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	<title>प्रमोद जोशी &#8211; The Harishchandra &#8211; Hindi</title>
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		<title>विरोधी-एकता का एक और मोर्चा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रमोद जोशी]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Jan 2023 05:16:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="640" height="293" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/opposition-party.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="विरोधी-एकता का एक और मोर्चा" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/opposition-party.jpg 640w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/opposition-party-300x137.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/opposition-party-313x143.jpg 313w" sizes="(max-width: 640px) 100vw, 640px" title="विरोधी-एकता का एक और मोर्चा 1">तेलंगाना में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) अब भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) है। गत बुधवार को तेलंगाना के खम्मम में हुई बीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव की रैली कई वजह से चर्चा में है। केसीआर ने राष्ट्रीय शक्ति के रूप में उभरने के अपने लक्ष्य के तहत पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में महत्वपूर्ण चुनावी उपस्थिति बनाने के [&#8230;]]]></description>
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<p>तेलंगाना में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) अब भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) है। गत बुधवार को तेलंगाना के खम्मम में हुई बीआरएस प्रमुख <a style="font-weight: 400;" href="https://navbharattimes.indiatimes.com/state/telangana/hyderabad/why-did-kcr-choose-khammam-for-opposition-unity-rally/articleshow/97093408.cms" rel="nofollow noopener" target="_blank">के चंद्रशेखर राव की रैली</a><span style="font-weight: 400;"> कई वजह से चर्चा में है। केसीआर ने राष्ट्रीय शक्ति के रूप में उभरने के अपने लक्ष्य के तहत पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में महत्वपूर्ण चुनावी उपस्थिति बनाने के लिए इसके सीमावर्ती शहर खम्मम को चुना। बीआरएस</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">तत्कालीन तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) 2018 में संयुक्त खम्मम जिले की 10 में से केवल एक विधानसभा सीट ही जीत सकी। बाद में कांग्रेस के छह और तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के दो विधायक बीआरएस में शामिल हो गए थे। चंद्रशेखर राव यहां अपना आधार बनाना चाहते हैं, ताकि पड़ोसी आंध्र प्रदेश में उनके कदम मजबूत करने में मदद देगा। साथ ही उनकी महत्वाकांक्षा राष्ट्रीय नेता बनने की भी है। दिल्ली के चैनलों पर आप आजकल तेलंगाना से जुड़े पेड कार्यक्रम देख रहे होंगे।</span></p>
<p style="font-weight: 400;">बुधवार को <a href="https://indianexpress.com/article/political-pulse/national-pitch-on-brs-stage-but-in-audience-message-largely-lost-8390301/" rel="nofollow noopener" target="_blank">खम्मम में हुई रैली</a> में के चंद्रशेखर राव के अलावा पिनाराई विजयन, अरविंद केजरीवाल, भगवंत, अखिलेश यादव और कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा शामिल हुए। एक तरह से 2024 के चुनाव के पहले विरोधी एकता का यह एक प्रयास है। रैली में समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव ने कहा कि मोदी सरकार अब जाने वाली है। अब उसके पास केवल 399 दिन बचे हैं। अखिलेश ने बीजेपी पर विरोधी दलों को परेशान करने और किसानों के साथ छल करने का आरोप लगाया।</p>
<p style="font-weight: 400;">उन्होंने यह भी कहा कि बीआरएस अध्यक्ष के चंद्रशेखर राव ने खम्मम की इस ऐतिहासिक धरती पर इतनी भारी भीड़ इकट्ठी की है और पूरे देश को एक संदेश दिया है। उत्तर प्रदेश की जनता द्वारा भी अंततः सत्तारूढ़ भाजपा को खारिज किए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘आज हम इतनी बड़ी संख्या में एकत्र हुए हैं। इस सभा के सामने, मैं कह सकता हूं कि अगर तेलंगाना में भाजपा को खारिज किया जा रहा है, तो उत्तर प्रदेश भी पीछे नहीं रहेगा।’</p>
<p style="font-weight: 400;">के चंद्रशेखर राव ने देश की जनता को आगाह किया कि हमें धार्मिक उन्माद से बचना होगा। देश भर में सभी सेक्युलर ताकतों को मिलकर भाजपा को सत्ता से हटाना होगा। बीआरएस के सत्ता में आने पर देशभर के किसानों को फ्री बिजली दिया जाएगा। प्रत्येक घर में शुद्ध पेय जल सुविधा दी जाएगी। इसके बाद देश में रायतुबंधु योजना लागू किया जाएगा। इस योजना के तहत प्रत्येक किसान को दस हजार रुपए प्रति एकड़ प्रति वर्ष फ्री सहायता राशि दी जाएगी। केंद्र में सत्ता परिवर्तन होने पर अग्निपथ भर्ती योजना को समाप्त कर दिया जाएगा। साथ ही देश में प्रत्येक वर्ष पच्चीस लाख परिवारों को दलित बंधु सुविधा दी जाएगी। इस योजना में दलित युवा को दस लाख रुपए स्वरोजगार के लिए दिया जाएगा। कोई राशि सरकार को लौटानी नहीं होगी।</p>
<p style="font-weight: 400;">दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पहली बार कई मुख्यमंत्री इकट्ठा होकर काम कर रहे हैं, हम सब एक साथ बैठकर राजनीति की बातें नहीं करते हैं बल्कि देश में किसानों और मजदूरों के हालत को बेहतर बनाने पर विचार करते हैं। अगले वर्ष सभी को मिलकर भाजपा को उखाड़ फेंकना है। केजरीवाल ने कहा कि तेलंगाना के राज्यपाल यहां के मुख्यमंत्री केसीआर को तंग करते हैं, पंजाब के राज्यपाल भी मुख्यमंत्री भगवंत मान को तंग करते हैं, दिल्ली के एलजी मुझे तंग करते हैं, तमिलनाडु के राज्यपाल मुख्यमंत्री को तंग करते हैं, ये सभी राज्यपाल तंग नहीं कर रहे हैं, मोदी साहब तंग कर रहे हैं।</p>
<p style="font-weight: 400;">जिस देश का प्रधानमंत्री दिनभर यह सोचे कि किसे तंग करना है तो देश तरक्की कैसे करेगा। प्रधानमंत्री सोचते हैं कि कहां सीबीआई भेजनी है और कहां ईडी भेजना है, किस पार्टी का विधायक खरीदना है। इससे देश तरक्की नहीं कर सकता है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा कि भाजपा जुमला पार्टी है। दो करोड़ रोजगार का वादा, महंगाई हटाने का वादा, किसान की आय दोगुना करने का वादा जुमला साबित हुआ है।</p>
<p style="font-weight: 400;">केरल के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने कहा कि केन्द्र की भाजपा सरकार राज्य के अंतर्गत आने वाले विषयों पर भी बिना राज्य सरकार से सलाह लिए कानून में परिवर्तन कर रही है। अब केन्द्र सरकार ही कानून व्यवस्था, कृषि और बिजली जैसे राज्य सरकार के विषयों पर बिना राज्य सरकार की सलाह लिए कानून बना रही है। यह संघीय ढांचे पर सीधा प्रहार है। राज्य सरकार के विधायी शक्ति को छीना जा रहा है। अब समय आ गया है कि हम सभी एकजुट होकर केन्द्र के इस रवैये का विरोध करें।</p>
<p><span style="color: #999999;"><em>Disclaimer: यह लेख मूल रूप से प्रमोद जोशी के ब्लॉग पर प्रकाशित हुआ है। इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। ये जरूरी नहीं कि द हरिश्चंद्र इससे सहमत हो। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।</em></span></p>
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		<title>उथल-पुथल के दौर में गुजरते साल के सुलगते सवाल!</title>
		<link>https://theharishchandra.com/hindi/the-smoldering-questions-of-the-year-passing-in-the-era-of-turmoil/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[प्रमोद जोशी]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 25 Dec 2022 05:51:22 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[आंदोलन]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="630" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="The Harishchandra News Image" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-300x158.png 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1024x538.png 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-768x403.png 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-696x365.png 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1068x561.png 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-800x420.png 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-313x164.png 313w" sizes="(max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="उथल-पुथल के दौर में गुजरते साल के सुलगते सवाल! 3">देश की राजधानी में 2022 की शुरुआत ‘यलो-अलर्ट’ से हुई थी। साल का समापन भी कोविड-19 के नए अंदेशों के साथ हो रहा है। यों भी साल की उपलब्धियाँ महामारी पर विजय और आर्थिक पुनर्निर्माण से जुड़ी हैं। वह ज़माना अब नहीं है, जब हम केवल भारत की बात करें और दुनिया की अनदेखी कर दें। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1200" height="630" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="The Harishchandra News Image" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-300x158.png 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1024x538.png 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-768x403.png 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-696x365.png 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1068x561.png 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-800x420.png 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-313x164.png 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="उथल-पुथल के दौर में गुजरते साल के सुलगते सवाल! 4">


<div style="clear: both;"><span style="font-weight: 400;">देश की राजधानी में 2022 की शुरुआत ‘यलो-अलर्ट’ से हुई थी। साल का समापन भी कोविड-19 के नए अंदेशों के साथ हो रहा है। यों भी साल की उपलब्धियाँ महामारी पर विजय और आर्थिक पुनर्निर्माण से जुड़ी हैं। वह ज़माना अब नहीं है, </span><span style="font-weight: 400;">जब हम केवल भारत की बात करें और दुनिया की अनदेखी कर दें। हमारी राजनीति</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">अर्थव्यवस्था और समाज पर यूक्रेन-युद्ध का भी उतना ही असर हुआ</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">जितना दो साल पहले कोविड-19 का हुआ था। कोविड-19</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">जलवायु-परिवर्तन और आर्थिक-मंदी वैश्विक बीमारियाँ हैं</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">जो हमारे जीवन और समाज को प्रभावित करती रहेंगी। खासतौर से तब</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">जब हमारी वैश्विक-उपस्थिति बढ़ रही है।</span></div>
<div></div>
<div style="clear: both;">
<p style="font-weight: 400;">साल के आखिरी महीने की पहली तारीख को भारत ने जी-20 की अध्यक्षता ग्रहण करने के बाद 2023 की इस कहानी के पहले पन्ने पर दस्तखत कर दिए हैं। भारत को लेकर वैश्विक-दृष्टिकोण में बदलाव आया है। इसका पता इस साल मई में मोदी की यूरोप यात्रा के दौरान लगा। यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद भारत ने दोनों पक्षों से दूरी बनाने का रुख अपनाया। इसकी अमेरिका और पश्चिमी देशों ने शुरू में आलोचना की। उन्हें यह समझने में समय लगा कि भारत दोनों पक्षों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकता है। यह बात हाल में बाली में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन में भी स्पष्ट हुई, जहाँ नौबत बगैर-घोषणापत्र के सम्मेलन के समापन की थी। भारतीय हस्तक्षेप से घोषणापत्र जारी हो पाया।</p>
<p style="font-weight: 400;">यह साल आजादी के 75वें साल का समापन वर्ष था। अब देश ने अगले 25 साल के कुछ लक्ष्य तय किए हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री ने ‘अमृतकाल’ घोषित किया है। इस साल 13 से 15 अगस्त के बीच हर घर तिरंगा अभियान के जरिए राष्ट्रीय चेतना जगाने का एक नया अभियान चला, जिसके लिए 20 जुलाई को एक आदेश के जरिए इस राष्ट्रीय-ध्वज कोड में संशोधन किया गया।</p>
<p style="font-weight: 400;">राजनीतिक-दृष्टि से इस साल के चुनाव परिणाम काफी महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के अलावा सात राज्यों के विधानसभा चुनावों ने राजनीति की दशा-दिशा का परिचय दिया। एक यक्ष-प्रश्न का उत्तर भी इस साल मिला और कांग्रेस ने गैर-गांधी अध्यक्ष चुन लिया। जम्मू-कश्मीर में पिछले एक साल में सुधरी कानून-व्यवस्था ने भी ध्यान खींचा है। पंडितों को निशाना बनाने की कुछ घटनाओं को छोड़ दें, तो लंबे अरसे से वहाँ हड़तालों और आंदोलनों की घोषणा नहीं हो रही है।</p>
<p style="font-weight: 400;">देश के 15वें राष्ट्रपति के रूप में श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक था। जनजातीय समाज से वे देश की पहली राष्ट्रपति बनीं। इसके अलावा वे देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति हैं। यह चुनाव राजनीतिक-स्पर्धा भी थी। उनकी उम्मीदवारी का 44 छोटी-बड़ी पार्टियों ने समर्थन किया था, पर ज्यादा महत्वपूर्ण था, विरोधी दलों की कतार तोड़कर अनेक सांसदों और विधायकों का उनके पक्ष में मतदान करना। यह चुनाव बीजेपी का मास्टर-स्ट्रोक साबित हुआ, जिसका प्रमाण क्रॉस वोटिंग।</p>
<p style="font-weight: 400;">‘फूल-झाड़ू’ इस साल का राजनीतिक रूपक है। आम आदमी पार्टी बीजेपी की प्रतिस्पर्धी है, पूरक है या बी टीम है? इतना स्पष्ट है कि वह कांग्रेस की जड़ में दीमक का काम कर रही है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की विजय भविष्य की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण रही। उत्तर प्रदेश में जिस किस्म की जीत मिली, उसकी उम्मीद उसके बहुत से समर्थकों को नहीं थी। वहीं, पंजाब में कांग्रेस की ऐसी पराजय की आशंका उसके नेतृत्व को भी नहीं रही होगी। आम आदमी पार्टी की असाधारण सफलता ने भी ध्यान खींचा। इससे पार्टी का हौसला बढ़ा और उसने गुजरात में बड़ी सफलता की घोषणाएं शुरू कर दीं। पार्टी को करीब 13 फीसदी वोट मिले, जिनके सहारे अब वह राष्ट्रीय पार्टी बन गई है। कांग्रेस को दिलासा के रूप में हिमाचल प्रदेश में सफलता मिली। एक बात धीरे-धीरे स्थापित हो रही है कि आम आदमी पार्टी को कांग्रेस के क्षय का लाभ मिल रहा है।</p>
<p style="font-weight: 400;">कांग्रेस पार्टी ने इस साल उदयपुर में चिंतन-शिविर करके भविष्य का रोडमैप तैयार किया है। राहुल गांधी चुनाव की राजनीति में पड़ने के बजाय राष्ट्रीय-नेता के रूप में उभारे जाएंगे। इसके लिए 7 सितंबर से भारत-जोड़ो यात्रा शुरू की गई है। इस यात्रा के निहितार्थ भी 2024 के चुनाव में स्पष्ट होंगे। बिहार में नीतीश कुमार का एनडीए से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिलकर सरकार बनाना इस साल की मोदी-विरोधी राजनीति की सबसे बड़ी घटना थी। उधर बीजेपी ने महाराष्ट्र में शिवसेना के भीतर दरार पैदा करके विरोधी राजनीति को धक्का पहुँचाया है।</p>
<p style="font-weight: 400;">मल्लिकार्जुन खड़गे का कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में चुनाव भी साल की महत्वपूर्ण परिघटना है। पहले लगता था कि पार्टी अशोक गहलोत को अध्यक्ष बनाना चाहती है। विचार शायद उन्हें हटाकर सचिन पायलट को राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर बैठाने का था। इससे कुछ नाटकीय स्थितियाँ पैदा हुईं। खड़गे क्या कांग्रेस में जान डाल सकेंगे? या अब पार्टी की विफलताओं का ठीकरा उनपर फूटेगा और सफलता का श्रेय राहुल गांधी को मिलेगा? बीजेपी के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर क्या कोई गठबंधन खड़ा होगा? होगा तो उसमें कांग्रेस की भूमिका क्या होगी? वह इस गठबंधन के केंद्र में होगी या परिधि में?</p>
<p style="font-weight: 400;">भारतीय जनता पार्टी का विजय रथ इस साल भी आगे बढ़ा। यह भी साबित हुआ कि नरेंद्र मोदी का जादू अभी कायम है, पर हिमाचल प्रदेश की पराजय ने बताया कि वह अजेय पार्टी नहीं है। बिहार का गठबंधन भी बीजेपी के लिए चुनौती बनेगा। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में अगले साल होने वाले चुनावों में पार्टी की ताकत का पता लगेगा।</p>
<p style="font-weight: 400;">अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की भविष्यवाणी थी कि इस साल भारत की पूरे वेग के साथ वापसी होने वाली है, पर जो हुआ वह आधा-अधूरा था। यूक्रेन-युद्ध और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की दरों में इजाफे से भारत में मुद्रास्फीति बढ़ी और ब्याज की दरें भी। मोदी सरकार के पहले दौर में राजकोषीय घाटा कम हो रहा था। महामारी के कारण इसमें उछाल आया और यह 9.2 प्रतिशत पर पहुंच गया। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में सरकार उसे 5.3 प्रतिशत तक लाने में कामयाब रही है। इस वर्ष का लक्ष्य 6.4 प्रतिशत है, और 2024-25 तक उसे 4.5 प्रतिशत पर लाने का दावा किया जा रहा है। लोकसभा चुनाव नजदीक आने के साथ, सब्सिडी को घटाने की चुनौती भी है, जो सरकार के बढ़ते खर्च का बड़ा हिस्सा है।</p>
<p style="font-weight: 400;">भारत में खुदरा मुद्रास्फीति नवंबर में 11 महीनों के निचले स्तर पर आ गई फिर भी यह 4 फीसदी के स्तर से काफी ऊपर है। बड़ी चुनौती है कि जीडीपी-संवृद्धि को गति कैसे दी जाए। दूसरी तिमाही में संवृद्धि 6.3 फीसदी रही। यह अनुमान से बेहतर है। पूरे साल के लिए शुरुआती अनुमान 7.2 से 7.5 फीसदी तक के थे, जिन्हें घटाकर 6.5 फीसदी तक कर दिया गया था। फिर भी विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2022-23 की सकल संवृद्धि 7 फीसदी से ऊपर रह सकती है।</p>
<p style="font-weight: 400;">अरुणाचल के तवांग में भारत और चीन के सैनिकों की भिड़ंत के बाद फिर से सवाल उठा है कि चीन के साथ हमारे सामरिक रिश्ते खराब हो रहे हैं, तो कारोबारी रिश्ते क्यों बढ़ रहे हैं? हम क्यों नहीं चीन से माल मंगाना बंद करते हैं?  यह इतना आसान नहीं है। चीन से व्यापार खत्म करने का मतलब आर्थिक संवृद्धि का बलिदान करना होगा। पहले हमें विकल्प बनाने होंगे। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ समेत कुछ देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर बात चल रही हैं। अमेरिका जैसा ताकतवर देश चीन या रूस पर प्रतिबंध लगाने में कामयाब नहीं है। हम अभी उस स्तर पर नहीं हैं।</p>
</div>
<p><span style="color: #999999;"><em>Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। ये जरूरी नहीं कि द हरिश्चंद्र इससे सहमत हो। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।</em></span></p>
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		<title>अजय माकन का इस्तीफा और खड़गे की पहली परीक्षा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रमोद जोशी]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 16 Nov 2022 14:41:31 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="549" height="309" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283329.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="अजय माकन का इस्तीफा और खड़गे की पहली परीक्षा" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283329.jpeg 549w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283329-300x169.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283329-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 549px) 100vw, 549px" title="अजय माकन का इस्तीफा और खड़गे की पहली परीक्षा 5">कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अभी अपना काम ठीक से संभाला भी नहीं है कि वह पहला विवाद उनके सामने आ गया है, जिसका अंदेशा था. कांग्रेस नेता अजय माकन ने पार्टी के राजस्थान प्रभारी के रूप में इस्तीफा दे दिया है. यह इस्तीफा उन कारणों से महत्वपूर्ण है, जो पार्टी अध्यक्ष के चुनाव के ठीक [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="549" height="309" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283329.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="अजय माकन का इस्तीफा और खड़गे की पहली परीक्षा" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283329.jpeg 549w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283329-300x169.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images283329-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 549px) 100vw, 549px" title="अजय माकन का इस्तीफा और खड़गे की पहली परीक्षा 6">



<p>कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने अभी अपना काम ठीक से संभाला भी नहीं है कि वह पहला विवाद उनके सामने आ गया है, जिसका अंदेशा था. कांग्रेस नेता अजय माकन ने पार्टी के राजस्थान प्रभारी के रूप में इस्तीफा दे दिया है. यह इस्तीफा <a href="https://indianexpress.com/article/explained/explained-politics/aicc-rajasthan-ajay-maken-quits-kharge-analysis-8272063/" rel="nofollow noopener" target="_blank">उन कारणों से महत्वपूर्ण है</a>, जो पार्टी अध्यक्ष के चुनाव के ठीक पहले उठे थे और जिनके बारे में माना जा रहा था कि वे खड़गे को परेशान करेंगे. राजस्थान-संकट का समाधान खड़गे के सांगठनिक कौशल की पहली बड़ी परीक्षा होगी.</p>



<p>अगले पखवाड़े में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा राजस्थान में प्रवेश कर सकती है. उस समय यह विवाद तेजी पकड़ेगा. अजय माकन ने अपना यह इस्तीफा पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखने के कुछ दिनों बाद दिया है, जिसमें उन्होंने लिखा था कि वह अब इस जिम्मेदारी को जारी नहीं रखना चाहते हैं.</p>



<p>मीडिया रिपोर्टों के अनुसार माकन, 25 सितंबर को जयपुर में कांग्रेस विधायक दल (सीएलपी) के समानांतर बैठक आयोजित करने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के तीन वफादारों को कारण बताओ नोटिस देने के बाद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न करने से नाराज हैं.</p>



<p>सूत्रों ने कहा कि इससे माकन परेशान थे क्योंकि जिन विधायकों को कारण बताओ नोटिस दिया गया था, वे राहुल गांधी के नेतृत्व वाली यात्रा का समन्वय कर रहे हैं. एआईसीसी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया, ‘राहुल गांधी की यात्रा आयोजित करने के लिए अजय माकन किस नैतिक अधिकार के साथ राजस्थान जाएंगे,&nbsp;अगर सीएलपी बैठक का मजाक उड़ाने वाले लोग ही इसका समन्वय करेंगे?’</p>



<p>माकन के करीबी सूत्रों ने बताया कि पार्टी नेतृत्व ने उन्हें अपना फैसला वापस लेने के लिए मनाने की कोशिश की लेकिन वे असफल रहे. खड़गे के नाम माकन के पत्र को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा राज्य में युवा नेतृत्व को ‘मौका’ देने से इनकार करने से पैदा हुए संकट के खिलाफ पार्टी आलाकमान पर दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा गया.</p>



<p>8 नवंबर को लिखे गए अपने पत्र में माकन ने कहा है कि भारत जोड़ो यात्रा के प्रदेश में प्रवेश करने और राज्य विधानसभा उपचुनाव होने से पहले एक नए व्यक्ति को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए. उन्होंने लिखा, ‘मैं राहुल गांधी का सिपाही हूं. मेरे परिवार का पार्टी से दशकों पुराना नाता है.’<a></a></p>



<p>गत&nbsp;&nbsp;25 सितंबर को तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के निर्देश पर माकन और खड़गे पर्यवेक्षक के रूप में जयपुर गए थे. तब अशोक गहलोत के कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ने की अटकलें काफी तेज थीं. उसी दौरान नए मुख्यमंत्री के चयन के लिए विधायक दल की बैठक होनी थी लेकिन सचिन पायलट की उम्मीदवारी का विरोध करने वाले गहलोत समर्थकों ने बगावती सुर इख्तियार किए थे और मीटिंग में शामिल नहीं हुए थे.</p>



<p>पार्टी हाईकमान इस घटनाक्रम से नाराज थी. इसके बाद तीन नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया. अशोक गहलोत ने तब सोनिया गांधी से माफी मांग ली थी, पर विधायकों के बारे में पार्टी के महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा था कि एक-दो दिन में कार्रवाई होगी. काफी समय बीत जाने के बाद भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई. बहरहाल विधायक दल की बैठक दोबारा नहीं हुई और सचिन पायलट के बारे में फैसला भी नहीं हो सका.</p>



<p>सूत्रों के मुताबिक, भग्न-हृदय माकन ने पद छोड़ने का फैसला किया है. सूत्रों के मुताबिक गहलोत समर्थकों के व्यवहार से आलाकमान नाखुश हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होने की कई वजहें हैं. गहलोत इस समय गुजरात चुनाव के मुख्य पर्यवेक्षक हैं.</p>



<p>हाईकमान इस समय राजस्थान सरकार के लिए कोई जोखिम पैदा नहीं करना चाहती. खड़गे को तय करना है कि सचिन को कमान सौंपने के लिए वे गहलोत को कैसे राजी करेंगे। ऐसे नहीं करना है, तो सचिन को किस प्रकार समझाना है और गहलोत को किस तरह कुर्सी पर बनाए रखना है. दूसरी ओर,&nbsp;उसके सामने 25 सितंबर को हुई ‘अनुशासनहीनता’ के मामले को सुलझाने की चुनौती भी है.</p>



<p>लगता नहीं कि ये मामले 8 दिसंबर को गुजरात के चुनाव परिणाम आने के पहले तय हो पाएंगे. परिणाम आने के बाद भी कम से कम दो हफ्ते गुजरात और हिमाचल की राजनीतिक गतिविधियाँ चलेंगी. फिलहाल अजय माकन के इस्तीफे ने इस मसले को समय से पहले हवा दे दी है.</p>
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		<title>क्या भारतीय भाषाओं में पढ़ाई की पहल को हिंदी थोपना माना जाए?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[प्रमोद जोशी]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 13 Oct 2022 05:04:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[आंदोलन]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="948" height="533" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="अमृतवर्ष : व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी के जमाने में, हिन्दुस्तान में हिन्दी का भौकाल!" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books.jpg 948w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books-300x169.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books-768x432.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books-696x391.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books-747x420.jpg 747w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books-313x176.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 948px) 100vw, 948px" title="क्या भारतीय भाषाओं में पढ़ाई की पहल को हिंदी थोपना माना जाए? 8">हिंदी को लेकर दक्षिण के दो राज्यों ने विरोध काझंडा फिर उठाया है। पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने और बाद में केरल के मुख्यमंत्री  पिनाराई विजयन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। केरल के मुख्यमंत्री ने लिखा है कि राजभाषा को लेकर बनी संसदीय समिति की सिफारिशों को केरल स्वीकार नहीं करेगा। किसी एक भाषा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="948" height="533" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="अमृतवर्ष : व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी के जमाने में, हिन्दुस्तान में हिन्दी का भौकाल!" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books.jpg 948w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books-300x169.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books-768x432.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books-696x391.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books-747x420.jpg 747w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/09/Hindi-Books-313x176.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 948px) 100vw, 948px" title="क्या भारतीय भाषाओं में पढ़ाई की पहल को हिंदी थोपना माना जाए? 10"><p>हिंदी को लेकर दक्षिण के दो राज्यों ने <a href="https://www.bhaskar.com/national/news/protest-against-hindi-language-tamil-nadu-cm-stalin-central-governmentfight-130429147.html" rel="nofollow noopener" target="_blank">विरोध काझंडा फिर उठाया</a> है। पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने और बाद में केरल के मुख्यमंत्री  पिनाराई विजयन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। केरल के मुख्यमंत्री ने लिखा है कि राजभाषा को लेकर बनी संसदीय समिति की सिफारिशों को केरल स्वीकार नहीं करेगा। किसी एक भाषा को दूसरों से ऊपर बढ़ावा देना अखंडता को नष्ट कर देगा। इस मामले में उन्होंने प्रधानमंत्री से दखल देने की मांग की है।</p>
<p>इसके पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने कहा था कि हिंदी थोपकर केंद्र सरकार को एक और भाषा युद्ध की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। हिंदी को अनिवार्य बनाने के प्रयास छोड़ दिए जाएं और देश की अखंडता को कायम रखा जाए। दोनों नेताओं ने यह बातें राजभाषा पर संसदीय समिति के अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को हाल में सौंपी गई एक रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया में कहीं।</p>
<p>संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में आईआईटी, आईआईएम, एम्स, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और केंद्रीय विद्यालयों में हिंदी को भी माध्यम बनाने की सिफारिश की है। स्टालिन ने कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में तमिल समेत 22 भाषाएं हैं। इनके समान अधिकार हैं। कुछ समय पहले स्टालिन ने कहा था कि हमें हिंदी दिवस की जगह भारतीय भाषा दिवस मनाना चाहिए। साथ ही ‘केंद्र को संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज सभी 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा घोषित कर देना चाहिए। हिंदी न तो राष्ट्रीय भाषा है और न ही इकलौती राजभाषा।</p>
<p>स्टालिन ने कहा कि हिंदी की तुलना में दूसरी भाषाओं के विकास पर बहुत कम संसाधन खर्च किए जाते हैं। केंद्र को इस फर्क को कम करना चाहिए। स्टालिन ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत सिर्फ हिंदी और संस्कृत को ही बढ़ावा देने का आरोप भी केंद्र सरकार पर लगाया था।’</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj9UCpuSryqayibO9_SvfKfvfGtPsuDufvghpW2qCxnwrPpgVY48vyrfDPAuwBpj95VMeIH17U-bndNdNnfjnlZtQxoVj3AMrCZCSLgRwQUgXbSCuEfE8KQhd5i6gmCjU8UqqNB8bpVeSX2ltRl3PKWFXC0Y5HWqmU2vA3uad7TTme0RBHsV_Y/w640-h580/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%20%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%82.jpg" width="368" height="334" alt="क्या भारतीय भाषाओं में पढ़ाई की पहल को हिंदी थोपना माना जाए?" title="क्या भारतीय भाषाओं में पढ़ाई की पहल को हिंदी थोपना माना जाए? 9"></p>
<p>उधर हाल में अमित शाह ने सूरत में 14 सितंबर को हिंदी दिवस के मौके पर अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में अमित शाह ने कहा था, ‘मैं एक बात साफ कर देना चाहता हूं। कुछ लोग गलत जानकारी फैला रहे हैं कि हिंदी और गुजराती, हिंदी और तमिल, हिंदी और मराठी प्रतिद्वंद्वी हैं। हिंदी कभी किसी भाषा की प्रतिद्वंद्वी नहीं हो सकती है। हिंदी देश की सभी भाषाओं की दोस्त है।</p>
<p><strong>हिंदी-विरोध</strong><br />
हर साल हम 14 सितंबर को हिंदी दिवस इसलिए मनाते हैं, क्योंकि 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा बनाने का फैसला किया था। पिछले कुछ वर्षों से 14 सितंबर को इंटरनेट पर #StopHindiImposition (हिंदी थोपना बंद करो) जैसे <a href="https://hindi.thequint.com/news/india/stop-hindi-imposition-agitation-after-amit-shah-remark-analysis" rel="nofollow noopener" target="_blank">हैशटैग ट्रेंड</a> करने लगे हैं। 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के नेता सिद्धारमैया ने कन्नड़-गौरव, हिंदी-विरोध और उत्तर-दक्षिण भावनाओं को भड़काने सहारा लेकर कन्नड़-प्रेमियों का समर्थन हासिल करने का प्रयास किया। बेंगलुरु में मेट्रो स्टेशनों के हिंदी में लिखे नाम मिटाए गए और अंततः हिंदी नाम पूरी तरह हटा दिए गए। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस तीन भाषा सूत्र की समर्थक है, पर बेंगलुरु मेट्रो में हिंदी-विरोध का उसने समर्थन किया।</p>
<p>हिंदी के प्रयोग को लेकर कुछ गैर-हिंदी राज्यों में आंदोलन चलाया जाता है। इस आंदोलन को अंग्रेजी मीडिया हवा देता है। कुछ समय पहले दक्षिण भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों के नाम-पटों में हिंदी को शामिल करने के विरोध में आंदोलन खड़ा हुआ था। राम गुहा और शशि थरूर जैसे लोगों ने बेंगलुरु मेट्रो-प्रसंग में हिंदी थोपे जाने का विरोध किया। मेरी नज़र में यह एक तरह से भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाने की कोशिश है, साथ ही अंग्रेजी के ध्वस्त होते किले को बचाने का प्रयास भी। चूंकि इस समय इस कार्यक्रम को भारतीय जनता पार्टी की सरकार आगे बढ़ा रही है, इसलिए इसे राजनीतिक रंग देकर सामाजिक-टकराव वगैरह के रूप में भी देखा जा रहा है, हालांकि यह विरोध काफी पहले से चल रहा है और 1965 से तमिलनाडु में यह राजनीतिक पैंतरे का रूप ले चुका है।</p>
<p>उन दिनों शशि थरूर ने अपने ट्वीट में लिखा, हिंदी देश की राष्ट्रभाषा नहीं है। बेशक हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है, पर वह देश की राजभाषा जरूर है। सांविधानिक व्यवस्था के अनुसार पहले 15 साल तक हिंदी के साथ अंग्रेजी को भी राजभाषा बने रहना था, पर हिंदी-विरोधी आंदोलन के कारण सन 1963 में राजभाषा अधिनियम पास किया गया। हिंदी के साथ अंग्रेजी तबतक काम करेगी, जबतक हिंदी स्वतंत्र रूप से राजभाषा नहीं बन जाती। राजनीति ने भारतीय भाषाओं को पीछे धकेल दिया है। साथ ही अंग्रेजी-परस्त तबका हमें लड़ाने की कोशिश करता है।</p>
<p>हिंदी-विरोध तमिलनाडु की राजनीति का केंद्र-बिंदु है। 1965 में हिंदी-विरोधी आंदोलन में भाग लेने वालों को तमिलनाडु सरकार ने पेंशन देने की घोषणा की, जिसे अंततः सुप्रीमकोर्ट ने <a href="https://indiankanoon.org/doc/1160503/" rel="nofollow noopener" target="_blank">गैर-कानूनी करार</a> दिया, पर वह भावना आज भी कायम है।</p>
<p><strong>हिंदी में मेडिकल किताबें</strong><br />
इस विरोध का तात्कालिक कारण है आगामी 16 अक्तूबर को भोपाल में होने वाला एक कार्यक्रम, जिसमें गृहमंत्री अमित शाह एमबीबीएस कक्षाओं के पहले वर्ष की कक्षाओं के लिए <a href="https://www.thehindu.com/education/amit-shah-to-launch-hindi-version-of-first-year-mbbs-books-on-october-16/article66002503.ece" rel="nofollow noopener" target="_blank">हिंदी पाठ्य पुस्तकों का विमोचन</a> करेंगे। यानी कि मध्य प्रदेश में एमबीबीएस की पढ़ाई हिंदी माध्यम से भी हो सकेगी। सरकार की योजना है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में मेडिकल की पढ़ाई हिंदी में और अन्य राज्यों में वहाँ की क्षेत्रीय भाषाओं में हो। तमिलनाडु और केरल के मुख्यमंत्री मानते हैं कि यह हिंदी थोपने का प्रयास है। अमित शाह ने हाल में कहा था कि भारत में अंग्रेजी-मोह के कारण देश में उपलब्ध 95 फीसदी मेधा का इस्तेमाल नहीं हो पाता है।</p>
<p>इस सिलसिले में चेन्नई के अखबार द हिंदू ने एक <a href="https://www.thehindu.com/education/amit-shah-to-launch-hindi-version-of-first-year-mbbs-books-on-october-16/article66002503.ece" rel="nofollow noopener" target="_blank">रिपोर्ट प्रकाशित की</a> है। इस रिपोर्ट में मध्य प्रदेश के मेडिकल शिक्षामंत्री विश्वास सारंग को यह कहते हुए उधृत किया गया है कि ये पुस्तकें अंग्रेजी पाठ्य पुस्तकों का अनुवाद हैं और इन्हें तैयार करने में पिछले आठ-नौ महीनों से 97 डॉक्टरों की एक समिति काम कर रही थी। यह हिंदी चिकित्सा प्रकोष्ठ गत फरवरी से काम कर रहा है। श्री सारंग ने बताया कि कुछ विशेषज्ञों ने इस विचार का विरोध भी किया है। बहरहाल हमने तीन विषय शुरू में चुने हैं, क्योंकि पहले वर्ष इन्हें पढ़ाया जाता है।</p>
<p>इस कमेटी के एक सदस्य डॉ नीलकमल कपूर का कहना है कि हम लोगों के दिमाग से यह बात निकाल देना चाहते हैं कि यह काम हो नहीं सकता। जर्मनी में ऐसा हुआ, फ्रांसीसियों ने यह करके दिखाया और मकदूनिया ने किया। हमने ये पुस्तकें उन छात्रों के लिए तैयार की हैं, जिन्होंने मेडिकल कक्षाओं में प्रवेश लेने के पहले हिंदी माध्यम से पढ़ाई की है। यह एक तरह से ब्रिज कोर्स होगा।</p>
<p><strong>12वीं तक हिंदी में पढ़ाई</strong><br />
ग्वालियर के गजरा राजा मेडिकल कॉलेज के छात्र रूपेश वर्मा ने हिंदू के संवाददाता को बताया कि मैं रीवा के पास के एक गाँव का रहने वाला हूँ। मेरी पढ़ाई का माध्यम हिंदी रही है। जब मैं मेडिकल कॉलेज में आया, तो मुझे डिक्शनरी साथ लेकर पढ़ाई करनी पड़ी। मुझे यह समझने में समय लगता था कि इसमें लिखा क्या है। मेरी मध्य प्रदेश के प्री-मेडिकल टेस्ट में 40वीं रैंक थी, पर कॉलेज में बमुश्किल पास हुआ। मुझे पीजी में प्रवेश नहीं मिल पाने की क बड़ी वजह यह भी थी।</p>
<p>इस पढ़ाई के व्यावहारिक पहलू को लेकर भी कुछ लोगों ने शंकाएं व्यक्त की हैं। मध्य प्रदेश जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष आकाश सोनी का कहना है कि इसे अनिवार्य बनाया गया, तो मध्य प्रदेश के डॉक्टरों को मध्य प्रदेश में ही काम मिलेगा। अमेरिका और इंग्लैंड में उन्हें दिक्कत होगी। कुछ और छात्रों ने शंकाएं व्यक्त की हैं। वहीं पूर्वोत्तर के एक छात्र ने कहा कि इस खिचड़ी भाषा से दिक्कत होगी।</p>
<p>मनोरोग विशेषज्ञ डॉ सत्यकांत त्रिवेदी भी इस समिति के सदस्य हैं। उन्होंने कहा कि इस दिक्कत को देखते हुए हमने अंग्रेजी या ग्रीक शब्दों को मूल रूप में ही रहने दिया है। हमने रीढ़ की हड्डी के लिए मेरुदंड और वेंस के लिए शिरा शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया है। अंग्रेजी शब्दों को ही देवनागरी में लिखा है। सवाल है कि जब 12वें तक विज्ञान की पढ़ाई भारतीय भाषाओं में संभव है, तो आगे क्यों नहीं?</p>
<p>यह परियोजना भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज से शुरू होगी और इसी सत्र में 13 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में लागू कर दी जाएगी। डॉ सारंग ने बताया कि आने वाले समय में और किताबों का अनुवाद किया जाएगा। मध्य प्रदेश के मेडिकल शिक्षा निदेशक डॉ जितेन शुक्ला ने कहा कि इसे ‘हिंदी बनाम अंग्रेजी’ के रूप में नहीं देखना चाहिए। राज्य की कोई योजना अंग्रेजी किताबें हटाने की नहीं है। केवल उन छात्रों की सहायता करने का विचार है, जिनकी पढ़ाई अबतक हिंदी माध्यम से हुई है। छात्र नीट (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंटरेंस टेस्ट) हिंदी माध्यम से दे रहे हैं, तो यदि मेडिकल कॉलेज अनुमति देंगे, तो वे इसके आगे भी हिंदी में जवाब दे सकेंगे।</p>
<p><strong>नीट की परीक्षा</strong><br />
दो साल पहले जब नीट की परीक्षा देश की 12 भाषाओं में देने की अनुमति मिली थी, तब मैंने <a href="https://pramathesh.blogspot.com/search?q=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80%E0%A4%AF+%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE%E0%A4%93%E0%A4%82+%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82+%E0%A4%87%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A5%80+%E0%A4%95%E0%A5%80+%E0%A4%AA%E0%A4%A2%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%88" rel="nofollow noopener" target="_blank">एक लेख अपने ब्लॉग पर</a> लिखा था। तत्कालीन शिक्षामंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने एक ट्वीट में लिखा कि &#8216;यह परीक्षा उन राज्यों की क्षेत्रीय भाषाओं में भी कराई जाएगी जहां स्टेट इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश क्षेत्रीय भाषाओं में हुई परीक्षा के आधार पर लिए जाते हैं। ऐसे राज्यों की भाषाएं अब जेईई मेन परीक्षा में शामिल की जाएंगी।&#8217; अभी तक जेईई मेन हिन्दी, इंग्लिश और गुजराती में आयोजित होता रहा है, जबकि नीट का आयोजन कुल 11 भाषाओं में किया जाता है।</p>
<p>हालांकि अभी प्रवेश परीक्षा की बात ही हुई है और आने वाले समय में इंजीनियरी की पढ़ाई भी भारतीय भाषाओं कराने की बात है, पर जिन्हें अंग्रेजी का वर्चस्व खतरे में पड़ने का डर है, उन्होंने अभी से विलाप करना शुरू कर दिया है। पहले यह हिन्दी थोपने के नाम पर होता था, पर अब चूंकि 12 भारतीय भाषाओं में यह परीक्षा होने जा रही है, उन्हें अब उस पढ़ाई की गुणवत्ता को लेकर डर लगने लगा है। वे चीन, जापान और कोरिया जैसे देशों के अनुभव को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। वे नहीं मानते कि अंग्रेजी के कारण हमारी गुणवत्ता बढ़ी नहीं, कम हुई है। बहरहाल <a href="https://timesofindia.indiatimes.com/blogs/toi-editorials/english-is-easier-india-is-woefully-underprepared-to-teach-engineering-in-regional-languages/" rel="nofollow noopener" target="_blank">टाइम्स ऑफ इंडिया</a> में इस विलाप की प्रतिध्वनि सुनें। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) भी  छात्रों को उनकी मातृ भाषा में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराएंगे।</p>
<p>अब दो सवाल हैं। पहला यह कि क्या यह हिंदी थोपना है? इसमें तो 12 भारतीय भाषाओं की बात है। दूसरा सवाल है कि क्या इन भाषाओं में पढ़ाई से गुणवत्ता प्रभावित नहीं होगी? इसका जवाब समय देगा। अलबत्ता इससे जुड़े कुछ मसलों पर मैंने विचार किया है, जो इस आलेख की दूसरी कड़ी में मैं लिखूँगा।</p>
<p><span style="color: #999999;"><em>Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। ये जरूरी नहीं कि द हरिशचंद्र इससे सहमत हो। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।</em></span></p>
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		<title>बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार</title>
		<link>https://theharishchandra.com/hindi/the-poisonous-business-of-hate-debates-must-stop/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[प्रमोद जोशी]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 01 Oct 2022 03:25:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="600" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-300x150.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-1024x512.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-768x384.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-696x348.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-1068x534.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-840x420.jpg 840w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-313x157.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार 16">मीडिया की सजगता या अतिशय सनसनी फैलाने के इरादों के कारण पिछले कुछ महीनों से देश में जहर-बुझे बयानों की झड़ी लग गई। अक्सर लोग इसे अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हैं, पर जब यह सुरुचि और स्वतंत्रता का दायरा पार कर जाती है, तब उसे रोकने की जरूरत होती है। हेट स्पीच का नवीनतम सुप्रीम [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1200" height="600" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-300x150.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-1024x512.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-768x384.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-696x348.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-1068x534.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-840x420.jpg 840w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/no-hate-313x157.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार 22"><p>मीडिया की सजगता या अतिशय सनसनी फैलाने के इरादों के कारण पिछले कुछ महीनों से देश में जहर-बुझे बयानों की झड़ी लग गई। अक्सर लोग इसे अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हैं, पर जब यह सुरुचि और स्वतंत्रता का दायरा पार कर जाती है, तब उसे रोकने की जरूरत होती है। हेट स्पीच का नवीनतम सुप्रीम कोर्ट से आया है। अदालत ने काफी कड़े शब्दों में चैनलों के एंकरों को फटकार लगाई है और इससे जुड़े सभी पक्षों से कहा है कि वे रास्ता बताएं कि किस तरह से इस आग को बुझाया जाए।</p>
<p>हालांकि देश में आजादी के पहले से ऐसे बयानों का चलन रहा है, पर 1992 में बाबरी विध्वंस के कुछ पहले से इन बयानों ने सामाजिक जीवन के ज्यादा बड़े स्तर पर प्रभावित किया है। इस परिघटना के समांतर टीवी का प्रसार बढ़ा और न्यूज़ चैनलों ने अपनी टीआरपी और कमाई बढ़ाने के लिए इस ज़हर का इस्तेमाल करना शुरू किया है। नब्बे के दशक में लोग गलियों-चौराहों और पान की दुकानों ज़हर बुझे भाषणों के टेपों को सुनते थे। विडंबना है कि हेट स्पीच रोकने के लिए देश में तब भी कानून थे और आज भी हैं, पर किसी को सजा मिलते नहीं देखा गया है।</p>
<p><strong>सब मूक-दर्शक</strong><br />
गत 21 सितंबर को जस्टिस केएम जोसफ और जस्टिस हृषीकेश रॉय की बेंच ने हेट-स्पीच से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह एंकर की जिम्मेदारी है कि वह किसी को नफरत भरी भाषा बोलने से रोके। बेंच ने पूछा कि इस मामले में सरकार ‘मूक-दर्शक’ क्यों बनी हुई है, क्या यह एक मामूली बात है? यही प्रश्न दर्शक के रूप में हमें अपने आप से भी पूछना चाहिए। यदि यह महत्वपूर्ण मसला है, तो टीवी चैनल चल क्यों रहे हैं? हम क्यों उन्हें बर्दाश्त कर रहे हैं? ‘मूक-दर्शक’ तो हम और आप हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सामान्य नागरिकों के भीतर चेतना का वह स्तर नहीं है, जो विकसित लोकतंत्र में होना चाहिए।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-medium" src="https://images.hukumonline.com/frontend/lt58328f8495661/lt58328febd7a25.jpg" width="648" height="434" alt="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार" title="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार 17"></p>
<p>चौराहों, नुक्कड़ों और भिंडी-बाजार के स्वर और शब्दावली विद्वानों की संगोष्ठी जैसी शिष्ट-सौम्य नहीं होती। पर खुले गाली-गलौज को तो मछली बाजार भी नहीं सुनता। वह भाषा सोशल मीडिया में पहले प्रवेश कर गई थी, अब मुख्यधारा के मीडिया में भी सुनाई पड़ रही है। मीडिया की आँधी ने सूचना-प्रसारण के दरवाजे भड़ाक से  खोल दिए हैं। बेशक इसके साथ ही तमाम ऐसी बातें सामने आ रहीं हैं, जो हमें पता नहीं थीं। कई प्रकार के सामाजिक अत्याचारों के खिलाफ जनता की पहलकदमी इसके कारण बढ़ी है, पर सकारात्मक भूमिका के मुकाबले उसकी नकारात्मक भूमिका चर्चा में है। हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हामी हैं, पर नहीं जानते कि इससे जुड़ी मर्यादाएं भी हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंदिश लगाने के जोखिम भी हैं।</p>
<p><strong>अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता</strong><br />
अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जरूरी है, लेकिन टीवी पर अभद्र भाषा बोलने की आजादी नहीं दी जा सकती है। संविधान के अनुच्छेद 19(1) ए के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीम नहीं है। उसपर विवेकशील पाबंदियाँ हैं। सिनेमाटोग्राफिक कानूनों के तहत सेंसरशिप की व्यवस्था भी है। पर समाचार मीडिया को लाइव प्रसारण की जो छूट मिली है, उसने अति कर दी है। टीवी मीडिया और सोशल मीडिया बिना रेग्युलेशन के काम कर रहे हैं। उनका नियमन होना चाहिए। इन याचिकाओं पर अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी। कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि वह स्पष्ट करे कि क्या वह हेट-स्पीच पर अंकुश लगाने के लिए विधि आयोग की सिफारिशों पर कार्रवाई करने का इरादा रखती है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-medium" src="https://theracquet.org/wp-content/uploads/2019/04/hate-spesech.png" width="752" height="440" alt="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार" title="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार 18"></p>
<p>देश में हेट-स्पीच से निपटने के लिए कई तरह के कानूनों का इस्तेमाल होता है, पर किसी में हेट-स्पीच को परिभाषित नहीं किया गया है। केंद्र सरकार अब पहले इसे परिभाषित करने जा रही है। विधि आयोग की सलाह है कि जरूरी नहीं कि सिर्फ हिंसा फैलाने वाली स्पीच को हेट-स्पीच माना जाए। इंटरनेट पर पहचान छिपाकर झूठ और आक्रामक विचार आसानी से फैलाए जा रहे हैं। ऐसे में भेदभाव बढ़ाने वाली भाषा को भी हेट-स्पीच के दायरे में रखा जाना चाहिए। सबसे ज्यादा भ्रामक जानकारियां फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सएप जैसे प्लेटफॉर्मों के जरिए फैलती हैं। इनके खिलाफ सख्त कानून बनने से कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुलेगा, पर फ्री-स्पीच के समर्थक मानते हैं कि एंटी-हेट-स्पीच कानून का इस्तेमाल विरोधियों की आवाज दबाने के लिए किया जा सकता है।</p>
<p><strong>आत्मघाती बहसें</strong><br />
कोई देश अपनी समस्याओं पर विचार विमर्श करे, इससे अच्छी बात क्या होगी. पर ये बहसें तो देश को ही जलाने पर उतारू हैं। नब्बे के दशक में जब देश में निजी चैनल शुरू हुए थे, तब आमतौर पर टीवी हार्ड न्यूज़ या ब्रेकिंग न्यूज़ की मीडिया था। उसमें बहस या विमर्श का हिस्सा बहुत कम था। आज हालत यह है कि आप दिन में जब भी टीवी खोलें, तो बहस होती नज़र आएगी। ज्यादातर चैनलों पर आप देखें कि बहस में भागीदार भले ही दस हों, एंकर की कोशिश होती है कि एक पक्ष बनाम दूसरा पक्ष हो। शुरुआती वर्षों में इस चर्चा में भाग लेने वाले स्वतंत्र टिप्पणीकार या ऐसे विशेषज्ञ होते थे, जो संतुलित बातें करते थे। पर अब चैनल एक-दूसरे से विपरीत राय रखने वाले और आत्यंतिक दृष्टिकोण वाले लोगों को बहस में शामिल करते हैं। वे चाहते हैं कि स्टूडियो में तनाव पैदा हो।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-medium" src="https://www.nicknotas.com/wp-content/uploads/2017/05/The_Trolls_are_Here.jpg" width="1620" height="1080" alt="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार" title="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार 19"></p>
<p>हाल के वर्षों में लाइव टीवी शो के दौरान थप्पड़, लात और घूँसे भी चलते देखे गए हैं। सच यह है कि कार्यक्रमों की पटकथा एंकर नहीं लिखते। वह तो चैनलों का प्रबंधन तय करता है। उसे टीआरपी चाहिए, जो सनसनी, तनाव और टकराव से मिलती है। सामाजिक जीवन के टकराव का फायदा उठाना सबसे आसान काम है। इन कार्यक्रमों के नाम भी महा संग्राम, हल्ला बोल, आर-पार, जवाब दो, दंगल, शंखनाद, खबरदार, महाभारत, मुकाबला, घमासान, वगैरह-वगैरह हैं। इनसे सनसनी की ध्वनि आती है। अदालत ने कहा, हेट-स्पीच से राजनेताओं को सबसे ज्यादा फायदा होता है और टेलीविजन चैनल उन्हें इसके लिए मंच देते हैं।</p>
<p><strong>समाधान क्या है?</strong><br />
सवाल है कि इन बातों का समाधान क्या है? अदालत ने भी समस्या का जिक्र किया है, समाधान नहीं बताया। बेशक वर्तमान परिस्थितियों में एक समाधान है कि आप टीवी बंद करके बैठ जाएं, पर यह समाधान नहीं है। नकारात्मक के अलावा मीडिया के सकारात्मक पक्ष भी हैं। दूसरे यदि यह कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्या है, तो उसके समाधान या तो सरकार देगी या अदालत। 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले दो बार सुप्रीम कोर्ट में ‘हेट-स्पीच’ का मामला सामने आया। अदालत ने 12 मार्च को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए विधि आयोग को निर्देश दिया कि वह नफरत भरे बयानों, खासतौर से चुनाव के दौरान ऐसी हरकतों को रोकने के लिए दिशा निर्देश तैयार करे। जस्टिस बीएस चौहान के नेतृत्व में तीन सदस्यों के पीठ ने कहा कि ऐसे बयान देने वालों को सजा न मिल पाने का कारण यह नहीं है कि हमारे कानूनों में खामी है। कारण यह है कि कानूनों को लागू करने वाली एजेंसियाँ शिथिल हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-medium" src="https://awsimages.detik.net.id/community/media/visual/2017/08/25/c7bc2e54-d020-4ded-a74d-ca73d57b4708.jpg?w=700&amp;q=90" width="700" height="420" alt="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार" title="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार 20"></p>
<p>2020 में सुदर्शन न्यूज़ चैनल के ‘यूपीएससी जिहाद&#8217; कार्यक्रम पर रोक लगाते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था, &#8216;हमें इसमें दखल देना पड़ा क्योंकि इस पर कोई एक्शन नहीं लिया जा रहा था। ये सही वक्त हो सकता है, जब हम आत्म नियमन की ओर बढ़ें।&#8217;  इस समय अदालत के सामने जो कई याचिकाएं हैं, उनमें एक यह भी है। ये बातें व्यापक स्तर पर ‘हेट-स्पीच’ से जुड़ी हैं। टीवी स्टूडियो या उससे बाहर कहीं भी। पर यहाँ टीवी स्टूडियो से बाहर निकल रही जहरीली भाषा की बात हो रही है। हाल में सरकार ने सोशल मीडिया के नियमन के लिए कुछ निर्देश और नियम जारी किए थे, जिन्हें अदालत में चुनौती दी गई है। सरकार टीवी से जुड़े नियम बनाएगी, तो उन्हें भी चुनौती दी जाएगी। एक तरीका है कि टीवी चैनलों से जुड़ी संस्थाएं नियमन की शुरुआत करें। इसके लिए एनबीए और एनबीएसए जैसी संस्थाएं बनी हैं।</p>
<p><strong>मुंबई हमला</strong><br />
नवंबर 2008 में मुंबई हमले के दौरान हुई लाइव कवरेज का लाभ आतंकियों ने उठाया था। उसके बाद चैनलों ने आत्मानुशासन का परिचय दिया था। वे अब भी यह काम कर सकते हैं। 2007 में न्यूज़ चैनलों ने मिलकर न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एसोसिएशन यानी एनबीए का गठन किया था। पिछले साल इसका नाम न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल एसोसिएशन (एनबीडीए) कर दिया गया। इसमें डिजिटल मीडिया को भी शामिल कर लिया गया है। न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी यानी एनबीएसए का नाम अब एनबीडीएसए है। पर इन संस्थाओं की वैधानिकता नहीं है। चैनल इनकी सलाह मानें या न मानें, उनकी मर्जी। सुदर्शन टीवी मामले पर सुनवाई के दौरान एनबीडीएसए के अधिकारों को लेकर भी बातें कही गई हैं।</p>
<p><strong>धंधा और मुनाफा</strong><br />
समस्या के पीछे दो बड़े कारण हैं। एक, राजनीतिक और दूसरा कारोबारी। राजनीतिक दल अपने दृष्टिकोण का ज्यादा से ज्यादा प्रसारण चाहते हैं। सभी राजनीतिक दलों ने अपने प्रवक्ताओं की लंबी फौजें तैयार कर ली हैं। पिछले डेढ़ दशक में राजनीतिक दलों के प्रवक्ता बनने का काम बड़े कारोबार के रूप में विकसित हुआ है। पार्टियों के भीतर इस काम के लिए कतारें हैं। दूसरे, टीवी चैनलों का कारोबार इससे जुड़ा है। आप चैनलों को देखें। उनमें सरकारों के विज्ञापन बढ़ गए हैं। कई राज्यों की सरकारों के विज्ञापन आप राष्ट्रीय मीडिया में देखेंगे। चैनलों के प्रबंधकों को जब जरूरी लगता है, वे उस सरकार के पक्ष में कवरेज कराते हैं या नहीं? उनके पास कवरेज को नियंत्रित करने के उपकरण हैं। वे जब चाहते हैं, तब कवरेज में झुकाव पैदा कर देते हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-medium" src="https://www.coe.int/documents/365513/10877703/Statement-Sexist-hate-speech-Elena-%28Colombie%29-Cartoononig-for-Peace-870x489.jpg/50c93cdd-beaf-b37f-f8a3-c4f8ae8d5ef2" width="870" height="489" alt="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार" title="बंद होना चाहिए नफ़रती बहसों का ज़हरीला कारोबार 21"></p>
<p>जब राजनीति इस नफरती आग में रोटियाँ सेंकने लगती है, तब उसपर काबू पाना काफी जटिल हो जाता है। और जब शिकायतें बढ़ती हैं, तब पुलिस प्रशासन जो कार्रवाई करता है, उसे लेकर भी शिकायतें होती हैं। यह दो-चार एंकरों की बात नहीं है। सच वह है जो जस्टिस रॉय ने कहा है,&#8217;नफ़रत से टीआरपी आती है और टीआरपी से मुनाफ़ा आता है।&#8217; साथ ही उन्होंने कहा कि हम इसे लेकर एक गाइडलाइन जारी करना चाहते हैं जो कानून बनने तक इस्तेमाल में लाई जाए। पर इसमें भी समय लगेगा। नफरत का यह हथियार बहुतों को फायदा पहुँचा रहा है। जब नफरती-कारोबार में मुनाफा है, तब हम प्रेम और सद्भाव किसे और कैसे समझाएंगे?</p>
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		<title>अर्थव्यवस्था का मंथर-प्रवाह</title>
		<link>https://theharishchandra.com/hindi/slow-economy/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[प्रमोद जोशी]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 04 Sep 2022 02:07:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="660" height="450" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="मोदी व्यक्ति नहीं एक सोच हैं…." style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave.jpeg 660w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave-300x205.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave-218x150.jpeg 218w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave-616x420.jpeg 616w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave-313x213.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 660px) 100vw, 660px" title="अर्थव्यवस्था का मंथर-प्रवाह 23">भारत की अर्थव्यवस्था (जीडीपी) चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में 13.5 फीसदी बढ़ी है। सामान्य-दृष्टि से इस संख्या को बहुत उत्साहवर्धक माना जाएगा, पर वस्तुतः यह उम्मीद से कम है। विशेषज्ञों का  पूर्वानुमान 15 से 16 प्रतिशत का था, जबकि रिज़र्व बैंक को 16.7 प्रतिशत की उम्मीद थी।  अब इस वित्त वर्ष के लिए ग्रोथ के अनुमान [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="660" height="450" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="मोदी व्यक्ति नहीं एक सोच हैं…." style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave.jpeg 660w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave-300x205.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave-218x150.jpeg 218w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave-616x420.jpeg 616w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/modiWave-313x213.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 660px) 100vw, 660px" title="अर्थव्यवस्था का मंथर-प्रवाह 24"><div style="clear: both;">
<p>भारत की अर्थव्यवस्था (जीडीपी) चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में <a href="https://hindi.news18.com/news/business/indias-q1fy23-gdp-grows-13-point-5-percent-fastest-in-a-year-says-govt-data-mlks-4525829.html" rel="nofollow noopener" target="_blank">13.5 फीसदी बढ़ी</a> है। सामान्य-दृष्टि से इस संख्या को बहुत उत्साहवर्धक माना जाएगा, पर वस्तुतः यह उम्मीद से कम है। विशेषज्ञों का  पूर्वानुमान 15 से 16 प्रतिशत का था, जबकि रिज़र्व बैंक को 16.7 प्रतिशत की उम्मीद थी।  अब इस वित्त वर्ष के लिए ग्रोथ के अनुमान को विशेषज्ञ 7.2 और 7.5 प्रतिशत से घटाकर 6.8 से 7.00 प्रतिशत मानकर चल रहे हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से 31 अगस्त को जारी आँकड़ों के अनुसार जीडीपी की इस वृद्ध में सेवा गतिविधियों में सुधार की भूमिका है, बावजूद इसके व्यापार, होटल और परिवहन क्षेत्र की वृद्धि दर अब भी महामारी के पूर्व स्तर (वित्त वर्ष 2020 की जून तिमाही) से कम है। हालांकि हॉस्पिटैलिटी से जुड़ी गतिविधियों में तेजी आई है। जीडीपी में करीब 60 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले, उपभोग ने जून की तिमाही में 29 फीसदी की मजबूत वृद्धि दर्ज की।</p>
<p><strong>नागरिक का भरोसा</strong><br />
उपभोक्ताओं ने पिछले कुछ समय में जिस जरूरत को टाला था, उसकी वापसी से निजी व्यय में इजाफा हुआ है। इससे इशारा मिलता है कि खर्च को लेकर <a href="https://www.thehindu.com/opinion/editorial/slow-improvement-the-hindu-editorial-on-gdp-growth-in-2022-23-first-quarter/article65837034.ece" rel="nofollow noopener" target="_blank">उपभोक्ताओं का भरोसा</a> बढ़ा है। ‘पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स’ (पीएमआई), क्षमता का उपयोग, टैक्स उगाही, वाहनों की बिक्री के आँकड़े जैसे सूचकांक बताते हैं कि इस वित्त वर्ष के पहले कुछ महीनों में वृद्धि की गति तेज रही। अगस्त में मैन्युफैक्चरिंग की पीएमआई 56.2 थी, जो जुलाई में 56.4 थी। यह मामूली वृद्धि है, पर मांग में तेजी और महंगाई की चिंता घटने के कारण वृद्धि को मजबूती मिली है। खाद्य सामग्री से इतर चीजों के लिए बैंक क्रेडिट में मजबूत वृद्धि भी मांग में सुधार का संकेत देती है। दूसरी तरफ सरकारी खर्च महज 1.3 फीसदी बढ़ा है। सरकार राजकोषीय घाटे को काबू करने पर ध्यान दे रही है।</p>
<p><strong>बेहतरी की ओर</strong><br />
जीडीपी के ये आँकड़े अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर को पेश नहीं करते हैं, पर इनके सहारे काफी बातें स्पष्ट हो रही हैं। पहला निष्कर्ष है कि कोविड और उसके पहले से चली आ रही मंदी की प्रवृत्ति को हमारी अर्थव्यवस्था पीछे छोड़कर बेहतरी की ओर बढ़ रही है। पर उसकी गति उतनी तेज नहीं है, जितना रिजर्व बैंक जैसी संस्थाओं को उम्मीद थी। इसकी वजह वैश्विक-गतिविधियाँ भी हैं। घरेलू आर्थिक गतिविधियों में व्यापक सुधार अभी नहीं आया है। आने वाले समय में ऊँची महंगाई, कॉरपोरेट लाभ में कमी, मांग को घटाने वाली मौद्रिक नीतियों और वैश्विक वृद्धि की मंद पड़ती संभावनाओं के रूप में वैश्विक चुनौतियों का अंदेशा बना हुआ है। मुद्रास्फीति को काबू में करने के लिए ब्याज दरें बढ़ने से अर्थव्यवस्था में तरलता की कमी आई है, जिससे पूँजी निवेश कम हुआ है। नए उद्योगों और कारोबारों के शुरू नहीं होने से रोजगार-सृजन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। इससे उपभोक्ता सामग्री की माँग कम होगी। सरकारी खर्च बढ़ने से इस कमी को कुछ देर के लिए ठीक किया जा सकता है, पर सरकार पर कर्ज बढ़ेगा, जिसका ब्याज चुकाने की वजह से भविष्य के सरकारी खर्चों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और विकास-योजनाएं ठप पड़ेंगी। इस वात्याचक्र को समझने और उसे दुरुस्त करने की एक व्यवस्था है। भारत सही रास्ते पर है, पर वैश्विक-परिस्थितियाँ आड़े आ रही हैं। अच्छी खबर यह है कि पेट्रोलियम की कीमतें गिरने लगी हैं।</p>
<p><strong>महंगाई की मार</strong><br />
जुलाई के महीने में देश का खुदरा मूल्य सूचकांक (सीपीआई-सी) 6.71 हो गया, जो पिछले पाँच महीनों में सबसे कम है। अच्छी संवृद्धि और मुद्रास्फीति में क्रमशः आती गिरावट से उम्मीदें बढ़ी हैं। स्थिर कीमत पर आधारित सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में 12.7 फीसदी बढ़ा, जबकि नॉमिनल जीडीपी में 26.7 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जो अर्थव्यवस्था में ऊँची मुद्रास्फीति के असर को दर्शाता है। इसका मतलब है कि खुदरा महंगाई भले ही क़ाबू में दिख रही हो, <a href="https://www.bbc.com/hindi/india-62747770" rel="nofollow noopener" target="_blank">असली महंगाई सुरसा की तरह</a> मुंह खोले खड़ी है। रिजर्व बैंक को इस समस्या के समाधान पर विचार करना होगा। इस महीने 30 सितंबर को रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक होने वाली है। अनुमान है कि बैंकों की ब्याज दरों में 25 से 35 आधार अंकों (बीपीएस) की बढ़ोतरी हो सकती है। उसके पहले 12 सितंबर को भारत के अगस्त महीने को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की और 21 सितंबर को अमेरिकी फेडरल बैंक की ब्याज दरों की घोषणा होगी। रिजर्व बैंक को इन दोनों घोषणाओं का इंतजार रहेगा। इनका असर भारत में विदेशी पूँजी-निवेश पर पड़ेगा। रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति को 2-6 प्रतिशत के बीच रखना चाहता है। शायद ब्याज दरें उतनी न बढ़ें, जितनी समझी जा रही है।</p>
<p><strong>पूँजी निवेश</strong><br />
निवेश संबंधी गतिविधियों का जायजा देने वाले ‘ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन’ (जीएफसीएफ) ने 20.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की। जीडीपी में इसका योगदान पिछले वर्ष की इसी तिमाही के मुक़ाबले इस तिमाही में 32.7 फीसदी से बढ़कर 34.7 फीसदी हो गया। आर्थिक मामलों के सचिव अजय सेठ के अनुसार यह पिछले दस साल की पहली तिमाहियों में सबसे ज्यादा है। इससे पता लगता है कि कई तरह के सुधारों और उठाए गए कदमों का असर दिखाई पड़ रहा है। हालांकि महामारी से पहले की अवधि में वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही की तुलना में यह महज 6.7 फीसदी बढ़ा है। पहली तिमाही में पूँजीगत निवेश 1.75 लाख करोड़ रुपये का हुआ, जो इस साल के बजट अनुमान का 23.4 प्रतिशत है और पिछले वर्ष की तुलना में 57 प्रतिशत ज्यादा है। इस प्रकार इस तिमाही में सकल स्थिर पूंजी निर्माण और निजी उपभोग दोनों बहुत अच्छे रहे हैं।</p>
<p><strong>बेरोजगारी</strong><br />
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के ताज़ा आँकड़े बता रहे हैं कि 2021 में देश में 4204 दिहाड़ी मज़दूरों ने आत्महत्या की है। ये ज्यादातर शहरी मजदूर हैं। यह देश में हुई कुल आत्महत्याओं का एक चौथाई से ज़्यादा हिस्सा था. रिपोर्ट में दिखता है कि 2014 के बाद से लगातार रोज़ कमाने वालों की आत्महत्या के मामलों में बढ़त हो रही है। इनमें बेरोज़गारों, स्वरोजगार में लगे लोगों और प्रोफेशनल्स या वेतनभोगियों को भी जोड़ें तो यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से ऊपर पहुंच जाता है। देश में बेरोजगारी दर अगस्त में एक साल के उच्च स्तर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गई। इस दौरान रोजगार पिछले महीने की तुलना में 20 लाख घटकर 39.46 करोड़ रह गया। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के अनुसार, जुलाई में बेरोजगारी दर 6.8 प्रतिशत थी तथा रोजगार 39.7 करोड़ था। शहरी बेरोजगारी दर आमतौर पर ग्रामीण बेरोजगारी दर से ऊंची यानी आठ प्रतिशत रहती है, जबकि ग्रामीण बेरोजगारी दर लगभग सात प्रतिशत होती है। अगस्त में शहरी बेरोजगारी दर बढ़कर 9.6 प्रतिशत और ग्रामीण बेरोजगारी दर 7.7 प्रतिशत हो गई। ग्रामीण बेरोजगारी का रिश्ता खेती से जुड़ी गतिविधियों और शहरी बेरोजगारी का संबंध औद्योगिक गतिविधियों और उपभोक्ता सामग्री की खरीद से जुड़ा है।</p>
<p><strong>अमृत काल</strong><br />
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगले 25 वर्षों को अमृत काल घोषित किया है। यानी कि देश को विकसित देशों की बराबरी पर रखने का समय। यह कैसे होगा? अगले 25 वर्ष में उठाए गए नीतिगत कदम ही तय करेंगे कि 2047 में भारत की विकास-यात्रा में कितनी दूरी तय कर पाएगी। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद तथा इंस्टीट्यूट फॉर कंपटीटिवनेस द्वारा प्रकाशित एक साझा रिपोर्ट इसे समझने के लिए उपयोगी है। यह रिपोर्ट ‘इंडिया कंपटीटिवनेस इनीशिएटिव’ का हिस्सा है, जो नरेंद्र मोदी और हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के माइकल पोर्टर की वार्ता के बाद शुरू हुआ है। इस पहल का काम है, नीतियों का ऐसा खाका तैयार करना, जिनसे देश को 2047 में आजादी की 100वीं वर्षगांठ तक मध्य आय और उससे आगे ले जाया जा सके। रिपोर्ट में मौजूदा हालात को लेकर जो आकलन किया गया है उसमें कहा गया है कि भारत में गरीबी कम हुई है, वहीं असमानता बढ़ी है। प्रति कर्मचारी सकल घरेलू उत्पाद में आए बदलाव के आधार पर आकलित उत्पादकता वृद्धि अच्छी रही है लेकिन श्रम को संगठित करने में हम पिछड़े हैं। कृषि और श्रम शक्ति की भागीदारी में कामयाबी नहीं मिली है। महिलाओं की भागीदारी निराशाजनक रूप से कम रही है। बड़ी कंपनियों ने उत्पादकता बढ़ाई है, पर ज्यादातर लोग छोटी कंपनियों में काम करते हैं। देश का बड़ा हिस्सा विकास की प्रक्रिया से कटा हुआ है। शहरीकरण बहुत धीमा है। इन समस्याओं के बारे में हम जानते हैं, पर उनसे जुड़े नीतिगत फैसले नहीं कर पाए हैं।</p>
<p><strong>शिक्षा की गुणवत्ता</strong><br />
भारत को आर्थिक-वृद्धि हासिल करनी है तो जवाब देना होगा कि हमारी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार क्यों नहीं हो रहा है। जब तक मानव-संपदा में सुधार नहीं होगा, तब तक देश का कारोबार प्रतिस्पर्धी नहीं बन सकेगा। देश की कंपनियों का आकार जिस गति से बढ़ना चाहिए, उस गति से नहीं बढ़ रहा है। इसी तरह स्वदेशी कंपनियों को विदेशी कंपनियों की स्पर्धा से बचाने की कोशिशों के बजाय उन्हें प्रतिस्पर्धी बनाने का प्रयास करना चाहिए। यह दुखद स्थिति है कि दुनिया के कुल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी आज भी कोरोना के पहले वाली स्थिति में नहीं पहुंच पाई है। हमारी हिस्सेदारी तीन प्रतिशत के आसपास है। यह हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए हमारे माल को गुणवत्ता में प्रतिस्पर्धी बनाना होगा। इसके साथ ही उन कानूनी पेचों को दूर करना होगा, जो कारोबारियों की राह में रोड़ा अटकाते हैं। यह व्यवस्था सुधारने से जुड़ा काम है।</p>
<p><span style="color: #999999;"><em>Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। ये जरूरी नहीं कि द हरिशचंद्र इससे सहमत हो। इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है।</em></span></p>
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