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	<title>राजेन्द्र बोड़ा &#8211; The Harishchandra &#8211; Hindi</title>
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		<title>डिजिटल प्रौद्योगिकी जीवन को सरल बनाते हए बहुत कुछ छीनती भी है</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 17 May 2024 07:36:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="630" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="The Harishchandra News Image" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-300x158.png 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1024x538.png 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-768x403.png 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-696x365.png 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1068x561.png 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-800x420.png 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-313x164.png 313w" sizes="(max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="डिजिटल प्रौद्योगिकी जीवन को सरल बनाते हए बहुत कुछ छीनती भी है 1">तकनीकी प्रगति में कुछ भी सीधा-सरल नहीं होता। कोई भी नई प्रौद्योगिकी जो हमारे जीवन को आसान बनाने वाली चीज़ें लेकर आती हैं तो वह हम से बहुत सी चीजें छीन भी ले जाती है। यह इतना सहज से होता है कि हमें इसका तत्काल पता नहीं चल पाता। डिजिटल तथा अंतर्जाल (इंटरनेट) की प्रौद्योगिकी [&#8230;]]]></description>
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<p>तकनीकी प्रगति में कुछ भी सीधा-सरल नहीं होता। कोई भी नई प्रौद्योगिकी जो हमारे जीवन को आसान बनाने वाली चीज़ें लेकर आती हैं तो वह हम से बहुत सी चीजें छीन भी ले जाती है। यह इतना सहज से होता है कि हमें इसका तत्काल पता नहीं चल पाता। डिजिटल तथा अंतर्जाल (इंटरनेट) की प्रौद्योगिकी ने हमारे जीवन को जितना आसान बना दिया है उसकी पहले कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। डिजिटल तकनीक और इंटरनेट ने हमारी पहुंच को अकल्पनीय हद तक बढ़ा दिया है; हमारे लिए लिए सूचना के द्वार और मनोरंजन के नये वितान खोल दिए हैं। नई प्रौद्योगिकी से बनी आभासी दुनिया हमें मौजूद समय में आपस में जोड़ भी रही है। हम नई-नई खोजों का आनंद ले रहे हैं। बहुत से लोगों के लिए यह नयी डिजिटल व्यवस्था धन कमाने का जरिया भी बनी है। इससे हमने बहुत कुछ पाया है, मगर इसने हमसे बहुत सी चीजें छीन भी ली है जिसके लिए उम्रदराज हो रही पीढ़ी अनेक बार नोस्टेल्जिक हो उठती है। जैसे, फोटो एलबम को ही लें जिनमें हम बड़े जतन से अपनी, अपने परिजनों व मित्रों की, पारिवारिक एवं अन्य समारोहों की श्वेत श्याम और फिर रंगीन फोटुएं चिपकाते थे। उन्हें एल्बम की शीट पर लगाने के लिए चिपकने वाले कोनों का उपयोग करते थे। अब उन एल्बमों की जरूरत नहीं रही। अब डिजिटल स्टोरेज ने उन्हें हम से छीन लिया। अब फोटो खींचने वाले घरेलू गैर पेशेवराना कैमरे भी नई डिजिटल तकनीक ने हम से छीन लिए हैं। अब कैमरे के अपरचर व टाइमर का हिसाब भी नहीं सीखना पड़ता और न यह पता करने के लिए कि फ़ोटो साफ आई है या नहीं फिल्म के धुल कर आने का इंतज़ार करना पड़ता है। नये डिजिटल कैमरे और स्मार्टफोन हमारे लिए सभी काम खुद ही कर लेते हैं। ली गई तस्वीरों को इंटरनेट पर उपलब्ध मुफ़्त सुविधाओं से उन्हें न केवल सुधार ही सकते हैं बल्कि परिचितों से तुरंत साझा भी कर सकते हैं। कैमरे के ऑटो क्लिक को सेल्फ़ी ने छीन लिया है। सर्च इंजिन ‘गूगल’ से पहले हम किसी किताब का पता करने तथा उसे खरीदने के लिए शहर की किताबों की दुकानों के चक्कर लगाते थे और दुकानदारों की मिन्नतें करते थे कि अमुक किताब वह हमारे लिए मंगवा दे। नेट ने यह काम उनसे छीन कर अमेज़न और प्रकाशकों की वेब साइटों को दे दिया है। किताबें ही क्यों अन्य सामान, यहां तक कि भोजन की थाली भी, ऑनलाइन ऑर्डर दे कर मंगा सकने के नये जमाने में पुरानी चीजों का खो जाना किसी को अखरता नहीं। अब हम शहर के बाज़ार की जगह अधिकतर इंस्टाग्राम पर मौजूद खिड़कियों में विंडो शॉपिंग करते हैं, जहां लक्षित विज्ञापन होते हैं और जिनके प्रायोजक जानते हैं कि हमारी रुचियां क्या हैं। नई तकनीक ने विंडो शॉपिंग के आश्चर्य और लालसा के भाव और दूकान के अंदर की मनोरम झलक पाने का आनंद छीन लिया है। जब हम स्कूल या कॉलेज में पढ़ते थे तब हमारे लिए जो सबसे महत्वपूर्ण चीज होती थी वह थी डिक्शनरी। पढाकुओं के पास अंग्रेजी से अंग्रेजी, अंग्रेजी से हिन्दी और हिन्दी से हिन्दी की तीन-तीन डिक्शनरियां होती थी। अंग्रेजी की कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड दोनों डिक्शनरियां घर में होनी लाज़मी थी। अंग्रेजी से हिन्दी के लिए फादर कामिल बुल्के और हिन्दी की भार्गव की डिक्शनरियों का अपना रुतबा हुआ करता था। इंटरनेट ने हमारे बचपन और किशोर वय की साथी रही उन डिक्शनरियों को हमसे छीन लिया। ऐसे ही 12 खंडों वाले एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में कुछ खोजने के लिए कॉलेज की लाइब्रेरी जाना होता था क्योंकि यह भारी भरकम कोश खरीदना हर एक के बूते की बात नहीं होती थी। थोड़े ऊंचे पढ़ाकू थैसारस रख कर गर्व अनुभव करते थे। अब उनके लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं होती, सभी इंटरनेट पर मौजूद है।</p>
<p>डिजिटल क्रांति ने हमसे फुटकर नकदी भी छीन ली है। आज भारत के दूर-दराज के कोनों में रहने वाले लोग भी रोज़मर्रा का बहुत से सामान बिना नक़दी के ख़रीद रहे हैं। यहां तक कि एक पैकेट ब्रेड या बिस्किट ख़रीदने के लिए क्यूआर कोड स्कैन करके दस-बीस रुपये जैसी मामूली रक़म का भी भुगतान ऑनलाइन ही किया जाता है। नकद पैसा जेब में रखने की जरूरत अब नहीं रही है। दुनिया के किसी कोने से पेन-फ्रेंड की डाक से चिट्ठी मिलना छिन गया है। डायल करने वाले फोन, सीडी और डीवीडी प्लेयर जैसे यंत्र अब यादों में सिमट गये हैं। कभी हम छत पर एरियल लगा कर रेडियो सेट पर बड़ी सावधानी से ट्यून करके शॉर्टवेव पर रेडियो सिलोन, बीबीसी या दूर दराज के दूसरे देशों के प्रसारण सुनते थे। इंटरनेट ने इन सब को छीनते हुए उनके विकल्प स्मार्टफोन में दे दिए हैं। रेडियो के समाचारों से घड़ियां मिलाना भी हमसे छिन गया है। कुछ भी हो जाए आकाशवाणी पर समाचार ठीक निर्धारित क्षण पर शुरू होते थे न एक सेकेंड आगे न एक सेकेंड पीछे। रेडियो से घड़ी मिलाने का आनंद हमसे छिन गया। अब तो इंटरनेट से जुड़े स्मार्टफोन अपनी घड़ी अंतर्राष्ट्रीय और स्थानीय समय के अनुसार अपने आप सेट कर लेते हैं। नेट पर ही अब सारे रेडियो तथा टीवी स्टेशन मौजूद हैं जिनका जीवंत प्रसारण इंटरनेट की बदौलत डिजिटल दुनिया में उपलब्ध है। गत्ते के कागज पर छपा रेल का छोटा सा टिकट यात्रा पूरी होने तक अब जेब में संभाल कर रखने का अनुभव हमसे छिन गया है। उसे खरीदने के लिए रेलवे स्टेशन जाकर लंबी लाइन में लगना अब पुरानी बात हो गई है। इंटरनेट पर ऑनलाइन खरीदा गया टिकट हमारे फोन में रहता है और उसे स्क्रीन पर ही टीटी को जरूरत पड़ने पर दिखाया जा सकता है। इंटरनेट निर्विवाद रूप से एक प्रकार का जादू है, मगर उसने हमारे जीवन के कुछ पुराने जादू पर पोंछा फेर दिया है। हमारे दैनिक अस्तित्व पर इंटरनेट ने कैसा प्रभाव डाला है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सुबह आंख खुलते ही सबसे पहला काम स्मार्टफोन की स्क्रीन पर टैप करना तो अब लोगों की आदत बन चला है। हम ऑनलाइन दुनिया में अधिक से अधिक समय बिताने लगे हैं। इंटरनेट से पहले का जीवन अब गुदगुदाती सुखद स्मृति बन कर रह गया है जिसे वापस नहीं पाया जा सकता।</p>
<p>अब हमें कहीं पहुँचने के लिए किसी से रास्ता पूछने की जरूरत नहीं रही। कभी वे ड्राइवर अधिक सफल होते थे जिन्हें शहर के रास्ते हाथ की हथेली की तरह मालूम होते थे। अब उनकी जरूरत नहीं रही है। अब हम गूगल मैप से अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं। टैक्सी वाले, जो अब कैब वाले कहलाते हैं, भी आपसे पता पूछ कर इंटरनेट से जुड़े अपने स्मार्टफोन में फ़ीड करते हैं और गूगल के निर्देशों के अनुसार रास्ता चुनते हैं और गंतव्य तक पहुंचते हैं। टैक्सी बुलाने के लिए भी उसी फोन का इस्तेमाल होता है जो हमारे हाथ में होता है। वास्तव में वह हमारी हथेली में पूरा कंप्यूटर है। इस पर छोटे संदेश या बड़े आलेख लिख कर भेज सकते हैं। इससे भी आगे बढ़ कर दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से रीयल टाइम में संदेशों का आदान प्रदान ही नहीं कर सकते हैं बल्कि वीडियो चैट भी जब चाहें कर सकते हैं। फोन तो हम पहले भी करते थे और उस पर लंबी-लंबी बातें भी होती थी। अपने बचपन को याद कीजिए जब यह उलाहना सुनते थे कि अरे वह तो एक घंटे से फोन पर ही चिपका या चिपकी हुई बैठी है। अब जब कोई फोन पर गेम खेलने में व्यस्त हो तब भी कोई ऐसी शिकायत नहीं करता। अब तो किसी को फोन करने से पहले भी संदेश भेज कर पूछा जाता है कि क्या मैं आपको कॉल कर सकता हूं? यह नये शिष्टाचार ने पुराने बेतकल्लुफ़ शिष्टाचार को छीन लिया है। अनौपचारिक रिश्ते हम से छिन गए हैं। इंटरनेट के इस युग में क्या हममें से किसी को सचमुच दूसरों के जन्मदिन याद रहते हैं? यदि नजदीकी रिश्तेदारों या प्रतिदिन ऑफिस में बगल में बैठने वालों के जन्मदिन कोई हम से पूछ ले तो हम बगलें झांकने लगते हैं। इन तारीखों तथा फोन नंबरों को सलीके से लिखी छोटी डायरियां हमसे छिन गई हैं। चिंता किस बात की; इंटरनेट मौजूद है ना। जन्मदिन की शुभकामनाएं देने के लिए इमोजी के साथ इंटरनेट पूरी तरह तैयार रहता है। मगर जो इंटरनेट पर नहीं हैं उनका क्या? इंटरनेट का एक विरोधाभास यह है कि जहां इसने जिस दुनिया को हमारे लिए खोल दिया है, वहीं इसने उस दुनिया को छोटा भी महसूस कराया है। हम नदी, पहाड़, बागानों तथा स्मारकों के शानदार दृश्य असल में नहीं डेस्कटॉप पृष्ठभूमि में देखते हैं। ऑनलाइन सर्फिंग में कुछ घंटे बिताने के बाद हमें दुनिया छोटी, दोहरावदार और सपाट दिखने लगती है। शायद हम अपना बोरडम मिटाने के लिए स्मार्टफोन पर उंगलियां फिराते है। पहले लोग जीवन के उबाऊ पलों को सहज स्वीकार करते थे। भाषा विज्ञानी बताते हैं कि &#8220;बोरडम&#8221; शब्द आंशिक रूप से उन्नीसवीं सदी के मध्य तक सामने नहीं आया था। घर में मन नहीं लगा तो हम अवकाश में खाली फुटपाथों पर या आबादी से दूर लक्ष्यहीन सैर पर चले जाते थे। मोबाइल फोन और डिजिटल डाटा ने हमसे यह आनंद भी छीन लिया है।</p>
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		<title>शासन में जन भागीदारी मतदान कर देने भर से पूरी नहीं हो जाती</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Oct 2023 07:43:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/images284729.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="शासन में जन भागीदारी मतदान कर देने भर से पूरी नहीं हो जाती" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/images284729.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/images284729-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/images284729-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/images284729-313x176.jpeg 313w" sizes="(max-width: 739px) 100vw, 739px" title="शासन में जन भागीदारी मतदान कर देने भर से पूरी नहीं हो जाती 3">लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए विधायिका का नियमित निर्वाचन शासन में जन भागीदारी का महत्वपूर्ण घटक है। भारतीय संविधान में सार्वभौम सत्ता यहां के नागरिकों के हाथ में हैं जो अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान करते हैं। जो जनता का बहुमत जुटा पाता है वही शासन की बागडोर संभालता है। [&#8230;]]]></description>
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<p>लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए विधायिका का नियमित निर्वाचन शासन में जन भागीदारी का महत्वपूर्ण घटक है। भारतीय संविधान में सार्वभौम सत्ता यहां के नागरिकों के हाथ में हैं जो अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान करते हैं। जो जनता का बहुमत जुटा पाता है वही शासन की बागडोर संभालता है। परंतु दलीय लोकतंत्र में मंत्रीमंडल का सामूहिक दायित्व होता है, भले ही उसका गठन विधायिका में बहुमत वाला नेता करता है। प्रत्येक पांच साल बाद राजनेताओं को फिर से जनता के दरबार में जाना होता है और उनके बहुमत का समर्थन पाना होता है। राजस्थान में वह घड़ी आ गई है कि जब यहां के लोग आगामी 23 नवंबर को अपने दो सौ नुमाइंदे चुनने के लिए मतदान करेंगे और तीन दिसंबर को वोटिंग मशीनें परिणाम बता देंगी कि अगले पांच वर्षों के लिए कौन सा दल शासन की बागडोर संभालेगा। शासन में जन भागीदारी की प्रक्रिया अनौपचारिक रूप से दलों के प्रत्याशियों के चयन और निर्दलीय प्रत्याशियों के आगे आने के साथ ही शुरू हो जाती है। मगर जन भागीदारी उतनी आसान नहीं होती जितनी आसानी से उसकी बात की जाती है। विविधताओं वाले भारतीय समाज में सबकी भागीदारी वाली आदर्श गणतांत्रिक व्यवस्था बनाई जाना हमेशा ही कठिन रहा है। सबकी झोली भरे यह भी तो संभव नहीं होता। किन्तु    समानता और न्याय की संवैधानिक व्यवस्था का भरोसा सबको एक किये रखता है। दूसरी तरफ यह भी सच है कि शासन में भागीदारी तो सभी चाहते हैं परंतु वास्तविक भागीदारी राजनीति के कुछ धुरंधर चतुर सुजान ही कर पाते हैं। उनकी यह भागीदारी सर्वजनहिताय की न होकर अपने और अपनों के लिये हो कर रह जाती है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से एक हैं प्रभावी ढंग से भागीदारी के बारे में आम नागरिक के रुझान और उसमें जागरूकता की कमी। हर पांच साल में एक बार &#8216;हम भारत के लोग&#8217; लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों में वोट देकर इन सदनों के लिए अपने प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया में भाग लेते हैं और आम तौर पर इसे ही लोकतंत्र में जन भागीदारी मान ली जाती है। वर्ष 2009 में मतदान के 58 प्रतिशत से बढ़कर 2019 में 67 प्रतिशत होने के साथ, यह कहना सुरक्षित भी हो गया है कि आधे से अधिक राष्ट्रीय आबादी इस माध्यम से अपने शासन के साथ जुड़ती है। जन भागीदारी के लिए सूचना का अधिकार नागरिकों को सरकार से पारदर्शिता, जवाबदेही और जवाब मांगने के अधिकार की गारंटी देता है किन्तु वह भी शासन तंत्र के प्रपंच में अपनी अपेक्षित धार खो देता है। शासन तंत्र अर्थात कार्यपालिका की जवाबदेही बनाए रखने की जिम्मेदारी निर्वाचित प्रतिनिधियों अर्थात विधायिका पर होती है वह जब कर्तव्यच्युत होने लगे तब जन भागीदारी की अहमियत और बढ़ जाती है क्योंकि उसी से गणतंत्र का कारोबार सही तरीके से चल सकता है। संसद के ऊपरी और निचले सदनों व विधानसभाओं की कार्यवाहियों का प्रसारण भी जन भागीदारी को बढ़ावा देने का एक जरिया है। सदन की इन कार्यवाहियों को देख कर नागरिक अपने चुने हुए प्रतिनिधियों और सत्ता में बैठे नेतृत्व के प्रदर्शन की गहरी समझ पा सकते हैं। इससे नागरिकों को मतदाता के रूप में अपने भविष्य के विकल्प चुनने के लिये दृष्टि बनती है। सदनों की वेबसाइटें नागरिकों को कार्यवाही के विवरणों तक आम नागरिकों को पहुंच प्रदान करती है, जिसमें सदस्यों द्वारा प्रस्तुत प्रश्न और उनके उत्तर भी शामिल हैं। मगर यह सब तब निरर्थक हो जाता है जब आम नागरिक उदासीन हो। आम जन की उदासीनता एक ऐसे राजतन्त्र को मजबूत करता है जो गणतांत्रिक व्यवस्था में गण के साथ सहकार नहीं करता। राजा और प्रजा जैसा सामंती नाता ही बना रहता है।</p>
<p>लोकतांत्रिक सिद्धांत उन लोगों के माध्यम से लागू किये जाते हैं जिनके पास निर्णय लेने का अधिकार होता है। “हम भारत के लोग” निर्णय लेने का अपना अधिकार विधायकों और सांसदों को अपना प्रतिनिधि बना कर हस्तांतरित कर देते हैं। व्यवहार में नागरिक अपने जीवन को प्रभावित करने वाली नीतियां और कार्यक्रम खुद नहीं बनाते। उनका मतदान सिर्फ अपने प्रतिनिधि चुनने तक सीमित होता है। नागरिकों के जीवन को सीधे प्रभावित करने वाली नीतियां और कार्यक्रम बनाने का काम उनके लिए सरकार चलाने वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़ दिया जाता है जो उसे आगे नौकरशाहों को सौंप देते हैं। सत्ता में बैठे लोग जनता से उनका विज़न मांगने का ढोंग जरूर करते रहते हैं। यही कारण है कि देश के संसाधनों और संपत्ति का लोकतांत्रिक तरीके से वितरण नहीं हो पाता हैं। हाल ही में यह आंकड़ा सामने आया है कि देश की 77 प्रतिशत से अधिक संपत्ति 10 प्रतिशत आबादी के हाथ में है। राजनैतिक व्यवस्था में सभी स्तरों पर पहले से राज में भागीदारी पा रहे नेताओं के ऐसे निहित स्वार्थ बन जाते हैं कि वे अन्यों को अपने प्रभुत्व के लिए खतरा मानने लगते हैं और केवल उन्हीं लोगों के साथ सहज होते हैं जो उनकी छत्र-छाया में रहने को राजी होते हैं। इस व्यवस्था में वंश, परिवार, जाति, क्षेत्र और धर्म के हितों का जाल ऐसा फैला दिया जाता है कि समग्र जनहित की बात औपचारिकता मात्र बन कर रह जाती है। राजनीति में जनशिक्षण अतीत की बात हो गई है। राजनेता और राजनीतिक कार्यकर्ता सत्ता में आने और वहां रहने के लिए समर्पित रहने लगे हैं क्योंकि राजनीति अब एक कारोबार बन गई है। युवा वर्ग अपने-अपने जाति समूहों के बल पर छात्र जीवन से ही राजनीति को पेशे के तौर पर अपनाने के जतन करने लगता है ताकि सत्ता के बाजार में वह अपना मोल बढ़ा सके। ऐसे में यह सवाल भी है कि राजनेताओं तथा राजनीतिक संस्थानों में नागरिकों का भरोसा कैसे बना रह सकता है?</p>
<p>राजनीतिक भरोसे में बदलाव का होना लोकतंत्र के प्रति राष्ट्रीय दृष्टिकोण में बदलाव तथा आर्थिक माहौल में बदलाव से भी जुड़ा होता है। इसी कारण वैचारिक ध्रुवीकरण में बदलाव और लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था से नागरिकों की संतुष्टि के बीच भी संबंध देखा जा सकता है। राजनेता जनभागीदारी की बात अपनी सत्ता के लिए करते हैं। यही कारण है कि पिछले दिनों अचानक लोकलुभावन घोषणाओं तथा राहतों तथा उनके प्रचार का जबरदस्त विस्फोट नज़र आया। लोकलुभावन चीजें लोकतंत्र विरोधी नहीं होती, मगर वे किस कीमत पर होती हैं और उनका क्या दीर्घकालीन प्रभाव होने वाला है उसकी जानकारी मतदाता को नहीं होती क्योंकि वह अपनी भागीदारी के बारे में गंभीर नहीं होता। राष्ट्रवाद भी लोक लुभावन लहर ही होता है। अब सोशल मीडिया के प्लेटफार्मों के माध्यम से राजनीतिक विचारधाराएं अपना वर्चस्व खोजने लगी हैं। शासन भी इन्हीं प्लेटफार्मों पर जन भागीदारी का आसान रास्ता अपनाने लगा है। ऐसा मानने वाले भीकम नहीं हैं कि सोशल मीडिया, नागरिक भागीदारी की ताकत और अवसर देता है। वह नागरिकों को विभिन्न मुद्दों पर अपने विचारों को व्यक्त करने का विकल्प देता है। किन्तु सोशल मीडिया का माध्यम आदर्श मानवीय एकता को खंडित भी करता है। आभासी दुनिया पर व्यक्तियों के समूह बनते हैं जिनमें अपनी बात को मनवाने की आपसी प्रतिस्पर्धा होती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपनी बात कहने की होती है, अगले को उसे मानने के लिए बाध्य करने की नहीं होती। सोशल मीडिया पर अलग-अलग समूहों द्वारा अपनी-अपनी अभिव्यक्तियों को धार देते हुए शिष्टाचार की सीमाएं पार कर जाना आम बात है। इससे आपस में तनाव बढ़ता है; भावनाएं भड़कती है। आभासी समूहों का आपसी तनाव बाहर भौतिक दुनिया में उपस्थित हो जाता है। सोशल मीडिया पर वे किरदार अधिक सफल होते हैं जो अपने में कट्टरता भरे रहते हैं। यह कट्टरता किसी एक पक्ष की बपौती जैसी नहीं है। प्रत्येक पक्ष कट्टरता में एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करता हुआ नज़र आता है। बाज़ार की ताकतें इसमें ऐसी घुल-मिल गई हैं कि पता ही नहीं चलता कि कौन इस प्रतिस्पर्धा को उकसा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म चलाने वालों के पास अपना खुद का कोई माल नहीं होता। वे अपना उपयोग करने वालों के माल से ही अरबों-खरबों कमाते हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों को लगता है वे अभिव्यक्ति की आज़ादी पा रहे हैं और वे जो कुछ कर रहे हैं वह उनका अपना चयन है। मगर आभासी दुनिया के इस भ्रम में लोगों को समूहों में बांट कर कौन अपना खेल कर जाता है किसी को पता ही नहीं चलता। नये डिजिटल युग में अब तो सोशल मीडिया प्रचार का बड़ा माध्यम बन कर अरबों रुपयों का कारोबार बन गया है। मीडिया के प्रचार के दम पर अब चुनावी मुद्दे बनाये जाते हैं और मतदाताओं को बांटा जाता है। स्थानीय और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों के बारे में नागरिक जागरूकता डिजिटल मीडिया तक सीमित होकर रह जाती है। संविधान के दो मौलिक अधिकारों द्वारा समर्थित है- भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार और बिना हथियारों के शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार। डिजिटल मीडिया ने इन अधिकारों पर कब्जा कर लिया है और लोगों में भेद करने की उसकी उग्रता भौतिक जगत में उतर आने लगी है। दुर्भाग्य से सभी राजनीतिक दलों ने डिजिटल जगत के सोशल मीडिया से जुडने को ही जन भागीदारी की इति मान ली गई है। चुनाव प्रचार के लिए उम्मीदवार का मतदाता के साथ सीधा और जीवंत संबंध भी इसी कारण घटता जा रहा है। ऐसे में जनभागीदारी सिर्फ मतदान करने तक रह जाती है।</p>
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		<title>भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Sep 2023 15:02:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="980" height="603" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds.jpg 980w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-300x185.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-768x473.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-696x428.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-683x420.jpg 683w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-356x220.jpg 356w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-313x193.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 980px) 100vw, 980px" title="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट 8">भारत में अब पक्षियों की सुध ली जाने लगी है। हालांकि इस देश में वन्य प्राणियों, जिनमें पक्षी भी शामिल हैं, के संरक्षण की सनातन परंपरा रही है। पक्षी न केवल प्रकृति के शक्तिशाली सांस्कृतिक प्रतीक होते हैं बल्कि वे प्रकृति की तंदरुस्ती का बहाली प्रकार पता भी देते हैं। विशेषकर सैकड़ों किलोमीटर दूर से [&#8230;]]]></description>
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<p>भारत में अब पक्षियों की सुध ली जाने लगी है। हालांकि इस देश में वन्य प्राणियों, जिनमें पक्षी भी शामिल हैं, के संरक्षण की सनातन परंपरा रही है। पक्षी न केवल प्रकृति के शक्तिशाली सांस्कृतिक प्रतीक होते हैं बल्कि वे प्रकृति की तंदरुस्ती का बहाली प्रकार पता भी देते हैं। विशेषकर सैकड़ों किलोमीटर दूर से खास मौसम में अल्प प्रवास के लिए उड़ कर आने वाले पक्षियों के अध्ययन का हमारे यहां लंबा इतिहास रहा है। भारत के अपने पक्षियों की स्थिति पर अब पहली बार विस्तृत विवेचना करती रिपोर्ट का आना शुभ संकेत है। भारत में पाए जाने वाली अधिकांश पक्षी प्रजातियों की स्थिति का मूल्यांकन करती ‘स्टेट ऑफ इंडियाज़ बर्ड्स’ की दूसरी रिपोर्ट पिछले दिनों जारी हुई है जो अपनी सर्वव्यापकता और पारिस्थितिक महत्व के साथ, एक व्यापक, राष्ट्रीय स्तर के मूल्यांकन के रूप में, देश के पक्षियों की संरक्षण आवश्यकताओं के बारे में जानकारी देती है। जैव विविधता के नुकसान को रोकने और पारिस्थितिक तंत्र को बहाल करने का संकल्प लेते हुए भारत ने दिसंबर 2022 में ‘द स्टेट ऑफ बर्ड्स द ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क’ (जीबीएफ) को भी अपनाया है। इस फ्रेमवर्क के चार लक्ष्यों में से एक है खतरे में पड़ी पक्षी प्रजातियों की मानव-प्रेरित विलुप्ति को रोकना। इससे पहले वर्ष 2020 में पक्षियों की प्रवासी प्रजातियों पर  गांधीनगर में हुए कन्वेंशन में भारत के पक्षियों की स्थिति पर पहली रिपोर्ट जारी हुई थी, जिसके साथ, हमारा देश उन देशों के समूह में शामिल हो गया जो नियमित रूप से अपने पक्षियों की स्थिति का आकलन करते हैं। अब पक्षियों की स्थिति का आकलन करती यह दूसरी रिपोर्ट आई है। इस नई रिपोर्ट में 2020 के बाद के चार साल के दौरान एकत्र किये गए अतिरिक्त 20 मिलियन आंकड़ों को जोड़कर, पक्षियों की स्थिति का मूल्यांकन किया गया है। वर्ष 2020 की पहली रिपोर्ट में 867 पक्षी प्रजातियों के मुक़ाबले इस रिपोर्ट में 942 प्रजातियों का अध्ययन शामिल हैं। इसके साथ ही पिछली बार की अपेक्षा वैज्ञानिक विश्लेषण पद्धति में भी कई परिशोधन किये गए हैं जिससे हालात को बेहतर तरीके से समझ जा सके।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://1.bp.blogspot.com/-V4vsNjs6Kw4/XmuJgEDOb3I/AAAAAAAAAWg/zR-oCY-LBHog1V2fcngoUzpecC9uPPB8ACLcBGAsYHQ/s1600/thirsty-birds.jpg" width="1200" height="800" alt="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट" title="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट 9"></p>
<p>अपनी जैव विविधता के हालात का आकलन करने की सभी देशों को आवश्यकता है, लेकिन वह किस तरीके से किया जाए यह एक जबरदस्त चुनौती सबके सामने होती है। वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है कि जैव विविधता का आकलन पक्षियों के हालात पर अध्ययन से किया जा सकता है। पक्षी हर जगह होते हैं। उन्हें अपेक्षाकृत आसानी से पहचाना जा सकता है। इसलिए उन्हें हम समग्र रूप से जैव विविधता के संकेतक के रूप में भी देख सकते हैं। क्योंकि वे गतिशील होते हैं इसलिए उन पर परिवर्तन का असर होता है। उनकी प्रजातियां एक सार्थक पैटर्न दिखा सकती है। उन पर हो रहे प्रभाव आम तौर पर अन्य समूहों को भी प्रतिबिंबित करते हैं। सबसे बढ़ कर तो यह बात कि पक्षियों की निगरानी अपेक्षाकृत आसानी से की जा सकती है। इन्हीं कारणों से दुनिया भर में पक्षियों की स्थिति का आकलन करने के प्रयास किये जाते हैं। आम तौर पर बड़े पैमाने पर और वैज्ञानिक तरीके से नागरिक निगरानी से मिलने वाली जानकारी पर इस तरह के आकलन आधारित होते हैं। भौगोलिक या टैक्सोनोमिक दायरे में अधिक सीमित विशिष्ट वैज्ञानिक निगरानी कार्यक्रम इनके पूरक होते हैं। जैसा कि दुनिया भर में ऐसे अन्य सभी आकलनों के साथ होता है, भारत में भी बड़े पैमाने पर मूल्यांकन के पीछे पक्षी प्रेमियों और प्रकृति से प्यार करने वाले उत्साही और भावुक लोगों का योगदान होता है। वे पक्षियों पर नज़र रखते हैं, अपने अवलोकनों का रिकॉर्ड रखते हैं और उन्हें सार्वजनिक प्लेटफार्मों पर उपलब्ध कराते हैं। इस प्रकार का नागरिक योगदान एकमात्र तरीका है जिससे जैव विविधता आकलन के लिए जानकारी एकत्र की जा सकती है। भले ही वह कम या अधिक समन्वित तरीके से हो सकता है। इस बार की ‘स्टेट ऑफ इंडियाज़ बर्ड्स’ रिपोर्ट देश भर के विभिन्न कोनों में फैले 30,000 पक्षी प्रेमियों से प्राप्त 30 मिलियन रिकॉर्ड पर आधारित है। वैज्ञानिक जानकारी जुटाने में जन भागीदारी का यह अनुपम उदाहरण है। इसलिए इन आकलनों का समग्र परिणाम काफी हद तक वैश्विक प्रवृत्ति को भी दर्शाता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://tfipost.in/wp-content/uploads/sites/2/2021/10/pigeons-750x375.jpg" width="750" height="375" alt="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट" title="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट 10"></p>
<p>इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले शोधकर्ताओं ने, 13 संरक्षण और अनुसंधान संगठनों के सहयोग से, 942 प्रजातियों का विश्लेषण किया, जिनके पास उनकी संरक्षण प्राथमिकता को उच्च, मध्यम या निम्न के रूप में निर्धारित करने के लिए पर्याप्त आंकड़े थे। यह डेटा देश भर में फैले बर्ड वाचर्स ने संकलित किये थे। उन्होंने अपने-अपने इलाकों में कम से कम 30 मीटर की दूरी से पक्षियों का अवलोकन किया एर अपने अपने अवलोकनों के परिणाम ऑनलाइन डेटाबेस में दाखिल किये। इस रिपोर्ट ने भारत में लगभग 1,350 पक्षी प्रजातियां दर्ज की हैं और 942 पक्षी प्रजातियों पर भारत के पक्षी प्रेमियों और संरक्षण संगठनों से एकत्र किए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया है। यह रिपोर्ट पक्षियों के हालात का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए हमें चेताते हुए पक्षियों की 178 प्रजातियों के संरक्षण के लिए प्राथमिकता से तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता बताती है। इसमें यहां नियमित रूप से पाई जाने वाली लगभग 1,200 प्रजातियों में से में 101 प्रजातियों को उच्च संरक्षण चिंता के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यह रिपोर्ट जिन प्रजातियों के लिए उच्च संरक्षण चिंता बताती है उनमें 34 ऐसी प्रजातियां हैं जो प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (आईयूसीएन) की “लाल सूची” में दर्ज नहीं हैं, जिससे वे विश्व स्तर पर खतरे में नहीं है। इसी प्रकार यह रिपोर्ट भारतीय रोलर बर्ड (नीलकंठ)सहित 14 प्रजातियों की स्थिति के तत्काल पुनर्मूल्यांकन की भी सिफारिश करती है जिसे प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा &#8220;कम से कम चिंता&#8221; के रूप में ही सूचीबद्ध किया गया है, जिनमें से कुछ को पहले सामान्य और व्यापक माना जाता था। ‘स्टेट ऑफ इंडियाज़ बर्ड्स रिपोर्ट’ में पक्षियों की प्रजातियों में चिंताजनक गिरावट बताई गई है। यह रिपोर्ट लगभग महाद्वीपीय पैमाने पर पक्षियों की कई प्रजातियों की स्थिति को सही परिप्रेक्ष्य में लाती है। रिपोर्ट से जो समझ बनेगी वह पक्षियों की प्रजातियों को बचाने के लिए रणनीति बनाने में संरक्षणवादियों की मदद करेगी। इसमें पाया गया है कि 25 वर्षों की दीर्घकालिक अवधि में अध्ययन की गई 348 प्रजातियों में से लगभग 60 प्रतिशत में गिरावट देखी गई है और अल्पावधि (2015 से) में मूल्यांकन की गई 359 प्रजातियों में 40 प्रतिशत में गिरावट देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रैप्टर और बत्तख की आबादी में सबसे अधिक गिरावट आई है, जबकि ग्रेट ग्रे श्राइक जैसी कई सामान्य प्रजातियों की संख्या में भी गिरावट आ रही है। ऐसा पाया गया है कि गैर-प्रवासी पक्षियों की तुलना में प्रवासी पक्षियों की संख्या में अधिक तेजी से कमी आ रही है। आहार के आधार पर वर्गीकृत, मांसाहारी, कीटभक्षी और अनाज खाने वाले पक्षियों में फल और मधु खाने वाले प्रकारों की तुलना में अधिक तेजी से गिरावट देखी गई। इसी प्रकार बंजर भूमि के रूप में वर्गीकृत घास के मैदानों और झाड़ियों जैसे विशिष्ट आवासों में पक्षियों की संख्या भी खुले आवासों की तुलना में अधिक तेजी से कम हुई है। हालांकि पक्षियों की प्रजातियों की आबादी में गिरावट के सटीक कारण अभी तक स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आए हैं, लेकिन रिपोर्ट में भूमि-उपयोग परिवर्तन, शहरीकरण, पारिस्थितिकी तंत्र में गिरावट, मोनोकल्चर, बुनियादी ढांचे के विकास, प्रदूषण और जलवायु बिगड़ने को खतरे के रूप में चिन्हित किया गया है। रिपोर्ट के प्रकाशकों ने इन कारणों पर और शोध करने का आह्वान किया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://media.istockphoto.com/id/583710512/photo/rainbow-lorikeet-close-up.jpg?s=612x612&amp;w=0&amp;k=20&amp;c=1UeJ-9dw_hDmRiG_ktoRU8YWYDSZtYmkomo1-tL7fy0=" width="612" height="408" alt="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट" title="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट 11"></p>
<p>रिपोर्ट के दूसरे संस्करण में भारत के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से प्रत्येक में संरक्षण पर ध्यान देने की आवश्यकता वाली चार प्राथमिकता वाली प्रजातियों पर ध्यान दिलाया गया है। वह कहती है कि मध्यम संरक्षण प्राथमिकता के तहत सूचीबद्ध प्रजातियों के लिए चेतावनी के प्रारंभिक संकेतों की पहचान करने के लिए अधिक काम की आवश्यकता है। इसके साथ ही कम संरक्षण प्राथमिकता वाली प्रजातियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसमें शामिल समूहों में से एक, ‘नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन’ के अनुसार हमें सामान्य प्रजातियों को सामान्य बनाए रखने के लिए काम करने की जरूरत है। रिपोर्ट में पक्षियों की 217 प्रजातियां ऐसी पाई गईं जो स्थिर थीं या उनकी संख्या बढ़ रही थीं। रिपोर्ट के अनुसार जंगली रॉक कबूतर, एशियाई कोयल और भारतीय मोर अच्छा प्रदर्शन करते पाए गए हैं, लेकिन अन्य, अधिक कमजोर प्रजातियों पर उनकी बढ़ती संख्या का प्रभाव की जानकारी नहीं है। बया वीवर और पाइड बुशचैट जैसे सामान्य पक्षी भी अपेक्षाकृत स्थिर पाए गए हैं। रिपोर्ट के प्रकाशकों ने सार्वजनिक भागीदारी को बहुत महत्व दिया, लेकिन उन्होंने यह भी दर्ज किया कि दुर्लभ और निशाचर पक्षियों के लिए अधिक शोध और डेटा एकत्र करने की आवश्यकता है, जो आम तौर पर पक्षी देखने वालों द्वारा दर्ज नहीं किए जाते हैं। हालांकि समूची दुनिया में जैव विविधता बुरी हालात में है। लेकिन भारत की पक्षी आबादी पर आई एक यह नई रिपोर्ट देश की कई पक्षी प्रजातियों के हालात की एक गंभीर तस्वीर तो पेश करती ही है वह जैव विविधता को पहुंच रहे नुकसान का पता भी देती हैं और साथ ही मानव कल्याण के लिए भी खतरे की घंटी बजाती है। रिपोर्ट निष्कर्षों का सारांश यह है कि देश में पक्षी संरक्षण के लिए व्यापक तौर पर काम करने की जरूरत है। आशा की जानी चाहिए कि देश के नीतिकार भी इस रिपोर्ट को पढ़ेंगे और कदम उठायेंगे।</p>
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		<title>डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 Aug 2023 14:35:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
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		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="630" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती।" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading.jpeg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-300x158.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-1024x538.jpeg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-768x403.jpeg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-696x365.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-1068x561.jpeg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-800x420.jpeg 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-313x164.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती। 15">जब चवन्नी क्लास में सिनेमा देखने जाने वाली आबादी के लिए सी ग्रेड फिल्में बनती थीं; जब किशोर स्कूलों से भाग कर फिल्में देखते थे; जब बुधवार की रात आठ बजे लोग घरों में और बाज़ार में दुकानों पर रेडियो सीलोन पर अमीन सयानी का बिनाका गीतमाला प्रोग्राम सुनने के लिए वैसे ही जमा होते [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1200" height="630" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती।" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading.jpeg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-300x158.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-1024x538.jpeg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-768x403.jpeg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-696x365.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-1068x561.jpeg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-800x420.jpeg 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-313x164.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती। 18">


<p>जब चवन्नी क्लास में सिनेमा देखने जाने वाली आबादी के लिए सी ग्रेड फिल्में बनती थीं; जब किशोर स्कूलों से भाग कर फिल्में देखते थे; जब बुधवार की रात आठ बजे लोग घरों में और बाज़ार में दुकानों पर रेडियो सीलोन पर अमीन सयानी का बिनाका गीतमाला प्रोग्राम सुनने के लिए वैसे ही जमा होते थे जैसे किसी धार्मिक कथा में; जब लोग चूड़ीबाजे में चाबी भर कर उस पर रिकॉर्ड चलाते और तीन मिनट का गाना सुन कर निसार हो जाते थे; जब पंप से हवा भर कर तथा पिन से उसका नोज़ल साफ कर रसोई में स्टोव जलाते थे, तभी वह वक़्त भी था जब जासूसी कहानियां तथा रोमांस वाले उपन्यास खूब पढे जाते थे। भले ही इनका पढ़ना घरों में त्याज्य था। बड़ों की निगाह बचा कर ही पढ़ना पड़ता था। हालांकि घर के बड़े भी सफर में समय बिताने के लिए ऐसे उपन्यास खरीद कर गटक लेते थे। इसीलिए ऐसे उपन्यास अधिकतर रेलवे स्टेशनों और बसों के अड्डों पर लगी किताबों पर ही सजे मिलते थे। किशोर, पढ़ाई की किताबों में छुपा कर ऐसी कहानियों, उपन्यासों की किताबें और मेग्जीनें पढ़ते थे। उस साहित्य को “लुगदी साहित्य” माना जाता था जो कम दाम पर बेचने के लिए शीघ्र पीले पड़ जाने वाले सस्ते अखबारी कागज पर छापा जाता था। आज की पीढ़ी को यह जान कर हैरानी हो सकती है कि यह साहित्य किताबों की दुकानों तथा विशेष लाइब्रेरियों से प्रतिदिन के हिसाब से किराये पर लाकर भी पढ़ा जाता था। इसी “लुगदी साहित्य” ने पिछली सदी के पांचवें दशक की पीढ़ी में पढ़ने की लत डाली जो उन्हें क्लासिक पढ़ने तक आगे ले जा सकी। उसी पीढ़ी ने घरेलू लाइब्रेरी योजना के सदस्य बन कर हर माह दस पॉकेट बुक्स भी मंगवाई और पढ़ी और उसके जरिए भारतीय और विश्व साहित्य और उनके महान लेखकों से पहला परिचय पाया। इस प्रकार उस पीढ़ी को पढ़ने की जो लत लगी वह ताउम्र उसके साथ रही। कहा भी जाता है कि किशोर वय में जो चीज सीख ली जाती है वह उम्र भर साथ नहीं छोड़ती। लेकिन यह भी सच है कि विद्यार्थियों में पढ़ने की लत हमारी संस्थागत शिक्षा व्यवस्था नहीं डाल सकी और आज हम ऐसे मुकाम पर अपने को पाते हैं जब हर तरफ कहा जा रहा है कि किताबों को अब कौन पढ़ता है? अब तो सभी अपने स्मार्ट फ़ोनों में आंखें गड़ाए रहते हैं। किन्तु दूसरी तरफ हम अपने आसपास तो यही देखते हैं कि धड़ाधड़ किताबें छप रही हैं। इतने नए-नए लेखक और कवि सामने आ रहे हैं, भले ही अनेक रचनाकार अपने खुद के पैसों से अपनी किताबें छपवा रहे हों। लोग धुआंधार लिख रहे हैं और राजकोष से वित्त पोषित अकादमियां उन्हें ढेर सारे इनाम ही नहीं दे रही बल्कि उनको प्रकाशन सहयोग भी दे रहीं हैं। ऐसे में आज के डिजिटल समय में यह पड़ताल जरूरी भी है कि सच में किताबें अब कौन पढ़ रहा है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://chronicle.brightspotcdn.com/4b/ff/f04733a04b378cb1e336b300bef8/lang-june21-gettyimages-1204348106-v2.jpg" width="5184" height="3456" alt="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती।" title="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती। 16"></p>
<p>किताब उस मुद्रण युग की देन है जो ज्ञान के मौखिक प्रसारण और डिजिटल युग के बीच का काल है। यह काल पश्चिमी जर्मन के शहर मैन्ज़ से शुरू होता है, जहां गुटेनबर्ग ने 1455 में अपना पहला छापाखाना स्थापित किया। गुटेनबर्ग के नवाचार के कारण ही पुस्तकों का छप कर पाठकों के हाथों में पहुंचना संभव हुआ और प्रकाशन व्यवसाय का विकास हो सका। बहुत से अध्येता तो यह भी मानते हैं कि प्रिंटिंग प्रेस के जरिए ही संस्कृति, धर्म और ज्ञान में बदलाव आ सके और आगे बढ़ा जा सका। यह भी माना जा रहा है कि डिजिटल के अनुसरण में आगे और भी क्रांतियां होंगी जो मुद्रण की शुरुआत के बाद हुई धार्मिक और सामाजिक उथल-पुथल को प्रतिध्वनित करेंगी। ऐसा मानने वालों को लगता है कि “राष्ट्र” और “राज्य” के विचार को इस नई प्रौद्योगिकी से ही चुनौती मिलेगी। इससे पुराने सामाजिक मानदंड भी बदलेंगे। वे कहते हैं कि पहचान की राजनीति जैसी ऑनलाइन बहसों को जो लोग खारिज करेंगे वे नए ज़माने को समझने का अवसर खो देंगे। इस पड़ताल में एक चीज स्पष्ट नज़र आती है कि छपाई के इतिहास पर तो अनगिनत किताबें लिखी गई हैं, किन्तु पढ़ने के इतिहास पर बहुत कम किताबें हैं। हम कैसे पढ़ते हैं, इस विज्ञान को समझने की ओर ध्यान कम ही गया है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में मुद्रण का बहुत बड़ा विस्तार हुआ। समाचार पत्र, पत्रिकाएं, पोस्टर, बिल बोर्ड और सस्ते उपन्यास जैसा इतना सामने आया कि दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपने समय को &#8220;पढ़ने का युग&#8221; कहा। लेकिन उन्हें इस बात की भी चिंता थी कि पाठक के सामने जिस गति और मात्रा में साहित्यिक भोज परोसा जाएगा तो क्या वह कुछ ले भी पाएगा? पश्चिम में वैज्ञानिक प्रयोग करके यह समझने की कोशिश करते रहे हैं कि वास्तव में क्या होता है जब लोग पढ़ते हैं? इन प्रयोगों के मूल में यह विचार रहा कि पढ़ना कोई निष्क्रिय कार्य नहीं है। वह एक सक्रिय काम है। पढ़ने की वैज्ञानिक जांच करने वालों में एक चार्ल्स हब्बार्ड जुड हुए हैं जिन्होंने पढ़ते समय आंखों की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए उपकरण विकसित किया। इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण एडमंड बर्क ह्युई थे, जिनकी कृति ‘द साइकोलॉजी एंड पेडागॉजी ऑफ रीडिंग’ ने 1908 में क्रांति ला दी। जब हम पढ़ते हैं तो हम क्या करते होते हैं, की समझ पर उन्होंने पहली बार प्रकाश डाला। ‘टैचिस्टोस्कोप’ का उपयोग करते हुए उन्होंने पाया कि शब्दों को अनुभव से पहचाना जाता है। इस प्रकार, पढ़ना केवल दृष्टि का मामला नहीं है, बल्कि वह याद किए गए, पूर्वानुमानित और अनुमानित अर्थों का मामला भी होता है। उनकी इस अवधारणा ने इस विचार को प्रोत्साहित किया कि पढ़ने को सोचने के रूप में सिखाया जाना चाहिए। इसी प्रकार 1940 के दशक में, एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक, सैमुअल रेनशॉ ने विमानों की तेजी से पहचान में सुधार करने की कोशिश के अपने युद्धकालीन अनुभव का उपयोग करते हुए हुए ‘स्पीड रीडिंग’ का ज्ञान विकसित किया जिसने 20वीं सदी में, सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करने में मदद की क्योंकि तब तक लोकतंत्र के विकास को सुनिश्चित करने में साक्षरता और पढ़ने का महत्व समझा जा चुका था। इस प्रकार स्कूलों में पढ़ना सिखाने का दृष्टिकोण, और सार्वजनिक पुस्तकालयों द्वारा निभाई गई भूमिका दुनिया भर में आबादी के बड़े हिस्से को छपी हुई चीजें पढ़ा कर ही लोकतांत्रिक समाज को जोड़ने में महत्वपूर्ण बनी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://www.mozaweb.com/mozaLibraryMicrocurriculum/dl_88/preview.png" width="964" height="528" alt="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती।" title="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती। 17"></p>
<p>एक अध्येता जिसका नई समझ पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा वह है मार्शल मैक्लुहान। उसके ‘द गुटेनबर्ग गैलेक्सी’ (1962) ने मीडिया युग के &#8220;नैतिक आतंक&#8221; के बारे में लोगों के विचारों को गहराई तक प्रभावित किया। उसका तर्क था कि समाज को यह समझने में देर हो गई है कि &#8220;माध्यम ही संदेश है&#8221;। मैकलुहान ने यह भी कहा कि मुद्रित पृष्ठ &#8220;मन की अनोखी आदतों का निर्माता&#8221; होता है। इस अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए अनुभूति की मानसिक प्रक्रियाओं पर स्क्रीन-रीडिंग के प्रभाव में रुचि रखने वाले न्यूरोवैज्ञानिकों ने हाल के दिनों में वर्तमान तकनीकी रीडिंग के प्रभावों के बारे में चिंता जताई है। अमरीका के नेशनल असेसमेंट ऑफ एजुकेशनल प्रोग्रेस के अनुसार, 2017 और 2019 के बीच 17 अमेरिकी राज्यों में साक्षरता में गिरावट देखी गई जिसके लिए पढ़ने में आए बदलाव को जिम्मेवार माना जा रहा है। किन्तु क्या यूट्यूब और टिकटॉक के युग में पढ़ना अब भी एक जरूरी कौशल के रूप में देखा जाना चाहिए जिसमें सभी नागरिकों को दक्ष हों? अध्येताओं का कहना है कि पढ़ने के कौशल, और जो पढ़ा जाता है उसकी समझ, को सभी के लिए, विशेषकर युवाओं के लिए कैसे सुलभ बना सकते हैं इस पर काम करना जरूरी है क्योंकि इसका उनके जीवन की संभावनाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ने वाला है। पढ़ने और लिखने दोनों के क्षेत्र में अब चैट जीपीटी प्रवेश कर चुका है जिसके लिए तो यहां तक कहा जाने लगा है कि इससे हमें खुद पाठों (टेक्स्ट) को पढ़ने और समझने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी। हमारा यह बोझ कंप्यूटर का ‘एल्गोरिद्म’ उठा लेगा। इस प्रकार मशीनी बुद्धि ‘एआई’ द्वारा सक्षम किए गए अत्यधिक “डेटाफिकेशन” के कारण हमें पारंपरिक पढ़ने को बड़ी चुनौती मिलती दिख रही है। हालांकि अतीत में किताबों का वृहद उत्पादन और पढ़ने का अभ्यास जबरदस्त तरीके से प्रभावशाली रहा है, मगर अब आगे क्या होगा जब एल्गोरिद्म मनुष्यों की तुलना में अधिक रीडिंग करने लगेगा? उससे समाज कैसे बदल जाएगा उसकी चिंता बहुतों को सता रही है। पब्लिशर्स वीकली ने भी हाल ही में बताया कि इस साल की पहली छमाही के लिए किताबों की बिक्री एक बार फिर कम हो गई है। किताबों की बिक्री में गिरावट कोविड महामारी के बाद से ही जारी है। अनेक पाठक अब कागज की बंधी किताब को छोड़ कर जब ‘किंडल’ (डिजिटल किताब) की राह पर भी हो लिए हैं जिसे मशीन बोल कर सुना भी सकती है। फिर भी ऐसे लोग अब तक बचे हुए हैं जो भौतिक रूप में किताबों को पसंद करते हैं। किताबों की गंध, उनका अनुभव, पढ़ने का संवेदी अनुभव उन्हें सुकून देता है। वे सीने पर किताब रखे सो भी जाते है। ऐसे लोग भी हैं जो किताब खरीदना एक नेक काम मानते हैं। ऐसे ही नेक लोग “किताबें कौन पढ़ता है” के झंझावात में नांव को थामे रखने की अपनी भूमिका निभा रहे हैं। यह भरोसा देता है कि किताबें रहेंगी और हाथ में लेकर उन्हें पढ़ने वाले भी रहेंगे।</p>
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		<title>समान नागरिक संहिता भेद करके नहीं लागू हो सकती</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Jul 2023 15:27:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="678" height="452" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="समान नागरिक संहिता भेद करके नहीं लागू हो सकती" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002.jpg 678w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-300x200.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-630x420.jpg 630w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-313x209.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 678px) 100vw, 678px" title="समान नागरिक संहिता भेद करके नहीं लागू हो सकती 19">समान नागरिक संहिता का मुद्दा एक बार फिर उछल कर सामने आया है और इस बार लग रहा है कि इसे लागू करने की भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में से एक की प्रत्याशा शायद पूरी हो जाय। प्रधानमंत्री ने जिस प्रकार इसका समर्थन किया है उससे यह और भी स्पष्ट हो गया है [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="678" height="452" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="समान नागरिक संहिता भेद करके नहीं लागू हो सकती" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002.jpg 678w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-300x200.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-630x420.jpg 630w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-313x209.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 678px) 100vw, 678px" title="समान नागरिक संहिता भेद करके नहीं लागू हो सकती 20">



<p>समान नागरिक संहिता का मुद्दा एक बार फिर उछल कर सामने आया है और इस बार लग रहा है कि इसे लागू करने की भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में से एक की प्रत्याशा शायद पूरी हो जाय। प्रधानमंत्री ने जिस प्रकार इसका समर्थन किया है उससे यह और भी स्पष्ट हो गया है कि मौजूदा केंद्र सरकार समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए तत्पर है और उस तरफ आगे बढ़ रही है। भारत के विधि आयोग द्वारा इस विषय पर सार्वजनिक नोटिस जारी कर सभी से राय और टिप्पणियां मांगने को नया कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू करना ही माना जा सकता है। बहुत से राजनीतिक प्रेक्षक यह भी मानते हैं कि समान नागरिक संहिता पर बहस की शुरुआत करके सत्तारूढ़ दल एक तरह से अगले चुनावों के लिए एजेंडा तय कर रहा है। विधि आयोग ने पांच साल के अंतराल के बाद अपनी फ़ाइलों में दबा यह मुद्दा फिर उठाया है। बहुत से लोग तो यह भूल भी चुके थे कि 21वें विधि आयोग ने अगस्त 2018 में इसी मुद्दे पर एक परामर्श पत्र जारी किया था। विधि आयोग की नई अधिसूचना में कहा गया है कि “विषय की प्रासंगिकता और महत्व के साथ-साथ इससे संबंधित अदालती आदेशों को देखते हुए, भारत के 22वें विधि आयोग ने इस विषय पर फिर से विचार करना आवश्यक समझा है।” आयोग ने अपने नोटिस के जरिए जनता के विचारों को आमंत्रित किया है और इस संबंध में धार्मिक संगठनों से भी पक्ष रखने का कहा है। हमेशा यही कहा जाता रहा है कि इस मुद्दे पर आम सहमति के साथ आगे बढ़ना चाहिए तथा इसे सभी दलों, सभी पक्षों, राजनीतिज्ञों, ग़ैर राजनीतिज्ञों और जनता के साथ इस पर व्यापक स्तर पर चर्चा के बाद ही कोई कदम उठाया जाना चाहिये। इसके लिए सरकार ने चर्चा छेड़ दी है। उधर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि विशेषज्ञों की एक समिति ने राज्य में इसे लागू करने के वास्ते मसौदा तैयार कर लिया है।</p>



<p>भले ही भारत में सभी नागरिकों के लिए एक आपराधिक संहिता लागू है, मगर समान नागरिक संहिता हमेशा ही भारतीय राजनीति में एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। संविधान सभा में भी इस पर गंभीर चर्चा हुई थी जब इसे भारतीय संविधान में निदेशक सिद्धांत के रूप में शामिल किया गया था। भारतीय संविधान के अध्याय चार के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि, &#8220;राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।&#8221; समान नागरिक संहिता का मतलब है प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिए एक समान कानून, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। अगर ये लागू होता है तो शादी, तलाक़, बच्चा गोद लेना और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में सभी भारतीयों के लिए एक जैसे नियम होंगे। समान नागरिक संहिता को लागू करना 1998 और 2019 के चुनावों के लिए भाजपा के चुनाव घोषणापत्र का हिस्सा रहा है। नवंबर 2019 में, संसद नारायण लाल पंचारिया ने गैर सरकारी बिल के रूप में इसे संसद में पेश किया था, लेकिन विपक्ष के विरोध के कारण इसे वापस ले लिया। मार्च 2020 में सांसद किरोड़ीलाल मीणा फिर से ऐसा निजी बिल लेकर आए, लेकिन इसे संसद में पेश नहीं किया गया। विवाह, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार से संबंधित कानूनों में समानता की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी अनेक याचिकाएं दायर हो चुकी हैं। विधि आयोग के 2018 के परामर्श पत्र में भी कहा गया था कि भारत में विभिन्न पारिवारिक कानून व्यवस्थाओं के भीतर कुछ प्रथाएं महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करती हैं और इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। तलाक के बाद गुजारे भत्ते को लेकर 1985 में शाह बानो मामले में एक मुस्लिम महिला के अधिकारों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि &#8220;संसद को एक सामान्य नागरिक संहिता की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए क्योंकि यह एक ऐसा साधन है जो राष्ट्रीय सद्भाव और कानून के समक्ष नागरिकों को समानता सुनिश्चित करता है।&#8221; एक अन्य मामले में 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ईसाई कानून के तहत ईसाई महिलाओं को अपने बच्चों के &#8220;प्राकृतिक अभिभावक के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है&#8221;,  भले ही हिंदू अविवाहित महिलाएं अपने बच्चे की &#8220;प्राकृतिक अभिभावक&#8221; हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तब भी कहा था कि समान नागरिक संहिता &#8220;एक संवैधानिक अपेक्षा” बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की व्याख्या भी की, और उन महिलाओं को संपत्ति में विरासत का अधिकार और पैतृक संपत्ति में समान सहदायिक अधिकार को मान्यता दी थी जो 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन के समय और उसके बाद जीवित थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2021 में संसद से समान पारिवारिक कानून बनाने पर विचार करने के लिए कहा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि देश के नागरिक विभिन्न विवाह कानूनों के कारण आ रही बाधाओं के बिना &#8220;स्वतंत्र रूप से मिल-जुल सकें&#8221;। उच्च न्यायालय ने धर्मांतरण और अंतरधार्मिक विवाह से संबंधित एक मामले में कहा था कि “समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगी।” उत्तराधिकार के मुद्दे को 1985 में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम पर 110वीं रिपोर्ट में भी विधि आयोग ने पारसी सहित विभिन्न धर्मों के बीच उत्तराधिकारियों की परिभाषा में बदलाव और विरासत कानूनों को सुव्यवस्थित करने की सिफारिश की थी। लेकिन कई प्रस्तावित परिवर्तनों को धार्मिक समुदायों के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा, और अधिनियम में संशोधन पारित नहीं हो सका। इन कठिनाइयों को समझते हुए 2018 में विधि आयोग ने बीच का रास्ता सुझाया कि समान नागरिक संहिता को देखने के बजाय विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों में &#8220;जहां भी आवश्यक हो, टुकड़ों टुकड़ों में बदलाव करके अधिकारों को समेटा जा सकता है&#8221;। परंतु वह भी संभव नहीं हुआ। अब, न्यायमूर्ति ऋतुराज अवस्थी की अध्यक्षता वाले 22वें विधि आयोग ने परामर्श के लिए जारी नए सिरे से नोटिस के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर बहस और चर्चा कैसे आगे बढ़ती है?</p>



<p>ब्रिटेन और अधिकांश यूरोप में, जो अब बहु-धार्मिक समाज हैं, ईसाई, मुस्लिम, यहूदी, हिंदू आदि सभी को समान आपराधिक, नागरिक और व्यक्तिगत कानूनों का पालन करना पड़ता है। ऐसे में स्वाभाविक ही यह सवाल पूछा जा सकता है कि भारतीय संविधान के बनने के इतने लंबे समय बाद भी यहां के नागरिक समान नागरिक संहिता अपनाने के प्रति इतने अनिच्छुक क्यों हैं और क्यों नहीं एक धर्मनिरपेक्ष संविधान के साथ एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा साकार हो पा रही है? सबसे प्रबल विरोध इस तर्क के साथ होता है कि समान नागरिक संहिता लोगों के धर्म में हस्तक्षेप करेगी। यह धार्मिक स्वतंत्रता तथा रस्म-रिवाज़ में दखलअंदाज़ी होगी। मगर दूसरी तरफ यह सवाल भी उठाया जाता है कि क्या रस्म-रिवाज़ नागरिकों को वे अधिकार पाने से महरूम रख सकते हैं जिन्हें संविधान सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित करता है? राज्य तथा सभी नागरिकों का रिश्ता एक ही स्तर पर क्यों नहीं होना चाहिये। जब संविधान सबकी समानता की बात करता है तब स्त्री और पुरुष के बीच रस्म रिवाजों जनित असमानता क्योंकर स्वीकार की जानी चाहिये और सबको एक जैसे अधिकार क्यों न मिलने चाहिये, तथा सबके लिए एक जैसे दायित्व क्यों न हों। सभी मानते हैं कि समान नागरिक संहिता आगे बढ़ने वाला प्रगतिशील कदम होगा। व्यक्तिगत कानून काफी हद तक पितृसत्तात्मक और महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण होते हैं। समान नागरिक संहिता से महिलाओं को स्वतंत्रता और समानता सुनिश्चित होगी। पढे लिखे और समझदार मुसलमानों का भी कहना है कि इससे उनके ईमान पर कोई खतरा नहीं है। हिंदुस्तान के मुसलमानों को आगे बढ़ कर यह अधिकार लेना चाहिए और पुरानी मनोदशा से बाहर निकल कर पढ़-लिख कर देश की आर्थिक मुख्य धारा में आना चाहिये।</p>



<p>सभी नागरिकों के बीच एक समान कानून लागू होने से राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ावा मिलेगा और उससे एक ऐसे धर्मनिरपेक्ष समाज की स्थापना सुनिश्चित होगी जिसमें प्रत्येक नागरिक को अपनी निजी आस्था के साथ अन्यों के साथ बराबरी का हक मिलेगा। इसी बीच एक संसदीय स्थायी समिति ने भी समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर सोमवार को विधि आयोग और विधि मंत्रालय के प्रतिनिधियों के साथ विमर्श किया है। मगर उसमें दिया गया संसदीय समिति के अध्यक्ष का बयान इस मुद्दे पर नया विवाद खड़ा कर सकता है। संसदीय समिति के अध्यक्ष का पूर्वोत्तर सहित आदिवासियों को किसी भी संभावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के दायरे से बाहर रखने की वकालत करना सरकार के कदम को धक्का पहुंचाने वाला ही माना जाएगा। उनकी यह टिप्पणी कि आदिवासियों को किसी भी प्रस्तावित समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखा जा सकता है क्योंकि सभी कानूनों में अपवाद होते हैं। यह कहना कि केंद्रीय कानून कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में उनकी सहमति के बिना लागू नहीं होते हैं केंद्र की बीजेपी सरकार पर लगने वाले इस आरोप को आधार देता है कि समान नागरिक संहिता सिर्फ मुस्लिम समुदाय पर केंद्रित कर रही है। इसलिए यह पूछा जाना समीचीन है कि क्या यही स्टैन्ड केंद्र सरकार लेने वाली है? यदि ऐसा होता है तो समान नागरिक संहिता की अवधारणा ही समाप्त हो जाती है। संहिता यदि सब पर एक समान लागू नहीं की जाती है तो वह सत्तारूढ़ दल की नीयत में खोट का ही प्रदर्शन होगा और सभी विवेकशील लोगों को आशा है कि ऐसा नहीं होगा।                                               </p>
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		<title>प्रशासन में कॅरियर बनाने आ रहे युवा अवाम को कितना जानते हैं?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 07 Jun 2023 12:10:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1600" height="900" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IAS-Officers.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="प्रशासन में कॅरियर बनाने आ रहे युवा अवाम को कितना जानते हैं?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IAS-Officers.jpg 1600w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IAS-Officers-300x169.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IAS-Officers-1024x576.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IAS-Officers-768x432.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IAS-Officers-1536x864.jpg 1536w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IAS-Officers-696x392.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IAS-Officers-1068x601.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IAS-Officers-747x420.jpg 747w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IAS-Officers-313x176.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1600px) 100vw, 1600px" title="प्रशासन में कॅरियर बनाने आ रहे युवा अवाम को कितना जानते हैं? 21">संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सर्विसेज परीक्षा मे सफल होना प्रतिभावान और मेहनती युवाओं का सपना होता है। इस परीक्षा को देश की सबसे मुश्किल प्रतिस्पर्धा माना जाता है जिसकी तैयारी में अभ्यर्थी कम से कम दो तीन वर्ष तो रात-दिन एक किये ही रहते हैं। उन्हें अपनी पढ़ाई करते हुए दीन-दुनिया की [&#8230;]]]></description>
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<p>संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सर्विसेज परीक्षा मे सफल होना प्रतिभावान और मेहनती युवाओं का सपना होता है। इस परीक्षा को देश की सबसे मुश्किल प्रतिस्पर्धा माना जाता है जिसकी तैयारी में अभ्यर्थी कम से कम दो तीन वर्ष तो रात-दिन एक किये ही रहते हैं। उन्हें अपनी पढ़ाई करते हुए दीन-दुनिया की कोई खबर नहीं रहती और वे रोजाना लंबे समय तक किताबों, और नोट्स में सिर खपाये रहते हैं। अनेक तो अपने ग्रेजुएशन काल से ही इस परीक्षा की तैयारी में जुट जाते हैं। कुछ प्रतिभावानों को पहली बार में ही सफलता मिल जाती है। पहले प्रयास में असफल रह जाने वाले बहुत से अभ्यर्थी भी निराश नहीं होते। वे उसे अपनी तैयारी का हिस्सा मानते हुए फिर प्रयास करते हुए दूसरे या तीसरे अटेम्पट में सफल भी हो जाते हैं। इसलिए जब सफलता मिलती है तब उनकी और उनके परिजनों की खुशी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ये खुशी क्यों न हो! वे प्रशासन के प्रमुख हिस्से बनने वाले हैं जिनके अधीन शासन तंत्र चलने वाला है। इस बार के यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा के परिणामों में बदलाव के ऐसे रुझानों भी हैं जिन पर हम सहज ही गर्व कर सकते हैं। लगातार दूसरे साल इस परीक्षा में लड़कियों ने बाजी मारी है। पिछले साल भी टॉप थ्री में लड़कियां थीं। इस बार टॉप फोर में लड़कियां हैं। टॉप 25 में भी 14 लड़कियां हैं। यह परीक्षा ही क्यों सीबीएसई की परीक्षा हो या दूसरी कोई कंपिटीटिव परीक्षाएं हों के परिणाम दर्शाते हैं कि लड़कियां अब आगे आ रही हैं, टॉपर बन रही हैं। यह नया ट्रेंड स्कूली एग्जाम से लेकर यूपीएससी तक साफ नज़र आ रहा है जो आने वाले समय में थमने वाला नहीं है। कठिन प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के लिए बहुत ही ध्यान लगाकर तथा एकाग्रचित्त होकर मेहनत करके अध्ययन करना पड़ता है। लड़कियों की ऊंची सफलता का यह नया ट्रेंड दर्शाता है कि वे ज्यादा फोकस्ड होकर अध्ययन कर रही हैं, और अब आने वाले समय में लड़कों को उनसे अधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना होगा।</p>
<p>सिविल सर्विसेज़ की प्रतिस्पर्धी ‘प्रीलिम्स’ परीक्षा के लिए हर साल लगभग चार लाख से अधिक उम्मीदवार आवेदन करते हैं। इस पहली बाधा को पार कर केवल दस हजार ही इसके अगले चरण यानी मुख्य परीक्षा में शामिल हो पाने में सफल हो पाते हैं और अंतिम चरण तक पहुंचते हैं जो कि साक्षात्कार का दौर है, जबकि करीब एक हजार रिक्तियों के लिए पदों को भरा जाना होता है। इन परीक्षाओं के आंकड़ों का खूब अध्ययन होते हैं जो बताते हैं कि आवेदन करने वालों में से 50 प्रतिशत उम्मीदवार ही प्रीलिम्स परीक्षा के लिए उपस्थित होते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि उन्हें नहीं लगता कि उनकी तैयारी पूरी हो पाई है। वे अपना एक अटेम्पट खराब नहीं करना चाहते। मुख्य परीक्षा में बैठने वालों में से लगभग 20 प्रतिशत अंतिम चरण (व्यक्तित्व परीक्षण/साक्षात्कार दौर) में जाते हैं, जबकि उन 20 प्रतिशत में से भी केवल 40 प्रतिशत सेवा में आने की अपनी योग्यता साबित कर पाते हैं। आंकड़ों ने नये अध्ययन यह भी बता रहे हैं कि इस परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों की अब स्ट्रीम बदल रही हैं। पिछले कई सालों तक आईआईटी के छात्र इसमें छाए रहते थे। लेकिन इस बार ‘टॉप फोर’ में पहले, दूसरे और चौथे नंबर पर तीन लड़कियां दिल्ली यूनिवर्सिटी से हैं। अभी तक छात्रों को भी ये लगता था कि आईआईटी से बीटेक या बीई या आईआईएम से एमबीए करने वाले उन पर भारी पड़ते हैं। लेकिन अब ग्रैजुएशन वाले छात्र भी आ रहे हैं तो मेडिकल स्टूडेंट्स भी आ ऱहे हैं। पहले तो 60-70 प्रतिशत से अधिक आईआईटी के छात्र यूपीएससी में दिखते थे लेकिन अब सिंपल ग्रैजुएशन करने वाले भी फोकस्ड पढ़ाई करते हुए अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। नई शिक्षा नीति के बाद ग्रैजुएशन की पढ़ाई में बदलाव भी आया है। इससे अब ग्रैजुएशन में छात्रों के पास पहले से ज्यादा मौके हैं। कुछ वर्ष पहले तक जो विद्यार्थी इंजीनियरिंग बैकग्राउंड के होते थे वे केवल इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, मिकेनिकल इंजीनियरिंग, सिविल इंजीनियरिंग जैसे विषय ही लेते थे। यदि वे साइंस बैकग्राउंड से होते तो जूलॉजी, फिजिक्स, कैमिस्ट्री, मैथ्य के ही सब्जेक्ट्स लेते थे। लेकिन अब ग्रैजुएशन के दौरान ही स्टूडेंट्स को लगने लग जाता है कि वे ह्युमैनिटीज या कॉमर्स सब्जेक्ट्स में ज्यादा कर पाएंगे। कॉमर्स से ज्यादा ह्युमैनिटीज ली जाती है, जैसे पॉलिटिकल साइंस, हिस्ट्री, साइकॉलजी, फिलॉसफी। इनमें एक जनरल स्टडी भी होती है जिसमें देश-विदेश के बारे में उनको ज्यादा जानकारी होती है। वास्तव में सिविल सर्विसेज की परीक्षा कोई एक सब्जेक्ट स्पेसिफिक एग्जाम नहीं होता है। ऐसा नहीं है कि किसी विशेष विषय की जानकारी नहीं है, तो कोई यह परीक्षा नहीं दे सकता। अभ्यर्थी जो वैकल्पिक विषय चुनते हैं, उसमें जनरल स्टडी का भी महत्व होता है। ह्युमैनिटीज के जो विषय होते हैं, वे सामान्य जानकारी वाले ज्यादा होते हैं बनिस्बत किसी विशिष्ठ विषय के। अब काफी बड़ा ट्रेंड यह भी देखने में आ रहा है कि ह्युमैनिटीज के विषय वैकल्पिक विषयों के तौर पर अभ्यर्थियों की पसंद बन रहे हैं। पिछले दो-तीन वर्षों से तो ऐसा ही हो रहा लगता है। पिछले साल भी यही देखा गया। काउंसिलर्स का कहना है कि जो टॉपर्स हैं उनमें इंजीनियरिंग बैकग्राउंड वालों ने भी काफी ह्युमैनिटीज के सब्जेक्ट्स लिए हैं। उन्होंने पॉलिटिकल साइंस, कानून तथा इस तरह के सब्जेक्ट्स ज्यादा लिए हैं। इससे कोई इन्कार नहीं करेगा कि संघ सेवा आयोग की परीक्षा में सफल होना प्रत्येक होनहार युवा का सपना होती है।</p>
<p>देखने की बात यह है कि छात्र-छात्राएं बहुत पहले से इस परीक्षा की तैयारी शुरू कर देते हैं। इसमें जाने-माने कैंपस और अच्छे कॉलेजों में दाखिले की उनकी जद्दोजहद शामिल है। साथ-साथ ही स्कूलों की परीक्षाओं से ही ऊंचे नंबर लाने वाली मेहनत की पढ़ाई भी उनके प्रयासों में शामिल होती है। कॉलेजों में ऑनलाइन, ऑफलाइन ट्रेनिंग, टीचर के साथ इंटरेक्शन, बाहर के लोगों के साथ इंटरेक्शन सब शामिल होते है। इसमें कोचिंग संस्थान भी कूद पड़े हैं, जो प्रतिभावान और मेहनती छात्रों में ऐसा आत्मविश्वास भरने का काम करते हैं कि वे परीक्षा क्रेक कर सकते हैं। मगर अभ्यर्थी को असली जरूरत होती है परीक्षा की अच्छी समझ,  तैयारी के लिए प्रभावी अध्ययन योजना, सही मार्गदर्शन, सुव्यवस्थित और सावधानीपूर्वक दृष्टिकोण, अत्यधिक उत्साह और जुनून, दृढ़ता, और कभी हार न मानने वाला जज़्बा जिससे वे प्रारंभिक चरण से अंतिम चरण तक पहुंचते हैं। इंटरव्यू में उनका तेज तर्रार होना काम आता है। वे कितने हाजिर जवाब हैं वह भी उनके चयन में बड़ा मायने रखता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सिविल सर्विसेज की तैयारी करते हुए युवा कम से कम दो तीन वर्षों के लिए तो दीन-दुनिया, यहां तक कि घर में रहते हुए भी अपने परिवार से दूर हुए रहते हैं और बस तैयारी में लगे रहते हैं। यह उनकी उसी प्रकार की तपस्या होती है जैसी हम पुराणों में ऋषियों के बारे में पढ़ते आए हैं जो संसार से दूर वन में जा कर एकाग्र होकर ध्यान लगाते थे। आज के युवा भी अपने आस-पास के संसार से इसी प्रकार विरक्त रहते हैं और सिर्फ अपनी पढ़ाई पर केंद्रित रहते हैं। उन्हें बाहर की दुनिया की उतनी ही खबर रहती है जितनी उन्हें अपनी इस कठिन परीक्षा में ऊंची सफलता के लिए जरूरी लगती है। ग्रैजुएशन के बाद उनका यही लक्ष्य रहता है कि उन्हें यूपीएससी परीक्षा क्रेक करनी है। ग्रैजुएशन में दाखिला लेते ही अनेक विद्यार्थियों का कोई न कोई लक्ष्य होता है कि उसे क्या करना है। और अपने उस टारगेट को लेकर वो पहले दिन से ही लग जाते हैं। ग्रैजुएशन की पढ़ाई को वो अपने भावी लक्ष्य की राह के रूप में देखते हैं। सारी मशक्कत के बाद वे लोग उस प्रशासनिक सेवा में प्रवेश करते हैं जिनसे इस देश की 140 करोड़ जनता को अच्छा प्रशासन मिलने की अपेक्षा होती है। ऐसे सवाल पूछने वाले लोग भी कम नहीं हैं कि सिविल सर्विसेज में चयनित युवाओं में किताबी बौद्धिक योग्यता तो खूब होती है किन्तु क्या वे हिंदुस्तान के उस अवाम को जानते हैं जिनके बीच उन्हें प्रशासनिक अधिकारी के रूप में जाना है और अपनी सेवा देनी है? सच तो यह है कि इन काबिल युवाओं का वास्तविक जीवन का कोई एक्सपोज़र नहीं होता। उनकी सफलता का वैभव उन्हें कुलीन बनाता है और आमजन से दूर रखता है। असल जीवन के बारे में वे अपने सेवाकाल में ही सीखते हैं। उनमें इतनी प्रतिभा और क्षमता तो होती है कि वे तुरंत सीख लें। इसीलिए प्रशासनिक अधिकारी को किसी भी विभाग का दायित्व दे दिया जाता है तो वे उसे निभा जाते हैं। उस ज़माने में जब प्रशासनिक सेवा पर कम उंगलियां उठती थीं एक प्रमुख अधिकारी की कही बात याद आती है कि प्रशासनिक अधिकारी की असली ताकत यह नहीं होती कि वह किसी का जायज काम कर सकता है, बल्कि यह होती है कि वह किसी का जायज काम नहीं होने भी दे सकता है। यही हमारे लोकतान्त्रिक व्यवस्था की विडंबना रही है। प्रशासनिक सेवा का काबिल अधिकारी अनुभव से अवाम की सेवा करना नहीं सीखता बल्कि अफ़सरी सीखता है। वह अपनी तरक्की तथा अन्य लाभ पाने के जतन करना सीखता है जिसमें अब तो उसकी राजनैतिक आकांक्षाएं भी दिखाई देने लगी हैं।</p>
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		<title>अखबारों के पन्नों से लुप्त होते कार्टून</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 10 May 2023 05:18:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<img width="1024" height="718" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="अखबारों के पन्नों से लुप्त होते कार्टून" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-300x210.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-768x539.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-696x488.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-599x420.jpg 599w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-100x70.jpg 100w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-313x219.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" title="अखबारों के पन्नों से लुप्त होते कार्टून 24">पत्रकारिता में कार्टून कला एक संपादकीय टिप्पणी के रूप में स्थापित विधा है। वैसे ही जैसे फ़ोटो पत्रकारिता, जिसमें किसी रिपोर्ट के साथ-साथ अनेक बार कोई चित्र संपादकीय टिप्पणी भी होता है। जिस प्रकार पत्रकारिता में किसी न्यूज़ फ़ोटो के लिए कहा जाता है कि वह एक हजार शब्दों के बराबर होती है, उसी प्रकार [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1024" height="718" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="अखबारों के पन्नों से लुप्त होते कार्टून" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-300x210.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-768x539.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-696x488.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-599x420.jpg 599w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-100x70.jpg 100w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/05/Cartoons-disappearing-from-the-pages-of-newspapers-313x219.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" title="अखबारों के पन्नों से लुप्त होते कार्टून 26"><p>पत्रकारिता में कार्टून कला एक संपादकीय टिप्पणी के रूप में स्थापित विधा है। वैसे ही जैसे फ़ोटो पत्रकारिता, जिसमें किसी रिपोर्ट के साथ-साथ अनेक बार कोई चित्र संपादकीय टिप्पणी भी होता है। जिस प्रकार पत्रकारिता में किसी न्यूज़ फ़ोटो के लिए कहा जाता है कि वह एक हजार शब्दों के बराबर होती है, उसी प्रकार कार्टून के लिए भी यही बात कही कहा जा सकती है। किन्हीं विषयों पर एक लंबा चौड़ा संपादकीय जितनी गहराई से अपनी बात नहीं कह पाता वह एक छोटा सा कार्टून कह देता है। समाचार पत्र में कार्टून एक प्रकार से व्यवस्था का प्रतिरोध भी करते हैं। कार्टूनिस्ट अर्थात कार्टून बनाने वाला एक परिस्थिति को दर्शाता है जो ह्यूमर के साथ वार करता है। जैसे हास्य कवि चुटकलों में गहरी टिप्पणी कर जाते हैं या चुटकी ले लेते हैं वैसे ही समाचार माध्यमों के कार्टून भी राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं, व्यवस्थाओं तथा फैसलों पर चुटकी लेते हैं, व्यंग्य करते हैं। मगर उनमें एक मिठास भी होती है। वे भयाक्रांत नहीं करते। एक समय अखबारों के कार्टूनों की अपनी अलग पहचान होती थी। लेकिन अब वैसा नहीं रहा। जब से समाचार माध्यम बाज़ार के लिए उत्पादों का प्रचार करने वाले उत्पाद खुद बनने लगे हैं तब से अखबारों में जिन बहुत सी चीजों का स्पेस सिमटता जा रहा है उनमें एक कार्टून भी है। यह दर्द उन प्रमुख कार्टूनिस्टों का भी है जिन्होंने वर्षों की मेहनत के बाद इस विधा में अपना स्थान ही नहीं बनाया है बल्कि नाम भी कमाया है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://scontent.fstv9-1.fna.fbcdn.net/v/t39.30808-6/344437243_899830797746968_954610150194500342_n.jpg?stp=cp6_dst-jpg_p180x540&amp;_nc_cat=106&amp;ccb=1-7&amp;_nc_sid=8bfeb9&amp;_nc_ohc=X-bFJ8wZFMIAX_l3qSX&amp;_nc_ht=scontent.fstv9-1.fna&amp;oh=00_AfD2WG8hdaMHoJd1cIWBE1e8nspcCfbMJRIY3b3B82EjIQ&amp;oe=6460F743" width="960" height="540" alt="अखबारों के पन्नों से लुप्त होते कार्टून" title="अखबारों के पन्नों से लुप्त होते कार्टून 25"></p>
<p>पिछले दिनों <strong>‘ग्रासरूट फाउंडेशन’</strong> की तरफ से आयोजित “हिंदी में कार्टून जगत की चुनौतियां” विषय पर एक संवाद में राजस्थान के चार दिग्गज कार्टूनिस्टों ने यह पीड़ा व्यक्त की कि उन्हें अपने बाद इस विधा में नई पीढ़ी का कोई सदस्य आता हुआ नहीं दिखता। उनका यह निष्कर्ष बिल्कुल गलत भी नहीं था कि हिन्दी जगत में कार्टून विधा को कोई अपना कॅरियर विकल्प नहीं बनाता। कोई युवा इस विधा में जाने का सोचे तो उसे अपने ही परिवार और नजदीकी लोगों से यह सुनने को मिलता है कि इसमें क्या धरा है। सभी ऐसा चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर-इंजीनियर जैसे विषय चुनें जिनमें अच्छे वेतन वाली नौकरियां मिल सके। मगर ऐसा सोच व्यक्त करते हुए हमारी दृष्टि सिर्फ प्रिन्ट माध्यम यानी अखबार पर ही जाती है जो नये डिजिटल युग में अपनी खिसकती जा रही जमीन को बचाने की जद्दो-जहद में लगा है। इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि डिजिटल माध्यम के सर्वव्यापी हो जाने के बाद अब यदि प्रिन्ट माध्यम का स्पेस सिकुड़ रहा है तो कार्टून विधा के पेशेवरों के सामने अनेकों नये अवसरों के दरवाजे भी खुल रहे हैं। <strong>भारत के मध्यम वर्ग के लोगों ने कॅरियर का अर्थ सिर्फ नौकरी मान रखा है जबकि नए दौर में संचार माध्यम के अवसर नियमित वेतन वाली बंधी बंधाई नौकरी से आगे निकल चुके हैं।</strong> जो अपनी प्रतिभा, मेहनत और क्षमता से किसी उत्पाद के उपयोगकर्ता को आकर्षित कर सके और जिससे पैसा कमाया जा सके, आज के उपभोक्ता बाज़ार को उसकी जरूरत है। इसमें कुछ करने और पाने की अपार संभावनाएं हैं। वह वक़्त गया कि कार्टूनिस्ट बनने का ख्वाब देखने वाला कोई नौसिखिया नौजवान अखबार में नौकरी पा ले और वहां घिसते-घिसते निखार पा जाए। अब प्रतिस्पर्धी बाज़ार पूछता है आपके पास बेचने को क्या हुनर है? अधिकांश स्थापित कार्टूनिस्टों का मानना है कि कोई भी संस्थान आपको कार्टून बनाना नहीं सिखा सकता। आप कला सीख सकते हैं, आप संस्थानों में स्केच और ड्रॉ करना सीख सकते हैं, लेकिन कोई किसी को अच्छा कार्टून बनाना नहीं सिखा सकता। यह खुद की प्रतिभा और मेहनत से ही पाया जा सकता है। स्थापित कार्टूनिस्ट यह सलाह भी देते हैं कि आप यदि स्केच बना सकते हैं तो यह मत मान लीजिए कि आप कार्टूनिस्ट बन जाएंगे।</p>
<p>कार्टून की मौजूदा विधा भले ही छापेखाने के आविष्कार और अखबारों के आविर्भाव के साथ पश्चिम से आई लेकिन पुरातत्ववेत्ताओं ने भारत में हास्य चित्रों के प्रमाण पुरातन काल में भी पाये हैं। प्राचीन अजन्ता की गुफाओं में व्यंग्य चित्रों के उदाहरण मिले हैं। यही नहीं हास-परिहास विनोदशीलता से युक्त तीक्ष्ण कटाक्षपूर्ण भीत्ति चित्र भी भारत में मिले हैं। कई मध्य युगीन ग्रन्थों में भी विनोदपूर्ण चित्र मिलते हैं। किन्तु कार्टूनों का आधुनिक काल में प्रचलन फ्रांस और इंग्लैण्ड में प्रारम्भ हुआ। वहां से यह विधा भारत में आई। इंग्लैण्ड के विलियम होगार्थ (1697-1764) को कार्टून दुनिया का पितामह माना जाता है। कालान्तर में जान लीच ने व्यंग्य चित्र बनाना शुरू किया। विश्व के अन्य प्रमुख कार्टूनकारों में फुगास, शैफार्ड, लेंगडन डेविडलों, रेनोल्ड्स, रौलिन्सन आदि हैं। <strong>भारत में सर्वप्रथम 19वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में कार्टून विधा प्रारम्भ हुई। एक पारसी ने इसका सूत्रपात किया बताते हैं। भारत के प्रमुख कार्टूनिस्टों में शंकर, आर. के. लक्ष्मण, सामू, आबिद सुरती, काजिलाल, रंगा, सुधीर दर, मारियो मिरांडा, अबू अब्राहम, राजिंदर पुरी, उन्नी, सुधीर तेलंग, प्राण, नेगी, मनोरंजन, शिक्षार्थी, अहमद, सुनील चटोपाध्याय, संदीप जोशी पंकज गोस्वामी आदि के नाम सहज ही याद आ जाते हैं। ‘शिव सेना’ को महाराष्ट्र में एक प्रमुख राजनैतिक दल के रूप में खड़ा करने वाले बाल ठाकरे भी पहले अखबार में कार्टूनिस्ट थे।</strong> भारतीय अखबारों में कार्टून छपने का इतिहास समाचार पत्रों जितना ही पुराना माना जाता है। कोई समय अखबारों के पाठकों के लिए रोज सुबह उनमें कार्टून एक जरूरी हिस्सा होता था और प्रथम पृष्ट का जेबी कार्टून समाचार पत्र पाठक को मुस्कराने का एक सबब देता था। अखबारों में छपने वाले कार्टून दो प्रकार के रहे हैं। वह परिपाटी आज भी जारी है। एक कार्टून वह होता है जिसमें व्यंग्य चित्र के जरिए ही सब कुछ कह दिया जाता है। उसके साथ कैप्शन में कोई टिप्पणी नहीं होती। ऐसे कार्टून अखबार के पाठक के थोड़े अधिक जुड़ाव, थोड़े अधिक ज्ञान और थोड़ी अधिक समझ की अपेक्षा करते हैं। दूसरे तरह के वे कार्टून होते हैं जिनके साथ कार्टूनिस्ट की टिप्पणी भी होती है। इसलिए कहा जाता ही कि कार्टूनिस्ट के पास रेखाओं की पकड़ के साथ साथ वाक्-पटुता भी होनी जरूरी है। कार्टून बनाना एक ऐसी कला मानी जाती है जिसमें किसी भी गंभीर विषय या मुद्दे को रोचक तरीके से प्रदर्शित किया जाता है।</p>
<p>आम तौर पर कार्टून बनाना एक शौक के तौर पर शुरू होता है। मगर क्या कोई अपने शौक को कॅरियर बना सकता है, यह बड़ा सवाल है। आज के अखबारों को देखें तो, जैसा वरिष्ठ कार्टूनिस्टों ने अपने संवाद में माना, वहां इसकी कोई संभावना नज़र नहीं आती। केवल कार्टूनों को समर्पित पत्रिका की भी हमारे देश में ‘शंकर्स वीकली’ के अलावा कभी कोई जगह नहीं रही। आज के समय में जहां एक तरफ प्रिन्ट न्यूज़ मीडिया में कार्टून विधा के लिए संभावनाएं नजर नहीं आती वहीं दूसरी तरफ डिजिटल जगत में उसके लिए अपार संभावनाएं हैं जिनमें कलाकार की आत्म संतुष्टि के साथ खूब पैसा भी है। कार्टूनिस्टों के लिए प्रिन्ट व ऑनलाइन पत्रिकाओं तथा किताबों में इलस्ट्रेशन और एनीमेशन-चलचित्रों के लिए भी काम की कमी नहीं है। कोई कार्टूनिस्ट यदि एक प्रोफेशनल कलाकार की तरह काम करे, तो उसके लिए कॉमिक स्ट्रिप्स, समाचार पत्र-पत्रिकाओं, मनोरंजन पत्रिकाओं, टेलीविजन, फिल्मों, वीडियो गेम आदि में काम मिलने की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। मगर इसे वही साध सकता है जो कल्पनाशील हो, और ड्राइंग का शौक रखता हो। वह अपने स्केच और कॉमिक स्ट्रिप्स के माध्यम से अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से भी व्यक्त कर सकता हैं। आज कल एनिमेटेड मूवीज का बड़ा चलन है जिसमें कार्टूनिस्टों के लिए खूब काम भी है और पैसा भी है। डिजिटल दुनिया का सबसे लोकप्रिय प्रोग्राम वीडियो गेम, जो डिजिटल दुनिया में सबसे कमाऊ धंधा है, में भी कार्टूनिस्टों के लिए कॅरियर के बड़े अवसर उपलब्ध है। क्योंकि कला की अपनी देशगत विशेषता होती है इस लिए भारतीय बाज़ार के लिए इसी माटी के कार्टूनिस्टों को काम मिलेगा और वे सफल भी होंगे। हालांकि कैरीकेचर और कार्टून में अन्तर होता है। कैरीकेचर किसी व्यक्ति के व्यंग्यात्मक भाव-भंगिमाओं का प्रस्तुतीकरण का तरीका है जबकि कार्टून में राजनीतिक, सामाजिक संदर्भों को बड़े कलात्मक और सूक्ष्म तरीके से प्रस्तुत करते हुए टिप्पणी होती है। लेकिन नए अवसरों के लिए संपादकीय टिप्पणी वाले कार्टून ही सब कुछ होते हैं इस जंजाल से बाहर निकलना होगा। इसके लिए विख्यात कार्टूनिस्ट सुधीर दर का उदाहरण दिया जा सकता है जिनका हास्यबोध चुभने वाला नहीं, बल्कि कुछ शरारती क़िस्म की चुटकी ले कर मजा देने वाला था हुआ करता था। उनके कार्टून तीखे राजनैतिक आशयों वाले न होकर मज़े लेने वाले कार्टून होते थे।</p>
<p>सच तो यह है कि भारत ही नहीं पश्चिम में भी राजनैतिक या एडिटोरियल-कार्टून की जगह सिमटती जा रही है। एडिटोरियल कार्टूनिस्टों के अमरीकी संगठन के मुताबिक़ पिछली शताब्दी में अमरीकी अख़बारों में दो हज़ार से ज्यादा कार्टूनिस्ट नौकरी पर थे, अब यह संख्या पचास से भी कम है। कमोबेश यह स्थिति सारी दुनिया में है। प्रिन्ट मीडिया ज़बर्दस्त आर्थिक संकट के दौर में है और ज्यादातर मीडिया संगठन कार्टून छापने को बेवजह के विवाद की जड़ मानते हैं, सो कटौती की पहली तलवार जिनके सिर पर पड़ती है उनमें कार्टूनिस्ट अगली क़तार में होते हैं। डिजिटल मीडिया ने नए रास्ते जरूर खोले हैं लेकिन वहां विचारधारा वाली संपादकीय टिप्पणी की जगह मजा देने वाले कार्टूनों की मांग अधिक होती है जिसके लिए इस पेशे को अपनाने वालों को तैयार रहना पड़ेगा।</p>
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		<title>प्लास्टिक उपयोगी किन्तु उसका कचरा गंभीर समस्या बना</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Apr 2023 05:23:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
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		<category><![CDATA[पर्यावरण]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="2000" height="1125" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/plastic-waste.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="प्लास्टिक उपयोगी किन्तु उसका कचरा गंभीर समस्या बना" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/plastic-waste.jpg 2000w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/plastic-waste-300x169.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/plastic-waste-1024x576.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/plastic-waste-768x432.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/plastic-waste-1536x864.jpg 1536w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/plastic-waste-696x392.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/plastic-waste-1068x601.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/plastic-waste-1920x1080.jpg 1920w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/plastic-waste-747x420.jpg 747w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/plastic-waste-313x176.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 2000px) 100vw, 2000px" title="प्लास्टिक उपयोगी किन्तु उसका कचरा गंभीर समस्या बना 28">प्लास्टिक का लगभग एक सदी पहले आविष्कार हुआ। उसके बाद से, प्लास्टिक हमारे जीवन के हर पहलू में प्रवेश करता चला गया है। इस टिकाऊ, हल्के वजन वाले अत्यंत बहुमुखी पदार्थ के साथ के बिना कुछ मिनट भी चलना हमारे लिये आज मुश्किल है। पश्चिम में विज्ञान के एक विद्यार्थी ने पिछले दिनों एक अनोखा [&#8230;]]]></description>
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<p>यह बिल्कुल स्पष्ट है कि प्लास्टिक ने हमारे लिये हजारों आधुनिक सुविधाओं को संभव बनाया है और उनके बिना हमारा गुजारा नहीं हो सकता। लेकिन इसके अनेक नुकसान भी हैं, खासकर पर्यावरण के लिए, यह भी सब जानते हैं। प्लास्टिक का उपयोग समस्या नहीं है। हम प्लास्टिक का उपयोग तो जीवन के हर क्षेत्र में करते हैं किन्तु उसके कचरे से निबटना हमारे लिये मुश्किल होता जा रहा है। इसका कारण है प्लास्टिक का प्राकृतिक रूप से नष्ट न होना। जिस प्रकार अन्य चीजें मिट्टी में मिल जाती है उस प्रकार प्लास्टिक नष्ट नहीं होता। प्लास्टिक के परमाणुओं के बीच बंधन इतना मजबूत होता है कि उसे खत्म करना मुश्किल होता है। अगर नष्ट करने के लिए इसे जलाया जाता है तो उससे अत्यंत हानिकारक विषैले रसायनों का उत्सर्जन होता है। उसे ज़मीन में गाड़ दिया जाय तो हजारों साल दबा रह कर भी वह विखंडित नहीं होगा। अधिक से अधिक धरती के ताप से वह छोटे-छोटे कणों में टूट जाएगा किन्तु पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होगा। अगर उसके कचरे को समुद्र में डाल दिया जाय तो वह वहां भी समय के साथ छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित होकर उसके पानी को प्रदूषित करता रहेगा और समुद्री जीवों को नुकसान पहुंचाता रहेगा। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में हर साल लगभग 400 मिलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक का कचरा पैदा होता है। अंदर फोम वाले टेकआउट कंटेनर, पेन, कप, अमेज़ॅन पैकेज और निश्चित रूप से कैरी-बैग का हम भरपूर उपयोग करते हैं। दुनिया में प्लास्टिक से बनने वाले सामानों में से लगभग आधे सिर्फ एक बार प्रयोग करने के बाद फेंक दिये जाते हैं। इसे हम “यूज़ एण्ड थ्रो” कहते है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, “हम एक बार इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक उत्पादों के जबरदस्त आदी हो गए हैं। मगर अब इसके गंभीर पर्यावरणीय, सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी परिणाम सामने आ रहे हैं।” बेशक, प्लास्टिक के बिना जीवन की कल्पना करना पूरी तरह एक बेतुका विचार है। इसके दोषों के बावजूद, चिकित्सा उपकरणों और हेलमेटों में उसका उपयोग नकारा नहीं जा सकता जिसका वह एक महत्वपूर्ण घटक होता है। कई मामलों में प्लास्टिक पर्यावरण की मदद भी कर सकता है। जैसे प्लास्टिक के हवाई जहाज के पुर्जे धातु की तुलना में हल्के होते हैं, जिसका अर्थ है कम ईंधन की खपत और कम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन। इसी प्रकार सौर पैनलों और पवन टर्बाइनों में प्लास्टिक के पुर्जे होते हैं। देखा जाय तो दुनिया प्लास्टिक के सामान से भरी पड़ी है, विशेष रूप से डिस्पोजेबल – काम में लेकर फैंक देने वाली वस्तुओं से। पृथ्वी नीति संस्थान का अनुमान है कि लोग हर साल एक ट्रिलियन सिंगल-यूज प्लास्टिक बैग का उपयोग करते हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://static.toiimg.com/thumb/resizemode-4,width-1280,height-720,msid-71606202/71606202.jpg" width="1280" height="720" alt="प्लास्टिक उपयोगी किन्तु उसका कचरा गंभीर समस्या बना" title="प्लास्टिक उपयोगी किन्तु उसका कचरा गंभीर समस्या बना 29"></p>
<p>पिछली सदी के नौवें दशक में प्लास्टिक उद्योग में एक कैच लाइन चलती थी “प्लास्टिक इसे संभव बनाते हैं” जो आज भी सच लगती है। प्लास्टिक ने हमारी दुनिया में कब प्रवेश किया, इस पर कुछ बहस है। कई लोग इसका आविष्कार 1855 में बताते हैं जब एक ब्रिटिश धातु विज्ञानी अलेक्जेंडर पार्क्स ने कपड़े के लिए जलरोधक कोटिंग के रूप में थर्मोप्लास्टिक सामग्री का पेटेंट कराया था। उसने नये पदार्थ को &#8220;पार्केसिन&#8221; कहा। अगले दशकों में, दुनिया भर में प्रयोगशालाओं ने उसके अनेक रूप और प्रकार विकसित कर दिये। मगर सभी का रसायन शास्त्र समान था। वे सभी परमाणुओं की बहुलक श्रृंखलाएं हैं, और वे अधिकांश पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस से बने होते हैं। उनमें मिलाये जाने वाले रसायनों के कारण प्लास्टिक अन्यों से बेतहाशा भिन्न होते हैं। वे अपारदर्शी, पारदर्शी, झागदार या कठोर, खिंचाव वाले या भंगुरशील भी हो सकते हैं। उन्हें पॉलिएस्टर और स्टायरोफोम सहित कई नामों से जाना जाता है, और पीवीसी और पीईटी जैसी आशुलिपि से भी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान प्लास्टिक निर्माण में तेजी आई क्योंकि वह युद्ध के प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण था। उसने नायलॉन के पैराशूट, प्लेक्सीग्लास, विमान की खिड़कियां जैसी सुविधाएं दी। युद्ध के बाद प्लास्टिक के उत्पादन में और बड़ा उछाल आया। प्लास्टिक फॉर्मिका काउंटर, रेफ्रिजरेटर लाइनर्स, कार के पुर्जे, कपड़े, जूते आदि। वह उत्पाद जिसे कुछ समय के लिए इस्तेमाल करने के वास्ते डिज़ाइन किया गया था, सभी प्रकार की चीजों में चला गया। हालत ने करवट तब ली जब प्लास्टिक सिंगल-यूज सामान में उपयोग में लिया जाने लगा और प्रीफ़ैब कूड़े के ढेर लगने लगे। यहीं से हम मुश्किल में पड़ने शुरू हुए। स्ट्रॉ, कप, बैग और अन्य उत्पादों के कचरे ने पर्यावरण के लिए विनाशकारी परिणाम पैदा किए हैं। हम अपने शहरों में पाते हैं कि सड़कों पर बिखरा अधिकांश कचरा प्लास्टिक का ही होता। खास कर प्लास्टिक की थैलियां। उधर प्यू चैरिटेबल ट्रस्टों के एक अध्ययन के अनुसार, हर साल 11 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक प्लास्टिक महासागरों में प्रवेश करता है, पानी में रिसता है, खाद्य श्रृंखला को बाधित करता है और समुद्री जीवन का दम घोंटता है।</p>
<p>ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट के अनुसार प्लास्टिक कचरे का लगभग पांचवां हिस्सा जल जाता है और हवा में कार्बनडाईआक्साइड छोड़ता है। यह संगठन यह भी रिपोर्ट करता है कि केवल नौ प्रतिशत प्लास्टिक का पुनर्नवीनीकरण किया जाता है। प्लास्टिक को रिसाइकल करना किफायती नहीं हैं, और जब रिसाइकल किया जाता हैं तो उसकी गुणवत्ता खराब हो जाती है। प्लास्टिक हमारे स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा सकता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एनवायर्नमेंटल हेल्थ साइंसेज के अनुसार, कुछ प्लास्टिक एडिटिव्स &#8211; जैसे कि बीपीए और फाथेलेट्स &#8211; मनुष्यों में अंतःस्रावी तंत्र को बाधित कर सकते हैं। मानव शरीर पर इसके चिंताजनक प्रभावों में व्यवहार संबंधी समस्याओं के अलावा पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम हो जानेर और महिलाओं में थायरॉयड हार्मोन का स्तर कम हो जाने तथा समय से पहले बच्चे का जन्म भी शामिल हैं। माइक्रोप्लास्टिक, उपभोक्ता उत्पादों और औद्योगिक कचरे के निपटाने और उसे तोड़ने के परिणामस्वरूप हमारे वातावरण में प्लास्टिक के बेहद छोटे-छोटे टुकड़े या कण हर जगह फैले हुए हैं। हम जो पानी पीते हैं, जिस हवा में हम सांस लेते हैं, और महासागरों में हर कहीं प्लास्टिक के कण विद्यमान हॉएते हैं। वे अन्य चीजों के अलावा, खराब प्लास्टिक कूड़े से आते हैं।</p>
<p>प्लास्टिक की इस समस्या का समाधान पूरी तरह से उपभोक्ताओं के कंधों पर नहीं डाला जा सकता है। हमें इस पर सभी मोर्चों पर काम करने की जरूरत है। समझदार लोगों का कहना है कि इस समस्या पर समग्रता से ध्यान देने की जरूरत है। प्लास्टिक समस्या भी है और उपयोगी भी है। यह प्रगति की समस्या भी है। प्लास्टिक से दुश्मनी की बात नहीं है। दुश्मनी उसके एकल उपयोग से हो तो बेहतर है। किसी चीज को एक बार इस्तेमाल करके फेंक देने की संस्कृति की बात है। इसीलिए दुनिया भर में ऐसे प्लास्टिक के उपयोग को कम से कम करने की कोशिश की जा रही है जो दोबारा इस्तेमाल में न आ सके। केंद्र सरकार ने एकबारीय उपयोग वाले प्लास्टिक पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया हुआ है। मगर हम अपने चारों तरफ उसका कोई असर नहीं देख रहे हैं। राज्य सरकार को सबसे अधिक आमदनी शराब की बिक्री से मिलने वाले आबकारी वाले कर से होती है। संविधान के निर्देश के अनुरूप तो सरकार को शराब को बंद करना चाहिए मगर ऐसा नहीं होता। अब सरकार शराब को प्लास्टिक की बोतलों व पाउच में पैक करने की भी अनुमति देने लागी है। ऐसा करके वह प्लास्टिक के कचरे में ही इजाफा करती है बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए संविधान के दिशानिर्देशों की भी अनदेखी करती है।</p>
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		<title>जलवायु परिवर्तन के खतरनाक परिणाम सामने आने लगे हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Apr 2023 10:05:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
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		<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[पर्यावरण]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="802" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="Climate change green faith" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-300x201.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-1024x684.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-768x513.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-696x465.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-1068x714.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-628x420.jpg 628w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-313x209.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="जलवायु परिवर्तन के खतरनाक परिणाम सामने आने लगे हैं 31">बीता 2022 का साल एक असाधारण वर्ष था। लगभग आधी सदी बाद पहली बार चांद पर कोई यान फिर उतारा गया। वैज्ञानिकों ने ‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’ के जरिये ब्रह्मांड में पहले से कहीं अधिक दूर गहराई तक झांक कर उसकी रचना और निर्माण की खोज करने का इतिहास रचा। वैज्ञानिकों ने गहरे अंतरिक्ष की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1200" height="802" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="Climate change green faith" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-300x201.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-1024x684.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-768x513.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-696x465.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-1068x714.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-628x420.jpg 628w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/03/Climate-change-green-faith-313x209.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="जलवायु परिवर्तन के खतरनाक परिणाम सामने आने लगे हैं 32"><p>बीता 2022 का साल एक असाधारण वर्ष था। लगभग आधी सदी बाद पहली बार चांद पर कोई यान फिर उतारा गया। वैज्ञानिकों ने ‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’ के जरिये ब्रह्मांड में पहले से कहीं अधिक दूर गहराई तक झांक कर उसकी रचना और निर्माण की खोज करने का इतिहास रचा। वैज्ञानिकों ने गहरे अंतरिक्ष की खोज करने के लिये करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर तक ही नहीं झांका, बल्कि साथ ही साथ अपनी पृथ्वी की ओर भी दृष्टि डालना जारी रखा। उन्होंने पिछले साल पृथ्वी पर क्या देखा? बहुत कुछ देखा। जो देखा वह डरावना है। मानव पर्यावरण के साथ जैसा खिलवाड़ कर रहा है उसकी जानकारी वैज्ञानिकों के अध्ययनों में सामने आई है। यह जानकारी धरती पर मानव के भविष्य के लिए चेतावनी देती है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों के अध्ययन बताते हैं कि बीते साल जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन एक बार फिर नई ऊंचाइयों पर पहुंच गये हैं। पिछले साल जुलाई में ‘एमिट’ नाम का एक नया उपकरण अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को भेजा गया। यह यंत्र विभिन्न स्रोतों से आने वाली एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस मीथेन, जिसे &#8216;सुपर एमिटर&#8217; की तरह पहचाना जाता है, के उद्गम स्थानों का पता लगाता है। यह तो अब जग जाहिर है कि मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसें जलवायु प्रणाली में अनावश्यक गर्मी बनाये रखती हैं जिससे धरती की सतह का तापमान बढ़ता हैं। पिछला वर्ष, 1880 के बाद पृथ्वी के पांचवें सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज हुआ। साथ ही इस सदी के पिछले नौ लगातार वर्ष सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज हुए हैं। धरती के बढ़ते तापमान ने पिछले साल दुनिया भर में अलग-अलग जगहों पर उत्पात मचाया, कहर ढाया। नेशनल ओशियेनिक एण्ड एटमॉसफियरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) और नासा के विश्लेषणों के अनुसार जलवायु प्रणाली में अधिकांश अतिरिक्त गर्मी समुद्र में बनती है। उनके आंकड़े बताते हैं कि 2022 में समुद्र की गर्मी के नये रिकॉर्ड बने। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह बढ़ी हुई समुद्री गर्मी तीव्र उष्णकटिबंधीय तूफानों को बढ़ावा दे सकती है। इसे हमने पिछले सितंबर में तूफान ‘इयान’ के रूप में देखा भी। अमरीका में ‘इयान’ एक उष्णकटिबंधीय तूफान के रूप में आया और 24 घंटे के भीतर तेजी से तूफ़ानों की भीषण तीव्रता की संख्या चार की श्रेणी में तब्दील हो गया। यह तूफान अमेरिका में तबाही के लिहाज से अब तक के सबसे बड़े तूफानों में से एक माना जा रहा है।</p>
<p>जब जलवायु प्रणाली गर्म होती है तब वातावरण में अधिक नमी बनती है, जिसके परिणामस्वरूप अधिक तीव्रता वाली भारी वर्षा होती है। पिछले साल जून से सितंबर तक हमने पड़ोसी पाकिस्तान में उसका तांडव देखा। लंबे समय तक और भारी मानसूनी बारिश के कारण वहां पिछले एक दशक की सबसे भीषण बाढ़ आई जिससे वहां जबरदस्त तबाही मची। बढ़ती गर्मी से न केवल वातावरण में अधिक पानी बनता है और भारी बारिश होती है, बल्कि उससे मिट्टी की नमी को भी नुकसान पहुंचता है। इससे सूखे के हालात बढ़ जाते हैं। पिछले साल अमेरिका के पश्चिम में सूखा पड़ा जिसके कारण उसके लेक मीड और लेक पॉवेल जैसे महत्वपूर्ण जलाशयों की क्षमता गिर कर केवल 27 प्रतिशत तक रह गई। शुष्क और गर्म परिस्थितियों का परिणाम जंगल में लगने वाली आग के खतरों के बढ़ जाने में भी होता है। जनवरी में लंबे समय से चली आ रही गर्मी और सूखे के दौरान, अर्जेन्टीना के कोरिएंटेस प्रांत में आग लगने की एक हजार से अधिक घटनाएं हुई। इसने अमरीका के इबेरा राष्ट्रीय उद्यान और आसपास के खेतों की महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि को नष्ट कर दिया। ऐसे हालात अमरीका के हैं जहां उन्नत प्रोद्योगिकी है और प्रकृति की प्रत्येक हलचल पर वैज्ञानिक पल-पल नज़र रखते हैं। जलवायु परिवर्तन का असर कुछ देशों को नहीं, वरन् समूची दुनिया पर पड़ता है। कोई देश यह सोचे कि वह प्रकृति की मार से बच जाएगा तो यह उसकी खाम-खयाली होगी। अमेरिकी भूभौतिकीय संघ की 2022 की वार्षिक बैठक में प्रस्तुत जीआईएसएस शोध के साथ-साथ एक अलग अध्ययन और आया है जिसके अनुसार, आर्कटिक क्षेत्र में वार्मिंग प्रवृत्तियों सबसे अधिक प्रभाव नजर आ रहा है। यह वैश्विक औसत के चार गुना के करीब है। दुनिया भर के समुदाय उन सभी प्रभावों को महसूस कर रहे हैं जिन्हें वैज्ञानिक गर्म होते वातावरण और समुद्र से जुड़े हुए मान रहे हैं।</p>
<p>नासा के वैज्ञानिक वैश्विक तापमान का विश्लेषण मौसम स्टेशनों और अंटार्कटिक अनुसंधान स्टेशनों के साथ-साथ जहाजों और समुद्र के जहाजों पर लगे उपकरणों द्वारा एकत्र किए गए आंकड़ों से तैयार करते हैं। वैज्ञानिक डेटा में अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए इन मापों का विश्लेषण करते हैं और हर साल वैश्विक सतह के औसत तापमान के अंतर की गणना के लिए सुसंगत तरीके काम में लेते हैं। सतह के तापमान के ये भू-आधारित माप नासा के एक्वा उपग्रह पर वायुमंडलीय इन्फ्रारेड साउंडर द्वारा 2002 से एकत्र किए जा रहे उपग्रह डेटा और अन्य अनुमानों के अनुरूप ही हैं। इसलिए उनकी विश्वसनीयता पर कोई विवाद नहीं है। समय के साथ वैश्विक तापमान कैसे बदलते हैं, यह समझने के लिए नासा 1951 से 1980 की अवधि को आधार रेखा के रूप में उपयोग करता है। उस आधार रेखा में ‘ला नीना’ और ‘एल नीनो’ जैसे जलवायु पैटर्न भी शामिल हैं। इनके साथ ही अन्य कारकों में असामान्य रूप से गर्म या ठंडे वर्ष भी शामिल किये जाते हैं। इसमें पृथ्वी के तापमान में प्राकृतिक भिन्नताओं को भी शामिल किया जाता हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि किसी भी वर्ष में औसत तापमान को कई कारक प्रभावित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में ‘ला नीना’ की स्थिति के लगातार तीसरे वर्ष बनाने के बावजूद वर्ष 2022 रिकॉर्ड पर सबसे गर्म वर्षों में से एक था। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ‘ला नीना’ के शीतलन प्रभाव ने वैश्विक तापमान को थोड़ा कम (लगभग 0.11 डिग्री फ़ारेनहाइट या 0.06 डिग्री सेल्सियस) किया हो सकता है, जो औसत से अधिक सामान्य समुद्री परिस्थितियों में होता। एक अलग, स्वतंत्र विश्लेषण करके निष्कर्ष निकालाने वाले अमरीका के नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) जिसने 2022 के लिए वैश्विक सतह का तापमान 1880 के बाद से पांचवां उच्चतम बताया के वैज्ञानिक अपने विश्लेषण में समान रूप से  तापमान के कच्चे डेटा का अधिक उपयोग करते हैं। वे एक अलग आधारभूत अवधि (1901-2000) और पद्धति अपनाते हैं। हालांकि कुछ खास वर्षों के लिए रैंकिंग के रिकॉर्ड के बीच थोडी भिन्नता हो सकती है मगर वे व्यापक तौर पर दीर्घकालिक ग्लोबल वार्मिंग को दर्शाते हैं। नासा के 2022 तक वैश्विक सतह के तापमान के पूर्ण डेटासेट का वैज्ञानिकों ने कैसे विश्लेषित किया वह उसका कोड सहित पूर्ण विवरण सार्वजनिक रूप से जियोग्रैफिक इनफार्मेशन सिस्टम पर उपलब्ध हैं। यह नासा की एक प्रयोगशाला है जिसका प्रबंधन मैरीलैंड के ग्रीनबेल्ट में एजेंसी के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के पृथ्वी विज्ञान प्रभाग द्वारा किया जाता है। यह प्रयोगशाला न्यूयॉर्क में कोलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थ इंस्टीट्यूट और स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड एप्लाइड साइंस से संबद्ध है।</p>
<p>जलवायु का आसन्न संकट धरती के किसी एक भूभाग के लिए नहीं है। वह सभी को प्रभावित करने वाला है। यह सम्पूर्ण मानव जाति का सामूहिक संकट है जिसे सामूहिक तरीके से ही निबटा जा सकता है। यही कारण है कि अंतरिक्ष से पृथ्वी पर नज़र रखने वाला अंतरिक्ष विज्ञान का संस्थान अपनी जानकारियों का सबसे साझा करता है। समाधानों को बढ़ावा देने के लिये वह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की जानकारी का ओपन डेटा उपलब्ध कराता है। जैसा कि हमने देखा है कि जलवायु का गरम होना हम सभी को प्रभावित करता है और इसका मुकाबला करने के लिए हम सभी को आगे बढ़ना है। जैसा कि 2022 और उसके पिछले वर्षों में वैज्ञानिकों ने जो आंकड़े दिये उनसे अब विश्व के सभी देश जलवायु की  चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने लगे हैं और समझने लगे हैं कि उनका सामना करना कितना महत्वपूर्ण है। अब यह सबको भली भांति समझ में आ गया है कि ग्रीन हाउस प्रभाव की वजह से पैदा होने वाली ग्लोबल वॉर्मिंग आने वाले समय में मानवजाति की सबसे बड़ी चुनौती है। धीरे-धीरे यह भी सबको साफ होता जा रहा है कि जल्द ही कुछ करने की जरूरत है ताकि धरती को गरम होने से रोका जा सके। ऐसी प्राकृतिक आपदा जो मानव के हस्तक्षेप से आती है। यह वक़्त उसे रोकने के उपाय करने का है। वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग में कमी के लिये मुख्य रूप से सी.एफ.सी. गैसों का उत्सर्जन रोकना होगा और इसके लिये फ्रिज़, एयर कंडीशनर और दूसरे कूलिंग मशीनों का इस्तेमाल कम करना होगा या ऐसी मशीनों का उपयोग करना होगा जिससे ऐसी गैसें कम निकलती हों। औद्योगिक इकाइयों की चिमनियों से निकलने वाला धुआं भी हानिकारक होता है। साथ ही वाहनों में से निकलने वाला धुआं भी पर्यावरण को बिगाड़ता है। रासायनिक इकाइयों से निकलने वाला कचरा और जंगलों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई भी धरती के तापमान को बढ़ाने में योगदान दे रही है। ऐसे में पर्यावरण मानकों का सख्ती से पालन करने, अक्षय ऊर्जा, जैसे पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और पनबिजली के उपायों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। तभी ग्लोबल वार्मिंग पैदा करने वाली गैसों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इसके लिए मजबूती से लगातार प्रयत्न करते रहने की जरूरत है।</p>
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		<title>असहमति के लिए जगह बनी रहना लोकतंत्र के लिए जरूरी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 08 Apr 2023 10:35:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="675" height="379" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="असहमति के लिए जगह बनी रहना लोकतंत्र के लिए जरूरी" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929.jpeg 675w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 675px) 100vw, 675px" title="असहमति के लिए जगह बनी रहना लोकतंत्र के लिए जरूरी 33">लोकतंत्र में एकाधिकारवादी शासन नहीं होता। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सबकी सहमति बनाई जाती है। भले ही शासन की बागडोर प्रतिस्पर्धात्मक निर्वाचन से सौंपी जाती है किन्तु राज्य का संचालन आम सहमति बना कर चलाना ही लोकतान्त्रिक नेताओं की असली उपलब्धि होती है। लोकतंत्र की पहली शर्त यही होती है कि उसमें प्रत्येक नागरिक को लगे [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="675" height="379" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="असहमति के लिए जगह बनी रहना लोकतंत्र के लिए जरूरी" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929.jpeg 675w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 675px) 100vw, 675px" title="असहमति के लिए जगह बनी रहना लोकतंत्र के लिए जरूरी 34"><p>लोकतंत्र में एकाधिकारवादी शासन नहीं होता। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सबकी सहमति बनाई जाती है। भले ही शासन की बागडोर प्रतिस्पर्धात्मक निर्वाचन से सौंपी जाती है किन्तु राज्य का संचालन आम सहमति बना कर चलाना ही लोकतान्त्रिक नेताओं की असली उपलब्धि होती है। लोकतंत्र की पहली शर्त यही होती है कि उसमें प्रत्येक नागरिक को लगे कि वह अपने तरीके से जीवन जीने को स्वतंत्र है। इस स्वतंत्रता में उसकी किसी परमेश्वर में आस्था के साथ किसी परमेश्वर को न मानने की भी आस्था, उसका रहन सहन, उसकी बोली, उसका खानपान, पहनावा सब शामिल होता है।</p>
<p>भारतीय संविधान उसे अपनी बात कहने का, अपना मत रखने का, और उसे अभिव्यक्त करने का पूरा हक़ देता है। संविधान उसे यह हक़ भी देता है कि वह बिना कोई लोभ, लालच, प्रलोभन या दबाव दिये दूसरों को अपने मत का बनाने के लिए प्रयत्न कर सके। नागरिकों के लिए इन्ही अधिकारों को पाने के लिए देश की आज़ादी के लिए लंबी जंग लड़ी गई थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, भारत के स्वाधीनता संग्राम के मूलभूत मूल्यों में से एक थी। अंग्रेजों ने असहमति के स्वर को कुचलने का भरसक प्रयास किया परंतु स्वाधीनता सेनानियों को यह एहसास था कि देश में प्रजातांत्रिक संस्कृति के जड़ पकड़ने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपरिहार्य है। स्वाधीनता संग्राम के कई नेताओं को निडरता से अपनी बात रखने की बड़ी कीमत अदा करनी पड़ी। उन्हें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों द्वारा हर तरह से प्रताड़ित किया गया। स्वाधीनता के बाद, हमारे संविधान में इस तरह के प्रावधान किए गए जिनसे अभिव्यक्ति की आज़ादी को कोई सरकार समाप्त न कर सके।</p>
<p>इन अधिकारों में प्रत्येक नागरिक को असहमति का अधिकार भी शामिल है जो संविधान की उसी धारा में समाहित है जिसमें प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी दी गई है। असहमति और कुछ नहीं बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 में निहित प्रतिबंधों के अधीन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का विस्तार ही है। ये एक ऐसा अधिकार है जिसे बनाये रखने की हमने शपथ ले रखी है। जब भी कोई चीज़ हमारी अंतरात्मा के ख़िलाफ़ जाती है तो हम इसे मानने से इनकार कर देते हैं। अपना कर्तव्य समझते हुए हम ऐसा करने से इनकार करते हैं। संविधान हमें ऐसा अधिकार देता है कि हम ऐसी किसी बात को मानने से इनकार करें जो हमारी अंतरात्मा के ख़िलाफ़ है।</p>
<p>यही बात महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन से हमें सिखाई। देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने भी हाल ही में टिप्पणी की कि सवाल करने और असहमतियों के लिए जगह ख़त्म करना राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक तरक्की के आधार को ख़त्म करना है। इस लिहाज़ से असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व है। इसका मतलब है कि लोकतंत्र में असहमतियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए न कि उन्हें कुचला जाना चाहिए। शर्त बस इतनी ही है कि असहमति शांतिपूर्ण हो और वह हिंसा में तब्दील न हो।</p>
<p>असहमति का अर्थ विरोध नहीं होता, इसलिए हमारे यहां इसकी जगह पक्ष और प्रतिपक्ष की अवधारणा है। हमारे संवैधानिक सदनों में कोई विरोधी पक्ष नहीं होता, प्रतिपक्ष होता है। असहमति जीवंत लोकतंत्र का प्रतीक है। लोकतान्त्रिक शासन में असहमति की तार्किक अभिव्यक्ति आम सहमति बनाने के लिये ही होती है। लेकिन हम पाते हैं कि भारतीय समाज में विभिन्न मुद्दों पर विपरीत विचारधारा के लिये असहिष्णुता बढ़ रही है। यह चिंता की बात है।</p>
<p>दुर्भाग्य से कई बार असहमति का विकृत रूप भी देखने को मिलता है। ऐसा प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति के कारण होता है जहां असहमति के लिए लोगों को भड़काया जाता है जिसका नतीजा जनसमूह के हिंसक हो जाने की घटनाएं के रूप में सामने आता है। असहमति व्यक्त करने के लिए शुरू में शांतिपूर्ण तथा अहिंसक तरीके से धरना-प्रदर्शन और बंद का आयोजन किया जाता है लेकिन उसे हिंसक होने में देर नहीं लगती। यह भी महत्वपूर्ण है कि हिंसा का माहौल आंदोलनकारियों के कृत्य से बनता है या राज्य की ताकत की प्रतीक पुलिस के असंयमित कदम से।</p>
<p>लेकिन हिंसक गतिविधियों को ‘असहमति’ के दायरे में नहीं माना जा सकता। हिंसा भौतिक ही नहीं होती है। असंयमित भाषा, क्रूर भाषा और गाली -गलौच वाली भाषा, किसी को देख लेने की धमकी देने वाली भाषा और किसी की आस्था का अमर्यादित मजाक उड़ाना हिंसा का प्रतिरूप ही माना जा सकता है। अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के इस्तेमाल के नाम पर किसी व्यक्ति या समुदाय के बारे में कटुता फैलाने की आज़ादी भी हमारा संविधान नहीं देता। हाल के समय में नि:संदेह विवादास्पद कृषि कानून, नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसे कई मुद्दों पर प्रतिस्पर्धी राजनीति के माहौल के कारण समाज में उत्तेजना रही है।</p>
<p>इसके पीछे वैचारिक विमत प्रमुख रहा है। यह भी तथ्य है कि इन्हीं आन्दोलनों के दौरान कई स्थानों पर हिंसा भी हुई। सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के लिये आरक्षण सहित ऐसे अनेक विषय हैं, जिन्हें लेकर विभिन्न संगठनों और समूहों ने आन्दोलन शुरू किये, लेकिन आगे चलकर इनका रूप बदल गया और इसमें हिंसा भी शामिल हो गयी। सरकार के रवैये से नाराज होकर किये जाने वाले आंदोलनों के दौरान हिंसा और तोड़फोड़ होना भी आम है।</p>
<p>इसीलिए लोकतंत्र में असहमति और असहमति व्यक्त करने के लिये हिंसा, तोड़फोड़ करने या फिर विघटनकारी गतिविधियों का सहारा लेने जैसे कृत्यों के बीच अंतर करने और असहमति के स्वरूप को परिभाषित करने की भी आवश्यकता महसूस की जाती रही है। असहमति के दायरे के निर्धारण के अभाव में आज समाज के हर वर्ग और समूह के लोग विभिन्न मुद्दों पर अपनी असहमति असंयमित और अमर्यादित भाषा से व्यक्त करने लगे हैं।</p>
<p>अभिव्यक्ति की आजादी का बोलबाला सोशल मीडिया पर अधिक नज़र आता है जहां राजनीतिक दलों, नेताओं के साथ ही न्यायपालिका और इसके सदस्यों के बारे में भी मनमर्जी की टिप्पणियां आम होती हैं। इसी वजह से ऐसा महसूस किया जाता है कि सोशल मीडिया पर की जा रही अनर्गल और बेबुनियाद टिप्पणियों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। इस समय उच्चतम न्यायालय में राजद्रोह के अपराध से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए को असंवैधानिक घोषित करने के अनुरोध के साथ अनेक याचिकाएं लंबित हैं। इन याचिकाओं में भी असहमति की आवाज उठाने वालों के प्रति धारा 124 ए के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया है। न्यायालय भी ‘औपनिवेशिक काल’ के राजद्रोह संबंधी दंडात्मक कानून के ‘दुरुपयोग’ से चिंतित है और उसने कहा भी है कि एक गुट दूसरे समूह के लोगों को फंसाने के लिए इस प्रकार के (दंडात्मक) प्रावधानों का सहारा ले सकता है।</p>
<p>यही नहीं, यदि कोई विशेष पार्टी या लोग विरोध में उठने वाली आवाज नहीं सुनना चाहते हैं, तो वे इस कानून का इस्तेमाल दूसरों को फंसाने के लिए कर सकते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमलों के पीछे कई कारण हो सकते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का एक तरीका हमने सन् 1975 के आपातकाल में देखा। उस समय देश में बोलने की आज़ादी पर रोक लगाने में राज्य की सबसे बड़ी भूमिका रही।</p>
<p>इन दिनों जो हो रहा है उसमें राज्य की भूमिका तो है ही, परंतु इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि साम्प्रदायिकता के ज़हर से लबरेज़ लोग अपने स्तर पर साम्प्रदायिकता के विरोधियों की आवाज़ को कुचल रहे हैं, उन पर जानलेवा हमले कर रहे हैं। आज न केवल धर्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा का वातावरण बन गया है बल्कि उनके प्रति भी जो प्रजातांत्रिक और बहुवादी मूल्यों के हामी हैं। समाज में असहिष्णुता तेजी से बढ़ी है। ऐसे में अनेक सवाल उठते है। समाज का साम्प्रदायिकीकरण क्यों हो रहा है? हम इतने असहिष्णु क्यों होते जा रहे हैं? जो लोग प्रजातांत्रिक मूल्यों के पैरोकार हैं, उनकी जान क्यों ली जा रही है? जो लोग स्वाधीनता संग्राम और भारतीय संविधान के मूल्यों को बढ़ावा देते हैं उन पर हमले क्यों हो रहे हैं? साम्प्रदायिक विचारधाराएं, प्रजातंत्र विरोधी होती हैं और उनकी बढ़ती ताकत के चलते ही देश में अलगाव बढ़ता है। विचारधारा और असहिष्णुता व हत्याओं के परस्पर संबंध को समझने के लिए यदि हम कुछ पीछे मुड़कर देखें तो स्वाधीन भारत में वैचारिक कारणों से हत्या की सबसे पहली और सबसे प्रमुख घटना थी महात्मा गांधी की हत्या।</p>
<p>किसी भी प्रजातांत्रिक समाज के लिए यह आवश्यक है कि वहां सभी लोगों को अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार हो और सभी के विचारों पर स्वस्थ्य बहस के लिए जगह हो। नि:संदेह, असहमति संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(ए) में प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी को प्रतिबिंबित करती है। प्रत्येक नागरिक को बोलने की स्वतंत्रता प्रदान करने वाले अनुच्छेद 19 (1)(ए) और इस संबंध में अनेक न्यायिक व्यवस्थाओं में स्पष्ट किया गया है कि अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार निर्बाध नहीं है और आवश्यकता पड़ने पर नियंत्रित किया जा सकता है। इसीलिए दूसरी तरफ असहमति को परिभाषित करने और इसकी लक्ष्मण रेखा खींचने की आवश्यकता भी महसूस की जाती रही है। अभिव्यक्ति और विचार की स्वतंत्रता राज्य की उदारता से नहीं मिलती। यह नागरिकों का मूलभूत अधिकार है। अभिव्यक्ति का सरकारी दमन असत्य को उजागर करने को अधिक कठिन तो बना सकता है, उसे कम नहीं कर सकता। भारत के प्रत्येक नागरिक को खुली, गतिशील तथा तर्कसंगत अभिव्यक्ति का अधिकार ही नहीं नागरिक कर्तव्य भी है। क्या बोला गया है उसके आधार पर जब सरकार सार्वजनिक चर्चा को व्यवस्थित करने का प्रयास करती है तो वह अभिव्यक्ति की आज़ादी को बांधने की चेष्टा होती है।</p>
<p><span style="color: #999999;"><em>Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। </em></span></p>
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