द्वारा उसी भ्रष्ट सेठ द्वारा सम्मानित किया जाता हैं जिसके अवैध कारोबार को ईमानदार अलोपीदीन ने पकड़ा था। मुंशी प्रेमचंद मानव मन के सर्वश्रेष्ठ व्याख्याकार के साथ-साथ बेहतर मानव जीवन के लिए संघर्ष के उत्कट प्रेरक हैं। मुंशी प्रेमचंद कार्ल मार्क्स, हीगल, जरमी बेंथम और जान स्टुअर्ट मिल जैसे राजनीतिक और दार्शनिक विचारकों की परम्परा के दार्शनिक और विचारक नहीं थे। परन्तु उनकी कहानियों और उपन्यासों में राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त शोषण के औजारों का बौद्धिक, तार्किक, वैज्ञानिक और सार्थक व्याख्या पाई जाती है और जनता के व्यापक हितों के पक्ष में जनक्रांति की वकालत करते हैं। लम्ही में पैदा हुए मुंशी प्रेमचंद ने कहा था कि- व्यक्ति की चेतना उसकी सामाजिक परिस्थितियों का निर्माण नहीं करती बल्कि सामाजिक परिस्थितियाॅ चेतना का निर्माण करती हैं। अपने दौर की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों का विश्लेषण करने वाला साहित्यकार युगांतरकारी और कालजयी हो जाती हैं। अपनी उत्कृष्टतम साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद भारतीय सीमाओं को पार कर वैश्विक विभूतियों में शामिल हो गये। वैश्विक स्तर पर मुंशी प्रेमचंद की तुलना महान रसियन उपन्यासकार मैक्सिम गोर्की के साथ की जाती हैं। मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित गोदान का वैश्विक साहित्य में वही स्थान है जो मैक्सिम गोर्की द्वारा रचित प्रसिद्ध उपन्यास माॅ { mother} का हैं। प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अध्यक्ष महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की स्मृतियों को नमन करता हूँ।</p>
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		<title>आग उगलता आसमान गहरे संकट का संकेत!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 Jun 2023 11:31:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="910" height="607" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/nature-emotions-sun-desert-heat.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="आग उगलता आसमान गहरे संकट का संकेत!" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/nature-emotions-sun-desert-heat.jpg 910w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/nature-emotions-sun-desert-heat-300x200.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/nature-emotions-sun-desert-heat-768x512.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/nature-emotions-sun-desert-heat-696x464.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/nature-emotions-sun-desert-heat-630x420.jpg 630w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/nature-emotions-sun-desert-heat-313x209.jpg 313w" sizes="(max-width: 910px) 100vw, 910px" title="आग उगलता आसमान गहरे संकट का संकेत! 3">मध्य जून तक सम्पूर्ण उत्तर भारत  मानसूनी हवाओं की जद में आ जाता हैं। परन्तु इस बार दो तिहाई जून का महीना बीत गया पर मानसून का कहीं अता-पता नहीं है। मानसून के रूठने से वातावरण में तापमान अप्रत्याशित रूप से बढता जा रहा है। बढते तापमान के कारण पड रही भयंकर गर्मी से लोग-बाग [&#8230;]]]></description>
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<p>मध्य जून तक सम्पूर्ण उत्तर भारत  मानसूनी हवाओं की जद में आ जाता हैं। परन्तु इस बार दो तिहाई जून का महीना बीत गया पर मानसून का कहीं अता-पता नहीं है। मानसून के रूठने से वातावरण में तापमान अप्रत्याशित रूप से बढता जा रहा है। बढते तापमान के कारण पड रही भयंकर गर्मी से लोग-बाग बिलबिलाने लगें हैं और संगमरमर के मकान लगभग खौलने लगे हैं। इस अप्रत्याशित गरमी और लूॅ के थपेडों से पेड पौधे भी झुलसने लगे। इस अप्रत्याशित गरमी और लूॅ के थपेडों से होने वाली मौतों ने कोरोना काल की याद ताजा कर दिया हैं। पूरी रात घटते-बढते चाँद और टिमटिमाते सितारों से भरे- पूरे जिस आसमान को रात भर एकटक निहारते- निहारते मन नहीं भरता उस आसमान से दिन में नजर मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही हैं।  अगर हम सामूहिक रूप से गम्भीरता के साथ सजग और सचेत नहीं हुए तो भविष्य में हमारा आसमान आग  उगलने लगेगा । इसलिए आज हमें  फिर से अपनी पृथ्वी, प्रकृति, पर्यावरण और विकास की वर्तमान संकल्पना के बारे में गम्भीरता से जानने समझने और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल करने पर चिंतन मनन करना होगा। आज जीवाश्म ईंधन का प्रयोग निरंतर बढता जा रहा है। जिसके कारण पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता। ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव से धरती और समन्दर दोनों गरम होते जा रहे हैं। अत्यधिक गरमी बढने से सूक्ष्म जीव जन्तुओं और कीडो-मकोडो के जीवन पर संकट मंडराने लगें हैं। यह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अशुभ संकेत है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आइनस्टाइन ने कहा था कि-केवल  कीडे-मकोड़े तीन-चार वर्षों के लिए खत्म हो जाए तो दुनिया पूरी तरह समाप्त हो जाएगी।</p>
<p>आज से लगभग साढे चार अरब वर्ष पहले पृथ्वी भी अन्य ग्रहों की तरह आग का दहकता हुआ गोला थी। परन्तु पर्यावरण में कुछ रासायनिक क्रियाएं हूई तदुपरान्त पृथ्वी ठंडी हूई बादल बने बारिश हूई तथा पृथ्वी पर जल भराव हुआ। इन्हीं जल भरावो में जीवन की सम्भावना बनी। इस तरह का कुदरती करिश्मा केवल पृथ्वी के साथ हुआ। इसलिए सौरमण्डल के सभी नौ ग्रहों में केवल पृथ्वी पर जीवन और प्रचुर मात्रा में जैव विविधता पाई जाती हैं। इसलिए पृथ्वी को अद्भुत ग्रह कहा जाता हैं। पृथ्वी समस्त जीवों का पालन पोषण तो करती हैं मनुष्य के शौक श्रृंगार को भी पूरा करती हैं। मनुष्य सहित समस्त जीव जंतुओं को स्वस्थ जीवन प्रदान करने वाली पृथ्वी ही अगर अस्वस्थ, प्रदूषित और कुपोषित हो गई तो हमारी भावी पीढ़ियों का जीवन संकट में पड जायेगा। पृथ्वी अनगिनत जीव जंतुओं का प्रसव प्रांगण के साथ-साथ सभी प्राणियों का क्रीडांगन भी हैं। विकास की अंधी दौड़ में मनुष्य जिस तरह प्राकृतिक संसाधनों का निर्ममता पूर्वक शोषण कर रहा है उससे सम्पूर्ण पृथ्वी को आच्छादित करने वाला पर्यावरण निरन्तर प्रदूषित होता जा रहा हैं। अगर प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन इसी तरह जारी रहा और इसी रफ्तार से हमारा पर्यावरण प्रदूषित होता रहा तो भावी  पीढियों की किलकारियों के स्वर , भौरौ के गुंजन, पक्षियों के कलरव और दिगदिगंत तक गुंजित होने वाले गीतों के स्वर मद्धिम हो जायेगे । इसलिए अपनी प्यारी  पृथ्वी और पृथ्वी के पर्यावरण को बचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।  बुलेट ट्रेन की रफ्तार से बेशुमार  दौलत कमाने की आसमानी महत्वाकांक्षा रखने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने लगभग पूरी पृथ्वी को अपनी मुट्ठी में भींच लिया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जिस निर्मम्ता और निर्लज्जता से प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन किया जा रहा है उससे हवा, पानी, धरती और आसमान बुरी तरह प्रदूषित होते जा रहे हैं। इस तरह हमारी पृथ्वी और पर्यावरण के अस्तित्व पर संकट आ गया हैं। पृथ्वी के अस्तित्व को बचाने की गरज से अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 मे पृथ्वी दिवस मनाने की परिकल्पना प्रस्तावित की। तबसे यह परम्परा स्थापित हूई कि- हर वर्ष 22 अप्रैल को विश्व के सभी देश पृथ्वी दिवस के रूप में मनायेगे। इसी तरह  पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए हर वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।</p>
<p>यह सर्वविदित तथ्य हैं कि- विकास करने और खुशहाल जीवन जीने में प्राकृतिक संसाधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परन्तु इन संसाधनों का मूर्खतापूर्ण उपभोग और उपयोग अनगिनत प्रकार की सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याएं पैदा कर सकता हैं। इसलिए भावी पीढियों को ध्यान में रखते हुए विकास की योजनाए निर्धारित करनी होगी तथा संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है। इसलिए प्रायः अत्यंत प्राचीन काल से प्रत्येक समाज में चिंतक और विचारक  संसाधनों के संरक्षण पर अपने विचार प्रकट करते रहे हैं। इस संबंध में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा है कि- प्रकृति में प्रत्येक की आवश्यकता पूरी करने के लिए सबकुछ है परन्तु किसी की लालच को पूरा करने के लिए नहीं। अर्थात हमारे पेट भरने के लिए बहुत है लेकिन पेटी भरने के लिए नहीं। महात्मा गाँधी के अनुसार संसाधनों के ह्रास्व के लिए  स्वार्थी व्यक्ति तथा आधुनिक प्रौद्यौगिकी की शोषणकारी प्रवृत्ति जिम्मेदार हैं ।  इसलिए वह व्यापक जन भागीदारी द्वारा लघु कुटीर उद्योग धंधों पर आधारित अर्थव्यवस्था के पक्षधर थे। अंतराष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्थित तरीके से संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और संसाधन संरक्षण की वकालत 1968 मे क्लब ऑफ रोम ने की। इसके बाद 1974 मे शुमेसर ने अपनी पुस्तक &#8220;स्माल इज ब्यूटीफुल &#8221; में इस विषय पर गांधी जी के दर्शन को एक बार फिर से दोहराया हैं। 1987 मे ब्रुन्ड्टलैंड आयोग रिपोर्ट द्वारा वैश्विक स्तर पर संसाधन संरक्षण में मूलाधार योगदान किया गया। इस रिपोर्ट ने सतत् पोषणीय विकास ( Sustainable Development) की संकल्पना प्रस्तुत की और संसाधन संरक्षण की वकालत की। सतत् पोषणीय विकास का अर्थ है भावी पीढ़ियों के भविष्य को ध्यान में रखकर और पर्यावरण कोई क्षति पहुंचाएं बिना संसाधनों का प्रयोग करना।</p>
<p>तीव्र औद्योगीकरण, नगरीकरण और आधुनिकीकरण की चाहत में पृथ्वी के प्राकृतिक भूगोल ,भूसंरचना भू-आकृति और भौगोलिक विन्यास को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया गया। इन चाहतो में पागल मानवीय महत्वाकांक्षाओं ने जल प्रबंधन के अधिकांश परम्परागत निर्मितियों कुऑ तालाब पोखरे जोहड़ और बावडियो को बेरहमी से पाट दिया गया। इसका स्वाभाविक परिणाम यह देखने को मिलता है कि- आज देश के मेगा शहर अत्यधिक जल भराव के शिकार हैं तो ग्रामीण क्षेत्रों में भौमिक जल स्तर काफी नीचे चला गया है। इसलिए भारत के लगभग छह लाख गांवो में जल संकट गहराता जा रहा हैं। जल संकट के अतिरिक्त औद्योगिक विकास शहरीकरण और नगरीकरण के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध शोषण हुआ है। इस अंधाधुंध शोषण के फलस्वरूप पारिस्थितिकीय असंतुलन, भूमंडलीय तापन, ओजोन परत का क्षरण पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्मनीकरण जैसी समस्याएं उत्पन्न हूई है।</p>
<p>बेतहाशा बढती जनसंख्या के भरण-पोषण के लिए अधिक अनाज उत्पादन का दबाव बढता जा रहा हैं।  अधिक अनाज उत्पादन के लिए अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों, प्रयोग, खरपतवारनाशी और कीटनाशक दवाओं के अत्यधिक प्रयोग के कारण हमारी धरती अत्यधिक प्रदूषित होती जा रही ह हैं और भूमि की गुणवत्ता में निरंतर गिरावट आती रही। जिसके फलस्वरूप अनगिनत बीमारियाँ पाँव पसार रहीं हैं तथा हमारी समृद्ध जैव विविधता क्षीण होती जा रही हैं। अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों, खरपतवार नाशी और कीट नाशक दवाओं के प्रयोग के कारण अनगिनत जीव जंतु और अनगिनत वनस्पतियां विलुप्त होने के कगार पर पर हैं। इसलिए जिस तरह हम अपने लिए अपने सपनों के घर की देखभाल करने के लिए चितिंत रहते हैं उसी मनुष्य सहित समस्त जीव जंतुओं के प्राकृतिक आवास पृथ्वी के बारे में भी चिंतन करना चाहिए।</p>
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		<title>भारत की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना के वैश्विक संवाहक थे टैगोर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 07 May 2023 15:40:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284929.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="भारत की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना के वैश्विक संवाहक थे टैगोर" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284929.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284929-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284929-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284929-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="भारत की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना के वैश्विक संवाहक थे टैगोर 5">कवि, दार्शनिक, शिक्षाविद चित्रकार, संस्कृतकर्मी एवं विश्व विख्यात साहित्यकार गुरूवर रविन्द्रनाथ टैगोर उत्कट देशभक्त के साथ उत्कट मानवतावादी थे। उत्कट मानवतावादी, प्रकृति अनुरागी, उच्च कोटि के पर्यावरणविद तथा विश्व बंधुत्व और विश्व शांति के लिए प्रबल पक्ष पोषक टैगोर ने विश्व नागरिकता की उत्कंठ हृदय से वकालत किया। विश्व नागरिकता की खुलकर वकालत करने वाले [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284929.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="भारत की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना के वैश्विक संवाहक थे टैगोर" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284929.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284929-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284929-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284929-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="भारत की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना के वैश्विक संवाहक थे टैगोर 6">



<p>कवि, दार्शनिक, शिक्षाविद चित्रकार, संस्कृतकर्मी एवं विश्व विख्यात साहित्यकार गुरूवर रविन्द्रनाथ टैगोर उत्कट देशभक्त के साथ उत्कट मानवतावादी थे। उत्कट मानवतावादी, प्रकृति अनुरागी, उच्च कोटि के पर्यावरणविद तथा विश्व बंधुत्व और विश्व शांति के लिए प्रबल पक्ष पोषक टैगोर ने विश्व नागरिकता की उत्कंठ हृदय से वकालत किया। विश्व नागरिकता की खुलकर वकालत करने वाले टैगोर भारत की साहित्यिक,सांस्कृतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक चेतना तथा आत्मा के सर्वश्रेष्ठ अधिवक्ता, व्याख्याता और वैश्विक संवाहक थे। </p>



<p>बीसवीं शताब्दी में टैगोर ने भारतीय प्रज्ञा, कुशाग्रता, प्रतिभा और मेधाशक्ति का साहस और  कुशलता के साथ प्रतिनिधित्व किया। अपनी साहित्यिक प्रतिभा से महाकवि कालिदास, माघ, जयदेव, सूरदास, सैयद इब्राहीम रसखान, और तुलसीदास की महान साहित्यिक विरासत को टैगोर ने आगे बढाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। उनकी वाणी में योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की स्वरलहरियों जैसी आकर्षण शक्ति और लेखनी में अद्भुत सम्मोहन शक्ति थी। रबिन्द्र नाथ टैगोर भारतीय बसुन्धरा के विरले लेखक और कवि हैं जिनके लेख सम्पूर्ण बंगाली जनमानस के हृदय में समाहित है और उनके गीत हर बंगाली मन मस्तिष्क में हमेशा तरोताजा रहते हैं। प्रकारांतर से वह सचमुच लोकमानास, लोकमंगल तथा लोक संवेदना के सच्चे साहित्यकार थे। अपने दौर की तुच्छताओं, संकीर्णताओं और दकियानूसी विचारों से आगे बढ़ कर रबिन्द्र नाथ टैगोर ने व्यापक, वैश्विक  मानवतावादी दृष्टि और समझदारी का परिचय देते हुए अपनी साहित्यिक सर्जनाओं और रचनाओं का निरंतर निरूपण किया। </p>



<p>इसलिए भौगोलिक रूप से पूर्वी दुनिया में पैदा हुए रविन्द्र नाथ टैगोर का पश्चिमी दुनिया ने भी भारत सहित सम्पूर्ण एशिया के सांस्कृतिक और साहित्यिक अग्रदूत के रूप में उनका अभिनंदन और स्वागत किया। प्रकृतिवादी, पर्यावरणवादी, मानवतावादी और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के रहस्यवादी होने के कारण रबिन्द्र नाथ टैगोर की रचनाओं ने न केवल भारत बल्कि विश्व साहित्य को गगनचुंबी बुलंदी प्रदान की और विश्व साहित्य को अत्यंत समृद्धशाली बनाया। उनकी ब्रहमांड को परखने की अंतः प्रज्ञात्मक चेतना और क्षमता, शैली की गरिमा युक्त सरलता, जाज्वल्यमान कल्पना और उत्कट दूरदर्शिता उन्हें वैश्विक क्षितिज पर एक अद्वितीय साहित्यिक स्थान प्रदान करती है। जिस तरह  स्वामी विवेकानंद वैश्विक पटल पर भारतीय दर्शन और आध्यात्म के ओजस्वी संदेशवाहक थे उसी तरह टैगोर भारत की साहित्यिक और सांस्कृतिक चेतना के सर्वश्रेष्ठ संवाहक थे।</p>



<p>रबिन्द्र नाथ टैगोर भारतीय पुनर्जागरण और स्वतंत्रता के प्रखर और कुशाग्र साहित्यिक सर्जक थे । स्वाधीनता संग्राम के दौरान उभरते आधुनिक भारत के आदर्शों, आकांक्षाओं, मूल्यों, मान्यताओं और लालसाओं का उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से न केवल स्पष्टीकरण किया बल्कि भारतीय जनमानस से उसका साक्षात्कार कराया। गुरुवर रविन्द्र नाथ टैगोर को भारत के गौरवशाली अतीत पर गर्व और गौरव की अनुभूति होती थी। वह हमेशा कहा करते थे कि-भारत के गगनमंडल में ही उषा की प्रथम रश्मि प्रस्फुटित हूई थी। उनके अनुसार आज विश्व में प्रचलित अधिकांश मानवता वादी मूल्यों, मान्यताओं, सिद्धांतो और श्रेष्ठतम आदर्शों का निरूपण भारतीय बसुन्धरा के वनों, गुफाओं और कन्दराओं में साधना रत युगद्रष्ट्रा ऋषियों द्वारा किया गया। महान मानवता वादी रविन्द्र नाथ टैगोर शासकीय, साम्प्रदायिक, धार्मिक और विशुद्ध भौतिकवादी  साम्राज्यवादी क्रूरता के प्रबल विरोधी थे। इसलिए जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर की तर्ज पर भारत में जलियावाला बाग में जनरल डायर द्वारा की गई क्रूरता का पूरी क्षमता से भर्त्सना किया था। इसे उन्होने राक्षसी अत्याचार कहा था और तत्कालीन भारत सरकार द्वारा प्रदत्त &#8221; नाइट &#8221; की उपाधि वापस कर दिया था। उनके अनुसार अतीत में की गई विविध प्रकार की क्रूरताएं सम्पूर्ण वैश्विक इतिहास और मानवता के मस्तक पर कलंक है। रविन्द्र नाथ टैगोर सांस्कृतिक समन्वय और अंतर्राष्ट्रीय एकता में विश्वास करने वाले अनोखे राष्ट्रवादी थे। वह उग्र तथा आक्रामक राष्ट्रवाद की हमेशा भर्त्सना किया करते थे। उग्र और आक्रामक राष्ट्रवाद की भावना समाज को उन्मादी भीड में  बदल देती हैं। फिर भी वह भारतीय राष्ट्रवाद के बौद्धिक नेता बन गये। अपने पूर्ववर्ती बंकिमचन्द्र चटर्जी के साहित्यिक पुनर्जागरण आन्दोलन को टैगोर ने शक्तिशाली और व्यापक  बनाया । </p>



<p>राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में बंगाल में हुए साहित्यिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण ने बंगाली राष्ट्रवाद के लिए बौद्धिक पृष्ठभूमि तैयार किया। वर्तमान भारतीय राष्ट्रगान के रचनाकार रबिन्द्र नाथ टैगोर ने यद्यपि स्वाधीनता संग्राम के घमासान और ब्रिटिश साम्राज्य के साथ चल रहे राजनीतिक युद्ध में भाग नहीं लिया परन्तु इसे वह बौद्धिक तथा  मानसिक रूप से उत्प्रेरित एव उत्साहित करते रहे। </p>



<p>रबिन्द्र नाथ टैगोर अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध कवि और साहित्यकार थे।  वह कवि और साहित्यकार के साथ एक महान शिक्षा शास्त्री थे। शिक्षा के क्षेत्र में उनके किए गए प्रयोगों और प्रयासों से आकृष्ट होकर यूरोप के बडे-बडे विद्वान उनकी विश्वभारती में आते रहते थे। भारतीय दार्शनिक परम्परा में वह मांडूक्य उपनिषद के &#8221; सत्यम् शिवम् और अद्वैतम् &#8221; की पम्परा के अनुयायी थे और ब्रह्म समाज की शिक्षाओं और अपने पिता देवेन्द्र नाथ टैगोर से विरासत में मिलें एकेश्वरवाद के विचार  में विश्वास करते थे। परन्तु उनके अन्दर हिब्रू एकेश्वरवादियों जैसी कट्टरता नहीं थी। उन्हें ईश्वर की  उच्चतम स्रजनशीलता में विश्वास था और परमात्मा को प्रेम की पूर्णता मानते थे। प्रख्यात जर्मन दार्शनिकों हीगल, नीत्शे और शोपेनहाॅवर की तरह इतिहास के साथ साथ प्रकृति को भी शाश्वत आत्मा की अद्वितीय तथा असीम सृजनात्मक अभिव्यक्ति और प्रकटीकरण मानते थे। इसलिए वह कहते थे ऑखे बंद कर के क्या ढूँढते हो ऑखे खोलों तुम्हारा परमात्मा तुम्हारे सामने खडा है। टैगोर बसुन्धरा पर ईश्वर के अमृतमय प्रेम और करुणा के सच्चे संदेशवाहक थे। </p>



<p>उन्होंने अपनी अमर रचना &#8221; गीतांजलि &#8221; में ईश्वरीय प्रेम की व्यापकता का खुले मन से बखान किया है तथा समस्त मानवजाति को आमंत्रित किया है कि- वह इस स्वर्णिम, ज्योतिर्मय और निर्मल प्रेम- सागर में डुबकी लगाये और इसका रसास्वादन करें। उनके अनुसार निर्मल और पवित्र प्रार्थनाओं द्वारा ईश्वरीय प्रेम का रसास्वादन किया जा सकता है। टैगोर सम्पूर्ण सृष्टि को सर्वशक्तिमान ईश्वर की सर्जना मानते थे। उनके अनुसार ब्रहमांड की यांत्रिक, जैविक और भौतिक प्रक्रियाओं में ईश्वर की व्यापकता हैं तथा प्रकृति की प्रत्येक कर्कश और कोमल घटनाओं में ईश्वर की विद्यमानता है। सरसराती हुई पत्तियाँ, वेगवती सरिताएं, तारादीप्त रातें, मध्याह्न का झुलसाने वाला ताप और मुसलाधार वर्षा ईश्वर की विद्यमानता को प्रकट करते हैं। प्रकारांतर से टैगोर प्रकृति को जड तथा भौतिक शक्तियों का यांत्रिक और संयोजन और एकत्रीकरण नहीं मानते थे बल्कि ऑधी, तूफान, महासागर, विशालकाय पर्वत, सूरज, चॉंद सितारे और पृथ्वी सब कुछ ईश्वरीय आनंद का विस्फोट है। पाश्चात्य साहित्य के महान कवि गेटे की तरह टैगोर भी प्रकृति के अनुपम सौन्दर्यत्मक आदान-प्रदान में मंत्र-मुग्ध हो जाते थे। वह वन बाग तडाग पक्षियों के कलरव, चीलो के स्वर में आनंद की अनुभूति करते थे। </p>



<p>रबिन्द्र नाथ टैगोर सहकार, समन्वय, साहचर्य और सार्वभौम सामंजस्य के उत्कृष्ट साहित्यकार थे। उनका एक अलौकिक, सर्वोच्च और सार्वभौम सामंजस्यकारी विश्व शक्ति में  अटूट विश्वास था। इसका अभिप्राय यह है कि- मनुष्य जाति को इस सर्वोच्च सामंजस्य कारी शक्ति की अनुभूति हो जाए तो अंतर्विरोधों से उत्पन्न कटुता और अन्तर्निषेध जनित कलह तथा कर्कशता का पूर्णतः दमन और शमन हो सकता हैं। वह मानव समुदाय के साथ मनुष्य का प्रकृति के साथ सार्थक और आनंदमय सामंजस्य स्थापित करना चाहते थे। पश्चिमी दुनिया में हुए वैज्ञानिक चमत्कारों ने पश्चिमी दुनिया के लोगों में प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का हौसला दिया था। रविन्द्र नाथ टैगोर प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की इस लालसा को पूर्णतः पाशविकता मानते थे। प्रकृति के साथ वह प्रकृति के प्रत्येक प्राणी के साथ दया करूणा और प्रेम का संबध चाहते थे। </p>



<p>उनके अनुसार सूक्ष्म से सूक्ष्म प्राणी को चोट पहुंचाना ईश्वर की कल्याणकारी अनुकम्पा के विरुद्ध अपराध है। टैगोर की ईश्वरीय न्याय में  गहरी और गहन आस्था थी। इसलिए वह मानते थे कि-साम्राज्यवाद, निरकुंशता, शोषण, क्रूरता और बर्बरता को कभी-न-कभी अवश्य परास्त होना होगा तथा घमंड, लोभ, उद्दन्डता की निश्चित पराजय होगी। रविन्द्र नाथ टैगोर का बचपन ब्रह्म समाज के बुद्धिवादी वातावरण में गुजरा इसलिए अपने दौर में प्रचलित अंधविश्वासों, कुरीतियों, कुप्रथाओं और निराधार मान्यताओं के प्रति उनकी दृष्टि आलोचनात्मक बनी रही। वह बुद्धि को सृजनात्मक और रचनात्मक शक्तियों का प्रदीपन मानते थे। बुद्धि सृजनात्मक और रचनात्मक शक्तियों के प्रदीपन से सुंदर और समरस समाज बनाया जा सकता हैं। बीसवीं शताब्दी के इस महान भारतीय साहित्य रत्न को सम्पूर्ण एशिया में प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता के रूप जाना जाता है। टैगोर इकलौते ऐसे साहित्यकार हैं जिन्हें दो देशों ( भारत और बांग्लादेश) के रचयिता होने का गौरव हासिल है। हर भारतीय का मस्तक गौरवान्वित करने वाले भारतीय मनीषा के दैदीप्यमान नक्षत्र को उनके जन्मदिन पर शत-शत नमन। </p>
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		<title>इतिहास, वर्तमान और भविष्य का असली निर्माता हैं मेहनतकश मजदूर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 May 2023 16:12:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284829.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="इतिहास, वर्तमान और भविष्य का असली निर्माता हैं मेहनतकश मजदूर" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284829.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284829-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284829-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284829-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="इतिहास, वर्तमान और भविष्य का असली निर्माता हैं मेहनतकश मजदूर 7">इतिहास के पन्नों में दर्ज दुनिया के अनगिनत राजाओं, रईसों, सम्राटों, बादशाहों और शहंशाहो के अनेकानेक सुनहरे सपनों,ख्वाबों तथा ख्वाहिशों को अपने हाथों के जादुई हुनर से मुक्कम्ल जम़ीन पर उतारने वाले मेहनतकश मजदूर ही वास्तव में इतिहास, वर्तमान और भविष्य के असली निर्माता हैं।  मेहनतकश मजदूरों ने ही सफेद संगमरमर को तराश कर शहंशाह [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284829.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="इतिहास, वर्तमान और भविष्य का असली निर्माता हैं मेहनतकश मजदूर" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284829.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284829-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284829-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/images284829-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="इतिहास, वर्तमान और भविष्य का असली निर्माता हैं मेहनतकश मजदूर 8">



<p>इतिहास के पन्नों में दर्ज दुनिया के अनगिनत राजाओं, रईसों, सम्राटों, बादशाहों और शहंशाहो के अनेकानेक सुनहरे सपनों,ख्वाबों तथा ख्वाहिशों को अपने हाथों के जादुई हुनर से मुक्कम्ल जम़ीन पर उतारने वाले मेहनतकश मजदूर ही वास्तव में इतिहास, वर्तमान और भविष्य के असली निर्माता हैं। </p>



<p>मेहनतकश मजदूरों ने ही सफेद संगमरमर को तराश कर शहंशाह शाहजहाँ की मुहब्बत को ताजमहल की शक्ल-सूरत में ढालकर हमेशा-हमेशा-हमेशा के लिए एक जिन्दा प्रेम की कहानी बना दिया। सडको के हाशिये पर आबाद फुटपाथ पर आसमान और धरती को ओढना-बिछौना बनाकर तारों से ऑख मिचौली करते-करते रात गुजारने वाले मेहनतकश मजदूर ही चमचमाती चारकतारी ( Four laine) सडको, राजपथो और राजमार्गों को बनाता है। हमारे मेहनतकश मजदूरों ने बेजान पत्थरों को गढकर न केवल हमारी पुजाओं और प्रार्थनाओं के भगवान और देवता बनाएं अपितु अनगिनत ऐसे नक्काशीदार मंदिरों को बनाया जिसको देखकर अनगिनत दर्शकों की ऑखे चौधियाॅ जातीं हैं। अपनी मेहनत को ही अपना ईमान समझने वाले मजदूरों ने अनगिनत मंदिरों, मस्जिदों, दुर्ग, किलों और आलीशान महलों को बनाकर वास्तुशिल्प, वास्तुशास्त्र, वास्तुकला और वास्तुसौन्दर्य की दृष्टि से मानव सभ्यता को महकाने का श्लाघनीय प्रयास किया। चना-चबेना चबाकर काम की तलाश में शहर दर शहर भटकने वाला मजदूर ही धन्नासेठो की खुशियों और हसरतों की गगनचुंबी अट्टालिकाएं बनाता है। </p>



<p>महज नून रोटी कच्ची प्याज और हरी मिर्च से अपने पेट की भूख मिटाने वाले मजदूरों ने जान हथेली लेकर भाॅखडा नांगल, हीराकुंड, रिहंद जैसे बाँध और पुल पुलिया बनाया जो हमारे विकास और आवागमन के बुनियादी स्तम्भ बन चुके हैं। हसियाॅ, हथौड़ा, छेनी, कुल्हाड़ी, कुदाल, फावड़ा, करनी वसूला, आरी और खुरपी जैसे अनगिनत सृजन, रचना, निर्माण और विकास के औज़ार मेहनतकश मजदूरों के उसी तरह साथी और दोस्त  होते हैं जिस तरह कलम, कापी और किताबें शिक्षार्थियों, शिक्षको और अध्ययनार्थियो की दोस्त और साथी होती हैं। सृजन, रचना, निर्माण और विकास के इन्हीं अनगिनत औज़ारो   को अपना साथी बनाकर अपने जादुई हुनर, कभी न थकने वाले हौसले और  फौलादी इरादों से इस खूबसूरत दुनिया को रचने, गढ़ने, सजाने और  सवांरने वाले मेहनतकश मजदूरों के परिश्रम और पराक्रम की बदौलत ही आज हमारी सभ्यता और संस्कृति इस मुकाम तक पंहुची हैं। इसी मेहनतकश मजदूरों ने अपने फौलादी इरादों से कुदाल और कुल्हाडी उठाई और घने जंगल झाड़ियों को काटकर खेत खलिहान बनाएं और अनाज उपजाए। इतिहास की किताबों और साहित्यिक सर्जनाओ मे लगभग हाशिए पर धकेल दिए गए इस मेहनतकश मजदूरों ने ही सचमुच ऊसर बंजर और मरुभूमि पर अपने पुरुषार्थ के पसीने से हरियाली लाई। </p>



<p>धरती के अंदर अनन्त अदृश्य आंतरिक अंतःस्थल को किंवदंतियों के अनुसार &#8220;पाताल लोक &#8220;के रूप में परिकल्पित किया जाता था ।कौन जानता था कि पाताल लोक के रूप में   परिकल्पित अंतःस्थल में कितना खजाना भरा पडा है परन्तु बीबी बच्चों की परवाह किए बिना कलेजे पर पत्थर रखकर धरती की छाती चीरकर धरती के अंतःस्थल की अनन्त गहराइयों में उतर गया और लोहा तांबा पीतल निकाल लाया खुद को गलाकर तपाकर लोहे को गलाया पिघलाया और गला पिघलाकर तरक्की के अनगिनत औजार बनाएं जिसके आसरे भरोसे दुनिया समन्दर से आसमान तक अनगिनत करिश्मे कर रही हैं।</p>



<p>इतिहास के इस महान पर गुमनाम से किरदार ने अपनी जान हथेली पर लेकर कोयला सहित उर्जा और शक्ति के स्रोतों संसाधनों को तलाशा तराशा, पानी से बिजली बनाई और घरो घरों में बिजली पंहुचाकर हर घर को रोशनी से नहलाया पर उसके पुरुषार्थ का कारवां यही नहीं ठहरा उसने इन्हीं उर्जा के संसाधनों के सहारे  कल कारखाने बनाए चलाए और  दुनिया के हर इंसान की हर तरह भूख चाहत, खवाबों, ख्वाहिशो और फैशन की इच्छाओं को पूरा किया और आज भी कर रहा है।</p>



<p>अमेरिका में शिकागो में आठ घंटे काम समय तय किए जाने की मांग करते हुए मजदूरो की शहादत से मजदूर दिवस मनाने का चलन- कलन शुरू हुआ। भारत में मद्रास में 1923 से मजदूर दिवस मनाने का चलन आरम्भ हुआ। इतिहास में दर्ज कई संग्रामो और कई क्रांतिओ को राह दिखाने वाले इस रहबर के सम्मान में पूरे वर्षभर में आयोजित होने वाले इस इकलौते उत्सव पर मजदूर दिवस पर मेहनतकश मजदूरों को मजदूर दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। मेहनतकश मजदूरों को हिकारत भरी नजरों से देखने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने की कोशिशों का संकल्प लेते हुए मजदूर दिवस की हार्दिक बधाई। </p>
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		<title>धन-बल और बाहुबल का बढता प्रभाव और बौद्धिक वर्ग की संकुचित होती राजनीतिक भूमिका!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Apr 2023 13:33:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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		<category><![CDATA[भ्रष्टाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="710" height="432" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सत्य का क्षरण: राजनीतिक समाचारों से जुड़ा कलंक और पत्रकारिता पर इसका प्रभाव" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429.jpeg 710w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429-300x183.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429-696x423.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429-690x420.jpeg 690w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429-313x190.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 710px) 100vw, 710px" title="धन-बल और बाहुबल का बढता प्रभाव और बौद्धिक वर्ग की संकुचित होती राजनीतिक भूमिका! 9">विश्व में होने वाली विविध क्रांतिओं और समय-समय पर होने वाले सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन और सामाजिक सुधारों की सफलता में उस समाज के बौद्धिक वर्ग की अग्रणी भूमिका रही है। दुनिया में समय-समय पर होने वाले इन समस्त सामाजिक परिवर्तनों,सामाजिक सुधारों और सुप्रसिद्ध क्रांतिओ का कुशलता पूर्वक मार्गदर्शन बौद्धिक वर्ग (चिंतक, विचारक, दार्शनिक, साहित्यकार [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="710" height="432" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सत्य का क्षरण: राजनीतिक समाचारों से जुड़ा कलंक और पत्रकारिता पर इसका प्रभाव" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429.jpeg 710w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429-300x183.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429-696x423.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429-690x420.jpeg 690w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283429-313x190.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 710px) 100vw, 710px" title="धन-बल और बाहुबल का बढता प्रभाव और बौद्धिक वर्ग की संकुचित होती राजनीतिक भूमिका! 10"><p>विश्व में होने वाली विविध क्रांतिओं और समय-समय पर होने वाले सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन और सामाजिक सुधारों की सफलता में उस समाज के बौद्धिक वर्ग की अग्रणी भूमिका रही है। दुनिया में समय-समय पर होने वाले इन समस्त सामाजिक परिवर्तनों,सामाजिक सुधारों और सुप्रसिद्ध क्रांतिओ का कुशलता पूर्वक मार्गदर्शन बौद्धिक वर्ग (चिंतक, विचारक, दार्शनिक, साहित्यकार इत्यादि) द्वारा ही किया गया और बौद्धिक समुदाय द्वारा ही इन क्रातियों और विविध परिवर्तनो के लिए आवश्यक आधार-भूमि,पृष्ठभूमि और भावभूमि तैयार की गई और बौद्धिक समुदाय के विचारों के फलस्वरूप ही क्रांतिओ और परिवर्तनों के लिए अनुकूल परिस्थितियां निर्मित हुई।</p>
<p>इसके साथ ही साथ इन समस्त सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनो,सामाजिक सुधारों और क्रांतिओ को मानसिक, मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक प्रेरणा भी बौद्धिक वर्ग के महान विचारों और संघर्षों से मिली। स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व के नारे के साथ लडी गयी फ्रांसीसी क्रांति के वैचारिक बौद्धिक और दार्शनिक प्रणेता जीन जैक्स रूसो,मांटेस्क्यू और वाल्टेयर थे,अमेरिकन क्रांति के प्रणेता टामस जेफरसन,डिडेरो और फ्रेंकलिन थे,तथा सोवियत संघ में सम्पन्न होने वाली समाजवादी क्रांति को वैज्ञानिक समाजवाद के जन्मदाता कार्ल मार्क्स के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरणा मिली थी।</p>
<p>सातवीं शताब्दी से लेकर पन्द्रहवीं शताब्दी तक पूरी तरह अंधकार में डूबे यूरोपीय महाद्वीप में पुनर्जागरण और जनमानस में आधुनिक तार्किक वैज्ञानिक मानवतावादी चेतना का जन्म कोपरनिकस कैपलर गैलीलियो जैसे अनगिनत दूरदर्शी साहसी चिंतको और विचारकों के महान विचारों और संघर्षों के फलस्वरूप हुआ। इन दूरदर्शी विचारकों के आधुनिक विचारों ने सातवीं शताब्दी से लेकर पन्द्रहवीं शताब्दी तक अंधकार में डूबे यूरोपीय महाद्वीप को आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक समाज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कोपरनिकस कैपलर गैलीलियो के अतिरिक्त जिन अन्य महान विचारकों ने यूरोपीय महाद्वीप को बहुआयामी रूप से तरक्की की बुलंदी तक पहुँचाया उनमें जान लाॅक ,जरमी बेंथम,जान स्टुअर्ट मिल और कार्ल मार्क्स जैसे चिंतको विचारकों और दार्शनिकों के विचारों और संघर्षों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सुकरात अरस्तू प्लेटो पाइथागोरस इरेटास्थनीज जैसे अनगिनत दार्शनिकों विद्वानों और विचारकों की बहुलता के कारण ही प्राचीन यूनान को ज्ञान-बिज्ञान का पालना कहा गया।</p>
<p>इसी परम्परा में गुरु वशिष्ठ गुरु विश्वामित्र गुरु चाणक्य गुरु संदीपनी जैसे अपने श्रेष्ठ और महान गुरुओं और उनकी महान शिक्षाओ के कारण भारत वैश्विक स्तर पर विश्व गुरू के रूप में विख्यात रहा। गुरु विश्वामित्र गुरु संदीपनी जैसे श्रेष्ठ और महान गुरुओं के कुशल मार्गदर्शन में मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगीराज श्री कृष्ण जैसे युगों के महानायक अवतरित हुए और गुरु चाणक्य की महान शिक्षाओ ने चन्द्रगुप्त मौर्य जैसे महान चक्रवर्ती सम्राट को पैदा किया। इसी कडी में भारतीय स्वाधीनता संग्राम का महासंग्राम तत्कालीन भारतीय बौद्धिक वर्ग (शिक्षक वकील पत्रकार और प्रखर समाज सेवियों ) के मार्गदर्शन और नेतृत्व में लडा गया।</p>
<p>स्वाधीनता संग्राम के दौरान शिक्षकों वकीलों और पत्रकारो द्वारा ही भारतीय जनमानस को स्वतंत्रता का अर्थ और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना समझाया गया तथा स्वतंत्रता की महत्ता और स्वतंत्रता का मूल्य बोध भी शिक्षकों वकीलों और पत्रकारो द्वारा ही निराश हताश भारतीय जनमानस को कराया गया। भारतीय संविधान के निर्माण से लेकर स्वाधीन भारत के पुनर्निर्माण और विकास के लिए सर्वाधिक प्रयास और प्रयत्न भी भारत के बौद्धिक वर्ग द्वारा ही किया गया। स्वाधीनता उपरांत भारतीय जनमानस की आशाओं आकांक्षाओं और सपनों को होमी जहाँगीर भाभा विक्रम साराभाई महान कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन और वर्गीस कुरियन जैसे मेधावियों द्वारा अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचाने और व्यवहारिक परिणति तक लाने के लिए ईमानदार प्रयास किए गए। स्वाधीनता उपरांत भारतीय शासन सत्ता के सर्वोच्च पदों को उस दौर के उच्चकोटि के प्रतिभाशाली व्यक्तित्वो ने सुशोभित किया।</p>
<p>डॉ राजेंद्र प्रसाद सर्वपल्ली राधा कृष्णन पंडित जवाहरलाल नेहरू कृष्णा मेनन डॉ भीम राव अंबेडकर इत्यादि सभी उच्चकोटि के प्रतिभाशाली थे। स्वाधीनता उपरांत भारतीय संसदीय राजनीति में योग्यता प्रतिभा सचरित्रता ईमानदारी और बचनबद्धता अनिवार्य और अपरिहार्य परिपाटी और परम्परा के रूप में स्थापित रही। गैर कांग्रेसी राजनीतिक पुरोधाओं डॉ राम मनोहर लोहिया आचार्य नरेन्द्र देव बलराज मधोक के अन्दर वैश्विक राजनीति की उच्चकोटि समझदारी और उत्कट मेधा शक्ति थी। प्रकारान्तर से योग्यता प्रतिभा मेधा हमारी राजनीतिक संस्कृति का अपरिहार्य तत्व थे।</p>
<p>परन्तु जैसे जैसे सम्पन्न्नता बढी वैसे-वैसे प्रतिभाशाली बौद्धिक समुदाय जैसे शिक्षक वकील पत्रकार और अन्य प्रखर पेशेवर बुद्धिजीवी भारतीय राजनीति में केन्द्रीय भूमिका से बाहर होते गए वर्तमान दौर में अपराधियों माफियाओ भ्रष्टाचारियो और धन्नासेठो ने इन्हें ढकेल कर परिधि पर खड़ा कर दिया हैं। 1952 के प्रथम निर्वाचित संसद से लेकर वर्तमान संसद की डेमोग्रेफी का अध्ययन किया जाय स्थितियाँ बिल्कुल भयावह नजर आती हैं। 1952 की पहली लोक सभा में चुनकर जाने वाले सदस्यों में सबसे ज्यादा संख्या शिक्षकों वकीलों और पत्रकारो की थी परन्तु उत्तरोत्तर इनकी संख्या घटती गयी। वर्तमान समय में संसद और राज्यों की विधानसभाओं में शिक्षको वकीलों पत्रकारो और अन्य बौद्धिक वर्ग की संख्या लगभग नगण्य है।</p>
<p>आज उनकी जगह धीरे-धीरे समाज के अपराधी माफिया बाहुबली भ्रष्टाचारी धन्नासेठ और घोर जातिवादी और साम्प्रदायिक लम्पट नेता संसद और विधानसभा के गलियारों में नजर आने लगे। यह सिलसिला निरंतर आगे ही बढता रहा और अपराध और जरायम पेशे के लोगों के उत्तरोत्तर बढते हौसले और जनता के बीच उनके प्रति बढते आकर्षण ने चम्बल के बीहड़ो में दहशत और आतंक का पर्याय बन चुके चम्बल के डकैतो को भी चुनाव में किस्मत आजमाने का हौसला दे दिया।</p>
<p>सदियों से भारतीय बसुन्धरा सम्पूर्ण विश्व में अपने ज्ञान,मेधा,चिंतन दर्शन और उत्कृष्ट शिक्षा और उच्चकोटि के दार्शनिकों तथा सर्वश्रेष्ठ गुरूओं के कारण ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की भूमि के रूप में जानी जाती रही हैं। महात्मा बुद्ध महावीर जैसे दार्शनिकों न केवल भारत भूमि को अपितु अपने दार्शनिक एवम आध्यात्मिक विचारों से पूरी दुनिया को प्रभावित किया। इतिहास साक्षी है कि-भारतीय बसुन्धरा पर वही विभूतियाँ महिमामंडित होती रही हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा पराक्रम परिश्रम कुशलता कुशाग्रता हुनर और हौसले से सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन लाया।</p>
<p>गुरु वशिष्ठ गुरू विश्वामित्र गुरू द्रोणाचार्य और आचार्य चाणक्य की वंश परंपरा के सच्चे ध्वजवाहक वर्त्तमान दौर के शिक्षकों, इंसाफ के मन्दिर में इंसाफ, इंसानियत और इंसानी हक हूकूक की खातिर काली कोट पहनकर बहस करने वाले वकीलों, लोकतंत्र के चौथे खम्भे के स्तम्भ माने जाने वाले पत्रकारों और देश के सच्चे सचेत जागरूक बुद्धिजीवियों को आज अपनी घटती गिरती उत्तरोत्तर राजनीतिक सामाजिक हैसियत पर गहराई से आत्म-चिंतन आत्म-विश्लेषण और आत्म-मंथन करने की आवश्यकता है।</p>
<p>लगभग दो सौ वर्षों तक पराधीनता के दौरान इस देश के जनमानस के पराधीन मन मस्तिष्क को स्वाधीनता का अर्थ और स्वाधीनता के लिए संघर्ष करना शिक्षकों वकीलों पत्रकारों और उस दौर के सचेत बुद्धिजीवियों ने ही बताया और समझाया।आजादी के दौरान होने वाले हर तरह के आन्दोलन का नेतृत्व शिक्षकों वकीलों पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने ही किया था। इसलिए स्वाधीनता उपरांत इस देश के जनमानस ने सबसे ज्यादा भरोसा विश्वास इन्हीं शिक्षकों वकीलों पत्रकारों और बुद्धिजीवियों पर जताया और इसीलिए सत्तर के दशक तक इस देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओ में जनता ने अपने प्रतिनिधि के रूप में चुनकर अवसर दिया। परन्तु जैसे जैसे आजादी के जश्न की ढोल नगाड़ो की थाप मद्धम पडती गई वैसे वैसे शिक्षक वकील पत्रकार और बुद्धिजीवी राजनीतिक शक्ति सत्ता और प्रभाव की मुख्य धुरी या केन्द्रीय स्थिति से परिधि पर या हासिए पर धकेल दिए गए ।नब्बे के दशक तक आते-आते कास्ट क्राइम और कैश का जादू सिर चढकर बोलने लगा।</p>
<p>जाति धर्म की बुनियाद पर सामाजिक अभियांत्रिकी (सोशल इंजीनियरिंग)चुनाव जीतने का सबसे आसान और अचूक फार्मूला बन गया। इसी दौरान हर जातियाँ अपनी जाति के रॉबिनहुड स्टाइल के बाहुबलियों मे अपना नायक ढूँढने खोजने लगी और देखते ही देखते बाहुबली अपनी-अपनी जातियों के रहनुमा और मसीहा बन गए। जनमानस में वर्तमान दौर के राजनेताओं की घटती लोकप्रियता विश्वसनीयता और आकर्षण ने राजनीतिक दलों को अपनी राजनीतिक रैलियां सफल बनाने के लिए रूपहले पर्दे के सितारों और सिने तारिकाओं की सहायता लेने के लिए मजबूर कर दिया।आज ग्लैमरस चेहरे राजनीतिक रैलियों के अनिवार्य अंग हो गए और अपने मजबूत राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को परास्त करने के लिए भी राजनीतिक दलो ने रूपहले पर्दे के चमकते दमकते चेहरों को बतौर उम्मीदवार चुनाव में उतारना आरम्भ कर दिया। इन बहुविवीध कारणों से भारतीय राजनीति संसदीय राजनीति की स्वस्थ्य परम्पराओं से दूर होती गई और और इक्सवी सदी के आरम्भ से ही देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओ में सोच विचार शिष्टाचार और विषयवस्तु की दृष्टि से बहस का स्तर उत्तरोत्तर गिरता गया ।</p>
<p>यह सर्वविदित है कि संसद और विधान सभाओं में सुयोग्य सचरित्र ईमानदार के साथ साथ प्रतिभाशाली जब जनप्रतिनिधि बनकर संसद और विधानसभाओं में पहुँचेगे तभी देश की वास्तविक समस्याओं और जनता के बुनियादी मुद्दों पर धारदार बहस होगी और जब धारदार बहस होती है तभी जनता के पक्ष मे शानदार नीतियां बनती हैं और जनता के पक्ष में शानदार फैसले होते है। इसलिए आज शिक्षकों वकीलों पत्रकारों सहित सम्पूर्ण बौद्धिक तबके को अपनी घटती सामाजिक हैसियत और राजनीति भूमिका तथा जनमानस में उत्तरोत्तर बढती अस्वीकार्यता पर आत्म-मंथन करते हुए नये दौर की चुनौतियों के लिहाज से अपने को तैयार करना होगा ।प्रकारांतर से बौद्धिक समुदाय का सक्रिय हस्तक्षेप स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।</p>
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		<title>बेहतर मतदाता ही बेहतर नेता का चुनाव कर सकता हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Feb 2023 18:41:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="बेहतर मतदाता ही बेहतर नेता का चुनाव कर सकता हैं" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="बेहतर मतदाता ही बेहतर नेता का चुनाव कर सकता हैं 11">लोकतंत्र एक गतिशील अवधारणा हैं। बेहतर लोक तंत्र बनाने के लिए सबसे पहले बेहतर जनमानस बेहतर समाज और बेहतर जनप्रतिनिधि चुनने वाला बेहतर मतदाता बनाना होगा। इसलिए सामाजिक, आर्थिक सांस्कृतिक और अन्य परिवर्तनों के अनुरूप लोकतंत्र का स्वरूप बनता-बिगडता रहा है। पाश्चात्य जगत में ज्ञान-विज्ञान के पालना के साथ-साथ लोकतंत्र की जन्मभूमि के रूप में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="बेहतर मतदाता ही बेहतर नेता का चुनाव कर सकता हैं" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="बेहतर मतदाता ही बेहतर नेता का चुनाव कर सकता हैं 12">



<p>लोकतंत्र एक गतिशील अवधारणा हैं। बेहतर लोक तंत्र बनाने के लिए सबसे पहले बेहतर जनमानस बेहतर समाज और बेहतर जनप्रतिनिधि चुनने वाला बेहतर मतदाता बनाना होगा। इसलिए सामाजिक, आर्थिक सांस्कृतिक और अन्य परिवर्तनों के अनुरूप लोकतंत्र का स्वरूप बनता-बिगडता रहा है। पाश्चात्य जगत में ज्ञान-विज्ञान के पालना के साथ-साथ लोकतंत्र की जन्मभूमि के रूप में विख्यात यूनान के एथेंस में दास प्रथा खुलेआम प्रचलित थी। इसको अनुचित गैर प्रजातांत्रिक नहीं माना जाता था। परन्तु आज वर्तमान लोकतंत्र में दास प्रथा, छूआ-छूत और अन्य सामाजिक भेदभाव की कुव्यवस्थाओं को लोकतंत्र के मस्तक पर कलंक माना जाता है। इतिहास में अनगिनत संघर्षों के उपरांत आज आधुनिक लोकतंत्र का जो सर्वमान्य और सर्वव्यापी स्वरूप उभर कर आया है वह कुछ बुनियादी स्तम्भों पर टिका होता हैं । वह बुनियादी स्तम्भ है सत्ता का विकेन्द्रीकरण, जनता में अंतिम रूप से सम्प्रभुता का निवास अर्थात लोक सम्प्रभुता, तार्किक और बौद्धिक बहस तथा अभिव्यक्ति की पर्याप्त आजादी, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद तथा सूचना- संचार के साधनों को पूरी स्वतंत्रता । लोकतंत्र की सकारात्मक गतिशीलता स्वस्थ , तार्किक और बौद्धिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुरूप जनमत निर्माण की परम्परा और प्रक्रिया निर्भर करती है।&nbsp;</p>



<p>लोकतंत्र, जनतंत्र और प्रजातंत्र, इन तीनों शब्दों का निहितार्थ हैं जनता का राज। लोकतंत्र में आम जनमानस स्वतन्त्रता और समानता का एहसास करते हुए अपनी इच्छा के अनुरूप एक निश्चित अवधि के लिए अपना शासक चुनता है। देश के जनमानस की इच्छा, अभिव्यक्ति और अभिमत को ही राजनीति विज्ञान की भाषा में जनमत कहा जाता हैं। जनतंत्र की गुणवत्ता का आकलन जनमत से ही किया जाता&nbsp; है। एक स्वस्थ लोकतंत्रिक देश में जनमत का निर्माण उस देश के नेताओं , समाचार पत्रों, पत्रिकाओं सहित सम्पूर्ण प्रिंट मीडिया , इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सहित सूचना संचार के साधनों , लोकतंत्र में आस्था रखने वाले बौद्धिक समुदाय द्वारा सम्पन्न गोष्ठियों ,न्यायिक निर्णयों और न्यायविदों की टिप्पणियों , राजनीतिक दलों के विभिन्न कार्यक्रमों तथा सम्मेलनों और जनमानस के बीच होने वाली चर्चा परिचर्चा और विचार- विमर्श द्वारा होता हैं । सचरित्र, ईमानदार, बचनबद्ध ,सच्ची जनसेवा की भावना रखने वाले&nbsp; और पढें-लिखें नेता अपने भाषण और विचार द्वारा&nbsp; तार्किक, बौद्धिक, विवेकसम्पन्न , जागरूक , वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण और सक्रिय जनमत का निर्माण करते हैं। इसके विपरीत चुनावी मौसम भाॅपकर गिरगिटों की तरह रंग बदलने वाले, बेईमान, धूर्त, आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे, घोर जातिवादी और साम्प्रदायिक मानसिकता से ग्रसित नेता कुंठित, संकीर्ण, उन्मादी , नकारात्मक और निष्क्रिय जनमत का निर्माण करते हैं। इसी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक सूचना संचार के औजार स्वस्थ, सहिष्णु, सचेत और बौद्धिक&nbsp; जनमत का निर्माण करते हैं। जबकि दिन-रात सत्ता की चौखटो का चालीसा गाने वाले तथा चाट-भारण परम्परा के सूचना संचार के औजार कूपमंडूक , अंधभक्ति से परिपूर्ण और भेंड चाल वाले जनमत का निर्माण करते हैं। देश के बौद्धिक समुदाय द्वारा भी जनमत का निर्माण किया जाता हैं। जब बौद्धिक समुदाय ईमानदारी, निष्पक्षता और निःस्वार्थ भावना से देश की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर अपना विचार प्रस्तुत करता है तो बौद्धिक, तार्किक और विवेक पूर्ण जनमत का निर्माण करते हैं। इसके विपरीत सत्ता सुख की चाहत रखने वाले तथा चाॅदी के सिक्कों पर बिकने वाले बुद्धिजीवी संकीर्ण, सतही और संकुचित सोच वाला जनमत तैयार करते हैं। जबतक स्वस्थ, स्वतंत्र, निर्भीक, बौद्धिक, जागरूक और सक्रिय जनमत नही होगा तब तक जनमानस को सुयोग्य, सचरित्र, ईमानदार और उर्जावान नेतृत्व नहीं मिल पाएगा।</p>



<p>स्वतंत्रता और समानता लोकतंत्र की प्राणशक्ति है। स्वतंत्रता का निहितार्थ हैं मनुष्य अपनी इच्छा और विवेक के अनुसार अपने जीवन का निर्धारण कर सकें। राजनीतिक दृष्टि से समानता का तात्पर्य है कि-प्रत्येक&nbsp; व्यक्ति को बारी-बारी से शासन संचालन का अवसर मिलना चाहिए। प्रकारांतर से प्रजातंत्र में जनता को स्वयं अपने राजनीतिक भाग्य को निर्धारित और संचालित करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। जिस समाज में अंधविश्वास और भय मुक्त वातावरण में तर्क , वितर्क, चिंतन मनन करने की स्वतंत्रता रहती हैं निश्चित रूप से वहाँ स्वस्थ जनमत का निर्माण होता हैं।&nbsp;</p>



<p>जनमत और नेतृत्व में गहरा संबंध पाया जाता हैं। कुशल, दूरदर्शी, प्रगतिशील और सर्वसमावेशी नेतृत्व द्वारा निर्भीक, निष्पक्ष और जागरूक जनमत का निर्माण किया जाता हैं। स्वाधीनता संग्राम के दौरान राजाराम मोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, केशव चन्द्र सेन, महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, बाल गंगाधर तिलक तथा महात्मा गांधी ने निर्भीक, साहसी, अनुशासित और संघर्षशील जनमत का निर्माण किया। इन समस्त विभूतियों ने यथाशक्ति चिरपोषित असंगत धारणाओं , परस्पर व्याप्त दुराग्रहों, प्रचलित मिथकों और मताग्रहों, विभिन्न प्रकार की संकीर्णताओं, अंधविश्वासों, पाखंडो और बुद्धिहीनता का भण्डाफोड किया। इसके स्थान पर इन विभूतियों ने एक सभ्य लोकतंत्रिक समाज के लिए आवश्यक तार्किक, बौद्धिक और जागरूक जनमत तथा जन समुदाय का निर्माण किया । लोकतंत्र में लोकमत राजनीतिक मत की अपेक्षा व्यापक अवधारणा हैं। क्योंकि लोकमत में राजनीतिक मत के साथ- साथ सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक अभिमत भी समाहित रहता हैं। सार्वजनिक रूप से अभिवृत्तियों की स्पष्ट और औपचारिक अभिव्यक्ति को &#8220;मत &#8221; अथवा अभिमत कहा जाता हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि- मनुष्य के मन मस्तिष्क में संचरित&nbsp; अभिवृत्तियों, प्रवृत्तियों, भावनाओं और विचारों का निरूपण सामाजिक और ऐतिहासिक वातावरण में होता हैं। इसलिए किसी देश में लोकमत के निर्धारण में लोक आस्थाओं, लोक मान्यताओं, लोक परंपराओं और रीति- रिवाजों की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं।&nbsp;</p>



<p>जनमत एक गतिशील अवधारणा हैं। जो समय, नेतृत्व, सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक परिवर्तन के लिहाज़ से बदलती रहती है। कभी-कभी सत्य की साधना में साधनारत दूरदर्शी व्यक्तियों द्वारा उद्घाटित विचारों से भी जनमत का निर्माण होता हैं। सुकरात, गैलीलियो, कोपरनिकस और दयानंद सरस्वती इस तरह के दूरदर्शी व्यक्तियों के रूप&nbsp; में लोकमानास में स्वीकार किए जाते हैं। हालांकि जन समुदाय इन महापुरुषों के विचारों को तात्कालिक रूप से स्वीकार नहीं करता है। परन्तु जैसे-जैसे जन मानस की सामूहिक समझदारी बढती जाती हैं वैसे-वैसे इन सत्य के साधकों के विचार जन मानस में प्रचलित और प्रवाहमान होने लगते हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र में लोकमत नमनीय तथा परिवर्तनशील होता हैं। लोकहित में प्रकट किए गए नवीनतम&nbsp; विचारों, संकल्पनाओ , अवधारणाओं और सिद्धांतों के अनुरूप लोकमत धीरे-धीरे परिवर्तित होता रहता हैं। एक सफल राजनेता वही होता हैं जो जनसमुदाय को नकारात्मक, विध्वंसक प्रवृत्तियों, निस्सारता तथा निराशा से बाहर निकाल कर उसमें&nbsp; आशा और कर्मठ्ता का संचार करें। इसलिए संकीर्ण राजनीतिक&nbsp; स्वार्थों की पूर्ति के लिए नेताओं को नकारात्मक, विध्वंसक और उन्मादी जनमत के निर्माण से परहेज करना चाहिए। प्रगतिशील तथा विकासोन्मुखी जनमत ही देश को शक्तिशाली और सामर्थ्यवान नेतृत्व प्रदान कर सकता हैं। जब देश की नेतृत्वकारी शक्तियां लोकतंत्र को महज एक शासन प्रणाली के रूप न स्वीकार कर लोकतंत्र को जीवन दर्शन कर लेती तो जनमत का निर्माण समझदारी, बुद्धिमत्ता पूर्ण और दूरदर्शिता पूर्ण तरीके से करना पड़ता हैं। जिससे लोकतंत्र महज राजनीतिक जीवन की चहारदीवारी से बाहर निकल कर हमारे नागरिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में स्थापित होने लगता है।&nbsp;</p>



<p>बुनियादी मुद्दों और बुनियादी समस्याओं पर होने सच्चे, ईमानदार, अनुशासित और अहिंसक जन आन्दोलनो से भी जनमत का निर्माण होता हैं तथा जन समुदाय का शिक्षण- प्रशिक्षण होता हैं। पराधीनता काल में 1857 से लेकर 1947 तक होने वाले विभिन्न आन्दोलनों ने भारतीय जनमानस को राजनीतिक रूप से शिक्षित-प्रशिक्षित किया। इन आन्दोलनों के कारण ही देश की जनता अंग्रेजों के विरुद्ध तन कर खडी हूई और अंततः अंग्रेजों को देश छोड़कर पलायन करना पडा। आजादी के बाद भी बहुत से आन्दोलन भारत में हुए। 1977 मे श्रीमती इन्दिरा गाँधी द्वारा देश में आपातकाल लगाए जाने के विरुद्ध लोक नायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में देश भर एक सशक्त आन्दोलन हुआ। इस आन्दोलन के फलस्वरूप एक ऐसा जनमत तैयार हुआ जिसनें आजादी के बाद लगभग तीस वर्ष से लगातार&nbsp; शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया। दक्षिण अफ्रीका में डाक्टर नेल्सन मंडेला के नेतृत्व मे गांधीवादी तरीके से रंग भेद नीति के खिलाफ एक लम्बा आंदोलन किया गया। जिससे स्वस्थ जनमत का निर्माण हुआ । 1990 से दक्षिण अफ्रीका में&nbsp; लगातार रंग भेद रहित लोकतंत्रिक व्यवस्था चल रही हैं। हमारे पडोसी देश नेपाल में नब्बे के दशक से राजतंत्र के विरुद्ध लगातार आंदोलन चलता रहा। जिसके फलस्वरूप नेपाल में धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रीक संविधान का निर्माण हुआ है और राजतंत्र का पूरी तरह खात्मा हो गया है। अभी भारत में हाल में लगभग तेरह महीने तक लम्बा ऐतिहासिक किसान आंदोलन चला। जिसके फलस्वरूप ऐसा जनमत तैयार हुआ जिसके समक्ष पूर्ण बहुमत की सरकार को झुकना पड़ा।&nbsp;</p>



<p>निष्कर्षतः लोकतंत्र में जनमत की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं। भारत सहित तिसरी दुनिया के देशों में धार्मिक और सामाजिक समस्याओं में जनमत की अभिव्यक्ति तीव्रता से होती हैं जबकि राजनीतिक, आर्थिक और बुनियादी समस्याओं पर जनमत की अभिव्यक्ति कमजोर होती हैं। इधर मंडल और कंमडल के बाद भारतीय राजनीति में जातिवादी और साम्प्रदायिक नेताओं की लम्बी कतार उभर आई हैं।&nbsp; समाज में धार्मिक परम्पराएं और भावनाएं बहुत ही क्रियाशील सामाजिक शक्ति हुआ करती हैं। इसलिए धार्मिक और जातिवादी भावनाओं को भड़काने वाले नेताओं का प्रभाव जनमानस देखा जा रहा हैं। यह स्वस्थ जनमत निर्माण और स्वस्थ लोकतंत्र की दृष्टि खतरनाक प्रवृत्ति हैं। राजनीतिक, आर्थिक और बुनियादी समस्याओं पर जनमत का निर्माण करने की आवश्यकता है। जनमत मतदान आचरण और व्यवहार को भी प्रभावित करता है। स्वस्थ जनमत द्वारा हम स्वस्थ मतदान आचरण और व्यवहार अपना कर ईमानदार और जनता के पक्ष में काम करने वाली सरकार चुन सकते हैं। तभी भारतीय लोकतंत्र को महज मस्तक गणना करने वाला नहीं बल्कि जागरूक और जिन्दा मस्तिष्क वाला लोकतंत्र बना सकते हैं।&nbsp;</p>
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		<title>मंहगाई, भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण पर नियंत्रण और उपयुक्त आर्थिक नीतियों द्वारा दूर हो सकती हैं गरीबी!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 01 Feb 2023 15:44:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<img width="960" height="637" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="मंहगाई, भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण पर नियंत्रण और उपयुक्त आर्थिक नीतियों द्वारा दूर हो सकती हैं गरीबी!" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495.jpg 960w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-300x199.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-768x510.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-696x462.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-633x420.jpg 633w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-313x208.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" title="मंहगाई, भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण पर नियंत्रण और उपयुक्त आर्थिक नीतियों द्वारा दूर हो सकती हैं गरीबी! 13">स्वाधीनता उपरांत गरीबी भारत में एक प्रमुख चुनौती रही हैं जो कमोबेश आज भी एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है। इसलिए आमजनता को चट्टी चौराहों पर चुनावी चर्चा के दौरान जातिवादी समीकरणों की जोड़-तोड करने के बजाय गरीबी भूखमरी और कुपोषण जैसी चुनौतीपूर्ण समस्याओं के कारण और निवारण पर बहस करना चाहिए। स्वाधीनता उपरांत केन्द्र [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="960" height="637" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="मंहगाई, भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण पर नियंत्रण और उपयुक्त आर्थिक नीतियों द्वारा दूर हो सकती हैं गरीबी!" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495.jpg 960w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-300x199.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-768x510.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-696x462.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-633x420.jpg 633w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-313x208.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" title="मंहगाई, भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण पर नियंत्रण और उपयुक्त आर्थिक नीतियों द्वारा दूर हो सकती हैं गरीबी! 14">



<p>स्वाधीनता उपरांत गरीबी भारत में एक प्रमुख चुनौती रही हैं जो कमोबेश आज भी एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है। इसलिए आमजनता को चट्टी चौराहों पर चुनावी चर्चा के दौरान जातिवादी समीकरणों की जोड़-तोड करने के बजाय गरीबी भूखमरी और कुपोषण जैसी चुनौतीपूर्ण समस्याओं के कारण और निवारण पर बहस करना चाहिए। स्वाधीनता उपरांत केन्द्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों ने गरीबी जैसी समस्या से निजात पाने के लिए तमाम नीतियां बनाई परन्तु आज भी गरीबी भूखमरी और कुपोषण जैसी समस्याएं&nbsp; हमारे नीति निर्माताओं के समक्ष एक गम्भीर चुनौती बनी हुई है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सच्चे सनातनी और सच्चे वेदांती थे तथा विशुद्ध आध्यात्मिक प्रवृत्ति के राजनेता थें। परन्तु उन्होंने वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण अपनाते हुए स्वीकार किया था कि-&#8220;गरीबी अभिशाप नहीं बल्कि मानव निर्मित षड्यंत्र है&#8221;। यह विचार प्रकट करते हुए महात्मा गांधी कल्याणकारी अर्थशास्त्रियों की परम्परा के प्रखर अर्थशास्त्री नजर आते हैं तथा एक जिम्मेदार और समाज के प्रति संवेदनशील राजनेता का परिचय देते हैं। भारत में गरीबी और दरिद्रता को दूर करने के लिए महात्मा गाँधी ने&nbsp; अंत्योदय का सिद्धांत प्रस्तुत किया था। समाज के प्रति संवेदनशील जिम्मेदार और ईमानदार बुद्धिजीवी, राजनेता और शासक कभी भी गरीबी को अभिशाप या आसमानी प्रकोप नहीं मान सकते हैं। गरीबी को अभिशाप मानना बुद्धिजीवी राजनेता और शासक-प्रशासक के लिए अपनी बौद्धिक, राजनैतिक , सामाजिक और शासकीय जिम्मेदारियों से मुंह मोडना हैं। विश्व के अधिकांश विकसित देशों ने दूरगामी और दूरदर्शितापूर्ण आर्थिक&nbsp; नीतियों के माध्यम से आम जनमानस को गरीबी और गुरूबत से बाहर निकालने का सफलतापूर्वक प्रयास किया है। ज्ञान विज्ञान के चमत्कार और आम जनमानस में उद्यमिता की चेतना विकसित कर आधुनिक काल में अधिकांश पश्चिमी दुनिया के देशों ने लोगों का जीवन स्तर उपर उठाने का प्रयास किया। विश्व के प्राचीन, अर्वाचीन और आधुनिक समाज के आर्थिक विकास- क्रम का ऐतिहासिक विश्लेषण किया जाए तो स्पष्टतः परिलक्षित होता हैं कि-शासक वर्ग द्वारा उत्पादकों और श्रमजीवियों का शोषण गरीबी का अनिवार्य कारण रहा हैं। राजतंत्रीय शासन व्यवस्थाओं में कुलीन वर्ग और पुरोहित वर्ग जन साधारण का मनमाना शोषण करते रहे हैं। इन राजतंत्रीय शासन व्यवस्थाओं में शासक अपने भोग-विलास शौक तथा शान-ओ-शौकत के लिए जनता पर मनमाना कर थोपते रहते थे। इसके साथ पुरोहित भी भोली-भाली जनता को अशुभ और अमंगल से भयाक्रांत कर तथा स्वर्ग-नरक का खेल दिखाकर भरपूर शोषण करते रहे हैं ।</p>



<p>स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के नारों के साथ लडी गई फ्रांसीसी क्रान्ति में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता हैं कि-फ्रांस में आम जनमानस ने कुलीनो और पादरियों के शोषण से तंग आकर तीव्रता से संघर्ष किया। फ्रांसीसी क्रान्ति की तरह आम जनमानस का शोषण करने वाले शासकों से आजिज आकर रूस सहित अन्य देशो के जन साधारण वर्ग द्वारा सफल संघर्ष किया गया। इस तरह विश्व की अधिकांश शासन व्यवस्थाओं में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से व्याप्त शोषण गरीबी के लिए स्पषट रूप से उत्तरदायी कारक रहा है। इसलिये प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अर्थव्यवस्था में सक्रिय शोषण के समस्त औजारों को भोथरा करके आम जनमानस को गरीबी से मुक्ति दिलाई जा सकती हैं। आज विश्व की अधिकांश अर्थव्यवस्थाएं सामंतवादी अर्थव्यवस्था से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था&nbsp; में परिवर्तित हो चुकी हैं तथा शोषण के औजार भी बदलते दौर के लिहाज़ से बदल चुके हैं। बदलते दौर के लिहाज़ से शोषण के नये औजारों को चिन्हित करना और उन्हें समाप्त करना जनतांत्रिक सरकारों की अनिवार्य जिम्मेदारी है। कुछ विश्लेषको के अनुसार भारतीय सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था अर्द्ध सामंती तथा अर्द्ध पूंजीवादी प्रवृत्ति की हैं। इसलिए भारत में गरीबी से&nbsp; निजात पाने के लिए सांमती और पूंजीवादी दोंनो व्यवस्थाओं की शोषणकारी प्रवृत्तियों पर प्रहार करना होगा।&nbsp;</p>



<p>ज्ञान विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में जब अगणित आविष्कार होने लगे तो उद्योग धंधों का विकास होने लगा। उद्योग-धंधों के विकास के फलस्वरूप बाजारवादी अर्थत्ंत्र अस्तित्व में आया। बाजारवादी अर्थत्ंत्र में कालाबाजारी मुनाफाखोरी और जमाखोरी जैसे नये तरह के शोषण के&nbsp; औजारों का विकास हुआ तथा नये तरह के शोषकों का अभ्युदय हुआ। सरकार जब बाजार में अहस्तक्षेप की नीति का पालन करने लगती हैं तथा बाजार पर&nbsp; सरकार का&nbsp; नियंत्रण कमजोर हो जाता हैं तो जमाखोरी मुनाफाखोरी कालाबाजारी और मिलावटखोरी की प्रवृत्ति पूरी निर्लज्जता के साथ अपनी पराकाष्ठा पर होती हैं। जिसका स्वाभाविक परिणाम यह होता हैं कि-आवश्यक वस्तुएँ आम जनमानस की पहुँच से दूर होने लगती हैं तथा लोग गरीबी के दलदल में फंसते चले जाते हैं। अधिकांश विकासशील देश इन्हीं समस्याओं के कारण निर्धनता के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। मुंशी प्रेमचंद ने अपने विभिन्न नाटकों और कहानियों में ग्रामीण जन-जीवन में व्याप्त&nbsp; मुख्यतः तीन प्रकार के शोषण का उल्लेख किया है।&nbsp;</p>



<p>मुंशी प्रेमचंद के अनुसार सामंतवाद, पुरोहितवाद और महाजनी व्यवस्था आम जनमानस के शोषण के सबसे सशक्त माध्यम थे। वर्तमान आधुनिक लोकतंत्र में भी चुने हुए जनप्रतिनिधियों में सामंतवादी चेतना गहरे रूप से व्याप्त है। जनता के उत्थान के लिए संचालित योजनाओं में लूट-खसोट करके निर्वाचित जनप्रतिनिधि बेशुमार दौलत के मालिक होते जा रहे हैं। इसी तरह तरह धर्म के आधुनिक ठेकेदार आस्था निष्ठा और श्रद्धा का बाजार खडा करके खूब काली कमाई कर रहे हैं। इसी तरह महाजनी व्यवस्था की प्रवृत्तियाँ आज भी बाजारवादी अर्थत्ंत्र में अपनी पराकाष्ठा पर हैं। भूमंडलीकरण उदारीकरण और निजीकरण के नारों के साथ 1991 में जिस नई अर्थव्यवस्था का आगाज किया गया वह विशुद्ध प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा पर आधारित है। जिसमें अधिकतम मुनाफा प्राप्त करने के लिए मिलावट खोरी जमाखोरी को औजार बनाया गया। जमाखोरी बाजार की शक्तियों का एक ऐसा&nbsp; घिनौना षड्यंत्र है जिसके द्वारा बाजार में आवश्यक वस्तुओं के अभाव का शोर मचाया जाता हैं। इस कृत्रिम अभाव के शोर से आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगते हैं। स्वाभाविक रूप से आवश्यक वस्तुओं के क्षेत्र में बेतहाशा बढती मंहगाई निर्धन लोगों की संख्या में बढोतरी करने में सहायक है।</p>



<p>भारत में स्वाधीनता उपरांत कल्याणकारी अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देते हुए मिश्रित को अपनाया गया। कल्याणकारी अर्थव्यवस्था में आर्थिक संसाधनों का वितरण इस तरह से किया जाता हैं कि-अधिकतम लोगों की अधिकतम भलाई सुनिश्चित हो सके तथा सरकार आम जनमानस के पक्ष में बाजार को समय-समय पर निर्देशित और नियंत्रित करती रहे। स्वाधीनता उपरांत भारत में निर्धनता को दूर करने के लिए सुनियोजित तरीके से कोशिश की गई। भारतीय अर्थव्यवस्था का गम्भीरता से अवलोकन किया जाए तो ज्ञात होता है कि- भारत में&nbsp; निर्धनो की सर्वाधिक संख्या भूमिहीन श्रमिको के रूप मे पाई जाती है। भूमिहीन श्रमिको को गरीबी रेखा से बाहर निकालने के लिए भूमि सुधार कार्यक्रम चलाया गया। स्वाधीनता उपरांत बनने वाली भारत की प्रथम केन्द्रीय सरकार ने एक झटके में जमींदारी रैयतवारी और महालवाडी जैसी व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया गया। पश्चिम बंगाल और केरल में भूमि सुधार के कार्यक्रमो द्वारा निर्धनता की समस्या को काफी हद तक दूर करने का प्रयास किया गया। इसके अतिरिक्त प्रख्यात गांधीवादी संत विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन के माध्यम से भूमिहीन मजदूरों को गरीबी रेखा से उपर उठाने का सार्थक प्रयास किया। इसके अतिरिक्त मानव संसाधन का समुचित विकास कर भी लोगों को गरीबी रेखा से उपर उठाया जा सकता है। केरल की सरकार ने मानव संसाधन के विकास के लिए शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में भरपूर निवेश किया। इस के प्रतिफल स्वरूप केरल विकसित राज्यो की श्रेणी में आ गया। भारत में गरीबी का एक महत्वपूर्ण कारण पराधीनता के समय ब्रिट्रिश साम्राज्य द्वारा अपनाई जानें वाली औपनिवेशिक नीतियाँ थी। इन औपनिवेशिक नीतियों के तहत अंग्रेजी सरकार ने परम्परागत भारतीय कृषि व्यवस्था और हस्तकला को बुरी तरह चौपट कर दिया था। इसलिए सत्तर के दशक में भारतीय कृषि में गतिशीलता लाने के लिए हरित क्रांति लाई गई। हरित क्रान्ति के फलस्वरूप पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के जीवन में सम्पन्नता आई । प्रकारांतर से हरित क्रांति ने पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोगों को गरीबी रेखा से उपर उठाया।</p>



<p>हरित क्रान्ति की तरह श्वेत क्रांति और नीली क्रान्ति के माध्यम से पशुपालकों और मत्स्य पालको के जीवन में सम्पन्नता आई। महाराष्ट्र में सत्तर के दशक में सुनिश्चित रोजगार कार्यक्रमों द्वारा आम जनमानस को&nbsp; गरीबी रेखा से उपर उठाने का प्रयास किया गया। कालांतर में सुनिश्चित रोजगार कार्यक्रम सम्पूर्ण देश में चलाए गए । जो देश की अधिकांश आबादी को गरीबी रेखा से उपर उठाने मे सहायक सिद्ध हूए। इन कार्यक्रमों के अतिरिक्त आवश्यक खाद्य पदार्थों के क्षेत्र में सार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू कर लोगों को गरीबी रेखा से उपर उठाने का प्रयास किया गया। जो तमिलनाडु जैसे राज्य में पर्याप्त रूप से सफल रहा।&nbsp;</p>



<p>आज हम चाॅद पर कदम रख चुके हैं परन्तु आज भी हर संवेदनशील व्यक्ति के मन मस्तिष्क  को मर्मान्तक पीड़ा पहुंचाने वाला तथ्य हैं कि- भारत में उन्नीस करोड़ लोग भूखे पेट सोते हैं तथा लगभग पैत्तीस करोड लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। उस दौर में जब भारत अंतराष्ट्रीय रंगमंच पर स्वयं को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहा है यह आंकड़ा अत्यंत भयावह और भारत की एक बदरंग तस्वीर पेश कर रहा है। भारत में लगभग हर चौथा व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा है। विश्व के अधिकांश देशों की उतनी आबादी नहीं है जितनी भारत में     गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर करने वालों की आबादी हैं। कौशल विकास कार्यक्रमों द्वारा भारतीय युवाओं में उद्यमिता की चेतना जाग्रत कर , कालाबाजारी, जमाखोरी, मिलावटखोरी और मुनाफाखोरी जैसी प्रवृत्तियों पर लगाम लगाकर तथा कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण स्थापित कर आम जनमानस को गरीबी के दलदल में फंसने से बचाया जा सकता हैं । तकनीकी एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा स्वास्थ में पर्याप्त निवेश द्वारा सुदक्ष और सक्षम मानव संसाधन का विकास करना गरीबी रेखा से उपर उठाने के लिये आवश्यक है। फलतः देश के नीति नियंताओं को दूरदर्शी तथा दूरगामी आर्थिक नीतियां बनाकर गरीबी के दुष्चक्र से भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहर निकालना होगा । इसके साथ मंहगाई और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, कृषि आधारित लघु कुटीर उद्योगो को बढावा देकर, भूमि सुधार कानून को ईमानदारी से लागू कर और शिक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से मानव संसाधन में निवेश कर अधिकांश लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया जा सकता है। </p>
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		<title>अपने कमाल, करतब और करिश्मे से बेटियां ही कर सकती हैं दहेज का अंतिम संस्कार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 31 Jan 2023 15:28:27 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
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		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/images28929.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="अपने कमाल, करतब और करिश्मे से बेटियां ही कर सकती हैं दहेज का अंतिम संस्कार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/images28929.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/images28929-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/images28929-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/images28929-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="अपने कमाल, करतब और करिश्मे से बेटियां ही कर सकती हैं दहेज का अंतिम संस्कार 15">आदिम,असभ्य,बर्बर और अनपढ़ जीवन से सभ्य,सुसंस्कृत और सुशिक्षित जीवन के विकासक्रम में और चरण-दर-चरण सभ्यता की ओर उत्तरोत्तर डग भरते हुए मनुष्य ने किसी पंडाॅव पर यौन अराजकता को रोकने और स्त्री-पुरुष संबंधों में स्थिरता,सुनिश्चितता, स्थायित्व और अनुशासन लाने तथा सुनिश्चित दंपत्तियों द्वारा उत्पन्न संततियों के समुचित पालन-पोषण और देख-रेख के लिए सम्भवतः विवाह जैसी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/images28929.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="अपने कमाल, करतब और करिश्मे से बेटियां ही कर सकती हैं दहेज का अंतिम संस्कार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/images28929.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/images28929-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/images28929-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/images28929-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="अपने कमाल, करतब और करिश्मे से बेटियां ही कर सकती हैं दहेज का अंतिम संस्कार 16">



<p>आदिम,असभ्य,बर्बर और अनपढ़ जीवन से सभ्य,सुसंस्कृत और सुशिक्षित जीवन के विकासक्रम में और चरण-दर-चरण सभ्यता की ओर उत्तरोत्तर डग भरते हुए मनुष्य ने किसी पंडाॅव पर यौन अराजकता को रोकने और स्त्री-पुरुष संबंधों में स्थिरता,सुनिश्चितता, स्थायित्व और अनुशासन लाने तथा सुनिश्चित दंपत्तियों द्वारा उत्पन्न संततियों के समुचित पालन-पोषण और देख-रेख के लिए सम्भवतः विवाह जैसी संस्था का विकास किया होगा । विवाह जैसी संस्थाओं के अस्तित्व में आने के फलस्वरूप ही समाज निर्माण की&nbsp; बुनियादी इकाई परिवार अस्तित्व में आया । परिवार के अस्तित्व में आने से मानव जीवन में बहुआयामी दृष्टि से&nbsp; क्रांतिकारी परिवर्तन आया। परिवार के अस्तित्व में आने से आवारा जंगली जानवरों की तरह घूमने वाला मानव सुनिश्चित जिम्मेदारियों के एहसास के साथ सुस्थिर और सुनिश्चित , सुव्यवस्थित और अनुशासित जीवन जीने का प्रयास करने लगा । सुनिश्चित जीवन साथी के साथ जीवन गुजर-बसर की इस नूतन जीवनशैली और दिनचर्या ने मनुष्य को अपनी संततियों के पालन पोषण के कर्तव्यबोध से आबद्ध और प्रतिबद्ध कर दिया तथा इस जीवन शैली ने मनुष्य को आवारा और बदचलन होने से काफी हद तक बचाने का प्रयास किया।&nbsp;</p>



<p>सामाजिक और सांस्कृतिक अनुशासन के माध्यम से एक सुव्यवस्थित और सुसंगठित समाज&nbsp; कायम करने तथा यौन संबंधो में स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण करने की सदिच्छा से विकसित की गई विवाह जैसी संस्था वर्त्तमान समय में&nbsp; धन-दौलत की हवस और&nbsp; लिप्सा की कोख़ से उपजी दहेज जैसी घिनौनी कुप्रथा के कारण दो परिवारों के मध्य निर्मम और निर्लज्ज सौदेबाज़ी का रूप धारण कर चुकी है। ना जाने इतिहास के किस कालखंड में और किन कारणों से दहेज प्रथा का आरम्भ हुआ परन्तु बढते बाजारवादी और उपभोक्तावादी&nbsp; दौर में यह वीभत्स और भयावह रूप धारण कर चुकी है। भौतिक वस्तुओं के आधार पर हैसियत आकलन के बढते चलन-कलन और दहेज़ की रकम को दूल्हे के कुल-खानदान द्वारा मौलिक अधिकार समझने के कारण दहेज प्रथा घर बैठे-बिठाऐ चोखा धन्धा होती&nbsp; जा रही है। जिसके कारण दहेज प्रथा&nbsp; हिंसा और क्रूरता की पराकाष्ठा पर भी&nbsp; पहुंच चुकी हैं । ध्यातव्य हो कि-वयालीसवें संविधान संशोधन द्वारा सम्पत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है। परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि- अप्रत्यक्ष और अनौपचारिक रूप से दहेज वर पक्ष का मौलिक अधिकार बन चुका है। वर्तमान समय में घर की चहारदीवारी के अंदर होने वाली घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के आंकड़ों का गम्भीरता से विश्लेषण किया जाए तो घरेलू हिंसा और महिलाओं के उत्पीड़न का सबसे बड़ा कारण दहेज प्रथा ही हैं ।</p>



<p>एक तरफ जहां गाँव-देहात में यह कहावत प्रचलित रहती हैं कि-&#8221; *बिन घरनी घर भूत का डेरा* &#8220;उस गांव देहात में आज घरनी अर्थात नयी नवेली घरनी को एक अदद मोटरसाइकिल या एक अदद&nbsp; सोने की चैन या एक अदद&nbsp; टीवी इत्यादि के लिए मारा-पीटा जाता है, दूल्हे के परिवार के सभी सदस्य समय-समय पर ताने मारते रहते हैं और अपना घर-बार छोड़ कर आई नये घर में अपनत्व ढूँढती नयी बहुरियाॅ को खाने के लिए ताने मिलते हैं तथा अपने माता-पिता से दहेज की तयशुदा रकम वसूलने और अधिक से अधिक नेग लाने के लिए विवश किया जाता हैं । कभी-कभी तो इसका&nbsp; अत्यंत वीभत्स और मानवता को शर्मसार करने वाला स्वरूप सामने आता है । जब माता-पिता से मन माफिक वसूली न कर पाने पर नयी नवेली दुल्हन को जला दिया जाता हैं और लीपा-पोती करते हुए इसे आत्महत्या बताने का प्रयास किया जाता है। जिस देश में सदियों से बेटियों को घर की लक्ष्मी माना जाता रहा है और जहाँ &#8221; *यत्र नार्यस्तु पूज्य्ंते रंमते तत्र देवता* &#8221; का उद्घोष गुंजित होता रहा है वहाँ मात्र दहेज की रकम कम देने के लिए अनगिनत घरों की अनगिनत लक्ष्मियों को प्रताड़ना का शिकार होना&nbsp; पड़ता हैं ।</p>



<p>समाज के हर वर्ग,जाति,समुदाय और सम्प्रदाय में बुलेट ट्रेन की रफ्तार से बढती दहेज प्रथा आज सर्वव्यापी समस्याॅ बन चुकी हैं। किसी भी स्तर की सरकारी नौकरी मिल जाने पर घर परिवार से लेकर रिश्तेदारों का रौब रुतबा सातवें आसमान पर पहुंच जाता हैं। संघ लोक सेवा आयोग ,विभिन्न राज्य लोक सेवा आयोगों सहित रेलवे बैंकिंग शिक्षा स्वास्थ्य इत्यादि में भर्ती के स्थापित भर्ती बोर्डों द्वारा चयनितों की बोली उसी तरह लगती है जैसे इण्डियन प्रीमियर लीग में क्रिकेट के खिलाडियों की लगती हैं। यही नहीं बल्कि जिस शिक्षक समाज को भावी कर्णधारों का चरित्र निर्माण और सर्वांगीण विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई है उस शिक्षक समाज के मूर्धन्य विद्वान भी चयनित होने पर दहेज के रूप में मोटी रकम लिए बिना शादी विवाह नहीं करते हैं । इस समस्याॅ के वैसे तो बहुत से कारण हैं पर एक पिता के रूप में पुरूष वर्ग की दोहरी मानसिकता और दोहरा चरित्र सर्वाधिक जिम्मेदार है। पुरुष के रूप में एक पिता बिलकुल दोमुहाॅ साॅप की तरह होता हैं। जब वह अपनी लडकी की शादी के लिए दरवाजे-दरवाज़े भटकता है तथा लोभी लालचियों और दौलत के भूखे भेड़ियो द्वारा दहेज के नाम पर मोटी रकम की मांग करने पर दहेज प्रथा को खूब कोसता हैं और दहेज को मिटाने के लिए दोगुनी उर्जा से तत्पर हो जाता हैं। परन्तु जब अपने नौकरीशुदा बेटे की शादी की बात याद आती हैं तो वह मूॅछ ऐठकर लम्बी लम्बी डींगे हाॅकता हैं और उसके&nbsp; हृदय में अपने बेटी को दिए दहेज की भरपाई करने की उत्कंठा प्रबल वेग से जाग्रत हो जाती हैं तथा अपने बेटे की पढाई लिखाई पर किये गये अपने खर्च की रकम भी जोड़ने लगता है। वह दहेज की लम्बी-चौडी सूॅची बेटी के बाॅप को इस तरह पेश करता है जैसे कोई वित्तीय मामलों का मर्मज्ञ&nbsp; वित्त मंत्री संसद में बजट पेश करता है। पुत्र के नाम पर एक कुशाग्र वितमंत्री की तरह दहेज का बजट पेश करने वाले ऐसे दोमुहाॅ साॅपो के आसरे दहेज प्रथा की न तो लडाई लडी जा सकती हैं और न इस घृणित कुप्रथा को कभी समाप्त नहीं किया जा सकता हैं। इस विषय में एक और बडी विडम्बना है कि-संघ लोक सेवा आयोग और अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं में दहेज प्रथा पर उम्दा निबंध लिखकर सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने वाले शादी व्याह के अवसर पर सफ़ेदपोश तरीके से और&nbsp; शिष्टाचारपूर्ण ढंग से खरीद-फरोख्त के शिकार हो जाते हैं।&nbsp;</p>



<p>बहुतेरे कानूनों , समाज सुधार और जागरुकता के कार्यक्रमों के बावजूद दहेज भारतीय समाज में एक महामारी का रूप धारण करती जा रही है। अंतिम रूप से इसका निदान भी उन्हें ही ढूँढना हैं जिनके कारण दहेज दिया-लिया जाता हैं। दहेज प्रथा के खिलाफ अंतिम निर्णायक संघर्ष भारत की होनहार बेटियों को ही लडना होगा। दहेज की महामारी को देखते हुए आइने के सामने अपने सौंदर्य पर इतराने इठलाने वाली बेटियों को अब&nbsp; अपनी अंतर्निहित क्षमता, प्रतिभा और अभिरुचि को पहचान कर ज्ञान विज्ञान कला साहित्य खेल कूद राजनीति और समाज सेवा में अपना करिश्मा करतब और कमाल दिखाना होगा। जैसे-जैसे&nbsp; बहुतायत मात्रा में भारत की बेटियाँ विविध क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा, कुशाग्रता ,मेधाशक्ति,पराक्रम और परिश्रम का परचम बुलंद करने लगेगी वैसे-वैसे&nbsp; दहेज के लिए मुँह बाएं भूखे भेड़ियों के हौसले पस्त होते जायेंगे। इसलिए हर सजग, सचेत और&nbsp; समझदार माता पिता को अपनी बेटियों को उनकी योग्यता क्षमता के अनुसार आगे बढने और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने का अवसर देना चाहिए। जिस तरह तन मन और धन से बेटों के भविष्य निर्माण के लिए माता-पिता तत्पर रहते हैं उसी तरह हर माता-पिता को बेटियों के भविष्य निर्माण के लिए भी तत्पर रहना चाहिए। ताकि बेटियाॅ अपने अन्दर छिपी हुई कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स,पी टी उषा, कर्णमलेश्वरी, साइना नेहवाल, किरण बेदी, महाश्वेता देवी,साक्षी मलिक,पी वी सिंधू टीना डाबी, नैना लाल किदवई और बिद्या छाबड़िया जैसी अनगिनत आदर्श महिलाओं की तरह तलाश, तराश और निखार सकें। जिस दिन बेटियाँ इस तरह विविध क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा और क्षमता को तराशकर और निखार कर अपनी उपलब्धियों के झंडे फहराने लगेगी तो निश्चित रूप से दहेज प्रथा धीरे-धीरे अपने अंतिम संस्कार की तरफ बढ़ने लगेगी। अपनी प्रतिभा क्षमता के अनुरूप पद प्रतिष्ठा प्राप्त होने से बेटियों के अंदर स्वाभिमान आयेगा और अपने पैरों पर खड़ा होने का हौसला मिलेगा। इन्हीं हौंसलों और पैरों में आई आत्मनिर्भरता की ताकत से जब बेटियाॅ दौलत के भूखे भेड़ियो को दरवाजों से ठोकर मारने का साहस दिखाने लगेगी तो दहेज प्रथा रूपी राक्षस अंतिम सांसें गिनने लगेगा।&nbsp;&nbsp;</p>
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		<title>सशक्त पंचायती राज व्यवस्था द्वारा ही वास्तविक लोकतंत्र लाया जा सकता है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Jan 2023 09:59:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="650" height="400" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/Panchayat.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सशक्त पंचायती राज व्यवस्था द्वारा ही वास्तविक लोकतंत्र लाया जा सकता है" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/Panchayat.png 650w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/Panchayat-300x185.png 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/Panchayat-356x220.png 356w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/Panchayat-313x193.png 313w" sizes="auto, (max-width: 650px) 100vw, 650px" title="सशक्त पंचायती राज व्यवस्था द्वारा ही वास्तविक लोकतंत्र लाया जा सकता है 18">भारत एक कृषि प्रधान देश के साथ साथ ग्रामींण सभ्यता और संस्कृति वाला देश भी है। आज भी भारत में कुल आबादी का लगभग पैंसठ प्रतिशत हिस्सा गाँवों में गुजर बसर करता है। हमारे सहज सरल गाँव और गाँव के लोग भारत की समृद्धि के  आधार स्तम्भ है। वैदिक काल से लेकर अंग्रेजो के आगमन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="650" height="400" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/Panchayat.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सशक्त पंचायती राज व्यवस्था द्वारा ही वास्तविक लोकतंत्र लाया जा सकता है" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/Panchayat.png 650w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/Panchayat-300x185.png 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/Panchayat-356x220.png 356w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/Panchayat-313x193.png 313w" sizes="auto, (max-width: 650px) 100vw, 650px" title="सशक्त पंचायती राज व्यवस्था द्वारा ही वास्तविक लोकतंत्र लाया जा सकता है 20"><p>भारत एक कृषि प्रधान देश के साथ साथ ग्रामींण सभ्यता और संस्कृति वाला देश भी है। आज भी भारत में कुल आबादी का लगभग पैंसठ प्रतिशत हिस्सा गाँवों में गुजर बसर करता है। हमारे सहज सरल गाँव और गाँव के लोग भारत की समृद्धि के  आधार स्तम्भ है। वैदिक काल से लेकर अंग्रेजो के आगमन तक भारत के गाँव हमारी शासन व्यवस्था की मौलिक ईकाई रहे हैं। परन्तु अंग्रेजो ने अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की प्रति- पूर्ति में  भारतीय गाँवों की मौलिकता और आत्मनिर्भरता को तहस-नहस कर दिया। इसलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान गाँवो के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक उत्थान की आवाज प्रखरता से उठाई और इसके लिए सहृदय और सचेतन प्रयास भी किया। महात्मा गाँधी ने कहा था कि-&#8220;भारत का भविष्य गाँवो में बसता है &#8220;। गाँवो के उत्थान और विकास के प्रति महात्मा गाँधी की उत्सुकता और उत्कट इच्छा तथा उनके समर्पित भाव को देखते हुए हमारे संविधानविदो ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद चालीस में नीति निदेशक तत्वों के रूप में पंचायती राज व्यवस्था को शामिल किया । इसलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद चालीस को गांधीवादी अनुच्छेद कहा जाता है। स्वाधीनता उपरांत पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ सक्षम सशक्त और सक्रिय बनाने तथा कानूनी हैसियत प्रदान करने के लिए लगभग आधा दर्जन समितियां बनाई गई। जिसमें सबसे पहले बनाई गई बलवंत राय मेहता समिति ने त्रिस्तरीय स्तरीय पंचायतीराज राज व्यवस्था की सिफारिश की। इसी समिति की सिफारिश के आधार पर 1959 मे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने  राजस्थान के नागौर जिले में पंचायती राज व्यवस्था का शुभारंभ किया था । इसके बाद 1977 मे जनता पार्टी की सरकार ने अशोक मेहता समिति बनाई । इस समिति ने द्वि-स्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था की सिफारिश की। महज ढाई साल में ही श्री मोरारजी देसाई की सरकार गिरने के साथ ही अशोक मेहता समिति की सिफारिशे भी मृतप्राय हो गई। स्वर्गीय श्री राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल की अवसान बेला में पंचायत राज व्यवस्था के लिए गम्भीरता से प्रयास किया। उनके कार्यकाल में पंचायती  राज व्यवस्था को सशक्त और सक्रिय बनाने के लिए दो समितियाॅ बनाई गई 1- जी वी के राव समिति और 2- डॉ एल एम सिन्धवी समिति। परन्तु विपक्षी दलों का अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण गम्भीर प्रयास के बावजूद राजीव गांधी को सफलता नहीं मिली। उनके कार्य काल में पंचायती राज व्यवस्था से संबंधित विधेयक राज्य सभा में गिर गया। अंततः 24 अप्रैल 1993 मे 73वे संविधान संशोधन के माध्यम पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया। जिसके उपलक्ष्य में हर वर्ष 24 अप्रैल को पंचायतीराज दिवस के रूप में मनाया जाता हैं। 73वें संविधान संशोधन के तहत पंचायतीराज संस्थाओं को न केवल संवैधानिक दर्जा दिया गया बल्कि नेतृत्व की दृष्टि से इसका परम्परागत सांचा,ढांचा और खांचा ही पूरी तरह से बदल दिया गया। भारत जैसे विविधतापूर्ण बहुलतावादी समाज में महिलाओं, अनुसूचित जातिओ, अनुसूचित जनजातिओ और पिछड़े वर्गों को आबादी के अनुपात में आरक्षण प्रदान कर सबको नेतृत्व करने का अवसर प्रदान किया गया। यह सत्य है कि- 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतीराज संस्थाए सामंतवाद की जकडन से बाहर निकलने में सफल हूई है। महिलाओं सहित वंचित वर्ग मे स्थानीय स्तर पर नेतृत्व करने की चाहत और महत्वाकांक्षा पैदा हूई है। लोकतंत्रिक परिवेश अवश्य व्यापक और विस्तृत हुआ परन्तु जातिगत गोलबंदी भी तेजी से बढी है। लोकतंत्र एक गतिशील अवधारणा हैं। लोकतंत्र की गतिशीलता का स्वाभाविक निष्कर्ष है कि- सत्ता का ऊपर से नीचे की तरफ हस्तांतरण प्रकारान्तर से संकल्पना के रूप में &#8220;सत्ता का बिकेंद्रीकरण&#8221;। जिसके अनुसार गाँवों के विकास के लिए योजनाओ का निर्माण सूदूर राजधानियों में पंचसितारा सुविधाओं से परिपूर्ण किसी आलीशान सरकारी कक्ष में न होकर किसी दूर-दराज़ गाँव के किसी बरगद या पीपल के वृक्ष के नीचे गाँवों की चौपालो के माध्यम से किया जायेगा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सपना भी यही था कि-गाँवो के उत्थान और विकास की योजनाए और  नीतियां गाँवो में ही बननी चाहिए और तभी गाँवों की मौलिकता और आत्मनिर्भरता को वापस लाया जा सकता है।</p>
<p><strong>कहानी में नहीं आता पहेली से नहीं जाता।</strong><br />
<strong>ना जाने क्यों ऐ छाॅला मेरी हथेली से नहीं जाता।।</strong><br />
<strong>तुम्हें आना पडेगा हमारे गाँव की गुमनाम गलियों में,</strong><br />
<strong>क्योंकि सदन का रास्ता तेरी हवेली से नहीं जाता।।</strong></p>
<p>गाँवो के उत्थान और विकास के लिए सवैंधानिक कानूनी और औपचारिक बदलाव के साथ-साथ सामाजिक शैक्षणिक और नैतिक सुधारों की भी  महती आवश्यकता है। हमारे गवंई जन जीवन में कई प्रकार के दुर्गुण और दुर्व्यसन के साथ-साथ सोच-विचार की दृष्टि से कई प्रकार संकीर्णताए और सामाजिक तथा सांस्कृतिक पिछड़ापन पाया जाता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEhsteEPv4L4XaVc_HkwbNbl1d4YgQCkxChJVWjohg8vRr6PWSXW8iMM0jvLjdTr5dxe0nrIPDy5cbspKNPifNDrRZK2xld6B6Ta9a4si6T43mLwN0wWPAA_enA20MDTjKF6d34-NFEIRhIbvppTVDLrxVxDBf86lis1xpmY_1y4qox-m089x-3p2O68=s16000" width="2240" height="1260" alt="सशक्त पंचायती राज व्यवस्था द्वारा ही वास्तविक लोकतंत्र लाया जा सकता है" title="सशक्त पंचायती राज व्यवस्था द्वारा ही वास्तविक लोकतंत्र लाया जा सकता है 19"></p>
<p>आधुनिकीकरण के नकारात्मक तत्वों  के तेजी बढते दुष्प्रभाव के फलस्वरूप गाँवो में विशेषकर युवाओं में दुर्व्यसन बढता जा रहा हैं।ताडी, शराब गांजा भाँग ताश, जुऑ और चुगलखोरी की प्रवृत्ति से उबार कर ही गाँवो में आर्थिक समृद्धि और जन जीवन में खुशहाली लायी जा सकती है। इसके लिए सरकारों , पंचायतीराज संस्थाओं के विभिन्न पदों ( ग्राम पंचायत सदस्य, ग्राम पंचायत प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत) लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों और गाँव के बौद्धिक समुदाय द्वारा ईमानदारी सार्थक पहल करने की आवश्यकता है। आजकल गाँवों में कुछ लोगों का   सुबह का नाश्ता ( breakfast) गाँवो के किसी तरकुल या खजूर के पेड़ के नीचे चना चबेना और ताडी के साथ होता हैं। तरकुल पर चढने उतरने के माहिर तरकुलारोही अपने कंधे पर बांस के फट्ठे के आसरे लबनियों को इस तरह लेकर मचलते हुए चलते हैं जैसे लगता है कि श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कंधे पर लटकाये तीर्थयात्रा पर निकले हैं। जेठ के महीने से पूरी गर्मी तक सुबह शाम ताडी का बडा आकर्षण रहता हैं। ताडी का औषधीय गुण बताने वाले देशज गवंई वैद्य भी इसके लाभकारी गुणों को एक ईमानदार विज्ञापनकर्ता की तरह बताते हैं जिससे ताडी पीने वालों की  तादात और चाहत दोनों बढ जाती हैं। अपनी बसुन्धरा से लगभग 100 मीटर की ऊंचाई पर पाएं जानें वाले आकाशीय पेय पदार्थ के लिए किसी अखबार या टीवी चैनल पर विज्ञापन नहीं करना पड़ता हैं। बल्कि कस्तूरी ढूंढने वाले मृग की तरह इसकी चाह रखने वाले स्वयं पहुँच जाते हैं। इसके बाद दुपहरीया तिजहरिया में किसी सुनिश्चित चिन्हित स्थान पर ताश या जुऑ खेलने के लिए बटोर होने लगता है। भारतीय जनमानस में फुरसत के समय में ताश जुऑ और चौसर खेलने का वैसे तो चलन कलन बहुत पुराना है। वेद व्यास रचित हमारे पवित्र पावन ग्रंथ महाभारत के अनुसार हमारे धर्मराज युधिष्ठिर ने द्रौपदी को ही चौसर के दाॅव पर लगा दिया था। दुपहरीया और  तिजहरिया के सन्नाटे में ताश जुऑ और चौसर खेलकर लोगों को अद्वितीय आनंद और आत्म संतुष्टि की अनुभूति होती है। ताश और जुऑ खेलते समय लोग-बाग गैरहाजिर लोगों की घर गृहस्थी की गोपनीय और गूढ जानकारियां एक दूसरे से साक्षा करते हुए खूब हँसी ठहाके लगाते हैं। आम तौर पर इसको ही चुगलखोरी कहा जाता हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तार्किक चेतना के अभाव में आज भी हमारे गाँवो में मिथकों मुहावरों पूर्वाग्रहों और अंधविश्वासो का बोलबाला है। इसलिए आज भी गाँवो में जादू-टोना भूत-प्रेत का विचार और विश्वास  चलन कलन में जिन्दा हैं।</p>
<p>आज दुनिया तेजी से बदल रही हैं अमेरिका सहित पश्चिमी दुनिया के देश  मंगल ग्रह पर एक नई दुनिया बसाने और जीवन की सम्भावना तलाश रहे हैं। इसलिए बदलती दुनिया और बदलते दौर के लिहाज से भारतीय गाँवों को भी बदलना होगा। गाँवो में योग व्यायाम खेल-कूद के लिए तथा  बेहतरीन सुबहों के लिए मिनी स्टेडियम होना आवश्यक है। मिनी स्टेडियम होने से गाँव के लोगों को न केवल स्वस्थ्य और मस्त जीवन मिलेगा अपितु गाँवो में खेल-कूद के क्षेत्र में उभरती प्रतिभाओं को अपनी प्रतिभा निखारने का उचित मंच (प्लेटफॉर्म) मिलेगा। ताश और जुऑ जैसी अन्य कुप्रवृत्तियो से ग्रामीण जन जीवन को निजात दिलाने के लिए भारतीय गाँवों में सूचना संचार के अत्याधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण एक पुस्तकालय और वाचनालय होना चाहिए। जिससे ग्रामींण जन जीवन में सृजनात्मक रचनात्मक सकारात्मक और समस्याओं के लिए समाधानात्मक बौद्धिक तार्किक  क्षमता का विकास हो सके। इसके बिना न्यू इण्डिया और वैश्वीकरण का नारा खोखला होगा। इसके साथ ही साथ गाँवों की भौगोलिक स्थितिओ परिस्थितियों का आकलन कर गाँवों में कृषि उत्पादों पर आधारित लघु कुटीर उद्योगो के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए व्यवस्था होनी चाहिए ताकि लोगों को घर परिवार के साथ साथ रहते हुए रोजी रोजगार मिल सकें। गाँवों के युवाओं और युवतियों को आर्थिक क्रियाओं के लिए सुदक्ष बनाने के लिये विविध प्रकार के शिक्षण-प्रशिक्षण केन्द्र और समय-समय पर कौशल विकास कार्यक्रमो का आयोजन आवश्यक है। इससे गाँवो से शहरों की तरफ तेजी से बढ रहे पलायन को रोका जा सकता है और गाँवों के युवाओं और युवतियों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया जा सकता है। पंचायतीराज दिवस के अवसर पर मेरा विनम्र सुझाव हैं कि पढे लिखे ईमानदार और सचरित्र नेताओं को पंचायतीराज संस्थाओं के विविध पदों पर चुनाव लडना चाहिए। विधानसभा और संसद से इसका सीधा श्रेणीबद्ध तारतम्य स्थापित करते हुए विधानसभा और लोकसभा का चुनाव लडने वाले अभ्यर्थियों को चुनाव लडने के लिए पंचायतीराज संस्थाओं में निर्वाचित होने की अनिवार्य शर्त लगाई जानी चाहिए । इससे पंचायतीराज संस्थाओं में नेतृत्व की दृष्टि गुणवत्ता आयेगी और जमीनी स्तर पर लोकतंत्र मजबूत होगा। वस्तुतः पंचायतीराज संस्थाए संसदीय जनतंत्र की प्राथमिक पाठशाला होती हैं। केंद्रीय विधायिका (संसद) और राज्य स्तरीय विधायिका (विधानसभा) को आपस में संगुम्फित और श्रेणीबद्ध कर संसदीय जनतंत्र को सक्षम सक्रिय और जमीनी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं। पंचायतीराज संस्थाओं से निर्वाचित प्रतिनिधि अगर  विधानसभा और लोकसभा पहुँचेगा तो अपने क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं को मजबूती से रखने में सफल होगा।</p>
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		<title>कक्षा की सबसे अगली कतार के बजाय सबसे पिछली कतार वाले हमारे नेता बनने लगे हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Dec 2022 15:31:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="630" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="The Harishchandra News Image" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-300x158.png 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1024x538.png 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-768x403.png 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-696x365.png 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1068x561.png 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-800x420.png 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-313x164.png 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="कक्षा की सबसे अगली कतार के बजाय सबसे पिछली कतार वाले हमारे नेता बनने लगे हैं 21">आज आम जनमानस के मन मस्तिष्क और हृदय में सुनियोजित तरीके से राजनीति को लेकर बडी विचित्र और हास्यास्पद अवधारणा ठूँस&#160; दी गई है। आज लगभग अधिंकाश परिवारो के लोग अपने परिवार के सबसे निट्ठल्ले नकारा निकम्मे और सबसे कम पढे लिखे बालक के बारे में यह विचार प्रकट करते हुए मिल जाएंगे कि- यह [&#8230;]]]></description>
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<p>आज आम जनमानस के मन मस्तिष्क और हृदय में सुनियोजित तरीके से राजनीति को लेकर बडी विचित्र और हास्यास्पद अवधारणा ठूँस&nbsp; दी गई है। आज लगभग अधिंकाश परिवारो के लोग अपने परिवार के सबसे निट्ठल्ले नकारा निकम्मे और सबसे कम पढे लिखे बालक के बारे में यह विचार प्रकट करते हुए मिल जाएंगे कि- यह कुछ और नहीं करेगा राजनीति करेगा और नेता बनेगा।&nbsp;</p>



<p>विश्व में होने वाली विविध क्रांतिओं और समय-समय पर होने वाले सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन और सामाजिक सुधारों की सफलता में उस समाज के बौद्धिक वर्ग की अग्रणी भूमिका रही है। दुनिया में समय-समय पर होने वाले इन समस्त सामाजिक परिवर्तनों,सामाजिक सुधारों और सुप्रसिद्ध क्रांतिओ का कुशलता पूर्वक मार्गदर्शन बौद्धिक वर्ग (चिंतक, विचारक, दार्शनिक, साहित्यकार इत्यादि) द्वारा ही किया गया और बौद्धिक समुदाय द्वारा ही इन क्रातियों और विविध परिवर्तनो के लिए आवश्यक आधार-भूमि,पृष्ठभूमि और भावभूमि तैयार की गई और बौद्धिक समुदाय के विचारों के फलस्वरूप ही क्रांतिओ और परिवर्तनों के लिए अनुकूल परिस्थितियां निर्मित हुई।&nbsp;</p>



<p>इसके साथ ही साथ इन समस्त सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनो,सामाजिक सुधारों और क्रांतिओ को मानसिक, मनोवैज्ञानिक और बौद्धिक प्रेरणा भी बौद्धिक वर्ग के महान विचारों और संघर्षों से मिली। स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व के नारे के साथ लडी गयी फ्रांसीसी क्रांति के वैचारिक बौद्धिक और दार्शनिक प्रणेता जीन जैक्स रूसो,मांटेस्क्यू और वाल्टेयर थे,अमेरिकन क्रांति के प्रणेता टामस जेफरसन,डिडेरो और फ्रेंकलिन थे,तथा सोवियत संघ में सम्पन्न होने वाली समाजवादी क्रांति को वैज्ञानिक समाजवाद के जन्मदाता कार्ल मार्क्स के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरणा मिली थी। सातवीं शताब्दी से लेकर पन्द्रहवीं&nbsp; शताब्दी तक पूरी तरह अंधकार में डूबे यूरोपीय महाद्वीप में पुनर्जागरण और जनमानस में आधुनिक तार्किक वैज्ञानिक मानवतावादी चेतना का जन्म कोपरनिकस कैपलर गैलीलियो जैसे अनगिनत दूरदर्शी साहसी चिंतको और विचारकों के महान विचारों और संघर्षों के फलस्वरूप हुआ । इन दूरदर्शी विचारकों के आधुनिक विचारों ने सातवीं शताब्दी से लेकर पन्द्रहवीं शताब्दी तक अंधकार में डूबे यूरोपीय महाद्वीप को आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक समाज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।&nbsp;</p>



<p>कोपरनिकस कैपलर गैलीलियो के अतिरिक्त जिन अन्य महान विचारकों ने यूरोपीय महाद्वीप को बहुआयामी रूप से तरक्की की बुलंदी तक पहुँचाया उनमें जान लाॅक ,जरमी बेंथम,जान स्टुअर्ट मिल और कार्ल मार्क्स जैसे चिंतको विचारकों और दार्शनिकों के विचारों और संघर्षों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। सुकरात अरस्तू प्लेटो पाइथागोरस इरेटास्थनीज जैसे अनगिनत दार्शनिकों विद्वानों और विचारकों की बहुलता के कारण ही प्राचीन यूनान को ज्ञान-बिज्ञान का पालना कहा गया। इसी परम्परा में गुरु वशिष्ठ गुरु विश्वामित्र गुरु चाणक्य गुरु संदीपनी जैसे अपने श्रेष्ठ और महान गुरुओं और उनकी महान शिक्षाओ के कारण भारत वैश्विक स्तर पर विश्व गुरू के रूप में विख्यात रहा। गुरु विश्वामित्र गुरु संदीपनी जैसे श्रेष्ठ और महान गुरुओं के कुशल मार्गदर्शन में मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगीराज श्री कृष्ण जैसे युगों के महानायक अवतरित हुए और गुरु चाणक्य की महान शिक्षाओ ने चन्द्रगुप्त मौर्य जैसे महान चक्रवर्ती सम्राट को पैदा किया। इसी कडी में भारतीय स्वाधीनता संग्राम का महासंग्राम तत्कालीन भारतीय बौद्धिक वर्ग (शिक्षक वकील पत्रकार और प्रखर समाज सेवियों ) के मार्गदर्शन और नेतृत्व में लडा गया ।&nbsp;</p>



<p>स्वाधीनता संग्राम के दौरान शिक्षकों वकीलों और पत्रकारो द्वारा ही भारतीय जनमानस को स्वतंत्रता का अर्थ और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना समझाया गया तथा स्वतंत्रता की महत्ता और स्वतंत्रता का मूल्य बोध भी शिक्षकों वकीलों और पत्रकारो द्वारा ही निराश हताश भारतीय जनमानस को कराया गया । भारतीय संविधान के निर्माण से लेकर स्वाधीन भारत के पुनर्निर्माण और विकास के लिए सर्वाधिक प्रयास और प्रयत्न भी भारत के बौद्धिक वर्ग द्वारा ही किया गया। स्वाधीनता उपरांत भारतीय जनमानस की आशाओं आकांक्षाओं और सपनों को होमी जहाँगीर भाभा विक्रम साराभाई महान कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन और वर्गीस कुरियन जैसे मेधावियों द्वारा</p>



<p>अंतिम निष्कर्ष तक पहुँचाने और व्यवहारिक परिणति तक लाने के लिए ईमानदार प्रयास किए गए। स्वाधीनता उपरांत भारतीय शासन सत्ता के सर्वोच्च पदों को उस दौर के उच्चकोटि के प्रतिभाशाली व्यक्तित्वो ने सुशोभित किया।&nbsp;</p>



<p>डॉ राजेंद्र प्रसाद सर्वपल्ली राधा कृष्णन पंडित जवाहरलाल नेहरू कृष्णा मेनन डॉ भीम राव अंबेडकर इत्यादि सभी उच्चकोटि के प्रतिभाशाली थे। स्वाधीनता उपरांत भारतीय संसदीय राजनीति में योग्यता प्रतिभा सचरित्रता ईमानदारी और बचनबद्धता अनिवार्य और अपरिहार्य परिपाटी और परम्परा के रूप में स्थापित रही। गैर कांग्रेसी राजनीतिक पुरोधाओं डॉ राम मनोहर लोहिया आचार्य नरेन्द्र देव बलराज मधोक के अन्दर वैश्विक राजनीति की उच्चकोटि समझदारी और उत्कट मेधा शक्ति थी। प्रकारान्तर से योग्यता प्रतिभा मेधा हमारी राजनीतिक संस्कृति का अपरिहार्य तत्व थे। परन्तु जैसे जैसे सम्पन्न्नता बढी वैसे-वैसे प्रतिभाशाली बौद्धिक समुदाय जैसे शिक्षक वकील पत्रकार और अन्य प्रखर पेशेवर बुद्धिजीवी भारतीय राजनीति में केन्द्रीय भूमिका से बाहर होते गए वर्तमान दौर में अपराधियों माफियाओ भ्रष्टाचारियो और धन्नासेठो ने इन्हें ढकेल कर परिधि पर खड़ा कर दिया हैं।</p>



<p>1952 के प्रथम निर्वाचित संसद से लेकर वर्तमान संसद की डेमोग्रेफी का अध्ययन किया जाय स्थितियाँ बिल्कुल भयावह नजर आती हैं। 1952 की पहली लोक सभा में चुनकर जाने वाले सदस्यों में सबसे ज्यादा संख्या शिक्षकों वकीलों और पत्रकारो की थी परन्तु उत्तरोत्तर इनकी संख्या घटती गयी। वर्तमान समय में संसद और राज्यों की विधानसभाओं में शिक्षको वकीलों पत्रकारो और अन्य बौद्धिक वर्ग की संख्या लगभग नगण्य है।आज उनकी जगह धीरे-धीरे समाज के अपराधी माफिया बाहुबली भ्रष्टाचारी धन्नासेठ और घोर जातिवादी और साम्प्रदायिक लम्पट नेता संसद और विधानसभा के गलियारों में नजर आने लगे। यह सिलसिला निरंतर&nbsp; आगे ही बढता रहा और अपराध और जरायम पेशे के लोगों के उत्तरोत्तर बढते हौसले और जनता के बीच उनके प्रति बढते आकर्षण ने चम्बल के बीहड़ो में दहशत और आतंक का पर्याय बन चुके चम्बल के डकैतो को भी चुनाव में किस्मत आजमाने का हौसला दे दिया।</p>



<p>सदियों से भारतीय बसुन्धरा सम्पूर्ण विश्व में अपने ज्ञान, मेधा, चिंतन दर्शन और उत्कृष्ट शिक्षा और उच्चकोटि के दार्शनिकों तथा सर्वश्रेष्ठ गुरूओं के कारण ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की भूमि के रूप में जानी जाती रही हैं। महात्मा बुद्ध महावीर जैसे दार्शनिकों न केवल भारत भूमि को अपितु अपने दार्शनिक एवम आध्यात्मिक विचारों से पूरी दुनिया को प्रभावित किया। इतिहास साक्षी है कि-भारतीय बसुन्धरा पर वही विभूतियाँ महिमामंडित होती रही हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा पराक्रम परिश्रम कुशलता कुशाग्रता हुनर और हौसले से सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन लाया।&nbsp;&nbsp;</p>



<p>गुरु वशिष्ठ गुरू विश्वामित्र गुरू द्रोणाचार्य और आचार्य चाणक्य की वंश परंपरा के सच्चे ध्वजवाहक वर्त्तमान दौर के शिक्षकों, इंसाफ के मन्दिर में इंसाफ, इंसानियत और इंसानी हक हूकूक की खातिर काली कोट पहनकर बहस करने वाले वकीलों, लोकतंत्र के चौथे खम्भे के स्तम्भ माने जाने वाले पत्रकारों और देश के सच्चे सचेत जागरूक बुद्धिजीवियों को आज अपनी घटती गिरती उत्तरोत्तर राजनीतिक सामाजिक हैसियत पर गहराई से आत्म-चिंतन आत्म-विश्लेषण और आत्म-मंथन&nbsp; करने की आवश्यकता है।&nbsp;</p>



<p>लगभग दो सौ वर्षों तक पराधीनता के दौरान इस देश के जनमानस के पराधीन मन मस्तिष्क को स्वाधीनता का अर्थ और स्वाधीनता के लिए संघर्ष&nbsp; करना शिक्षकों वकीलों पत्रकारों और उस दौर के सचेत बुद्धिजीवियों ने ही बताया और समझाया। आजादी के दौरान होने वाले हर तरह के आन्दोलन का नेतृत्व शिक्षकों वकीलों पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने ही किया था ।इसलिए स्वाधीनता उपरांत इस देश के जनमानस ने सबसे ज्यादा भरोसा विश्वास इन्हीं शिक्षकों वकीलों पत्रकारों और बुद्धिजीवियों पर जताया&nbsp; और इसीलिए सत्तर के दशक तक इस देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओ में जनता ने अपने प्रतिनिधि के रूप में चुनकर अवसर दिया। परन्तु जैसे जैसे आजादी के जश्न की ढोल नगाड़ो की थाप मद्धम पडती गई वैसे वैसे शिक्षक वकील पत्रकार और बुद्धिजीवी राजनीतिक शक्ति सत्ता और प्रभाव की मुख्य धुरी या केन्द्रीय स्थिति से परिधि पर या हासिए पर धकेल दिए गए। नब्बे के दशक तक आते-आते कास्ट क्राइम और कैश का जादू सिर चढकर बोलने लगा। जाति धर्म की बुनियाद पर सामाजिक अभियांत्रिकी (सोशल इंजीनियरिंग)चुनाव जीतने का सबसे आसान और अचूक फार्मूला बन गया । इसी दौरान हर जातियाँ अपनी जाति के रॉबिनहुड स्टाइल के बाहुबलियों मे अपना नायक ढूँढने खोजने लगी और देखते ही देखते बाहुबली अपनी-अपनी जातियों के रहनुमा और मसीहा बन गए।&nbsp;</p>



<p>जनमानस में वर्तमान दौर के&nbsp; राजनेताओं की घटती लोकप्रियता विश्वसनीयता और आकर्षण ने राजनीतिक दलों को अपनी राजनीतिक रैलियां सफल बनाने के लिए रूपहले पर्दे के सितारों और सिने तारिकाओं की सहायता लेने के लिए मजबूर कर दिया।आज ग्लैमरस चेहरे राजनीतिक रैलियों के अनिवार्य अंग हो गए और अपने मजबूत राजनीतिक&nbsp; प्रतिद्वंदियों को परास्त करने के लिए भी राजनीतिक दलो ने रूपहले पर्दे के चमकते दमकते चेहरों को बतौर उम्मीदवार चुनाव में उतारना आरम्भ कर दिया। इन बहुविवीध कारणों से भारतीय राजनीति संसदीय राजनीति की स्वस्थ्य परम्पराओं से दूर होती गई और और इक्सवी सदी के आरम्भ से ही देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओ में सोच विचार शिष्टाचार और विषयवस्तु की दृष्टि से बहस का स्तर उत्तरोत्तर गिरता गया ।</p>



<p>यह सर्वविदित है कि संसद और विधान सभाओं में सुयोग्य सचरित्र ईमानदार के साथ साथ प्रतिभाशाली जब जनप्रतिनिधि बनकर संसद और विधानसभाओं में पहुँचेगे तभी देश की वास्तविक समस्याओं और जनता के बुनियादी मुद्दों पर धारदार बहस होगी और जब धारदार बहस होती है तभी जनता के पक्ष मे शानदार नीतियां बनती हैं और जनता के पक्ष में शानदार फैसले होते है। इसलिए आज शिक्षकों वकीलों पत्रकारों सहित सम्पूर्ण बौद्धिक तबके को अपनी घटती सामाजिक हैसियत और राजनीति भूमिका तथा जनमानस में उत्तरोत्तर बढती अस्वीकार्यता पर आत्म-मंथन करते हुए नये दौर की चुनौतियों के लिहाज से अपने को तैयार करना होगा ।प्रकारांतर से बौद्धिक समुदाय का सक्रिय हस्तक्षेप स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।&nbsp;</p>
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