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	<title>संजय कुमार सिंह &#8211; The Harishchandra &#8211; Hindi</title>
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		<title>सरकार ने अपने खिलाफ हो सकने वाली खबरों की संभावना खत्म कर दी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Feb 2023 14:21:07 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="717" height="428" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सरकार ने अपने खिलाफ हो सकने वाली खबरों की संभावना खत्म कर दी" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629.jpeg 717w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629-300x179.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629-696x415.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629-704x420.jpeg 704w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629-313x187.jpeg 313w" sizes="(max-width: 717px) 100vw, 717px" title="सरकार ने अपने खिलाफ हो सकने वाली खबरों की संभावना खत्म कर दी 1">द टेलीग्राफ में सोमवार, 27 फरवरी को पहले पन्ने पर तीन कॉलम में एक खबर छपी थी जिसका शीर्षक था, पूर्व में संघ की एजेंसी दूरदर्शन को समाचार देगी। यह खबर ‘द वायर’ में रविवार को छपी खबर पर आधारित थी। शाम में इंडियन एक्सप्रेस की खबर दिखी और इस तरह पक्का हो गया कि [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="717" height="428" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सरकार ने अपने खिलाफ हो सकने वाली खबरों की संभावना खत्म कर दी" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629.jpeg 717w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629-300x179.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629-696x415.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629-704x420.jpeg 704w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images281629-313x187.jpeg 313w" sizes="(max-width: 717px) 100vw, 717px" title="सरकार ने अपने खिलाफ हो सकने वाली खबरों की संभावना खत्म कर दी 3">



<p>द टेलीग्राफ में सोमवार, 27 फरवरी को पहले पन्ने पर तीन कॉलम में एक खबर छपी थी जिसका शीर्षक था, पूर्व में संघ की एजेंसी दूरदर्शन को समाचार देगी। यह खबर <a href="https://thewirehindi.com/241443/prasar-bharati-hindusthan-samachar-rss-news-agency/" rel="nofollow noopener" target="_blank">‘द वायर</a>’ में रविवार को छपी खबर पर आधारित थी। शाम में इंडियन एक्सप्रेस की खबर दिखी और इस तरह पक्का हो गया कि सरकार खिलाफ खबर करने वालों को ही खत्म नहीं कर रही है समर्थन की पत्रकारिता करने वालों को पूरा संरक्षण भी दे रही है। इसके एक-दो नहीं, कई उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन अभी मैं हिन्दुस्तान समाचार पर ही केंद्रित रहूंगा और उसमें भी वही जो अखबारों में छप चुका है। </p>



<p>इंडियन एक्सप्रेस ने शाम में जो सब बताया उसे बाद में संशोधित करके बताया है कि दूरदर्शन और आकाशवाणी को कंटेंट मुहैया कराने का ठेका पाने वाला हिन्दुस्तान समाचार क्या है। दरअसल यह आरएसएस से जुड़ी एक न्यूजवायर सेवा है जिससे प्रसार भारती 2017 से अपनी सेवाएं ले रही है। अब इसे <a href="https://indianexpress.com/article/explained/hindusthan-samachar-rss-linked-newswire-doordarshan-air-8469647/" rel="nofollow noopener" target="_blank">12 भाषाओं में 25 महीने तक खबरें देने का ठेका</a> दिया गया जो कुल 7.7 करोड़ रुपये का है। मैं नहीं जानता कि इसमें ठेका देने के नियमों का कितना पालन हुआ और हुआ कि नहीं पर मेरा मानना है कि अगर यह सामान्य होता तो इसकी घोषणा की जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है।</p>



<p>विपक्षी सांसदों ने हिन्दुस्तान समाचार के साथ हुए इस समझौते की निन्दा की है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस के सांसद जवाहर सरकार जो 2012 से 2016 तक प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे ने ट्वीट किया, &#8220;आखिरकार प्रसार भारती और भाजपा का विलय सर्वश्रेष्ठ है।” सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी ने ट्वीट किया, “दूरदर्शन और आकाशवाणी अब विशेष रूप से वही समाचार प्रसारित करेंगे जो आरएसएस देगा! प्रसार भारती ने पीटीआई के साथ अपने अनुबंध को समाप्त कर दिया है और समाचार फ़ीड के लिए विश्व हिन्दू परिषद के संस्थापक गोलवलकर और वीएचपी के द्वारा स्थापित हिंदुस्तान समाचार से अनुबंध किया है।”</p>



<p>ऊपर मैंने बताया कि द वायर ने इतवार को सबसे पहले खबर छापी कि करार 14 फरवरी से लागू है। अगर ऐसा है और सामान्य है तो प्रसार भारती के साथ-साथ हिन्दुस्तान समाचार को भी प्रेस विज्ञप्ति जारी करनी चाहिए थी जैसा कोई भी बड़ा ठेका मिलने और देने पर करता है बशर्ते वह सामान्य तरीके से दिया गया हो। जिनकी घोषणा नहीं हुई उनमें आमतौर पर गड़बड़ रहती है लेकिन वह भी अभी मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि सरकार आरएसएस से जुड़ी समाचार एजेंसी की सेवा लेकर क्या उसे उपकृत नहीं कर रही है और बदले में प्रचारात्मक खबरों से उपकृत नहीं होगी। प्रतिकूल खबरें तो खैर क्या होंगी &#8211; उसके लिए पीटीआई की उदाहरण याद आता है। उसपर चर्चा से पहले आइए आरएसएस से इसके संबंध देख लें जो इंडियन एक्सप्रेस ने बताए हैं।  </p>



<p>हिन्दुस्तान समाचार की स्थापना 1948 में शिवराम शंकर आप्टे उर्फ दादासाहेब आप्टे ने की थी। गुजरात के बड़ौदा में पैदा हुए पत्रकार, आप्टे का आरएसएस के साथ आजीवन जुड़ाव रहा और 1964 में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के संस्थापक महासचिव बने। हिन्दुस्तान समाचार को 1956 में एक सहकारी समिति के रूप में पंजीकृत कराया गया था। 1975 में, इमरजेंसी की घोषणा के तुरंत बाद, इंदिरा गांधी की सरकार ने उस समय की चार समाचार एजेंसियों &#8211; पीटीआई, यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (यूएनआई), हिंदुस्तान समाचार और समाचार भारती &#8211; का विलय एक समाचार एजेंसी &#8211; समाचार में कर दिया था।</p>



<p>1977 के चुनावों के बाद सत्ता में आई जनता पार्टी सरकार ने इस फैसले को पलट दिया (उस समय लाल कृष्ण आडवाणी सूचना और प्रसारण मंत्री थे) लेकिन इंदिरा गांधी की सरकार ने 1983 में फिर से हिन्दुस्तान समाचार को निशाना बनाया। मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेसी सुभाष यादव, जो बाद में राज्य के उपमुख्यमंत्री बने, को रिसीवर नियुक्त किया गया। हिन्दुस्तान समाचार ने सरकार के फैसले को चुनौती दी और 1999 में दिल्ली उच्च न्यायालय में केस जीत गया। इसके बाद, आरएसएस के वरिष्ठ नेता श्रीकांत जोशी ने एजेंसी को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया और इसे फिर से शुरू किया। इसके बाद की कहानी आगे पढ़िये।</p>



<p>फिलहाल यहां यह बताना जरूरी है कि प्रसार भारती पीटीआई की सेवा लेती थी इस बीच, 5 अगस्त 2019 को कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म किया गया था और कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया था। राज्य से खबरें पहले ही कम आती थीं अब लगभग बंद हो गईं। कोई एक साल बाद जून में गलवान हिन्सा हुई थी। तब एक निजी समाचार एजेंसी ने शुरुआती खबरें दी थीं। क्यों और कैसे यह मेरे लिए अभी भी रहस्य है लेकिन अभी वह मुद्दा नहीं है। उन्हीं दिनों पीटीआई ने भारत में चीनी राजदूत और चीन में भारतीय राजदूत का इंटरव्यू किया था। आपको याद होगा चीनी सेना के इसी घुसपैठ पर प्रधानमंत्री का मशहूर कथन सुना गया था, “&#8230; <a href="https://www.aajtak.in/india/story/narendra-modi-all-parties-meeting-india-china-border-bjp-1086522-2020-06-19" rel="nofollow noopener" target="_blank">न कोई हमारी सीमा में घुसा, न ही पोस्ट किसी के कब्जे में है</a>”। यह 19 जून 2020 की खबर है। उन्हीं दिनों प्रसार भारती के एक अधिकारी ने संवाददाताओं को बताया था, ‘पीटीआई की राष्ट्र-विरोधी रिपोर्टिंग के चलते संबंध जारी रखना संभव नहीं है।’ यह खबर उस समय खूब चर्चित हुई थी। अब उसी चेतावनी को पूरा किया गया है।</p>



<p>द वायर के अनुसार, तब सरकार को लगता था कि चीनी राजदूत का साक्षात्कार नहीं करना चाहिए था जबकि भारतीय राजदूत ने अपने इंटरव्यू में चीनी घुसपैठ पर ऐसी टिप्पणी की थी कि जिससे सरकार को शर्मिंदा होना पड़ा था। यह टिप्पणी प्रधानमंत्री के उस दावे के विपरीत थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी भी भारतीय क्षेत्र के साथ समझौता नहीं किया गया है। <a href="https://indianexpress.com/article/india/prasar-bharati-decides-to-end-subscription-to-pti-uni-6747467/" rel="nofollow noopener" target="_blank">पीटीआई को हटाकर हिन्दुस्तान समाचार एजेंसी की सेवाएं लेना</a> सार्वजनिक प्रसारण को सकारात्मक मीडिया कवरेज के रूप में प्रभावित करने की कोशिश तो है ही भगवा समाचार एजेंसी को फिर से खड़ा करने का प्रयास है जो अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है।</p>



<p>दूसरी ओर, प्रसार भारती ने मुनाफा न कमाने वाले भारतीय समाचार पत्रों के सहकारी समाचार संस्थान <a href="https://indianexpress.com/article/india/prasar-bharati-decides-to-end-subscription-to-pti-uni-6747467/" rel="nofollow noopener" target="_blank">प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की सेवा लेना 2020 से बंद</a> कर दिया था। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, प्रसार भारती के सीईओ गौरव द्विवेदी ने कहा था कि हिन्दुस्तान समाचार के साथ यह कोई नया करार नहीं है और करार पहले से था जिसका इस महीने नवीकरण किया गया है। इसके साथ अखबार ने बताया था कि प्रसार भारती हिन्दुस्तान समाचार से 2017 से ही फीड ले रही थी और करार के लिए वार्ता चल रही थी। प्रसार भारती से करार 2020 में हुआ और इसके तुरंत बाद कोविड महामारी आ गई। लेकिन 2020, 2021 और 2022 में हर साल दो करोड़ रुपए में ठेका दिया गया। कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह उसे पांव जमाने में मदद दी गई। </p>

<figure style="width: 1200px" class="wp-caption alignnone"><img decoding="async" class="size-full" src="https://gumlet.assettype.com/newslaundry%2Fimport%2F2018%2F11%2Fhindustan-samachar.jpg?auto=format%2Ccompress&amp;fit=max&amp;format=webp&amp;w=1200&amp;dpr=1.0" width="1200" height="520" alt="सरकार ने अपने खिलाफ हो सकने वाली खबरों की संभावना खत्म कर दी" title="सरकार ने अपने खिलाफ हो सकने वाली खबरों की संभावना खत्म कर दी 2"><figcaption class="wp-caption-text">Image : Newslaundry</figcaption></figure>

<p>हिन्दुस्तान समाचार को पुनर्जीवित करने की कोशिश करने वाले आरएसएस नेता श्रीकांत जोशी का 2013 में निधन हो गया। इसके बाद, आरएसएस के तत्कालीन सरकार्यवाह सुरेश (भैय्याजी) जोशी ने एजेंसी को मजबूत करने के प्रयास किए। मई 2016 में उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर आयोजित एक सम्मेलन में, एक व्यापक पुनरुद्धार योजना तैयार की गई थी। सम्मेलन में आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व ने भाग लिया, जिसका समापन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। पुनरुद्धार योजना के अनुसार, हिन्दुस्तान समाचार को चलाने के लिए साधन संपन्न व्यक्ति की तलाश शुरू की गई थी। खोज रवींद्र किशोर सिन्हा पर केंद्रित थी, जिन्होंने 10 अप्रैल 2014 से 9 अप्रैल, 2020 तक बिहार से भाजपा के राज्यसभा सांसद के रूप में कार्य किया। <a href="https://hindi.newslaundry.com/2018/11/27/hindusthan-samachar-rss-rk-sinha-ram-bahadur-rai-pti" rel="nofollow noopener" target="_blank">सिन्हा को हिन्दुस्तान समाचार के बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया</a> और उन्होंने अप्रैल तक इस पद पर कार्य किया। 2022, जब उनकी जगह नागपुर के अरविंद मर्डीकर ने ले ली।</p>



<p>दैनिक जागरण की एक खबर के अनुसार, बिहार के <a href="https://www.jagran.com/bihar/patna-city-bjp-mp-rk-sinha-name-also-in-paradise-paper-scam-know-about-his-sis-connection-16988392.html" rel="nofollow noopener" target="_blank">भाजपा सांसद आरके सिन्हा</a> ने 23 साल की उम्र में एक सिक्योरिटी कंपनी शुरू की थी। उनका नाम <a href="https://www.jagran.com/bihar/patna-city-bjp-mp-rk-sinha-name-also-in-paradise-paper-scam-know-about-his-sis-connection-16988392.html" rel="nofollow noopener" target="_blank">पैराडाइज पेपर लीक मामले में</a> आया था। इसमें कई राजनेताओं, बॉलीवुड सितारों समेत 714 भारतीयों का नाम थे। मीडिया वाले जब इस बारे में उनसे  प्रतिक्रिया लेने पहुंची, तो उन्होंने कागज पर लिखकर जवाब दिया था कि वह सात दिनों के मौन व्रत पर हैं। उन्होंने लिखा, &#8220;7 दिन के भागवत यज्ञ के लिए मौन व्रत है।&#8221; न्यूज एजेंसी एएनआई ने इसका एक वीडियो भी शेयर किया था। इसमें सिन्हा पहले इशारे से बता रहे थे कि कुछ नहीं बोलेंगे। इसके बाद वह मीडियाकर्मियों से पेन मांगकर उन्हें लिखकर बता रहे थे कि वह मौन व्रत पर हैं और कुछ भी नहीं बोल सकते। सिन्हा जी की बात चली है तो उनका काम भी जान लीजिए। एसआईएस लिमिटेड नाम की उनकी सुरक्षा एजेंसी कंपनी के वेबसाइट के अनुसार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के कई स्मारकों और कई सरकारी कार्यालयों की सुरक्षा करती है। वेबसाइट का दावा है कि कंपनी ने 2022 में &#8220;10,000 करोड़ रुपये वार्षिक राजस्व का स्तर पार कर लिया&#8221; था।</p>



<p>नई दिल्ली मुख्यालय वाली समाचार एजेंसी की वेबसाइट के अनुसार, इसके 22 समाचार ब्यूरो और 600 संवाददाता देश भर में फैले हुए हैं। समूह संपादक राम बहादुर राय 77 साल के हैं और 2015 के पद्मश्री विजेता है। जो जनसत्ता और नवभारत टाइम्स में काम कर चुके हैं और केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय के तहत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के अध्यक्ष हैं। संपादक जितेंद्र तिवारी हैं, जो पहले संघ परिवार द्वारा संचालित साप्ताहिक पाञ्चजन्य के साथ काम कर चुके हैं। सात सदस्यीय निदेशक मंडल के अध्यक्ष अरविंद मर्डीकर हैं। बोर्ड के अन्य सदस्यों में वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र (86 साल के हैं पहले जनसत्ता में थे और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति रहे हैं),  हिंदी दैनिक देशप्राण के संस्थापक संपादक और रांची एक्सप्रेस के पूर्व संपादक बलबीर दत्त (87 साल के हैं, 2017 में पद्मश्री से सम्मानित); मनमोहन सिंह चावला; बाबा मधोक; और रवींद्र संघवी शामिल हैं। ब्रजेश झा कार्यकारी संपादक हैं।</p>



<p>ऐसी समाचार एजेंसी की सेवा लेने से पहले, 16 अक्तूबर 2020 को यह खबर आई थी कि <a href="https://www.opindia.com/2020/10/prasar-bharti-terminates-association-pti-to-save-rs-10-crores-annually-exclusive-details/" rel="nofollow noopener" target="_blank">प्रसार भारती ने पीटीआई और यूएनआई की सेवा लेना बंद करने का निर्णय किया</a> है। प्रसार भारती की ग्राहकी खत्म होने के बाद पीटीआई तो फिर भी आर्थिक तौर पर ठीक है लेकिन यूएनआई और वार्ता का बुरा हाल है। न्यूजलॉन्ड्री की एक खबर के अनुसार, यूएनआई के स्थायी कर्मचारियों को <a href="https://hindi.newslaundry.com/2022/09/16/uni-news-agency-is-dying-a-slow-death" rel="nofollow noopener" target="_blank">पांच साल से पूरा वेतन नहीं मिला</a> है, कंपनी की संपत्तियां जब्त कर ली गई हैं और एजेंसी के खिलाफ अदालती मामले बढ़ते जा रहे हैं, जिनमें एजेंसी को दिवालिया घोषित करने की याचिका भी शामिल है। यूएनआई के अवसान की यात्रा धीमी रही है। इसके मुख्य कारण हैं 2006 के बाद से सदस्यता में लगातार गिरावट और फायदेमंद संभावित सौदों का सतत आंतरिक प्रतिरोध। लेकिन यूएनआई पर शायद सबसे घातक प्रहार 2020 के अंत में हुआ, जब राष्ट्रीय प्रसारक प्रसार भारती ने एजेंसी छोड़ दी, जिसके कारण इसके मासिक राजस्व में लाखों रुपए की गिरावट आई। फिलहाल यूएनआई के कर्मचारी संघ ने समाचार एजेंसी को दिवालिया घोषित करने की याचिका दायर की है। दूसरी ओर,  हिन्दुस्तान समाचार के अलावा निजी और अपेक्षाकृत छोटी व नई समाचार एजेंसी एएनआई को सरकारी संरक्षण हर जगह दिखता है।</p>



<p>प्रसार भारती का कहना है कि पीटीआई और यूएनआई की सेवा बंद करने का निर्णय वाणिज्यिक कारणों से लिया गया है। अगर इसपर यकीन कर भी लिया जाए तो यह किसी भी तरह से ठीक नहीं है कि पुरानी एजेंसी को मरने दिया जाए, उसके कर्मचारियों को वेतन न मिले पूर्व कर्माचारियों को पेंशन और वाजिब बकाया नहीं मिले और संघ समर्थिच सरकार संघ समर्थित एजेंसी की सेवा ले। इस स्थिति में इस तरक का भी कोई मतलब नहीं है कि 2006 से इन एजेंसियों के साथ कोई &#8220;औपचारिक अनुबंध&#8221; नहीं था। प्रसार भारती के शीर्ष सूत्रों ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि बोर्ड ने अपनी 163वीं बैठक में इस फैसले को मंजूरी दी। बैठक के तुरंत बाद, प्रसार भारती के सीईओ शशि शेखर वेम्पति ने ट्वीट किया: “नई सामग्री के विकास, लंबे समय से लंबित वाणिज्यिक विवादों को हल करने, समाचार एजेंसियों पर खर्च को तर्क संगत बनाने और उपग्रह क्षमता के बेहतर उपयोग के लिए प्रौद्योगिकी निवेश पर आज के कई प्रमुख फैसलों के लिए प्रसार भारती बोर्ड के सदस्यों का धन्यवाद।&#8221;</p>



<p>यहां यह उल्लेखनीय है कि पीटीआई और यूएनआई दोनों के साथ प्रसार भारती के अनुबंध भले ही 2006 में समाप्त हो गए थे और तब से उनका नवीनीकरण नहीं किया गया था लेकिन ग्राहकी तदर्थ तरीके से यथानुपात आधार पर चल रही थी और दिखाया बताया जो जाए, हिन्दुस्तान समाचार को पूरा संरक्षण दिया गया और जब वह इस लायक हो गया तो उसे ठेका दे दिया गया। दूसरे दावेदारों या प्रतिस्पर्धियों की उपेक्षा करके। अधिकारी ने कहा कि प्रसार भारती &#8220;नए व्यवहार्य मूल्य निर्धारण&#8221; पर चर्चा करने के लिए दोनों एजेंसियों के संपर्क में था, लेकिन कुछ नहीं हुया। अब यह तय किया गया है कि &#8220;सभी घरेलू समाचार एजेंसियों से अंग्रेजी पाठ और संबंधित मल्टीमीडिया सेवाओं की डिजिटल ग्राहकी के लिए नए प्रस्ताव मांगे जाएंगे और इसमें पीटीआई और यूएनआई भी भाग ले सकते हैं। मुझे नहीं पता इस संबंध में निर्णय का आधार क्या था और सभी एजेंसियां समान मानी गई या नहीं और समान कैसे थीं। दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो के लिए पीटीआई की सेवा प्रसार भारती ने 2013 से सालाना 9.15 करोड़ रुपये का भुगतान किया है, लेकिन 2017 के बाद से, यह लगभग 25 प्रतिशत वापस ले रहा था क्योंकि यह लागतों पर फिर से बातचीत करना चाहता था। 7 जुलाई को सरकार ने पीटीआई को ऑफिस की भूमि के लिए पट्टे की शर्तों के कथित उल्लंघन के लिए <a href="https://hindi.theprint.in/india/modi-govt-slaps-rs-84-4-cr-fine-on-pti-says-it-hasnt-paid-rent-for-delhi-office-since-1984/154382/" rel="nofollow noopener" target="_blank">84 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान</a> करने के लिए कहा था।</p>



<p>तब सरकार समर्थक माने जाने वाले ऑपइंडिया डॉट कॉम ने अपनी खबर के शीर्षक में  कहा था, पीटीआई से संबंध तोड़ने के प्रसार भारती के निर्णय और हर साल 10 करोड़ रुपए की बचत के पीछे की पूरी कहानी पढ़िये। इस खबर को एक्सक्लूसिव भी कहा गया था। यह खबर प्रसार भारतीय की उस चिट्ठी के हवाले से थी जो पीटीआई को लिखी गई थी। इसमें लगभग वही सब बातें हैं जो इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से या अनाम अधिकारियों के हवाले से कही थी। इस खबर के अनुसार प्रसार भारती 2014 से समाचार एजेंसियों पर होने वाले अपने खर्चे को तर्कसंगत बनाने की कोशिश कर रहा था।</p>
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		<title>आफताब के बहाने संस्कारियों के ‘प्यार’ को भी याद कर लीजिए</title>
		<link>https://theharishchandra.com/hindi/remember-the-love-of-the-cultured-people-on-the-pretext-of-aftab/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 17 Nov 2022 09:33:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
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		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="630" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="The Harishchandra News Image" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-300x158.png 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1024x538.png 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-768x403.png 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-696x365.png 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1068x561.png 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-800x420.png 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-313x164.png 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="आफताब के बहाने संस्कारियों के ‘प्यार’ को भी याद कर लीजिए 4">श्रद्धा और आफताब के बहाने देश को शिक्षा देने वालों की कमी नहीं है। शिक्षा यह होती कि प्रेम करो पर संभल कर, जान बचाना महत्वपूर्ण है, अगर बात न बने तो अलग हो जाओ, अगर कोई व्यवहार बुरा लगा हो और बदला लेने का मन हो, सीख देने की इच्छा हो तो अकेले कोशिश [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1200" height="630" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="The Harishchandra News Image" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image.png 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-300x158.png 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1024x538.png 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-768x403.png 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-696x365.png 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-1068x561.png 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-800x420.png 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/The-Harishchandra-News-Image-313x164.png 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="आफताब के बहाने संस्कारियों के ‘प्यार’ को भी याद कर लीजिए 5">



<p>श्रद्धा और आफताब के बहाने देश को शिक्षा देने वालों की कमी नहीं है। शिक्षा यह होती कि प्रेम करो पर संभल कर, जान बचाना महत्वपूर्ण है, अगर बात न बने तो अलग हो जाओ, अगर कोई व्यवहार बुरा लगा हो और बदला लेने का मन हो, सीख देने की इच्छा हो तो अकेले कोशिश मत करो &#8211; तो बात अलग थी। सीख यह दी जा रही है कि धर्म विशेष के लोग लड़कियों को प्रेम जाल में फंसा कर हत्या कर देते हैं। इसलिए धर्म विशेष के लोगों से बच कर रहो। ऐसे जैसे अपने धर्म के सब लोग संत हैं जबकि सच्चाई यह है कि संत के भेष में कई बलात्कारी जेल में और बाहर भी हैं। </p>



<p>भारत जैसे धर्म निरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश में ऐसी बातें करना कानून का उल्लंघन है और बहुत हाल तक धर्म का नाम इस तरह नहीं लिया जाता था। और तो और, मंदिर मस्जिद की जगह धार्मिक स्थल या पूजा स्थल लिखा जाता था इसी तरह धर्म बताने से बचने के लिए आरोपियों के नाम नहीं लिये जाते थे। अब एक धर्म को नीचा दिखाने और एक को खास बताने के लिए यह सब खुले आम हो रहा है और जान बूझकर एक धर्म और धर्म से जुड़े लोगों को नीचा दिखाया जा रहा है। पुलिस कार्रवाई की बात तो तब होती जब ऐसा कोई एक-दो व्यक्ति अपराधी मानसिकता से करता। </p>



<p>स्थिति यह हो गई है कि समाज का एक बड़ा वर्ग अपने धर्म की बुराइयों या मामलों को भूल कर (या छिपाकर) दूसरे धर्म के लोगों के किसी एक काम के आधार पर पूरे धर्म को दोषी ठहराता है। बिना जाने। उदाहरण के लिए तीन तलाक का मामला ऐसे बदनाम कर दिया गया जैसे हर कोई बड़ी आसानी से तलाक ले लेता है। वहां मेहर की रकम तय होती है और जो तलाक लेता है उसे मेहर की रकम अदा करनी होती है। अपने यहां तो भरपूर दहेज लिया जाता है और किसी बहाने छोड़ दिया जाता है। हत्या कर दिए जाने के भी मामले हैं। लेकिन इस बुराई की चिन्ता उतनी नहीं है जितनी तीन तलाक या एक से ज्यादा विवाह करने की कथित धार्मिक आजादी को है। </p>



<p>अव्वल तो हमारे यहां यह आजादी नहीं है तो भी कई लोग बगैर घोषणा एक से ज्यादा शादी करते हैं। दूसरी ओर, अगर आजादी है तो व्यावहारिक कहां है। ऐसे में मामला धर्म विशेष का नहीं व्यक्ति विशेष का है। लेकिन एक धर्म की बुराइयों को छोड़कर दूसरे धर्म की अच्छाइयों को भी बुरा कहा जा रहा है। उदाहरण के लिए, बच्चा न हो या बेटा न हो तो हमारे यहां दूसरी शादी के मामले सुनने में आते हैं। उसे कोई बुरा भी नहीं कहता। सामाजिक तौर पर तो मनाही नहीं ही है। इसलिए लोग छिप कर करते हैं। अगर एक से ज्यादा विवाह की इजाजत होती तो छिपने की जरूरत नहीं होती। इस लिहाज से यह अच्छाई है भले बहु-विवाह गलत, अनुचित या गैर कानूनी हो। ऐसे में मुद्दा धार्मिक इजाजत से ज्यादा व्यक्ति के व्यवहार का है लेकिन उसकी चिन्ता नहीं की जा रही है। </p>



<p>दूसरी शादी के लिए धर्म बदलने के उदाहरण भी हैं। चंद्रमोहन से चांद मोहन और फिर अनुराधा को फिजा बनाने और तलाक देने तथा पुरानी पत्नी के पास वापस चले आने का भी एक मामला है। कई हिन्दुओं ने एक से ज्यादा शादी की है। हालांकि, पहली को विधिवत छोड़कर दूसरी से शादी की जाए तो वह नैतिक रूप से बहुत बुरा नहीं है पर एक को छोड़े बगैर दूसरी से शादी कर लेना या एक को छोड़कर दूसरी के साथ बिना शादी किए रहना ज्यादा बुरा है। पर सब होता है। बड़े लोगों ने किया है। दुनिया जानती है कि विवाहित और बाल बच्चेदार धर्मेन्द्र ने हेमा मालिनी से शादी करने के लिए 21 अगस्त 1979 को इस्लाम धर्म कबूल कर लिया था। </p>



<p>दूसरी ओर, सुनील दत्त नर्गिस के साथ रहे और शाहरुख खान गौरी के साथ रह रहे हैं लेकिन बात करेंगे आमीर खान की। उस आफताब की नहीं जिससे पीड़ित जसोदाबेन के पास विवाह का प्रमाणपत्र नहीं है और इसलिए उनका पासपोर्ट नहीं बन रहा था। जसोदाबेन के आफताब से किसी ने नहीं कहा कि उनका पासपोर्ट तो बन जाने दो। ऐसी श्रद्धाओं का पासपोर्ट कैसे बने उसकी व्यवस्था भी हो &#8211; इसकी चिन्ता किसी को नहीं है। लोग सीख ऐसे दे रहे हैं जैसे टुकड़ों में काटने का काम सिर्फ आफताब ही करते हैं। बाकी सब दूध के धुले हैं। सच्चाई यह है कि एक का पासपोर्ट मत बनने दो दूसरी लापता हो जाए तो कह दो विदेश चली गई। यह तय करने की कोशिश भी नहीं हुई कि उसे 72 टुकड़े तो नहीं कर दिए गए। तंदूर में जला तो नहीं दिया गया।   </p>



<p>वैसे तो प्रेम में पड़ी महिला की हत्या का मामला कोई नया नहीं है पर धर्म जिहाद जरूर नया है और उसका प्रचार तो सब जानते हैं कब शुरू हुआ। दूसरी ओर, भोपाल के विभा मिश्रा और बव कारंत मामले में (1987) तो सरकार ने सरकारी वकील को भी नाटकीय ढंग से बदल दिया था। और राज्य सरकार ने पांच बार वकील बदले थे। इंडिया टुडे की खबर के अनुसार इससे पता चलता है कि मामले में सरकार भी निर्णय लेने में अक्षम थी। द हिन्दू की एक खबर के अनुसार इंडियन एक्सप्रेस के उस समय के भोपाल संवाददाता ने कहा था कि उनपर हर एंगल से खबर देने का दबाव रहता था ताकि उसे प्रमुखता से छापा जा सके। जो नहीं जानते उन्हें बता दूं कि रंगकर्मी बव कारंत की शिष्या विभा मिश्रा ने आत्महत्या की कोशिश की थी और उसे बचाने में कारंत भी घायल हो गए थे। </p>



<p>श्रद्धा और आफाताब मामले में परेशान लोगों को हाल के उत्तराखंड मामले की जांच की भी चिन्ता नहीं है जहां पुलकित आर्या ने अपने होटल की रिसेप्शनिस्ट की हत्या कर दी थी। यह किसी वीआईपी की सेवा का मामला था और कई बड़े लोग शामिल होंगे। बिहार में एक श्वेतनिशा त्रिवेदी की हत्या हुई थी (1983)। वह बिहार विधान परिषद की सभापति और कांग्रेस नेता राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली हुई बेटी थी। उसकी खूबसूरती को देखकर उसके प्रशंसकों ने उसका नाम राजकपूर की फिल्म बॉबी की नायिका का दे दिया था। कई माननीय उस पर इस कदर लट्टू थे कि अपने भत्ते का पूरा बिल बना उसे सौंप दिया करते थे। उसकी खूबसूरती की वजह से कई राजनेताओं के साथ उसकी घनिष्ठ मित्रता हो गई थी। हत्या या मौत के मामले में कई नेताओं के नाम आए थे पर मामला नहीं सुलझ पाया। यह तो कांग्रेस नेता की गोद ली हुई बेटी का हाल था पर अब बलात्कारियों को बचाने के कई मामले सामने आए हैं। </p>



<p>एक मामला तो कठुआ का ही है। 2018 का यह मामला याद हो तो जानते होंगे कि पुलिस को जांच करने में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। अब तय हुआ है कि आरोपियों में एक, शुभम सांगरा को अवयस्क कहकर उसकी पहचान की रक्षा की गई थी पर वह वयस्क था। बता दें कि वह सभी अभियुक्तों में सबसे क्रूर और बर्बर भी था। यह मुख्य अभियुक्त और पुजारी संजी राम का रिश्तेदार है जिसे दो अन्य, दीपक खजूरिया और प्रवेश कुमार के साथ उम्र कैद हो चुकी है। तीन अन्य &#8211; तिलक राज आनंद, आनंद दत्ता और सुरेन्द्र वर्मा को सबूत नष्ट करने के लिए पांच साल की कैद हुई थी। जब बात चली है तो उन मामलों को भी याद कर लीजिए जो लव जेहाद नहीं हैं और महिला की हत्या से संबंधित हैं और सब उन लोगों ने किए हैं जिन्हें संस्कारी कहा जाता है या साबित करने का अभियान चल रहा है &#8211; </p>



<p>1.नैना साहनी का पति सुशील दिल्ली में पत्नी के शव के टुकड़े जलाते पकड़ा गया था। (1995) </p>



<p>2. आईपीएस के बेटे संतोष ने प्रियदर्शिनी मट्टू की पीछे पड़कर हत्या कर दी थी। (1996)   </p>



<p>3. बार में शराब परोसने से मना करने पर मनु शर्मा ने जेसिका लाल की हत्या कर दी थी। (1999)  </p>



<p>4. नेता के बेटों विकास और विशाल ने बहन के प्रेमी नीतिश को जलाकर मार दिया था। (2002) </p>



<p>5. नोएडा में माता-पिता के घर में रहते आरुषि की हत्या हो गई, मामला नहीं सुलझा  (2008)</p>



<p>6. देहरादून में इंजीनियर राजेश गुलाटी ने पत्नी अनुपमा के 72 टुकड़े कर दिए थे। (2010) </p>



<p>7. एकतरफा प्यार करने वाले मेजर निखिल हांडा ने शैलजा की हत्या कर दी थी। (2018)  </p>



<p>8. इंदौर में हर्ष शर्मा ने कुत्ते की जंजीर से पत्नी अंशु का गला घोंटा। (2020)</p>



<p>9. पति को छोड़कर फिरोज के साथ रहने वाली प्रीति ने फिरोज का गला रेत डाला। (2022) </p>



<p>10. मेरठ के गांव में एक प्रस्ताव स्वीकर नहीं करने पर शिवानी को गोली मार दी। (2022) </p>



<p>11. बाराबंकी में लड़की की पिता ने हत्या कर दी क्योंकि वह फोन पर बात करती थी। (2022) </p>



<p>12. औरैया में चाचाओं ने भतीजी की हत्या कर दी, वह भी किसी से बात करती थी। (2022) </p>



<p>ये कुछ चर्चित मामले हैं और बहुत सारे रह गए हैं। अगर एक या कई लव जिहाद के मामले से लड़कियों को सीख लेनी चाहिए तो इन मामलों के बाद सीख क्या हो?  समाज की जो हालत है उसमें लड़किया पैदा ही न हों या किसी भी उम्र में किसी भी हालत में मार दी जाएं यह बड़ी बात नहीं है। क्योंकि जसोदा बेन जैसी महिलाओं के लिए भी समाज को चिन्ता नहीं है। आफताब मामले में समाज की चिन्ता दरअसल राजनीति है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा और बलात्कारियों को बचाने के कई उदाहरणों के बीच समस्या यह है कि कोई चाहे कि वह बेटी का बाप न बने तो कानूनन वह भी संभव नहीं है।</p>
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		<title>सरकार की मनमानी और नालायकी के इतने उदाहरण काफी है, या अपनी बारी आने के बाद ही पट्टी उतरेगी!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Oct 2022 08:57:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="667" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="देशभक्ति के प्रमाणपत्र की बार-बार माँग क्यों ?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-300x167.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-1024x569.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-768x427.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-696x387.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-1068x594.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-756x420.jpg 756w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-313x174.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="सरकार की मनमानी और नालायकी के इतने उदाहरण काफी है, या अपनी बारी आने के बाद ही पट्टी उतरेगी! 8">इंडियन एक्सप्रेस में शुक्रवार, 14 अक्तूबर को पहले पन्ने पर एक दिलचस्प एंकर था। इसके शीर्षक का हिन्दी अनुवाद कुछ इस तरह होगा &#8211; चपाती नहीं पराठा, अगर आप सस्ती रोटी नहीं खा सकते हैं तो 18% जीएसटी दीजिए। यह सरकारी फैसला है और विरोध के बावजूद सुना दिया गया है। फिलहाल खबर यही है। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1200" height="667" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="देशभक्ति के प्रमाणपत्र की बार-बार माँग क्यों ?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-300x167.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-1024x569.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-768x427.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-696x387.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-1068x594.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-756x420.jpg 756w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/08/PM-modi-15-aug-2022-313x174.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="सरकार की मनमानी और नालायकी के इतने उदाहरण काफी है, या अपनी बारी आने के बाद ही पट्टी उतरेगी! 13"><p>इंडियन एक्सप्रेस में शुक्रवार, 14 अक्तूबर को पहले पन्ने पर एक दिलचस्प एंकर था। इसके शीर्षक का हिन्दी अनुवाद कुछ इस तरह होगा &#8211; चपाती नहीं पराठा, अगर आप सस्ती रोटी नहीं खा सकते हैं तो 18% जीएसटी दीजिए। यह सरकारी फैसला है और विरोध के बावजूद सुना दिया गया है। फिलहाल खबर यही है। वैसे तो जीएसटी की बुनियाद ही दोषपूर्ण है और उसपर मैं पूरी किताब, जीएसटी 100 झंझट लिख चुका हूं पर अब मामला मनमानी का ज्यादा है। इस तथ्य के बावजूद कि ऐसे कई मामले सामने पहले भी आए हैं और लगभग हर बार फैसला जनहित के खिलाफ होता है। अपवाद जीएसटी लागू होने के बाद के विधानसभा चुनावों में गोबरपट्टी में हार और फिर गुजरात विधानसभा चुनाव के समय विरोध का माहौल रहा है जब सरकार ने जीएसटी नियमों में ढील दी। बाकी पूरी मनमानी चल रही है पर अभी मेरा मुद्दा जीएसटी नहीं, इस या डबल इंजन वाली सरकारों की जनविरोधी कार्यशैली है।</p>
<p><figure id="attachment_4137" aria-describedby="caption-attachment-4137" style="width: 680px" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-4137 size-full" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/GST-Book.jpg" alt="सरकार की मनमानी और नालायकी के इतने उदाहरण काफी है, या अपनी बारी आने के बाद ही पट्टी उतरेगी!" width="680" height="450" title="सरकार की मनमानी और नालायकी के इतने उदाहरण काफी है, या अपनी बारी आने के बाद ही पट्टी उतरेगी! 9" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/GST-Book.jpg 680w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/GST-Book-300x199.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/GST-Book-635x420.jpg 635w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/GST-Book-313x207.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 680px) 100vw, 680px" /><figcaption id="caption-attachment-4137" class="wp-caption-text">जीएसटी 100 झंझट, लेखक संजय कुमार सिंह</figcaption></figure></p>
<p>कहने की जरूरत नहीं है कि सामाजिक वैमनस्य बढ़ाने वालों को सरकारी संरक्षण मिल रहा है, बलात्कारियों को छोड़ दिया गया है, अपराधियों की मौज है पर बूढ़े-बुजर्ग-लाचार समाज सेवियों को परेशान किया जा रहा है, <a href="https://www.bbc.com/hindi/social-57721231" rel="nofollow noopener" target="_blank">स्टेन स्वामी</a> तो जेल में ही मर गए। यह सब खुले आम हो रहा है पर अखबारों में खबरें वैसे नहीं छप रही हैं जैसे सब हो रहा है, किया जा रहा है या इन मामलों को अंजाम दिया जा रहा है। घटना के रूप में छपना एक बात है और यह बताना कि ऐसा जान-बूझकर प्रयास करके किया गया है &#8211; में फर्क है और मीडिया अपना यह काम करता नजर नहीं आ रहा है। मैंने ऊपर इंडियन एक्सप्रेस के कल के एंकर का उदाहरण देकर बताया कि जीएसटी के मामले में एकदम मनमानी चल रही है और यह कई कारणों में एक, इसलिए भी अनुचित है कि एक जैसे आयटम पर टैक्स की अलग दरें होना &#8211; टैक्स लेने, जमा करने, बिल बनाने, हिसाब रखने के लिहाज से तो परेशानी वाला है ही दुकानदारों के लिए भी माथापच्ची वाला काम है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://i.ytimg.com/vi/lRlw53dYxVM/hqdefault.jpg" width="480" height="360" alt="सरकार की मनमानी और नालायकी के इतने उदाहरण काफी है, या अपनी बारी आने के बाद ही पट्टी उतरेगी!" title="सरकार की मनमानी और नालायकी के इतने उदाहरण काफी है, या अपनी बारी आने के बाद ही पट्टी उतरेगी! 10"></p>
<p>ऐसी सरकार काम किसके लिए कर रही है और कौन उसे पसंद कर रहा है यह समझना मुश्किल नहीं है। अभी मैं उस विस्तार में भी नहीं जाउंगा पर कहने में कोई संकोच नहीं है कि सरकार की नीयत जनविरोधी और सत्ता से चिपके रहने वाली है। सरकार अपने विरोधियों को चुन-चुन कर अप्रभावी बना रही है और यह लोकतंत्र के लिए बहुत घातक है। स्थिति यह बन गई है कि सरकार को विरोधियों को संरक्षण देकर बताना चाहिए कि इस मामले में कार्रवाई नहीं की जा रही है क्योंकि मामला सरकार विरोधी होने का है और कार्रवाई का मतलब यह लगाया जा सकेगा कि सरकार विरोधी से हिसाब बराबर कर रही है। अभी तो साफ दिख रहा है कि सरकार अपने विरोधियों को येन-केन प्रकारेण जेल में बंद रखना चाहती है और उनकी जमानत भी नहीं होने देती। समर्थकों के मामले में दूसरा रवैया साफ दिखाई देता है। लेकिन यह भी इतना सीधा नहीं है। और ऐसा नहीं लगता है कि सबकुछ नियंत्रण में है और जो हो रहा है वह किया जा रहा है।</p>
<p>कानून व्यवस्था की हालत इसका उदाहरण है और सरकार ने जिस ढंग से अपना काम करने वालों को पद का ईनाम दिया है और पार्टी के नेताओं कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की है वह भी छिपा हुआ नहीं है। मैं उसके विस्तार में भी नहीं जाउंगा क्योंकि उसपर समर्थकों को सोचना चाहिए। लेकिन हालात का पता तो इंडियन एक्सप्रेस के आज के एंकर से लगता है। शीर्षक है, &#8220;मैं भाजपा में हूं, दोनों राज्यों में हमारी सरकारें हैं &#8230; अगर मुझे न्याय नहीं मिलेगा तो किसे मिलेगा?&#8221; आगे बढ़ने से पहले बता दूं कि मामला उत्तराखंड के भाजपा नेता <a href="https://www.amarujala.com/photo-gallery/dehradun/kashipur-firing-case-gurtaj-singh-bhullar-says-i-am-with-bjp-our-govts-in-both-states-if-i-cant-get-justice" rel="nofollow noopener" target="_blank">गुरताज सिंह भुल्लर</a> से संबंधित है। उनकी पत्नी, 32 साल की गुरप्रीत को उत्तर प्रदेश की पुलिस ने उत्तराखंड के भरतपुर स्थित उनके घर में एक छापे के दौरान मार दिया। गुरताज सिंह भुल्लर ने उत्तर प्रदेश सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं और न्याय की बात कर रहे हैं। लेकिन उन्हें कुछ भी मिले, भले लगे कि न्याय हो गया पत्नी वापस नहीं मिल सकती है।</p>
<p>कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा राज में भाजपा नेता के साथ ऐसा हुआ है &#8211; तो सरकार काम किसके लिए कर रही है। बदला लेना, हिसाब चुकाना काम नहीं है। सरकार में बने रहना तो बिल्कुल भी नहीं। लेकिन जो हो रहा है वह इससे ज्यादा नहीं है और मीडिया अगर विज्ञापनों के लिए सरकार की सेवा में है तो गलत है और उनपर ऐसी कोई शर्त है तो इसका विरोध उन्हें भी करना चाहिए। पर वह सब अभी दूर की बात है। सरकार की इस कार्यशैली को समर्थक बुरा न भी मानें तो तथ्य यह है कि सरकार अपनी अक्षमता, अयोग्यता और नालायकी के साथ नोटबंदी और जीएसटी ही नहीं मंदिर बनवाने के प्रयोग का खर्च जनता से वसूल रही है। बदले में जनता को रोजगार या सुकून की जिन्दगी मिल रही होती तो भी लगता कि महंगी है पर है तो। लेकिन सुकून की जिन्दगी तो भाजपा नेताओं की नहीं है उनकी पत्नी घरों में सुरक्षित नहीं हैं। बाकी जिन्हें लिन्च कर दिया जाता है उनकी क्या बात करूं। प्रधानसेवक हैं कि ‘मन की बात’ करते हैं या फिर मौन धारण कर लेते हैं। जनता ने चुना है तो उसे यह सब भुगतना भी चाहिए लेकिन जानना चाहिए कि सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी वसूली तो पूरा कर रही है अपने खर्चों या चंदों या धन जुटाने के प्रयासों में कोई कमी या छूट नहीं दे रही है।</p>
<p><figure id="attachment_4138" aria-describedby="caption-attachment-4138" style="width: 746px" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-4138" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/The-Telegraph.jpg" alt="द टेलीग्राफ का पहला पन्ना" width="746" height="570" title="सरकार की मनमानी और नालायकी के इतने उदाहरण काफी है, या अपनी बारी आने के बाद ही पट्टी उतरेगी! 11" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/The-Telegraph.jpg 746w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/The-Telegraph-300x229.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/The-Telegraph-696x532.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/The-Telegraph-550x420.jpg 550w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/The-Telegraph-80x60.jpg 80w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/The-Telegraph-313x239.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 746px) 100vw, 746px" /><figcaption id="caption-attachment-4138" class="wp-caption-text">गैरकानूनी गतिविधियों को रोकने के लिए बनाए गए कानून का उपयोग ही गैरकानूनी ढंग से हो और शारीरिक रूप से अक्षम, मोदी जी के शब्दों का उपयोग करूं तो दिव्यांग आठ साल जेल में रहे तो खबर कुछ अलग तरह से छपनी चाहिए। वैसे ही जैसे आठ साल वैध मंजूरी के बिना जेल काटने के बाद जमानत पर रिहा 90 प्रतिशत विकलांग प्रो जीएन साइबाबा की जमानत की अर्जी खारिज करवाने के लिए (विधायक खरीद कर बनी) महाराष्ट्र सरकार की अपील अगर अगले दिन सुनवाई के लिए मंजूर हो जाए और पटाखे पर बैन की खबर दीवाली के बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हो तो कुछ खास ट्रीटमेंट मांगती है।</figcaption></figure></p>
<p>बात इतनी ही नहीं है। सरकार की सारी फुर्ती या चुश्ती विरोधियों को थामने में लगी हुई है। आपने पढ़ा होगा कि व्हीलचेयर पर चलने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के बर्खास्त <a href="https://theharishchandra.com/hindi/supreme-court-refuses-to-stay-the-order-of-acquittal-of-gn-saibaba-asks-the-state-to-make-regular-appeals/">प्रोफेसर जीएन साइबाबा</a> को 8 साल से जेल में रखा था और कल मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने गढ़चिरोली की कोर्ट में उनके खिलाफ चली ट्रायल की कार्रवाई को नल एंड वॉयड (बेअसर और बेमतलब) करार दिया है। उनके खिलाफ यूएपीए लगाया गया था पर कार्रवाई के लिए वैध मंजूरी नहीं थी। खबर यह नहीं है कि इसके बावजूद वे पांच साल जेल में रहे। खबर यह है कि महाराष्ट्र सरकार उनके खिलाफ कल ही सक्रिय हो गई और कुछ ही घंटों में <a href="https://theharishchandra.com/hindi/supreme-court-refuses-to-stay-the-order-of-acquittal-of-gn-saibaba-asks-the-state-to-make-regular-appeals/">सुप्रीम कोर्ट</a> में स्टे लेने पहुंच गई। स्टे नहीं मिला तो अपील दाखिल की गई जिसपर आज सुनवाई होनी है। दूसरी ओर, आप जानते हैं कि आम आदमी को अदालत से जमानत मिलने के बावजूद जेल में आदेश की कॉपी नहीं, मूल प्रति दिखानी होती है और कई बार जमानत की शर्तें ऐसी होती हैं कि गरीब अभियुक्त उन्हें पूरा नहीं कर पाता है या शर्ते पूरी करने के लिए कुछ महीने और जेल में रहता है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-4124" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/gnbabasai.jpeg" alt="सरकार की मनमानी और नालायकी के इतने उदाहरण काफी है, या अपनी बारी आने के बाद ही पट्टी उतरेगी!" width="739" height="415" title="सरकार की मनमानी और नालायकी के इतने उदाहरण काफी है, या अपनी बारी आने के बाद ही पट्टी उतरेगी! 12" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/gnbabasai.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/gnbabasai-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/gnbabasai-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/gnbabasai-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" /></p>
<p>एक तरफ प्रो <a href="https://theharishchandra.com/hindi/supreme-court-refuses-to-stay-the-order-of-acquittal-of-gn-saibaba-asks-the-state-to-make-regular-appeals/">जीएन साइबाबा</a> का मामला है जो आतंकवादी हों भी तो कितने सफल और सक्षम हो सकते हैं कि उन्हें लगातार पांच साल जेल में रखा गया दूसरी ओर समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट से लेकर भोपाल से सांसद बनाई गई साध्वी प्रज्ञा का मामला है जो अदातल में लंबित है या जिसे राज्य सरकारों ने ऊपरी अदालत में चुनौती नहीं दी। एक मामले में तो उस समय के केंद्रीय गृहमंत्री ने पहले ही कह दिया था कि अपील करने की जरूरत नहीं है जबकि अदालत ने इस मामले की जांच करने के एनआईए के तरीके की आलोचना की थी और कहा था कि इसमें ढेरों खामियां हैं। विस्तृत फैसले में संदिग्ध जांच, जुगाड़ू सबूत, अभियोजन की कहानी में भारी अंतर, कई वकीलों का मुकर जाना और अभियोजन द्वारा ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहने जैसे कारणों को अभियुक्तों के बरी होने का आधार बताया था। कहने की जरूरत नहीं है कि एक तरफ अगर दक्षिणपंथी आतंकवाद के अभियुक्त को बचा लेने का यह मामला साफ है तो दूसरी ओर प्रो जीएन साइबाबा को जबरन जेल में बंद रखने की कोशिशें छिपी हुई नहीं हैं &#8211; और यह सरकार अगर शौंचालय बनवाने के सिवा (उसके दावे भी संदिग्ध हैं) कुछ कर रही है तो वह यही है।</p>
<p>ऐसी सरकार को मीडिया ही नहीं देश की दूसरी एजेंसियों-संगठनों और प्रचारकों का पूरा समर्थन मिल रहा है। नोटबंदी का मामला सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए मंजूर कर लिया गया है। सरकार की तरफ से दलील दी गई कि मामला पुराना हो गया है सिर्फ अकादमिक महत्व का है। बेशक, सुनवाई के लिए स्वीकार किए जाने के बाद यह बड़ा मामला बन गया है लेकिन मीडिया ने इसे हेडलाइन मैनेजमेंट का हिस्सा बना दिया। लगभग छह साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जांच जरूरी है तो मुख्य शीर्षक यही होना चाहिए था और बताया जाना चाहिए था कि सरकार ने क्या कहा या सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा। पर ऐसा कहने से दूसरा सवाल यही उठता कि जरूरी था तो अब क्यों या इतनी देर बाद क्यों। दूसरी ओर, मीडिया को तो &#8220;सब चंगा सी&#8221; दिखाना है। इसलिए वह बात कहीं नहीं आई, किसी शीर्षक लगाने वाले के दिमाग में नहीं। मैंने 11 अखबार देखे इनमें शाह टाइम्स का शीर्षक बताता है कि मामले में कानूनन कुछ गड़बड़ हो सकती है। दूसरे शीर्षक से ऐसा नहीं लगता है। तथ्य यही है कि विरोधियों को चुन-चुन कर बेअसर करने की रणनीति के बावजूद पी चिदंबरम की दलीलों को माना गया कि नोटबंदी सिर्फ अकादमिक चर्चा का विषय नहीं है।</p>
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		<title>मोदी की चिन्ता देश की चिन्ता कैसे हो जाती है?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 08 Oct 2022 14:31:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/images281229.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="मोदी की चिन्ता देश की चिन्ता कैसे हो जाती है?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/images281229.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/images281229-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/images281229-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/images281229-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="मोदी की चिन्ता देश की चिन्ता कैसे हो जाती है? 14">इस हफ्ते की कई खबरों में एक खबर थी, चुनाव आयोग चाहता है कि पार्टियां चुनावी वायदों का विवरण दें। वैसे तो यह कोई बड़ा मामला नहीं है और प्रधानमंत्री ने रेवड़ी को मुद्दा नहीं बनाया होता तो इस खबर की कोई खास अहमियत नहीं थी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 16 जुलाई को उत्तर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/images281229.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="मोदी की चिन्ता देश की चिन्ता कैसे हो जाती है?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/images281229.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/images281229-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/images281229-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/images281229-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="मोदी की चिन्ता देश की चिन्ता कैसे हो जाती है? 15">



<p>इस हफ्ते की कई खबरों में एक खबर थी, चुनाव आयोग चाहता है कि पार्टियां चुनावी वायदों का विवरण दें। वैसे तो यह कोई बड़ा मामला नहीं है और प्रधानमंत्री ने रेवड़ी को मुद्दा नहीं बनाया होता तो इस खबर की कोई खास अहमियत नहीं थी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 16 जुलाई को उत्तर प्रदेश के जालौन में फोर-लेन बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे का उद्घाटन किया। इसके बाद अपने संबोधन में उन सियासी दलों पर निशाना साधा जिन्होंने मुफ्त की रेवड़ियों का एलान कर वोट लेने का सहारा लिया। पीएम मोदी ने कहा, मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का अभ्यास देश के विकास के लिए हानिकारक है। बेशक, यह प्रधानमंत्री की राय है और हो सकता है वे सही भी हों पर यह देश की चिन्ता कैसे हो गई?</p>



<p>आप कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री की चिन्ता देश की चिन्ता क्यों नहीं होनी चाहिए। आखिर वे देश के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं। मेरा एतराज इसी बात पर है कि वे चुने हुए प्रधानमंत्री हैं। चुना हुआ प्रधानमंत्री चुनने की प्रक्रिया को लेकर क्यों परेशान है? खासकर तब जब वह उसी प्रक्रिया से चुन का आया है और एक प्रधानमंत्री के रूप में उनकी नैतिक जिम्मेदारी है कि वे दूसरे दलों को वही स्थितियां मुहैया करवाएं। इसमें आवश्यक छूट भी है और वे उसका प्रयोग भी करते हैं। फिर क्यों चाहते हैं कि चुनाव वैसे ही हो जैसे वे चाहते हैं। मुफ्त रेवड़ी इसी चिन्ता का हिस्सा है जो खुलकर तो सामने आ गया है पर मीडिया इसे वैसे नहीं बता रहा है जैसे बताना चाहिए या जैसा यह मुद्दा है।<br>प्रधानमंत्री 16 जुलाई को यह मुद्दा उठाते हैं और 5 अक्तूबर के अखबारों में यह चुनाव आयोग की चिन्ता के रूप में छप जाता है। बात इतनी ही नहीं है। अगले ही दिन खबर छपती है कि चुनाव कानूनों में सुधार के लिए सरकार चुनाव आयोग से चर्चा में है। चुनाव आयोग को इसपर सरकार से चर्चा क्यों करनी चाहिए और समय बता रहा है कि चुनाव आयोग इस मामले को लेकर क्यों जल्दबाजी में है। यह सही है कि प्रधानमंत्री की चिन्ता देश की चिन्ता हो सकती है। लेकिन आठ साल के उनके शासन और काम काज ने यह साबित कर दिया है कि प्रधानमंत्री वैसे हैं नहीं जैसा बताया जाता है या वे दिखने की कोशिश करते हैं।</p>



<p>अब तो सबको पता है कि वे चुनाव में वोट लेने के लिए कुछ भी (लगभग) कर सकते हैं और किया है। इसमें झूठ बोलना शामिल है। ऐसे में रेवड़ी पर वे और उनके समर्थक जो बोल रहे हैं उसपर विचार किए जाने की जरूरत है। चुनाव आयोग को यह बात जरूरी लगती है तो वह सभी राजनीतिक दलों, दूसरे स्टेकधारकों आदि से बात करे। जल्दबाजी में नहीं, आराम से। सरकार को भी चुनाव कानून में जरूरी सुधार करना ही है तो दिखाने के लिए ही सही निष्पक्ष तो होना ही चाहिए। पर नहीं, ऐसा कुछ नहीं किया गया है। सरकार अपने तईं, चुनाव आयोग के साथ मिलकर कानून बदलना चाहती है। बदल पाएगी या नहीं वह तो बाद की बात है अभी वह इसे बदलने को लेकर क्यों परेशान है।</p>



<p>प्रधानमंत्री ने रेवड़ी से अपनी परेशानी बताई है। चुनाव लड़ने वालों की परेशानी चुनाव करवाने वाले की परेशानी नहीं हो सकती है। खास कर तब जब और कोई ऐसी मांग नहीं कर रहा है और जो सत्ता में है वही ऐसी मांग करे तो निश्चित रूप से यह सत्ता में होने का गलत लाभ उठाना है। इसलिए, ना सरकार को ऐसी कोई कोशिश करनी चाहिए ना चुनाव आयोग को ऐसे झांसे में आना चाहिए। दोनों हो रहा है। ऐसे में मीडिया का काम था कि वह सबको यह बात बताता पर मीडिया अपने इस काम से काफी समय से अलग चल रहा है और ऐसा वह सरकारी विज्ञापनों के लिए कर रहा है। आम तौर पर इस तरह के आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए पर इस सरकार के मामले में सब खुल्लम-खुल्ला है इसलिए कहा जा रहा है और ना सरकार को शर्म है ना मीडिया को।</p>



<p>दिलचस्प यह है सरकार जिस काम का विरोध करती है, जिसे गलत बता रही है, चुनाव जीतने के लिए खुद वही करती आई है। सरकारी पार्टी की पुरानी घोषणाएं हों या चुनाव आयोग के पुराने फैसले &#8211; कई उदाहरण मिल जाएंगे। फिर भी चुनाव आयोग का ऐसा कहना और सरकार का ऐसा करना दोनों गलत हैं और जब दोनों गलत हैं तो मीडिया का काम है कि सरकार की मनमानी जनता को बताए ताकि जनता वोट देने के समय सरकार की इन मनमानियों का ख्याल रखे पर वह भी नहीं। कहने की जरूरत नहीं है कि मामला दिल्ली में मुफ्त बिजली और पानी देने के वायदे ही नहीं, सचमुच मुफ्त बिजली देने से जुड़ा हुआ है। इसलिए सरकार दिल्ली में दोबारा चुनाव नहीं जीत पाई तो वह इसे मुद्दा बनाना चाहती है।</p>



<p>इसलिए नहीं कि अब ऐसे वादे नहीं किए जा सकें या जनता को रेवड़ी न मिले। अगर सरकार जरूरतमंद को मुफ्त बिजली पानी दे सकती है तो देना ही चाहिए और देना है तो बोलने में क्या दिक्कत होनी चाहिए। लेकिन यह हमारी राय है, हो सकता है कुछ और लोगों की राय अलग हो और हम गलत हों। पर यहां मामला सही गलत होने का तो है ही नहीं। यहां तो चुनाव आयोग का उपयोग करके दूसरों को प्रचार करने से रोकना है क्योंकि सरकारी पार्टी को मालूम है कि नोटबंदी और उसके बाद की स्थितियों में अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण नहीं रह गया है और देर सबेर जनता को मुफ्त पैसे बांटने ही पड़ेंगे। अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस फायदे में रहेगी।</p>



<p>आपको याद होगा कि पिछले चुनाव में कांग्रेस ने हर जरूरतमंद परिवार को 7,000 रुपए महीने देने की एक योजना की घोषणा की थी। लोगों ने उसे पसंद नहीं किया और कांग्रेस चुनाव नहीं जीत पाई। पांच साल में यह साबित होता लग रहा है कि नरेन्द्र मोदी के पास अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने का कोई तरीका नहीं है और नोटबंदी के जो फायदे बताए गए थे वो तो नहीं ही हुए, नुकसान ऊपर से हुआ है। ऐसे में अगर जनता को यह बात समझ में आ गई और चुनाव में कांग्रेस ने अपने पुराने मुद्दे या घोषणा को बनाए रखा तो भाजपा को अच्छी टक्कर मिलेगी। जानकार बताते हैं कि ऐसा करना संभव है और इसका एक ही नुकसान है कि महंगाई बढ़ेगी पर वो तो इस सरकार में वैसे ही बहुत बढ़ गई है। इसलिए सरकार परेशान है और नहीं चाहती है कि कांग्रेस कोई ऐसी व्यावहारिक रेवड़ी योजना लाए कि वह चुनाव जीत जाए।</p>



<p>यहां एक मुद्दा और है, बात कांग्रेस के चुनाव जीतने से ज्यादा भाजपा के हारने की है। साफ है कि राहुल गांधी ना कांग्रेस अध्यक्ष बनने के इच्छुक है ना प्रधानमंत्री बनने की जल्दबाजी में हैं और ना ही यह कोशिश कर रहे हैं कि किसी भी तरह भाजपा हारे और कांग्रेस सत्ता में आए। वे आरएसएस औऱ भाजपा द्वारा किए गए नुकसान की चर्चा करके देश को जागरूक बनाना चाहते हैं और कोशिश कर रहे हैं कि लोग भाजपा का सच जानें उसका समर्थन छोड़ें। भाजपा सत्ता में नहीं रहेगी तो कांग्रेस सत्ता में आए या नहीं उन मामलों की जांच हो पाएगी जो भाजपा के सरकार रहने के कारण नहीं हो पा रही है। इनमें जज लोया की हत्या से लेकर रफाल और पेगासस की खरीद जैसे कई मामले हैं।</p>



<p>कहने की जरूरत नहीं है कि इन मामलों की जांच से सरकार के बड़े लोगों को खतरा है और वे नहीं चाहते हैं कि किसी भी तरह वे सत्ता से हटें और उन मामलों की जांच हो जिनके लिए राहुल गांधी ने कहा था कि चौकीदार चोर है। अब बहुत सारे मामले हैं, सरकार के पास जवाब नहीं है और जनता ने जो उम्मीद की थी वह सब नहीं हुआ। ऐसे में सत्तारूढ़ दल का परेशान होना स्वाभाविक है और वह हर संवैधानिक संस्था को अपने नियंत्रण में लेना चाहती है। राजनीति के लिहाज से आप इसे जायज मानें या जरूरी मीडिया का काम है जनता को सच बताना पर मीडिया वह काम भी नहीं कर रहा है। क्या आपको लगता है कि रेवड़ी मामले में चुनाव आयोग की फुर्ती पर अखबारों का रुख अपेक्षा अनुकूल रहा है?</p>



<p>वैसे भी, बहुमत के नाम पर सरकार संविधान नहीं बदल सकती है और ना चुनाव से संबंधित कायदे कानून। पर इस सरकार के हाल निराले हैं। पहले यह ईवीएम के खिलाफ थी, पार्टी के नेता किताबें लिख रहे थे अब वह मुद्दा ही नहीं है। सरकार के प्रभाव से सुप्रीम कोर्ट भी अछूता नहीं लग रहा है। उसके फैसलों के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। </p>



<p>अगर आप नजर रखते हैं तो समझ भी रहे होंगे पर क्या मीडिया वैसे बता रहा है जैसे बताना चाहिए। उदाहरण के लिए, इंडियन एक्सप्रेस में शनिवार को खबर छपी है कि विधि मंत्री ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर कहा है कि वे अपने उत्तराधिकारी का नाम बताएं। अखबार ने लिखा है और यह उपशीर्षक है कि अगर वे प्रक्रिया के अनुसार सिफारिश करते हैं तो सबसे सीनियर जज न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ को दो साल का कार्यकाल मिलेगा। खबर पढ़ने से लगता है कि भले सब नियमानुसार है पर मामला बिल्कुल सीधा भी नहीं है। </p>



<p>कुछ तो पक रहा है। आखिर इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर छह कॉलम में लीड है और बाकी अखबारों के पहले पन्ने से गायब &#8211; तो कुछ कारण जरूर होगा। हो सकता है समझ में आए या नहीं समझ में आए। पर अखबार क्या करते हैं यह मैं जरूर बताउंगा। अगले हफ्ते नहीं तो फिर कभी। पर ऐसी ही खबरों के लिए पढ़ते रहिए &#8211; पहला पन्ना।</p>
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		<title>प्रक्रिया के इस दुरुपयोग पर क्या कहेंगे मी लॉर्ड!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 11 Jul 2022 11:54:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="749" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="राजद्रोह कानून पर रोक, सरकार का रवैया और अखबार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-300x187.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-1024x639.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-768x479.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-696x434.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-1068x667.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-673x420.jpg 673w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-313x195.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="प्रक्रिया के इस दुरुपयोग पर क्या कहेंगे मी लॉर्ड! 18">गुजरात दंगों पर एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को चुनौती देने वाली जकिया जाफरी ( Zakia Jafri ) की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों बाद हाल में खारिज कर दिया था। एसआईटी की इस रिपोर्ट में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी समेत 63 अन्य अधिकारियों को क्लीन चिट दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1200" height="749" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="राजद्रोह कानून पर रोक, सरकार का रवैया और अखबार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-300x187.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-1024x639.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-768x479.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-696x434.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-1068x667.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-673x420.jpg 673w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-313x195.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="प्रक्रिया के इस दुरुपयोग पर क्या कहेंगे मी लॉर्ड! 21"><p>गुजरात दंगों पर एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को चुनौती देने वाली जकिया जाफरी ( Zakia Jafri ) की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों बाद हाल में खारिज कर दिया था। एसआईटी की इस रिपोर्ट में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी समेत 63 अन्य अधिकारियों को क्लीन चिट दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ याचिका को खारिज किया बल्कि यह भी कहा, अंत में हमें यह गुजरात राज्य के असंतुष्ट अधिकारियों के साथ-साथ अन्य लोगों का एक संयुक्त प्रयास प्रतीत होता है कि ऐसे खुलासों से सनसनी पैदा की जाए, जो उनकी खुद की जानकारी में गलत थे। एसआईटी की गहन जांच के बाद उनके झूठे दावों को उजागर कर दिया गया। वास्तव में, प्रक्रिया के ऐसे दुरुपयोग में शामिल सभी लोगों को कटघरे में खड़ा होना चाहिए और कानून के अनुसार उन पर कार्रवाई होनी चाहिए।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://img-mm.manoramaonline.com/content/dam/mm/mo/news/just-in/images/2022/6/25/teesta-setalvad.jpg" width="1248" height="650" alt="प्रक्रिया के इस दुरुपयोग पर क्या कहेंगे मी लॉर्ड!" title="प्रक्रिया के इस दुरुपयोग पर क्या कहेंगे मी लॉर्ड! 19"></p>
<p>कहने की जरूरत नही है कि कानूनी प्रक्रिया पर यकीन करने वालों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का असर हुआ और तीस्ता सीतलवाड ( Teesta Setalvad ) तथा आरबी कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया। 300 से ज्यादा वकीलों और एक्टिविस्टों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर यह स्पष्ट करने के लिए कहा है कि जकिया जाफरी के फैसले का कोई प्रतिकूल परिणाम नहीं होगा। इस पत्र में तीस्ता सीतलवाड़, पूर्व एडीजीपी आरबी श्रीकुमार और अन्य की गिरफ्तारी पर चिंता व्यक्त की गई है। दूसरी ओर, आप जानते हैं और देख रहे हैं या महसूस किया होगा कि मौके-बेमौके किसी के खिलाफ जांच शुरू होने की खबर आ जाती है। कुछ जांच तो वर्षों से चल रही है।</p>
<p>हाल में चर्चित नेशनल हेराल्ड का मामला इसमें शामिल है। वर्षों पुराने इस मामले में राहुल गांधी से लगातार कई दिन की पूछताछ के बाद सन्नाटा है।</p>
<hr />
<p><em>15 जून 2022 <a href="https://www.aajtak.in/india/news/story/rahul-gandhi-ed-probe-congress-legal-notice-ntc-1482397-2022-06-15" rel="nofollow noopener" target="_blank">आज तक</a> की ख़बर के अनुसार&#8230;</em></p>
<p><em>कांग्रेस नेता राहुल गांधी से ईडी की कई घंटों की पूछताछ हो चुकी है. उस पूछताछ में उनसे नेशनल हेरॉल्ड मामले में कई तरह के सवाल पूछे गए हैं. लेकिन कांग्रेस पार्टी की तरफ से वित्त मंत्री, गृह मंत्री और कानून मंत्री को लीगल नोटिस दे दिया गया है. सवाल पूछा गया है कि आखिर कैसे उन्हें पूछताछ की सारी जानकारी मिल रही है?</em></p>
<p><em>कांग्रेस ने गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और कानून मंत्री किरण रिजिजू को ये नोटिस थमाया है. आरोप लगाया जा रहा है कि उन्हें राहुल गांधी से हो रही पूछताछ की सारी जानकारी मिल रही है.</em></p>
<hr />
<p><em>22 जून <a href="https://hindi.asianetnews.com/national-news/national-herald-case-no-fresh-summon-to-rahul-gandhi-ed-will-interrogate-sonia-gandhi-on-23-june-kpa-rduww5" rel="nofollow noopener" target="_blank">Asianet News</a> की खबर के अनुसार&#8230; </em></p>
<p><em>नेशनल हेराल्ड केस (National Herald Case) को लेकर राहुल गांधी की टेंशन फिलहाल कम हुई है। हालांकि राहुल गांधी को हाल-फिलहाल कोई नया नोटिस नहीं दिया गया है। राहुल गांधी से 21 जून को ED ने करीब 12 घंटे पूछताछ की थी। इससे पहले 20 जून और 13, 14 और 15 जून को भी वे ED में पेश हुए थे।</em></p>
<p><em>माना जा रहा है कि फिलहाल पूछताछ पूरी हुई</em></p>
<p><em>वायनाड (केरल) के कांग्रेस सांसद ने ED कार्यालय में 5 बैठकों में कुल 54 घंटे बिताए और उनसे कई सेशंस में पूछताछ की गई। राहुल गांधी के प्रीवेंशन आफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत उनका बयान दर्ज किए गए। अब उन्हें कोई नया समन जारी नहीं किया गया है। समझा जाता है कि उनसे हाल-फिलहाल पूछताछ समाप्त हो गई है।</em></p>
<hr />
<p>सुप्रीम कोर्ट ने जब मुकदमे की प्रक्रिया को मामला गर्म रखने की कोशिश कहा है तो सरकारी जांच वर्षों चलना किस श्रेणी में आएगा खासकर तब अखबारों में लीक छपवाकर संबंधित पक्ष को बदनाम किया जाता है, पूछताछ और कार्रवाई के नाम पर लोगों को परेशान औऱ गिरफ्तार किया जाता है तथा अंत में कुछ नहीं निकलता है या मामले को ना बंद किया जाता है और ना परिणाम बताया जाता है।</p>
<p>यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता तथा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने जो आरोप लगाए थे वो गलत साबित हुए या अभी तक सच साबित नहीं हुए हैं और ना ही उन्हें सच साबित करने की कोशिश की गई है। कहने का आशय यह है कि प्रक्रिया का दुरुपयोग होता रहता है। अगर आम जनता कर सकती है तो सरकार भी कर सकती है। यह गलत है तो सरकार को भी नहीं करना चाहिए। आपको याद होगा सराकीर संरक्षण और सुविधाओं से मंत्रियों को ट्रस्टी बनाकर चलने वाले ट्रस्ट, पीएम केयर्स पर सवाल उठे, चीनी कंपनियों से चंदे का मामला आया तो सरकार ने जवाब देने की बजाय राजीव गांधी फाउंडेशन का मामला सामने कर दिया।</p>
<p>राजनीतिक मुकाबले के लिए जांच कराने में कोई बुराई नहीं है। पर वह बदनाम करने के लिए नहीं होना चाहिए और बदनाम भी तब किया जाए जब गड़बड़ी साबित हो जाए। पर देखा जा रहा है कि कार्रवाई ही बदनाम करने और डराने के लिए की जा रही है। और ऐसे एक-दो नहीं, सैकड़ों मामले हैं। वैसे तो इसमें कोई बुराई नहीं है पर दो साल हो गए, पीएम केयर्स आरटीआई और सवालों से परे हो गया। लेकिन राजीव गांधी फाउंडेशन ( Rajiv Gandhi Foundation ) पर जो आरोप लगाए गए थे उनका जवाब नहीं मिला। जांच पूरी हुई कि नहीं, चल रही है कुछ और मिला या नहीं मिला &#8211; कोई खबर नहीं है। आपको याद दिलाने के लिए उस समय की कुछ सुर्खियां पेश कर रहा हूं।</p>
<ol>
<li>राजीव गांधी फाउंडेशन-ट्रस्ट में मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप, होगी जांच (आजतक, 8 जुलाई 2020)</li>
<li>राजीव गांधी फाउंडेशन समेत गांधी परिवार के तीन ट्रस्ट सरकार के निशाने पर, फंडिंग की होगी जांच, (अमर उजाला, 26 जून 2020)</li>
<li>राजीव गांधी फाउंडेशन समेत तीन ट्रस्ट को मिले फंड की होगी जांच, गृह मंत्रालय ने बनाई समिति (अमर उजाला, 23 जुलाई 2020)</li>
<li>राजीव गांधी फाउंडेशन समेत तीन ट्रस्ट को मिले फंड की होगी जांच, गृह मंत्रालय ने बनाई समिति (आज तक, 08 जुलाई 2020)</li>
<li>क्या है राजीव गांधी फाउंडेशन? चीन से चंदे को लेकर मचा है हंगामा, पीएम राहत कोष से पैसा ट्रांसफर करने का भी आरोप, (लाइव हिन्दुस्तान, 27 जून 2020)</li>
</ol>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://scontent-bom1-2.xx.fbcdn.net/v/t39.30808-6/293010479_5701970849836443_2816081483614044031_n.jpg?_nc_cat=100&amp;ccb=1-7&amp;_nc_sid=dbeb18&amp;_nc_ohc=IOfY_0U_XJMAX_Kj2-Z&amp;_nc_ht=scontent-bom1-2.xx&amp;oh=00_AT-TfOKVCUjkv-ciY0OtM5DfS8q2of8WF-gtqpSZwH5M-g&amp;oe=62D176A0" width="1024" height="797" alt="प्रक्रिया के इस दुरुपयोग पर क्या कहेंगे मी लॉर्ड!" title="प्रक्रिया के इस दुरुपयोग पर क्या कहेंगे मी लॉर्ड! 20"></p>
<p>कहने की जरूरत नहीं है कि जो खबरें छपीं या छपवाई गईं वह कई गुना ज्यादा है। आज जांच या कार्रवाई का विवरण ढूंढ़ते हुए इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर मिली इसके अनुसार राजीव गांधी फाउंडेशन और राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट ( Rajiv Gandhi Charitable Trust )  को दान देने वालों में गेट्स फाउंडेशन ( Gates Foundation ), अमेरिकी आधार वाले ट्रस्ट आदि हैं। मुझे किसी गड़बड़ी की कोई सूचना नहीं मिली और अखबार ने लिखा है कि फाउंडेशन के अधिकारी ने संपर्क करने पर कहा कि मैं इस मामले में कुछ खास नहीं कहना चाहता हूं। हमारे खाते साफ-सुथरे हैं। सब कुछ घोषित है। सरकारी कार्रवाई राजनीतिक एजंडा है और कुछ नहीं। फाउंडेशन और ट्रस्ट की स्थापना क्रम से 1991 और 2002 में हुई थी और दोनों के कार्य, उद्देश्य व स्थिति पीएम केयर्स से अलग हैं।</p>
<p>साफ है कि पीएम केयर्स ( PM CARES Fund ) पर आरोप लगा तो इनका नाम लेकर सरकार ने पीएम केयर्स को बचा लिया और यह वही सरकार है जो आम आदमी को विदेशी चंदा लेने में पर्याप्त रोड़े अटकाती है और खुद विदेशी चंदे लेकर बैठ गई जनता बेहाल है। अब इस पैसे का जो उपयोग हो, जरूरत पर जनता के काम नहीं आया इसमें कोई दो राय नहीं है और ना ऐसा कहा जा सकता है कि जनता को सारी सुविधाएं उपलब्ध थीं, पैसों की कोई जरूरत नहीं थी।</p>
<p><span style="color: #808080;"><em>Disclaimer: यह लेख मूल रूप से <strong>संजय कुमार सिंह</strong> के फेसबुक वॉल पर प्रकाशित हुआ है। इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। किसी भी विवाद के लिए द हरिशचंद्र उत्तरदायी नहीं होगा।</em></span></p>
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		<title>प्रधानसेवक चाहते हैं कि ना कोई सवाल करे ना सवाल करने लायक रहे</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 Jul 2022 09:25:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[आंदोलन]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="764" height="401" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="निर्वाचन आयोग की गतिविधियां संदिग्ध कौन करे निगरानी ?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection.jpeg 764w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-300x157.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-696x365.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-313x164.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 764px) 100vw, 764px" title="प्रधानसेवक चाहते हैं कि ना कोई सवाल करे ना सवाल करने लायक रहे 22">इन दिनों देश में जिसकी लाठी उसकी भैंस और सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का &#8211; जैसे पुराने कहावतों के ढेरों उदाहण मिल जाएंगे। सब खुलेआम बिखरे-फैले पड़े हैं। उसपर ट्वीटर ने केंद्र सरकार पर मुकदमा करके सारे मामले को सार्वजनिक कर दिया है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज इस खबर को पहले पन्ने पर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="764" height="401" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="निर्वाचन आयोग की गतिविधियां संदिग्ध कौन करे निगरानी ?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection.jpeg 764w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-300x157.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-696x365.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-313x164.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 764px) 100vw, 764px" title="प्रधानसेवक चाहते हैं कि ना कोई सवाल करे ना सवाल करने लायक रहे 23"><p>इन दिनों देश में जिसकी लाठी उसकी भैंस और सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का &#8211; जैसे पुराने कहावतों के ढेरों उदाहण मिल जाएंगे। सब खुलेआम बिखरे-फैले पड़े हैं। उसपर ट्वीटर ने केंद्र सरकार पर मुकदमा करके सारे मामले को सार्वजनिक कर दिया है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज इस खबर को पहले पन्ने पर छापकर रही सही कसर पूरी कर दी है।</p>
<p>केंद्र सरकार पर सत्ता के दुरुपयोग का आरोप है। इस मामले में केंद्र सरकार का पक्ष चाहे जो हो तथ्य यह है कि 2021 में केंद्र सरकार चाहती थी कि उस समय चल रहे किसान आंदोलन से संबंधित ट्वीटर पोस्ट हटाए जाएं। ट्वीटर ने ज्यादातर मामलों में आदेश माने भी पर कई मामलों में कार्रवाई नहीं की खासकर राजनेताओं और मीडिया वालों के मामले में। आप जानते हैं कि किसान आंदोलन को कुचलने की हर संभव कोशिश हुई, मीडिया वालों को परेशान किया गया और अंत में सरकार ने कानून वापस ले लिया और प्रधानमंत्री ने तब कहा था कि शायद तपस्या में कोई कमी रह गई होगी।</p>
<p>यह सब उदाहरण है जो बताता है कि प्रशासन के मामले में सरकार के हाथ कितने तंग हैं और फैसले कैसे होते हैं तथा जनता को सूचना पहुंचने देने से रोकने के हर उपाय सरकार करती है, गलत सूचना देने का अलग तंत्र है जो निर्बाध काम करता है और सरकार उसके लिए आजादी भी चाहती है। ऐसी हालत में सरकार पर पेगासस स्पाईवेयर खरीदने और नागरिकों के खिलाफ उपयोग करने के भी आरोप हैं। ट्वीटर का कहना है कि कुछ सामग्री को ब्लॉक करने की सरकार की मांग उसकी राय में अभिव्यक्ति की आजादी के उल्लंघन का मामला है और संबंधित कानून से संबंध होने का कोई आधार नहीं है।</p>
<p>स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री चाहते हैं कि ना कोई सवाल करे और ना सवाल करने लायक रहे। सोशल मीडिया के दुरुपयोग या अपने पक्ष में उपयोग का मामला अब पुराना हो गया। सोशल मीडिया पर विरोध रोकने की हर संभव कोशिश चल रही है और यह शायद अंतिम बाधा है जो सरकार फतह कर ले तो चुनाव हो या नहीं, देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर लिया जाए कोई क्या कर लेगा। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि विदेशी चंदे से एनजीओ चलाने वाले कुछ लोग सरकार के खिलाफ बोल पाते तो चंदे पर रोक पहले लग चुकी है। उसका असर देश की आर्थिक स्थिति, रोजगार के मौकों पर जरूर पड़ रहा होगा लेकिन उसकी परवाह किसी को नहीं है।</p>
<p>आखिर एनजीओ चलाने वाले और उसमें नौकरी करने वाले भी तो बेरोजगार हुए होंगे। अगर पीएम केयर्स से उन्हें दान के बराबर पैसा मिल जाता तो सरकारी नियंत्रण भी रहता और काम भी होता लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं किया गया है। कहने की जरूरत नहीं है कि देश में बहुत सारे एनजीओ सरकार के कामकाज पर नजर रखते हैं। कायदे से इन्हें हर संभव संरक्षण और सुविधाएं मिलनी चाहिए और तब उनके मीडिया की तरह शरणागत होने का डर रहेगा पर एनजीओ के मामले में ऐसा नहीं करके उनकी आय के स्रोत बंद कर दिए जाने का मतलब आप समझ सकते हैं।</p>
<p>आप जानते हैं कि इस समय देश में सरकार का मतलब प्रधानमंत्री ही है। लगभग सारा काम उन्हीं की मर्जी, इच्छा, आदेश और विवेक से होता दिख रहा है। उसमें बहुत सारे संस्थाओं में उन्होंने अपनी पसंद के व्यक्ति या समर्थक को बैठा दिया है उसका असर भी हो रहा है। मीडिया इसमें शामिल है। फेसबुक के संबंध में औरोप और शिकायत पहले आ चुकी है। ट्वीटर के मामले में भी चर्चा चलती रही है। ऐसे समय में ट्वीटर ने सरकार के खिलाफ जाकर जनता का भला करने की हिम्मत दिखाई है। ऐसे समय में जब सरकार के खिलाफ होने पर बिना कारण बताए अंतिम समय में विमान पर सवार होने या विदेश जाने से रोक दिया जाए सरकार का विरोध कैसे होगा उससे कौन पूछेगा कि लोकतंत्र का पालन क्यों नहीं हो रहा है।</p>
<p>दूसरी ओर, धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने वाली चार साल पुरानी पोस्ट के लिए अल्ट न्यूज के संस्थापक और खबरों की सच्चाई जांचने वाले मोहम्मद जुबैर को जेल में डालने और उसपर नए आरोप लगाने के साथ यह भी सच और सर्वविदित है कि सोशल मीडिया पर चर्चित कई मामलों में कार्रवाई नहीं हुई है और अंतरराष्ट्रीय दबाव में भाजपा की अधिकृत प्रवक्ता के खिलाफ यही कार्रवाई हुई कि उसे फ्रिंज एलीमेंट कह दिया गया और पार्टी से निकालने का एलान कर दिया गया।</p>
<p>ऐसे मामलों में आम लोगों के खिलाफ जो कार्रवाई होती है वह तो भाजपा समर्थकों के खिलाफ नहीं ही होती है भाजपा नेताओं के बयान भी बदल जाते हैं और कार्रवाई भी बचाने वाली होती है। जुबैर को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया और दिल्ली बैगलोर सहारनपुर घुमा रही है। दिल्ली पुलिस ने बंगलौर से दिशा रवि को गिरफ्तार किया था लेकिन छत्तीसगढ़ की पुलिस नोएडा / गाजियाबाद से प्रचारक एंकर को गिरफ्तार नहीं कर पाई। भाजपा समर्थक नेता के मामले में पहले भी ऐसा हुआ है जब पुलिस अभियुक्त को दूसरे राज्य की पुलिस के कब्जे से छुड़ा लाई।</p>
<p>एंकर के ताजा मामले में चर्चा है कि पुलिस गिरफ्तार करने पहुंची तो उसके संस्थान ने नोएडा में ही एफआईआर लिखवा दी और नोएडा पुलिस ने गिरफ्तार कर जमानत पर छोड़ दिया। इसे पुलिसिया चाल मानने वाले लोग भी हैं पर वह अलग मुद्दा है। इन उदाहरणों से पता चल रहा है कि कानून व्यवस्था के मामले में पुलिस की कार्रवाई निष्पक्ष या जरूरत के अनुसार नहीं है और इसमें केंद्र व राज्य सरकारों का दबाव है। राज्यों की पुलिस वहां की सरकार की सेना की तरह काम कर रही है। यह स्थिति अच्छी नहीं है और बहुत आशंका है कि भिन्न वर्गों और समूहों में झगड़ा हो जाए और पुलिस संभाल न पाए या भागीदार बन जाए।</p>
<p>देखते रहिए आगे-आगे होता है क्या, नामुमकिन मुमकिन है। ईडी, सीबीआई के बल पर विरोधियों को काबू में रखना और धन बल से विधायक खरीदना तो पहले भी संभव था अब कुछ नया और अलग देखिये। जुबैर को बिना मामला नियंत्रित करना इसी लिए जरूरी है।</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>सरकार झूठ बोलती रही है या उसे गलत सूचना दी जाती रही?</title>
		<link>https://theharishchandra.com/hindi/the-government-has-been-lying-or-has-been-given-wrong-information/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 15 May 2022 09:13:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="650" height="400" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/wheat-export-bans.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सरकार झूठ बोलती रही है या उसे गलत सूचना दी जाती रही? गेहूं के निर्यात पर रोक और गोदी मीडिया का प्रचार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/wheat-export-bans.jpg 650w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/wheat-export-bans-300x185.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/wheat-export-bans-356x220.jpg 356w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/wheat-export-bans-313x193.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 650px) 100vw, 650px" title="सरकार झूठ बोलती रही है या उसे गलत सूचना दी जाती रही? 25">आप जानते हैं कि केंद्र सरकार ने गेहूं के निर्यात पर अचानक रोक लगा दी है। इसका कारण यह बताया जा रहा है कि देश में गेहूं की कीमत बढ़ रही थी इसलिए निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है क्योंकि खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है (इंडियन एक्सप्रेस)। कल सोशल मीडिया पर कुछ पुरानी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="650" height="400" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/wheat-export-bans.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सरकार झूठ बोलती रही है या उसे गलत सूचना दी जाती रही? गेहूं के निर्यात पर रोक और गोदी मीडिया का प्रचार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/wheat-export-bans.jpg 650w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/wheat-export-bans-300x185.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/wheat-export-bans-356x220.jpg 356w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/wheat-export-bans-313x193.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 650px) 100vw, 650px" title="सरकार झूठ बोलती रही है या उसे गलत सूचना दी जाती रही? 27"><p>आप जानते हैं कि केंद्र सरकार ने गेहूं के निर्यात पर अचानक रोक लगा दी है। इसका कारण यह बताया जा रहा है कि देश में गेहूं की कीमत बढ़ रही थी इसलिए निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है क्योंकि खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है (इंडियन एक्सप्रेस)। कल सोशल मीडिया पर कुछ पुरानी खबरों का उल्लेख कर बताया जा रहा था कि सरकार ने अचानक <a href="https://pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=1825455" rel="nofollow noopener" target="_blank">गेहूं के निर्यात पर रोक</a> लगाने से पहले यह भी कहा (और अखबारों ने प्रचारकों की तरह छापा) था कि गेंहूं का निर्यात बढ़ाने के लिए भारत नौ देशों में निर्यात प्रतिनिधिमंडल भेजेगा।</p>
<p>किसी एक अखबार का नाम क्या लूं, <a href="https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1824862" rel="nofollow noopener" target="_blank">सरकारी विज्ञप्ति</a> पढ़िये, केंद्र सरकार, भारत से <a href="https://pib.gov.in/PressReleaseIframePage.aspx?PRID=1824862" rel="nofollow noopener" target="_blank">गेहूं निर्यात को बढ़ावा देने</a> की संभावनाएं तलाशने के लिए मोरक्को, ट्यूनिशिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, थाईलैंड, वियतनाम, टर्की, अलजीरिया तथा लेबनान में व्यापार प्रतिनिधिमंडल भेजेगी। भारत ने वैश्विक रूप से अनाज की बढ़ती मांग के बीच वित्त वर्ष 2022-23 में रिकॉर्ड 10 मिलियन टन गेहूं का लक्ष्य निर्धारित किया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने पहले ही रेलवे, जहाजरानी तथा वाणिज्य मंत्रालयों सहित विभिन्न मंत्रालयों के प्रतिनिधियों के साथ तथा कृषि प्रसंस्‍कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) के तत्वाधान में गेहूं निर्यात पर एक कार्य बल का गठन कर लिया है। जाहिर है, सरकार को वास्तविकता का कोई अनुमान नहीं था। और प्रधानमंत्री से लेकर अधिकारी तक कुछ भी बोले जा रहे थे।</p>
<p>12 मई के शाम 4:50 की विज्ञप्ति में कहा गया था, “वैश्विक बाजार में भारतीय गेहूं की मांग में बढोतरी लगातार जारी है, जिसे देखते हुए किसानों, व्यापारियों तथा निर्यातकों को आयातक देशों के सभी गुणवत्ता मापदंडों का अनुसरण करने का सुझाव दिया गया है जिससे कि भारत वैश्विक स्‍तर पर गेहूं का एक भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर कर सामने आए।” और 14 मई को निर्यात पर रोक लग गई। इससे पहले 05 मई को रात रात 8:43 पर पीआईबी की ही विज्ञप्ति में कहा गया था, प्रधानमंत्री ने गेहूं की आपूर्ति, स्टॉक और निर्यात की स्थिति की समीक्षा के लिए आयोजित बैठक की अध्यक्षता की। इस विज्ञप्ति में बताया गया है, “प्रधानमंत्री को विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत प्रस्तुति दी गई। उन्हें फसल उत्पादन पर मार्च-अप्रैल, 2022 के महीनों में उच्च तापमान के प्रभाव के बारे में जानकारी दी गई। गेहूं की सरकारी खरीद और निर्यात की स्थिति की भी समीक्षा की गई।”</p>
<p>इसी में आगे कहा गया है, भारत के कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए, प्रधानमंत्री ने निर्देश दिया कि गुणवत्ता नियमों और मानकों को सुनिश्चित करने के लिए सभी कदम उठाए जाएं, ताकि भारत खाद्यान्न और अन्य कृषि उत्पादों के एक निश्चित स्रोत के रूप में उभर सके। उन्होंने अधिकारियों से किसानों को अधिक से अधिक मदद सुनिश्चित करने के लिए भी कहा। पीएम को मौजूदा बाजार दरों के बारे में भी बताया गया, जो किसानों के लिए फायदेमंद हैं। इस आधार पर बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी खबर का शीर्षक था (अनुवाद मेरा), &#8220;सुनिश्चित कीजिए कि भारत दुनिया के लिए अच्छे अनाज का स्रोत बने।&#8221; जारी विज्ञप्ति के आधार पर कहा जा सकता है कि बैठक का वास्तविकता से कोई संबंध नहीं था और जो हुआ वही बताया गया है तो बैठक बेमतलब रही। उसमें से सही सूचनाएं गायब थीं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="http://cdn.zeebiz.com/hindi/sites/default/files/styles/zeebiz_850x478/public/2022/04/08/81857-wheat-export.jpg?itok=ZqRPPccA" width="850" height="478" alt="सरकार झूठ बोलती रही है या उसे गलत सूचना दी जाती रही?" title="सरकार झूठ बोलती रही है या उसे गलत सूचना दी जाती रही? 26"></p>
<p>बात इतनी ही नहीं है 12 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने कहा था, “<a href="https://www.aajtak.in/india/gujarat/story/prime-minister-narendra-modi-food-grains-feed-world-give-wto-permission-joe-biden-gujarat-news-ntc-1445029-2022-04-12" rel="nofollow noopener" target="_blank">डब्ल्यूटीओ इजाजत दे तो दुनिया को खिला सकते हैं</a>।” अब कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री सुनी-सुनाई बातों पर डींग हांक रहे थे। और अब वास्तविकता भी नहीं बताएंगे। ना प्रेस कांफ्रेंस में ना ‘मन की बात’ में। आजतक डॉट इन की खबर के अनुसार, “प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैंने राष्ट्रपति जो बाइडेन से हुई चर्चा के दौरान कहा था कि अगर विश्व व्यापार संगठन हमें अनुमति दे तो <a href="https://www.aajtak.in/india/gujarat/story/prime-minister-narendra-modi-food-grains-feed-world-give-wto-permission-joe-biden-gujarat-news-ntc-1445029-2022-04-12" rel="nofollow noopener" target="_blank">भारत में अनाज के इतने भंडार हैं कि हम उससे पूरी दुनिया का पेट भर सकते हैं</a>। हमें परमिशन मिले तो हम अपने अनाज को पूरी दुनिया में भेज सकते हैं। मां अन्नपूर्णा के आशीर्वाद से हमारे यहां अनाज के भंडार भरे हुए हैं।” यह प्रधानमंत्री का प्रचारक होना नहीं है। यह देशद्रोह नहीं है? कौन कर रहा है या करवा रहा है?</p>
<p>अगर मामला इतना ही होता तो शायद फिर भी चलता। 3 मई की द वायर की खबर है, “भारत में गेहूं की पैदावार 2022 में कम होने की आशंका है। लगातार पांच वर्षों तक रिकार्ड पैदावार के बाद इस बार मार्च के मध्य में अचानक तापमान बढ़ने के कारण फसल की पैदावार कम होने की आशंका है। इस कमी से भारत को निर्यात रोकना पड़ सकता है।” इस खबर पर अधिकारियों ने कहा कि भारत ऐसा नहीं करने वाला है। पैदावार खराब होने पर भी भारत इस वित्त वर्ष में आसानी से आठ मिलियन टन गेहूं निर्यात कर सकता है। हालांकि, रोक की गुंजाइश तब भी रखी गई थी। इसी खबर में कहा गया है, विदेश माल भेजने में अनअपेक्षित वृद्धि की स्थिति में ही सरकार निर्यात पर पाबंधी के संबंध में सोचेगी। इस मामले में वास्तविकता क्या है? कोई बताएगा? कभी पता चलेगा?</p>
<p>आपदा में अवसर मार्च में दिखा था। 9 मार्च की बीबीसी की खबर है, रूस यूक्रेन संकट: पीएम मोदी गेहूं निर्यातकों से &#8216;आपदा में अवसर&#8217; तलाशने की बात क्यों कर रहे हैं? इसमें कहा गया था, &#8230;.आपदा की इस घड़ी में प्रधानमंत्री मोदी ने गेहूं के निर्यातकों से ख़ास अपील की है। मंगलवार को बजट से जुड़े एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, &#8220;इन दिनों दुनिया में भारत के गेहूं की तरफ़ आकर्षण बढ़ने की ख़बरें आ रही हैं। क्या हमारे गेहूं के निर्यातकों का ध्यान इस तरफ़ है? भारत के फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन का ध्यान इस तरफ़ है क्या?&#8221; इससे पहले 06 मार्च को लाइव हिन्दुस्तान की खबर थी, “अफगानिस्तान को 2000 टन गेहूं भेजेगा भारत, पाकिस्तान ने तालिबान को दिया था सड़ा हुआ अनाज।”</p>
<p>कहने की जरूरत नहीं है कि गेहूं के निर्यात का पूरा मामला हवा हवाई था। सरकार जानबूझकर या मिल रही गलत सूचनाओं के प्रभाव में गलत जानकारी दे रही थी और प्रचारक मीडिया आंख मूंद कर प्रचारित किए जा रहा था। यहां तक कि रोक लगने के बाद भी प्रचार ही कर रहा है। आज ज्यादातर अखबारों में रोक की खबर ऐसे दी गई है जैसे सरकार ने बहुत जरूरी और बड़ा काम किया है। इसमें पुरानी खबरों की चर्चा नहीं के बराबर है। जबकि अचानक निर्यात रोक देने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रिया हुई है और भारत में कहा जा रहा था कि डॉलर की कीमत बढ़ने का फायदा निर्यातकों को होगा और हुआ यह कि (गेहूं का) निर्यात ही रोक दिया गया।</p>
<p>आज के अखबारों में शीर्षक इस प्रकार हैं</p>
<ol>
<li>देश में कीमतें बढ़ीं तो गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया &#8211; हिन्दुस्तान टाइम्स</li>
<li>पैदावार कम होने के नए अनुमान के बाद सरकार ने गेहूं के निर्यात पर रोक लगाई, कहा खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है &#8211; इंडियन एक्सप्रेस</li>
</ol>
<p>3.कीमतें कम करने के लिए केंद्र ने गेहूं के निर्यात पर रोक लगाई &#8211; टाइम्स ऑफ इंडिया</p>
<ol start="4">
<li>भारत सरकार ने गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया &#8211; द हिन्दू सिंगल कॉलम</li>
<li>भारत ने गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया &#8211; द टेलीग्राफ (बिजनेस पेज पर लीड छह कॉलम में)</li>
</ol>
<p>सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने पर छह कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ छपी मूल खबर के साथ छपी दूसरी खबर में बताया है कि (मोटे तौर पर) यह जानी-पहचानी प्रतिक्रिया है और ये होना ही था। अखबार ने इसके साथ बताया है कि सरकार और क्या कर सकती थी। हालांकि यहां भी यह नहीं बताया गया है कि गेहूं के निर्यात और दुनिया को खिलाने के नाम पर भारत और मुख्य़ रूप से प्रधानमंत्री हवा में तलवार भांज रहे थे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने जी7 देशों की प्रतिक्रिया मूल खबर के साथ छापी है जो पहले पन्ने पर टॉप के दो कॉलम की मूल खबर के साथ सिंगल कॉलम में है।</p>
]]></content:encoded>
					
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		<title>राजद्रोह कानून पर रोक, सरकार का रवैया और अखबार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 May 2022 10:57:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="749" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="राजद्रोह कानून पर रोक, सरकार का रवैया और अखबार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-300x187.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-1024x639.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-768x479.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-696x434.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-1068x667.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-673x420.jpg 673w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-313x195.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="राजद्रोह कानून पर रोक, सरकार का रवैया और अखबार 28">आज के अखबारों में राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई की खबर लीड है। इसके साथ केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू की एक टिप्पणी भी अलग-अलग शीर्षक से छपी है। इसमें वे कहते हैं कि किसी को भी लक्ष्मण रेखा पार नहीं करनी चाहिए। द हिन्दू की खबर के अनुसार, &#8230; अदालतों को सरकार [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1200" height="749" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="राजद्रोह कानून पर रोक, सरकार का रवैया और अखबार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-300x187.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-1024x639.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-768x479.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-696x434.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-1068x667.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-673x420.jpg 673w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/05/supreme-court-313x195.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="राजद्रोह कानून पर रोक, सरकार का रवैया और अखबार 29"><p>आज के अखबारों में राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई की खबर लीड है। इसके साथ केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू की एक टिप्पणी भी अलग-अलग शीर्षक से छपी है। इसमें वे कहते हैं कि किसी को भी लक्ष्मण रेखा पार नहीं करनी चाहिए। द हिन्दू की खबर के अनुसार, &#8230; अदालतों को सरकार और विधायिका का सम्मान करना चाहिए वैसे ही जैसे सरकार कोर्ट का करती है।</p>
<p>रिज्जू के इस दावे के साथ दि हिन्दू ने बताया है कि नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय दंड संहिता की इस धारा 124ए के तहत 2015 से 2020 के पांच वर्षों में 356 मामले दर्ज हुए और 548 लोगों को गिरफ्तार किया गया। पर सिर्फ छह जनों को सजा हुए।</p>
<p>अखबार ने इसके कुछ उदाहरण दिए हैं</p>
<ol>
<li>जनवरी 2020 में बच्चों के एक नाटक को लेकर स्कूल पर राजद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया गया था।</li>
<li>बैंगलोर में रहने वाली, पर्यावरण कार्यकर्ता 21 साल की दिशा रवि को दिल्ली पुलिस ने 14 फरवरी 2021 को गिरफ्तार कर लिया। उसपर किसानों के लिए कथित रूप से एक टूलकिट बनाने और बांटने का आरोप था।</li>
<li>आगरा में पढ़ने वाले तीन कश्मीरी छात्रों को 28 अक्तूबर 2021 को गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि उन्होंने कथित रूप से व्हाट्सऐप्प स्टेट पोस्ट किया था जिसमें टी20 क्रिकेट मैच में भारत से जीतने वाले पाकिस्तानी खिलाड़ियों की प्रशंसा की गई थी।</li>
</ol>
<p>30 मार्च को इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद भी ये 26 अप्रैल तक जेल में रहे क्योंकि स्थानीय गारंटर उपलब्ध नहीं थे, सुरक्षा राशि ज्यादा थी और पुलिस जांच नहीं हो पाई। दो और उदाहरण कन्हैया कुमार और शर्जिल इमाम के हैं। राजस्थान पत्रिका में उमर खालिद का भी नाम है।</p>
<p>यह दिलचस्प है कि दूसरे अखबारों ने राजद्रोह के मामलों का उल्लेख नहीं किया है और सरकार या किरण रिजिजू को अपनी बात रखने या प्रचारित करने का भरपूर मौका दिया है। दूसरी ओर हिन्दुस्तान टाइम्स ने छापा है कि सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई से सबसे पहले टीवी एंकर को राहत मिली है। एंकर अमन चोपड़ा के मामले में हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस को निर्देश दिया है कि इस कानून के तहत मामले की जांच न की जाए।</p>
<p>द टेलीग्राफ ने इस खबर का शीर्षक लगाया है, राजद्रोह की पर-पीड़ा से खुश होने वालों (के गले) में पट्टा। ऊपर फ्लैग शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने अगर-मगर के बिना स्टे लगाया, केंद्र ने विरोध किया लेकिन कानून पर पुनर्विचार के अपने ही वादे में फंस गई।</p>
<p>इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक इसके मुकाबले सिर्फ सूचना देता है, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के पुनर्विचार तक राजद्रोह के मामलों पर कार्रवाई टाली, कहा पीड़ित राहत मांग सकते हैं। फ्लैग शीर्षक इनवर्टेड कॉमा में है, उम्मीद और अपेक्षा कीजिए कि राज्य और केंद्र कोई एफआईआर दर्ज करने से बचेंगे।</p>
<p>दैनिक जागरण का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह कानून पर लगाई अंतरिम रोक। इसके बाद आप किरण रिजिजू को पढ़ेंगे तो लगेगा कि सुप्रीम कोर्ट वाकई लक्ष्मण रेखा पर कर गई हो। यह है अखबारों और उसकी सुर्खियों की ताकत।</p>
<p>इस लिहाज से अमर उजाला का शीर्षक अच्छा है, देशद्रोह कानून पर लगी सुप्रीम रोक तो सरकार ने याद दिलाई लक्ष्मण रेखा। मुझे लगता है कि रिजिजू जिस लक्ष्मण रेखा की बात कर रहे हैं उसका भी स्पष्टीकरण होना चाहिए।</p>
<p>आखिर ये लक्ष्मण रेखा किस लक्ष्मण ने किस सीता को बचाने के लिए कब खीची थीं। कहीं वो लक्ष्मण रिजिजू ही तो नहीं हैं? उमर उजाला ने रिजिजू के बयान को, अदालत का सम्मान लेकिन &#8230; शीर्षक से छापा है।</p>
<p>कपिल सिबल के अनुसार, राजद्रोह के मामले में 13,000 लोग जेल में हैं। मुझे लगता है कि यह कानून ही गलत है तो राजद्रोह कौन कर रहा है &#8211; नागरिक जो जेल में हैं या सरकार जो अपने इतने सारे नागरिकों को अंग्रेजों के कानून के तहत जेल में रखे हुए है और लक्ष्मण रेखा की बात कर रही है?</p>
<p>लक्ष्मण रेखा कोई मानक रेखा तो है नहीं। एक काल्पनिक या पुरानी कहानी का हिस्सा है और लक्ष्मण रेखा पार करने का नुकसान सीता को तुरंत हुआ था। पार उन्होंने इ्च्छा से नहीं किया था उन्हें मजबूर किया गया था। ऐसे मामले से तुलना करके सरकार क्या कहना चाहती है। यह सब अखबारों में आना चाहिए था। बहुत सारे लोग जानना समझना चाहेंगे।</p>
<p>मुझे लगता है कि अगर यह कानून गलत है, इसका दुरुपयोग हो रहा है तो अखबारों को बताना चाहिए ताकि आम लोगों को लगे कि सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई सही या जरूरी है। पर आम अखबारों की खबरों से ऐसा लग नहीं रहा है। जनता कोई राय कैसे बनाएगी &#8211; व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी के ज्ञान से?</p>
<p><a href="https://indiankanoon.org/doc/1641007/" rel="nofollow noopener" target="_blank">राजद्रोह कानून</a> पर 2010 से 2021 तक का डेटा रखने वाली वेबसाइट आर्टिकल 14 के मुताबिक, इस पूरे दौर में देश में राजद्रोह के 867 केस दर्ज हुए। वेबसाइट ने जिला कोर्ट, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, पुलिस स्टेशन, एनसीआरबी रिपोर्ट और अन्य माध्यमों के जरिए बताया है कि इन केसों में 13 हजार 306 लोगों को आरोपी बनाया गया। हालांकि, जितने भी लोगों पर केस दर्ज हुआ था, डेटाबेस में उनमें सिर्फ तीन हजार लोगों की ही पहचान हो पाई।</p>
<p>पहली बार नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने राजद्रोह से जुड़े केसों का डेटा 2014 से ही जुटाना शुरू किया था। हालांकि, एनसीआरबी के आंकड़ों की मानें तो 2014 से 2020 (2021 के आंकड़े उपलब्ध नहीं) के बीच राजद्रोह के 399 मामले ही दर्ज हुए हैं। आर्टिकल 14 ने इस दौरान (2014-20 के बीच) ही राजद्रोह के 557 मामले दिखाए हैं।</p>
<p>साफ है कि सरकार अदालत तो छोड़िये कानून का भी सम्मान नहीं कर रही थी। उनका तो बिल्कुल नहीं जिन्हें अच्छे दिन का सपना दिखाया गया था। ऐसे में अदालतों से कानून मंत्री या सरकार की यह अपेक्षा क्या राजद्रोह के दायरे में नहीं है? खासकर इसलिए कि अदालत अपना पक्ष इस तरह प्रचार माध्यमों में नहीं रख सकती है या रखती है।</p>
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		<title>न्यू इंडिया &#8211; मांस विवाद पर चुप, बूस्टर डोज का प्रचार करते प्रधानसेवक</title>
		<link>https://theharishchandra.com/hindi/prime-servant-promoting-silent-booster-dose-on-new-india-meat-dispute/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 11 Apr 2022 08:02:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="689" height="445" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/04/Investigation.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="न्यू इंडिया - मांस विवाद पर चुप, बूस्टर डोज का प्रचार करते प्रधानसेवक" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/04/Investigation.jpeg 689w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/04/Investigation-300x194.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/04/Investigation-650x420.jpeg 650w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/04/Investigation-313x202.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 689px) 100vw, 689px" title="न्यू इंडिया - मांस विवाद पर चुप, बूस्टर डोज का प्रचार करते प्रधानसेवक 30">कश्मीर के पत्रकार आसिफ सुलतान को चार साल बाद कल जमानत मिली पर उन्हें फिर से पबलिक सेफ्टी ऐक्ट (पीएसए) के तहत अवैध रूप से थाने में रोक लिया गया। उनके वकील आदिल अब्दुल्ला पंडित ने द टेलीग्राफ से कहा है कि, अब यह स्पष्ट है कि सरकार उन्हें जेल में रखना चाहती है और [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="689" height="445" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/04/Investigation.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="न्यू इंडिया - मांस विवाद पर चुप, बूस्टर डोज का प्रचार करते प्रधानसेवक" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/04/Investigation.jpeg 689w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/04/Investigation-300x194.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/04/Investigation-650x420.jpeg 650w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/04/Investigation-313x202.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 689px) 100vw, 689px" title="न्यू इंडिया - मांस विवाद पर चुप, बूस्टर डोज का प्रचार करते प्रधानसेवक 31">



<p>कश्मीर के पत्रकार आसिफ सुलतान को चार साल बाद कल जमानत मिली पर उन्हें फिर से पबलिक सेफ्टी ऐक्ट (पीएसए) के तहत अवैध रूप से थाने में रोक लिया गया। उनके वकील आदिल अब्दुल्ला पंडित ने द टेलीग्राफ से कहा है कि, अब यह स्पष्ट है कि सरकार उन्हें जेल में रखना चाहती है और आतंकवादियों को पनाह देने का आरोप सिर्फ बहाना था। पीएसए में छह महीने तक बिना ट्रायल जेल में रखा जा सकता है। </p>



<p>निजी खर्च से बूस्टर डोज लगवाने की सलाह और खबरों के बीच आज एक खबर है, “कोविड-19 गया नहीं है, रूप बदल रहा है – प्रधानमंत्री”। प्रधान सेवक और चौकीदार के ऐसा कहने का क्या मतलब है आप तय कीजिए लेकिन प्रधानमंत्री के कहने का मतलब यही है कि बूस्टर डोज लगवा लीजिए। वह ऐसे ही नहीं लगाया जा रहा है। अगर कोविड गया नहीं है यह डोज मुफ्त क्यों नहीं लग रहा है और पीएम केयर्स किस लिए है? यह ना कोई पूछेगा ना बताया जाएगा। यही है अच्छे दिन। </p>



<p>महिला कांग्रेस की कार्यवाहक प्रेसिडेंट नेट्टा डीसूजा ने केंद्रीय मंत्री और सहयात्री स्मृति ईरानी से पेट्रोल और एलपीजी की बढ़ती कीमत पर सवाल पूछा तो ईरानी कोई जवाब नहीं दे पाईं और ईधर-उधर की बातें करती रहीं। 1.11 मिनट का एक वीडियो सुश्री डीसूजा ने ट्वीट किया है जिसे कल रात नौ बजे तक 22,800 लोगों ने लाइक किया था। द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर आठ कॉलम में एंकर है। आपको यह खबर कहीं और दिखी क्या?  </p>



<p>जेएनयू के मेस में मांस खाने और नहीं खाने पर विवाद, मारपीट। किसी विश्वविद्यालय के हॉस्टल का एक मेस बहुत ही छोटी जगह है। वहां कोई क्या करता है क्या खाता है इससे संबंधित विवाद भी नहीं निपट पाए तो आप समझ सकते हैं कि प्रशासन कैसा है या प्रशासन का हाल क्या है। अव्वल तो दूसरा क्या खाता है उससे किसी को मतलब नहीं होना चाहिए और अगर विवाद है तो निपटाने की व्यवस्था होनी चाहिए और नहीं हो तो प्रशासन को स्पष्ट कर देना चाहिए &#8211; पर कुछ नहीं हुआ। तभी मारपीट हुई होगी। बोलने वाले प्रधान कुछ बोल नहीं रहे हैं। ना यह कि विवाद बेकार है ना यह कि मुद्दा सही है।  </p>



<p>भाजपा सत्ता में होती है तो दंगे नहीं होते हैं। वैसे तो इस दावे का कोई मतलब नहीं है क्योंकि टकराव दो बराबर शक्ति वाले पक्षों में ही हो सकता है। एक पक्ष सत्ता में हो तो दूसरा क्या खाकर टकराव मोल लेगा। फिर भी यह दावा किया जाता रहा है। लेकिन इस बार रामनवमी पर स्थिति बदलने की कोशिश लग रही है। अखबारों में हिंसा की खबरें कुछ ज्यादा ही हैं। मैं इसे दंगा नहीं कह रहा पर हिंसा अगर वाकई हुई है तो दावे का क्या हुआ और नहीं हुई है तो खबरें कैसी हैं। इस बीच गुजरात में दंगा और एक व्यक्ति के मरने की खबर है। </p>



<p>इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, 2019-20 के दौरान निगमित पांच नई विनिर्माण कंपनियों में से दो ने सितंबर 2019 में सरकार द्वारा घोषित 15 प्रतिशत की छूट वाले कॉरपोरेट टैक्स का चुनाव किया था और ऐसी कंपनियों की संख्या 2019-20 में 1244 थी। इन कंपनियों ने कुल मिलाकर 35.13 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार कॉरपोरेट टैक्स रिटर्न फाइल करने वाली नई कंपनियों की संख्या 3219 रही। खबर के अनुसार योजना साल के बीच में शुरू की गई थी और पूरे साल का आंकड़ा नहीं दिया गया है। इसलिए कुल आय का आंकड़ा छह महीने के लिए ही है। हालांकि तब भी बहुत कम है।     </p>
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		<title>वानखेड़े के खिलाफ एक-दो नहीं 26 मामले तो एक ही पत्र में थे और उनका कुछ नहीं बिगड़ा।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संजय कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 21 Nov 2021 10:54:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="678" height="452" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/sameerwankhedencb.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="वानखेड़े के खिलाफ एक-दो नहीं 26 मामले तो एक ही पत्र में थे और उनका कुछ नहीं बिगड़ा।" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/sameerwankhedencb.jpeg 678w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/sameerwankhedencb-300x200.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/sameerwankhedencb-630x420.jpeg 630w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/sameerwankhedencb-313x209.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 678px) 100vw, 678px" title="वानखेड़े के खिलाफ एक-दो नहीं 26 मामले तो एक ही पत्र में थे और उनका कुछ नहीं बिगड़ा। 32">संजय कुमार सिंह : शाहरुख खान के बेटे आर्यन के खिलाफ नशे का मामला बहुत कमजोर था यह तो शुरू से ही स्पष्ट है। कल आयर्न को जमानत से संबंधित बांबे हाईकोर्ट का विस्तृत आदेश आने के बाद यह बात बिल्कुल साफ हो गई है या कहिए अदालत ने नहीं माना कि इस मामले में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="678" height="452" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/sameerwankhedencb.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="वानखेड़े के खिलाफ एक-दो नहीं 26 मामले तो एक ही पत्र में थे और उनका कुछ नहीं बिगड़ा।" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/sameerwankhedencb.jpeg 678w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/sameerwankhedencb-300x200.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/sameerwankhedencb-630x420.jpeg 630w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/11/sameerwankhedencb-313x209.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 678px) 100vw, 678px" title="वानखेड़े के खिलाफ एक-दो नहीं 26 मामले तो एक ही पत्र में थे और उनका कुछ नहीं बिगड़ा। 33">



<p>संजय कुमार सिंह : शाहरुख खान के बेटे आर्यन के खिलाफ नशे का मामला बहुत कमजोर था यह तो शुरू से ही स्पष्ट है। कल आयर्न को जमानत से संबंधित बांबे हाईकोर्ट का विस्तृत आदेश आने के बाद यह बात बिल्कुल साफ हो गई है या कहिए अदालत ने नहीं माना कि इस मामले में कार्रवाई लायक कुछ है। ठीक है कि आर्यन शाहरुख खान का बेटा है इसलिए उसकी गिरफ्तारी बड़ी खबर बनी और खूब छपी। जमानत मिलने के बाद शाहरुख ने अपने जन्म दिन और दीवाली के बहाने अपने &#8220;बिगड़ैल बेटे&#8221; के लिए वह सब किया जो सरकारी कार्रवाई के समर्थकों के लिहाज से नहीं करना चाहिए था। लेकिन जब हाईकोर्ट ने कह दिया कि मामले में दम नहीं है, आर्यन के खिलाफ सबूत नहीं मिला, तो इन आरोपों को दम मिलता है कि यह मामला वसूली का था। महाराष्ट्र के मंत्री नवाब मलिक ने जांच अधिकारी के खिलाफ ढेरों आरोप लगाए हैं। पहले उन्हें एक ईमानदार अधिकारी को ईमानदारी से काम रोकने की कोशिश कहा गया। पर अब तो मामला दमदार लगता है। लेकिन आज अखबारों में खबर क्या है? </p>



<p>अंग्रेजी के जो पांच अखबार मैं देखता हूं उनमें से चार में यह खबर पहले पन्ने पर है।  सबमें मुख्य रूप से यही खबर है कि आर्यन के खिलाफ साजिश रचने (या अपराध करने) के कोई सबूत नहीं हैं। द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन अंदर सात कॉलम में छपी खबर का शीर्षक है, “आर्यन साजिश का भाग था इसके सबूत नहीं : हाईकोर्ट”। द टेलीग्राफ जांच अधिकारी समीर वानखेड़े के खिलाफ आरोप छापता रहा है पर जो आर्यन के खिलाफ ही आरोप छाप रहे थे उनके लिए मजबूरी है कि वे उसके पक्ष में आए हाईकोर्ट के आदेश की बात भी बताएं। अब इसमें हिन्दी अखबारों की भूमिका कैसी रही यह मैं नहीं जानता क्योंकि मैं हिन्दी अखबार नियमित नहीं देखता हूं। पर यह दिलचस्प है कि इस खबर से समीर वानखेड़े के खिलाफ आरोपों की पुष्टि हुई है लेकिन आज के अखबारों में उसे महत्व नहीं मिला है। नवाब मलिक के कहने और याद दिलाने के बावजूद। यहां तक कि नवाब मलिक की खबर भी पहले पन्ने पर मुंबई नवभारत टाइम्स को छोड़कर और कहीं नहीं दिखी। </p>



<p>इस खबर की प्रस्तुति में सबसे दिलचस्प खेल या चूक हिन्दी अखबार हिन्दुस्तान ने की है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड है और शीर्षक है, &#8220;आर्यन के साजिश करने का कोई सबूत नहीं&#8221;।  हिन्दी हिन्दुस्तान में यह खबर लीड नहीं है लेकिन टॉप पर चार कॉलम में छपी खबर का शीर्षक है, &#8220;आर्यन के खिलाफ साजिश के सबूत नहीं&#8221;। वैसे तो अंदर खबर सही है पर इस शीर्षक का यह अर्थ भी निकलता है कि आर्यन को साजिश कर फंसाने के सबूत नहीं हैं। जबकि इस मामले की तो जांच ही नहीं हुई है और इस मामले के गवाह ने ही ऐसे आरोप लगाए हैं कि मामला वसूली का था। अब परिस्थितिजन्य साक्ष्य इसकी पुष्टि कर रहे हैं। मुझे नहीं पता यह जान बूझकर किया गया है, अज्ञानता है या चूक। लेकिन उस अखबार में है जिसके बारे में कहा जाता रहा है कि वहां ना कर्मचारी की कमी है ना पैसों की। बेशक, यह कहा जा सकता है कि शीर्षक सही है और इसके दोनों मतलब निकलते हैं लेकिन दुखद यह है कि मूल मुद्दा रह गया। समीर वानखेड़े पर वसूली की कोशिश का मामला चलेगा या वे गुजरात में ऐसा ही काम करने के आरोपी रहे अधिकारी की तरह ईनाम पाएंगे? </p>



<p>नवभारत टाइम्स मुंबई ने इस खबर को लीड तो बनाया है पर उपशीर्षक है, “सार्वजनिक हुआ एचसी से मिला बेल का विस्तृत आदेश”। वैसे तो यह कोई पहला मामला नहीं है कि इस तथ्य को इतनी प्राथमिकता दी जाए। दूसरे इसमें कोई चूक या नई बात नहीं है और अदालत के आदेश सार्वजनिक होते ही हैं। अखबार शायद वायरल होने को सार्वजनिक होना लिख गया है। लेकिन एक बड़े अखबार में यह चूक और समीर वानखेड़े का मामला छूट जाना रेखांकित करने लायक तो है ही। खासकर तब जब अखबार ने मुख्य खबर के साथ चार अन्य संबंधित खबरें छापी हैं और इनमें एक नवाब मलिक की खबर भी है, अब तो वानखेड़े को निलंबित करो। ठीक है कि हाईप्रोफाइल मामलों की जांच करने वाले अधिकारी को सुरक्षा मिलनी चाहिए लेकिन उसे संजीव भट्ट ही बनाया जाए यह कोई जरूरी नहीं है। ना ही यह जरूरी है कि हर अफसर संजीव भट्ट की तरह हिम्मती हो। ऐसा नहीं हुआ तो अच्छे दिन का उपयोग कमाने खाने में करके फिर लो-प्रोफाइल हो सकता है। </p>



<p>यह सब देखना और सरकार का भरोसा बनाए रखना सरकार का ही काम है। वसूली करने के आरोपी अफसर के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कार्रवाई नहीं होगी तो सरकार पर कौन भरोसा करेगा और कितने दिन? मीडिया पैसे कमाने की होड़ में भले सब भूल जाए, पीड़ितों को तो याद रहेगा। वानखेड़े के खिलाफ एक-दो नहीं 26 मामले तो एक ही पत्र में थे और उनका कुछ नहीं बिगड़ा। कानून के हाथों इस तरह सताए और संरक्षित अधिकारियों को झेलने-भुगतने और देखने वाले युवा भविष्य के नागरिक हैं और ये कैसा देश बनाएंगे?</p>
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