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	<title>राजनीति &#8211; The Harishchandra &#8211; Hindi</title>
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		<title>शासन में जन भागीदारी मतदान कर देने भर से पूरी नहीं हो जाती</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Oct 2023 07:43:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/images284729.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="शासन में जन भागीदारी मतदान कर देने भर से पूरी नहीं हो जाती" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/images284729.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/images284729-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/images284729-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/images284729-313x176.jpeg 313w" sizes="(max-width: 739px) 100vw, 739px" title="शासन में जन भागीदारी मतदान कर देने भर से पूरी नहीं हो जाती 1">लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए विधायिका का नियमित निर्वाचन शासन में जन भागीदारी का महत्वपूर्ण घटक है। भारतीय संविधान में सार्वभौम सत्ता यहां के नागरिकों के हाथ में हैं जो अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान करते हैं। जो जनता का बहुमत जुटा पाता है वही शासन की बागडोर संभालता है। [&#8230;]]]></description>
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<p>लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पांच वर्ष के कार्यकाल के लिए विधायिका का नियमित निर्वाचन शासन में जन भागीदारी का महत्वपूर्ण घटक है। भारतीय संविधान में सार्वभौम सत्ता यहां के नागरिकों के हाथ में हैं जो अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान करते हैं। जो जनता का बहुमत जुटा पाता है वही शासन की बागडोर संभालता है। परंतु दलीय लोकतंत्र में मंत्रीमंडल का सामूहिक दायित्व होता है, भले ही उसका गठन विधायिका में बहुमत वाला नेता करता है। प्रत्येक पांच साल बाद राजनेताओं को फिर से जनता के दरबार में जाना होता है और उनके बहुमत का समर्थन पाना होता है। राजस्थान में वह घड़ी आ गई है कि जब यहां के लोग आगामी 23 नवंबर को अपने दो सौ नुमाइंदे चुनने के लिए मतदान करेंगे और तीन दिसंबर को वोटिंग मशीनें परिणाम बता देंगी कि अगले पांच वर्षों के लिए कौन सा दल शासन की बागडोर संभालेगा। शासन में जन भागीदारी की प्रक्रिया अनौपचारिक रूप से दलों के प्रत्याशियों के चयन और निर्दलीय प्रत्याशियों के आगे आने के साथ ही शुरू हो जाती है। मगर जन भागीदारी उतनी आसान नहीं होती जितनी आसानी से उसकी बात की जाती है। विविधताओं वाले भारतीय समाज में सबकी भागीदारी वाली आदर्श गणतांत्रिक व्यवस्था बनाई जाना हमेशा ही कठिन रहा है। सबकी झोली भरे यह भी तो संभव नहीं होता। किन्तु    समानता और न्याय की संवैधानिक व्यवस्था का भरोसा सबको एक किये रखता है। दूसरी तरफ यह भी सच है कि शासन में भागीदारी तो सभी चाहते हैं परंतु वास्तविक भागीदारी राजनीति के कुछ धुरंधर चतुर सुजान ही कर पाते हैं। उनकी यह भागीदारी सर्वजनहिताय की न होकर अपने और अपनों के लिये हो कर रह जाती है। इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से एक हैं प्रभावी ढंग से भागीदारी के बारे में आम नागरिक के रुझान और उसमें जागरूकता की कमी। हर पांच साल में एक बार &#8216;हम भारत के लोग&#8217; लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों में वोट देकर इन सदनों के लिए अपने प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया में भाग लेते हैं और आम तौर पर इसे ही लोकतंत्र में जन भागीदारी मान ली जाती है। वर्ष 2009 में मतदान के 58 प्रतिशत से बढ़कर 2019 में 67 प्रतिशत होने के साथ, यह कहना सुरक्षित भी हो गया है कि आधे से अधिक राष्ट्रीय आबादी इस माध्यम से अपने शासन के साथ जुड़ती है। जन भागीदारी के लिए सूचना का अधिकार नागरिकों को सरकार से पारदर्शिता, जवाबदेही और जवाब मांगने के अधिकार की गारंटी देता है किन्तु वह भी शासन तंत्र के प्रपंच में अपनी अपेक्षित धार खो देता है। शासन तंत्र अर्थात कार्यपालिका की जवाबदेही बनाए रखने की जिम्मेदारी निर्वाचित प्रतिनिधियों अर्थात विधायिका पर होती है वह जब कर्तव्यच्युत होने लगे तब जन भागीदारी की अहमियत और बढ़ जाती है क्योंकि उसी से गणतंत्र का कारोबार सही तरीके से चल सकता है। संसद के ऊपरी और निचले सदनों व विधानसभाओं की कार्यवाहियों का प्रसारण भी जन भागीदारी को बढ़ावा देने का एक जरिया है। सदन की इन कार्यवाहियों को देख कर नागरिक अपने चुने हुए प्रतिनिधियों और सत्ता में बैठे नेतृत्व के प्रदर्शन की गहरी समझ पा सकते हैं। इससे नागरिकों को मतदाता के रूप में अपने भविष्य के विकल्प चुनने के लिये दृष्टि बनती है। सदनों की वेबसाइटें नागरिकों को कार्यवाही के विवरणों तक आम नागरिकों को पहुंच प्रदान करती है, जिसमें सदस्यों द्वारा प्रस्तुत प्रश्न और उनके उत्तर भी शामिल हैं। मगर यह सब तब निरर्थक हो जाता है जब आम नागरिक उदासीन हो। आम जन की उदासीनता एक ऐसे राजतन्त्र को मजबूत करता है जो गणतांत्रिक व्यवस्था में गण के साथ सहकार नहीं करता। राजा और प्रजा जैसा सामंती नाता ही बना रहता है।</p>
<p>लोकतांत्रिक सिद्धांत उन लोगों के माध्यम से लागू किये जाते हैं जिनके पास निर्णय लेने का अधिकार होता है। “हम भारत के लोग” निर्णय लेने का अपना अधिकार विधायकों और सांसदों को अपना प्रतिनिधि बना कर हस्तांतरित कर देते हैं। व्यवहार में नागरिक अपने जीवन को प्रभावित करने वाली नीतियां और कार्यक्रम खुद नहीं बनाते। उनका मतदान सिर्फ अपने प्रतिनिधि चुनने तक सीमित होता है। नागरिकों के जीवन को सीधे प्रभावित करने वाली नीतियां और कार्यक्रम बनाने का काम उनके लिए सरकार चलाने वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़ दिया जाता है जो उसे आगे नौकरशाहों को सौंप देते हैं। सत्ता में बैठे लोग जनता से उनका विज़न मांगने का ढोंग जरूर करते रहते हैं। यही कारण है कि देश के संसाधनों और संपत्ति का लोकतांत्रिक तरीके से वितरण नहीं हो पाता हैं। हाल ही में यह आंकड़ा सामने आया है कि देश की 77 प्रतिशत से अधिक संपत्ति 10 प्रतिशत आबादी के हाथ में है। राजनैतिक व्यवस्था में सभी स्तरों पर पहले से राज में भागीदारी पा रहे नेताओं के ऐसे निहित स्वार्थ बन जाते हैं कि वे अन्यों को अपने प्रभुत्व के लिए खतरा मानने लगते हैं और केवल उन्हीं लोगों के साथ सहज होते हैं जो उनकी छत्र-छाया में रहने को राजी होते हैं। इस व्यवस्था में वंश, परिवार, जाति, क्षेत्र और धर्म के हितों का जाल ऐसा फैला दिया जाता है कि समग्र जनहित की बात औपचारिकता मात्र बन कर रह जाती है। राजनीति में जनशिक्षण अतीत की बात हो गई है। राजनेता और राजनीतिक कार्यकर्ता सत्ता में आने और वहां रहने के लिए समर्पित रहने लगे हैं क्योंकि राजनीति अब एक कारोबार बन गई है। युवा वर्ग अपने-अपने जाति समूहों के बल पर छात्र जीवन से ही राजनीति को पेशे के तौर पर अपनाने के जतन करने लगता है ताकि सत्ता के बाजार में वह अपना मोल बढ़ा सके। ऐसे में यह सवाल भी है कि राजनेताओं तथा राजनीतिक संस्थानों में नागरिकों का भरोसा कैसे बना रह सकता है?</p>
<p>राजनीतिक भरोसे में बदलाव का होना लोकतंत्र के प्रति राष्ट्रीय दृष्टिकोण में बदलाव तथा आर्थिक माहौल में बदलाव से भी जुड़ा होता है। इसी कारण वैचारिक ध्रुवीकरण में बदलाव और लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था से नागरिकों की संतुष्टि के बीच भी संबंध देखा जा सकता है। राजनेता जनभागीदारी की बात अपनी सत्ता के लिए करते हैं। यही कारण है कि पिछले दिनों अचानक लोकलुभावन घोषणाओं तथा राहतों तथा उनके प्रचार का जबरदस्त विस्फोट नज़र आया। लोकलुभावन चीजें लोकतंत्र विरोधी नहीं होती, मगर वे किस कीमत पर होती हैं और उनका क्या दीर्घकालीन प्रभाव होने वाला है उसकी जानकारी मतदाता को नहीं होती क्योंकि वह अपनी भागीदारी के बारे में गंभीर नहीं होता। राष्ट्रवाद भी लोक लुभावन लहर ही होता है। अब सोशल मीडिया के प्लेटफार्मों के माध्यम से राजनीतिक विचारधाराएं अपना वर्चस्व खोजने लगी हैं। शासन भी इन्हीं प्लेटफार्मों पर जन भागीदारी का आसान रास्ता अपनाने लगा है। ऐसा मानने वाले भीकम नहीं हैं कि सोशल मीडिया, नागरिक भागीदारी की ताकत और अवसर देता है। वह नागरिकों को विभिन्न मुद्दों पर अपने विचारों को व्यक्त करने का विकल्प देता है। किन्तु सोशल मीडिया का माध्यम आदर्श मानवीय एकता को खंडित भी करता है। आभासी दुनिया पर व्यक्तियों के समूह बनते हैं जिनमें अपनी बात को मनवाने की आपसी प्रतिस्पर्धा होती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपनी बात कहने की होती है, अगले को उसे मानने के लिए बाध्य करने की नहीं होती। सोशल मीडिया पर अलग-अलग समूहों द्वारा अपनी-अपनी अभिव्यक्तियों को धार देते हुए शिष्टाचार की सीमाएं पार कर जाना आम बात है। इससे आपस में तनाव बढ़ता है; भावनाएं भड़कती है। आभासी समूहों का आपसी तनाव बाहर भौतिक दुनिया में उपस्थित हो जाता है। सोशल मीडिया पर वे किरदार अधिक सफल होते हैं जो अपने में कट्टरता भरे रहते हैं। यह कट्टरता किसी एक पक्ष की बपौती जैसी नहीं है। प्रत्येक पक्ष कट्टरता में एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करता हुआ नज़र आता है। बाज़ार की ताकतें इसमें ऐसी घुल-मिल गई हैं कि पता ही नहीं चलता कि कौन इस प्रतिस्पर्धा को उकसा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म चलाने वालों के पास अपना खुद का कोई माल नहीं होता। वे अपना उपयोग करने वालों के माल से ही अरबों-खरबों कमाते हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों को लगता है वे अभिव्यक्ति की आज़ादी पा रहे हैं और वे जो कुछ कर रहे हैं वह उनका अपना चयन है। मगर आभासी दुनिया के इस भ्रम में लोगों को समूहों में बांट कर कौन अपना खेल कर जाता है किसी को पता ही नहीं चलता। नये डिजिटल युग में अब तो सोशल मीडिया प्रचार का बड़ा माध्यम बन कर अरबों रुपयों का कारोबार बन गया है। मीडिया के प्रचार के दम पर अब चुनावी मुद्दे बनाये जाते हैं और मतदाताओं को बांटा जाता है। स्थानीय और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों के बारे में नागरिक जागरूकता डिजिटल मीडिया तक सीमित होकर रह जाती है। संविधान के दो मौलिक अधिकारों द्वारा समर्थित है- भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार और बिना हथियारों के शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार। डिजिटल मीडिया ने इन अधिकारों पर कब्जा कर लिया है और लोगों में भेद करने की उसकी उग्रता भौतिक जगत में उतर आने लगी है। दुर्भाग्य से सभी राजनीतिक दलों ने डिजिटल जगत के सोशल मीडिया से जुडने को ही जन भागीदारी की इति मान ली गई है। चुनाव प्रचार के लिए उम्मीदवार का मतदाता के साथ सीधा और जीवंत संबंध भी इसी कारण घटता जा रहा है। ऐसे में जनभागीदारी सिर्फ मतदान करने तक रह जाती है।</p>
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		<title>मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में एक ऐसी सीट जहां भाजपा में आपस में महाभारत</title>
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		<dc:creator><![CDATA[कैलाश सनोलिया]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Oct 2023 13:28:41 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="521" height="446" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/10/IMG-20231003-WA0004.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में एक ऐसी सीट जहां भाजपा में आपस में महाभारत" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/10/IMG-20231003-WA0004.jpg 521w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/10/IMG-20231003-WA0004-300x257.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/10/IMG-20231003-WA0004-491x420.jpg 491w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/10/IMG-20231003-WA0004-313x268.jpg 313w" sizes="(max-width: 521px) 100vw, 521px" title="मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में एक ऐसी सीट जहां भाजपा में आपस में महाभारत 3">नागदा। मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में स्थित नागदा-खाचरौद विधानसभा क्षेत्र में तीन बार भाजपा टिकट से चुनावी समर में उतरे  पूर्व विधायक दिलीपसिंह शेखावत को अबकि बार टिकट से वंचित कर दिया। हाईकमान ने अब भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य डॉ.तेजबहादुर सिंह चौहान पर भरोसा किया है।  इस निर्णय से  खिलाफत कर भाजपा का एक [&#8230;]]]></description>
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<p>नागदा। मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में स्थित नागदा-खाचरौद विधानसभा क्षेत्र में तीन बार भाजपा टिकट से चुनावी समर में उतरे  पूर्व विधायक दिलीपसिंह शेखावत को अबकि बार टिकट से वंचित कर दिया। हाईकमान ने अब भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य डॉ.तेजबहादुर सिंह चौहान पर भरोसा किया है।  इस निर्णय से  खिलाफत कर भाजपा का एक खेमा विरोध में खड़ा हैं। टिकट बदलने की मांग पर डटा-अड़ा है। इस महाभारत के  दो मुख्य पात्र हैं। एक  खेमे का ध्वज  टिकट से वंचित दिलीपसिंह शेखावत थामे हैं। दूसरा खेमा डॉ.तेजबहादुर के साथ है। टिकट से वंचित व्यथित दिलीपसिंह ने इस निर्णय के बाद दो बार शक्ति प्रदर्शन कर अपनी ताकत को दिखाने का प्रयास किया। यहां तक अपने समर्थकों की हजारों की भीड़ के बीच  बीफार्म मिलने तक इस संघर्ष को जारी रखने का ऐलान कर दिया।  वे उचित प्लेटफार्म पर अपनी बात रखकर अभी भी टिकट पाने की आश लगाए बैंठे हैं।</p>
<p><strong>शह और मात का खेल   </strong></p>
<p>इस सूबे में अभी तक दिलीप सिंह शेखावत भाजपा के हर मामले में अगुवाई करते आए।  संगठन ने उन्हें तीन बार टिकट दिया। एक विजय 2013 में हाथ लगी। दो बार पराजय 2008 एवं 2018 में नसीब हुई। वे  2013 से 2018 तक एक संवैधानिक पद बतौर विधायक काबिज रहे हैं। 2018 का विधानसभा चुनाव पराजय  के बाद पार्टी की गाइड लाइन के मुताबिक वे बतौर एमएलए इस सूबे के सेनापति बने रहें। लेकिन इस सूबे में अब उनकी जगह डॉ. तेजबहादुरसिंह चौहान को प्रोजेक्ट कर देने से निः संदेह शेखावत की सियासत पर ग्रहण के बादल मंडरा गए।</p>
<p>डॉ.चौहान की उम्मीदवारी से यूं कहा जाए कि श्री शेखावत की कश्ती सियासत के सागर के भंवरजाल में लड़खड़ा गई। जैसा राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं श्री चौहान की जीत एवं पराजय  दोनों ही परिस्थतियों में दिलीपसिंह के इस सूबे में एकाधिकार की राजनीति को धक्का लग रहा है। डाक्टर चौहान यदि जीतेे तो वे सिकंदर, या पराजय के साथ  घर लौटे तो सूबे के सिरमोर की कमान उनके हाथ में होगी। भाजपा में परंपरा हैकि हारे उम्मीदवार कों एमएलए के किरदार में तवज्जो मिलती है।  इस समीकरण से  पहला पक्ष डाक्टर चौहान की जीत के आंकलन से समीक्षा की जाए तो जैसा तेजबहादुरसिंह के स्वभाव-मिजाज की तासिर नरेेंद्र मोदी की उस थीम से सामंजस्य करती हैकि-  ना खाउंगा ना खाने दूंगा। यह एक बहुत बड़ा फैक्टर  यहां की सरजमीं पर है। यह बड़ा फेेैक्टर भी इस महाभारत की बुनियाद में सुरंग बनाकर डॉ चौहान के खिलाफ कार्य कर रहा है। डाक्टर चौहान की ईमानदार कार्यशैली सेे  कई चेहरे विचलित हैं, घबराहट सें दिलों की धड़कन तेज है। इसलिए दूसरा पहलू यदि पराजय के साथ डॉ चौहान घर लौटे तो पार्टी गाइड लाइन के मुताबिक वे इस क्षेत्र में आगेवानी करेंगे। जैसा कि वर्तमान में पूर्व विधायक दिलीपसिंह के हाथों में यह जिम्म्मेदारी का ध्वज है। ऐसी स्थिति में दोनो पहलू से दिलीपसिंह की सियासत प्रभावित होगी। राजनीति का यह सर्वमान्य  सिद्धात हैकि जब किसी राजनेता का पावरगैम कमजोर पड़ता है, या  सत्ता से विमुख होकर लड़खड़ता तो उसमें छटपटाहट ,बैचेनी सार्वजनिक रूप से परिलक्षित होती है। यहंा जो समीकरण चल रहा है यह उसी और संकेत कर रहा है। अब शेखावत के सामने यह सवाल यह आरहा हैकि इस पूरे समीकरण से कैसे उभरा जाए। जिसके लिए भीड़तंत्र को बतौर हथियार बनाकर सियासत के सागर के  भंवरजाल में फसी अपनी कश्ती को किनारे लगाने की कवायद चल पड़ी है। बड़ी बात यह हैकि संगठन के निर्णय को चुनोैती देकर टिकट बदलने का मसला है। यह कार्य भाजपा की सनातन संस्कृति &#8211; संस्कार को चिढ़ा रहा है। अनुशासनहीनता की कार्यवाही के पायदानों के पेराकारों को एक आईना भी है।</p>
<p><strong>1985 का इतिहास ताजा     </strong></p>
<p>इस प्रकार के नजारे कांग्रेस संस्कति में तो आम थे, लेकिन अब कथित अनुशासित एवं संस्कार से सराबोर भाजपा संगठन में भी इस प्रकार का संक्रमण फैल रहा है । हालांकि इस दल में इस प्रकार की दूसरी बार  पुनरावृति हो रही है। वर्ष 1985 में तत्कालीन भाजपा जिला अध्यक्ष स्व मांगीलाल शर्मा को लालसिंह राणावत को टिकट देना रास नहीं आया था। श्री शर्मा ने  हाईकमान के निर्णय को चुनौती दे डाली थी। श्री शर्मा चुनाव चिन्ह शेर के साथ  निर्दलीय मैंदान में उतरे थे। उस समय  कार्यकर्ताओं के सामने इसी प्रकार का धर्मसंकट खड़ा हुआ था। शर्मा के समर्थक टिकट बदलने की मांग पर अड़े थे। लेकिन पार्टी टस से मस नही हई। श्री शर्मा का नाम उस युग में लोकप्रिय, जूझारू, मजदूर हितैषी  एक ईमानदार राजनेता की शोहरत में शुमार था। उस समय वे भाजपा के उज्जैन जिला अध्यक्ष पद पर काबिज थे।  उस जमाने के कदावर एवं लोकप्रिय राजनेता  श्री शर्मा महज 9800 मतों के आसपास सिमट गए । हालांकि भाजपा से प्रतिशोध की भावना में वे अवश्य सफल हुए। उस समय भाजपा प्रत्याशी लालसिंह राणावत को हराने में कामयाब हुए थे।  कांग्रेस के रणछोडलाल आंजना 3838 मतो चुनाव जीत गए । इस पराजय से ही तत्कालीन भाजपा का एक खेमा खुश हुआ ।  अब श्री शेखावत बार- बार अपने भाषण में कार्यकर्ताओं को तवज्जो दे रहे और कार्यकर्ताओं को सम्मान देने की बात कर रहे है। उधर,  कार्यकर्ता भी सोशल मीडिया पर जोश-खरोश में अपनी अभिव्यक्ति का इजहार इस प्रकार से कर रहे हैं-अब सघंर्ष नहीं रण होगा। मतलब कार्यकर्ता तो अपने नेता को संकेत चुनाव लड़ने का दे रहें ंहैं। कार्यकर्ताओं की इस भावना को कितना सम्मान होगा यह अभी भविष्य की गर्त में है। इस सूबे में  एक दूसरा उदाहरण इसी प्रकार का हैं। इसी प्रकार  2003 में इस सूबे में कांग्रेस में हुआ था। 1993 में विधायक रहे दिलीपसिंह गुर्जर को 2003 में टिकट नहीं मिला। श्री गुर्जर ने  कांग्रेस पार्टी के निर्णय से खफा होकर निर्दलीय चुनाव चिन्ह इंजिन से किस्मत आजमाई । वे 14,429 मतों से जीत गए। इस चुनाव में कांग्रेस उम्म्मीदवार को जमानत बचाने के लाले पड़ गए ।</p>
<p><strong>प्रत्येक परिस्थति को परखे</strong></p>
<p>वर्तमान में भाजपा में जो बखेड़ा खड़ा हुआ उससेे यह तो स्पष्ट हैकि अब संगठन पर व्यक्तिवाद हावी होने की कोशिश है। व्यक्तिगत सता सुख की महात्वकांक्षा की अंतिम पराकाष्ठा से एक गुट  हाईकमान के निर्णय को चुनौती देने की हिम्मत कर बैठा। यहां तक घोषित उम्मीदवार डॉ चौहान की शक्ति ,शोहरत की कमजोरी सामंतवादी सोच एवं सार्वजनिकता में गुमनामी के आरोप लगा दिए।   भाजपा संगठन इस प्रकार की दलील एवं प्रदर्शन के आगे नतमस्तक होगा या अनुशासन हीनता का डंडा चलाएगा, उसकी तस्वीर अभी धंूधली है। लेकिन फिलहाल तो इस महाभारत के संवेदनशील प्रकरण में भाजपा हाईकमान की खामोशी  ने धृतराष्ट युग की याद ताजा कर दी।  लेकिन यह तो संभव हैकि सियासत के इस मैंदान में तेजबहादुर के हाथ से बल्ला छिनना टेडीखीर होगा।</p>
<p>एक अनुशासित दल में हाईकमान की निर्णय को चुनौती देकर यह क्यों हो रहा है  उस पर विश्लेषण करना  आज सामयिक है। पहला कदम प्रेशर पोलिटिकस संभव है। जिसमें सियासत के सागर के भंवरजाल में डगमगाती कश्ती है। इसलिए टिकट बदलने का प्रदर्शन भीड़ के माध्यम से किया जा रहा है।  लेकिन विश्व का सबसे बड़ा दल कहे जाने वाले पार्टी के निर्णायक मंडल  इस प्रकार के प्रदर्शन को कितना तवज्जो देंगे और टिकट बदले उस पर फिलाहल तो संशय के बादल  है। दूसरी मंशा श्री शेखावत खेमे की यह मानी जा सकती हैकि बेहत्तर शक्ति प्रदर्शन के बाद मान-.मनुहार के बाद सम्मान जनक हल निकालने की तलाश संभव है । ताकि सांप भी ना मरे और लाठी भी ना टूटे। भविष्य में संवैधानिक  कोई पद का  नजराना भी मांगा जाए। लेकिन इस बिंदु में यह बाधा संभव हैकि यदि संयोग से काग्रेेस सरकार बनी तो इस नजराना के मार्ग में कांटे बिछ जाएंगे। दूसरी बात यदि भाजपा सरकार में आई तो शिवराज के हाथों में अब प्रदेश की बागडोर नहीं होगी। श्री शेखावत के आंगन की सियासत को धूप शिवराज की खिड़की से ही मिलने की जैसी चर्चा है। शिव को अब कुर्सी से दूर करने की रणनीति भाजपा हाईकमान ने स्वयं बनाई है। इसलिए यह हल भी संशय में है। फिर जिन 12 लोागों पर टिकट कटवाने  के आरोप लगा जा रहे वे अपने साथ  इस क्षेत्र में उपेक्षा के गहरे  जख्मों को दबाए बैठे हैं। ये भी अच्छे दिन आने पर इनाम मांगेंगे।ये लोग भी अपनी सरकार बनते ही  अपना- अपना  नजराना मंडल- कमंडल की और अपेक्षा रखेंगेें। पार्टी आखिर किस- किस को  खुश कर पाएगी। एक बड़ा  फैक्टर यह हैकि जिस प्रकार से श्री शेखावत खेमे से भीड़तंत्र को जुटाया जा रहा हैं और सोशल मीडिया पर समर्थकों  की मंशा चल रही हैकि- अब संघर्ष नहीं  रण होगा। यदि निर्णय मैंदान में जाने का हुआ तो  त्रिकोणीय मुकाबले के आसार संभव है। इस निर्णय से श्री शेखावत को उनकी तकदीर दो रास्ते की और ले जा सकती है। या तो सियासत की धार परवान चढेगी या अपने हाथों अपने पांव पर कुल्हाड़ी। विकल्प यह भी संभव  हैकि समय के साथ समझौता कर तेजबहादूर के संग जुट जाए।</p>
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		<title>मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[कैलाश सनोलिया]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 28 Aug 2023 08:33:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="630" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/Kailash-Sanolia.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां!" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/Kailash-Sanolia.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/Kailash-Sanolia-300x158.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/Kailash-Sanolia-1024x538.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/Kailash-Sanolia-768x403.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/Kailash-Sanolia-696x365.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/Kailash-Sanolia-1068x561.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/Kailash-Sanolia-800x420.jpg 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/Kailash-Sanolia-313x164.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां! 5">नागदा। मप्र मे नवंबर माह में विधानसभा चुनाव है। जिसको सियासती पारा चढा हुआ है।  मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने मालवा अंचल के उज्जैन जिले में स्थित नागदा को जिला बनाने की घोषणा की है। जिसकी प्रक्रिया भी शुरू हो गई। नागदा विधानसभा सीट पर वर्तमान में कांग्रेस के दिलीपसिंह गुर्जर एमएलए है।  आगामी विधानसभा चुनाव में [&#8230;]]]></description>
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<p>नागदा। मप्र मे नवंबर माह में विधानसभा चुनाव है। जिसको सियासती पारा चढा हुआ है।  मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने मालवा अंचल के उज्जैन जिले में स्थित नागदा को जिला बनाने की घोषणा की है। जिसकी प्रक्रिया भी शुरू हो गई। नागदा विधानसभा सीट पर वर्तमान में कांग्रेस के दिलीपसिंह गुर्जर एमएलए है।  आगामी विधानसभा चुनाव में इस सीट पर  कांग्रेस से  चार बार के विधायक श्री गुर्जर की टिकट लगभग तय है।  भाजपा में टिकट को लेकर स्वयंबर मचा हुआ है। यह भाजपा के दो कदृदावर नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ थावरचंद गेहलोत, जो वर्तमान में कर्नाटक के राज्यपाल है, तथा  मप्र शासन में कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त असंगठित कामगार कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष सुल्तानसिंह शेखावत के  गृहनगर की सीट है।</p>
<p>भाजपा ने प्रदेश की  39 सीटों पर प्रत्याशियों के नामों की पहली सूची जारी की है, जिसमें में मालवा अंचल के उज्जैन जिले की दो  तराना एवं घटिया सीट के  उम्मीदवारों के नाम शुमार है। ये दोनों अजा वर्ग की सुरक्षित है। पिछले वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में इन दोनों सीटों पर भाजपा को शिकस्त मिली है। जैसा बताया जा रहा है भाजपा ने कमजोर सीटों पर  पहली सूची में नाम तय किए  हैं। नागदा सीट पर अधिकांश बार  मुकाबला रहा या कांग्रेस का कब्जा रहा है।  बावजूद पहली सूची में  इस सीट पर उम्मीदवार की घोषणा को रोकना प्रत्याशियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा माना जा रहा है। हालांकि इस सीट पर अब भाजपा की कड़ी नजर है।  इस कारण सीएम ने 15 बरसों से झूल रही जिला बनाने की मांग चुनाव के एन वक्त पर पूरी करने की घोषणा की है। नागदा सीट पर पिछली बार भाजपा उम्मीदवार दिलीपसिंह शेखावत की  हार के बाद कई नए चेहरों में टिकट को लेकर उत्सुकता है।</p>
<p>अब यह चेहरा बदला जाएगा या पुनरावृति होगी अभी तस्वीर धुंधली भाजपा ने इस सीट से  दिलीपसिंह शेखावत  पिछले चुनावों में लगातार तीन बार कांग्रेस के दिलीपसिंह गुर्जर के खिलाफ मैंदान में उतारा है। जिसमें से शेखावत को  2 बार पराजय और एक मर्तबा सफलता मिली है।  2018 में भाजपा प्रत्याशी शेखावत  कांग्रेस के श्री गुर्जर से 5117 मतो से हार गए थे। दोनों के बीच पहली बार 2008 में टक्कर हुई जिसमें कांग्रेस के गुर्जर 9500 से भी अधिक मतो पिछली से जीत गए।  दूसरी बार 2013 में भाजपा के दिलीपसिंह शेखावत ने 16,115 मतो से बाजी मारी। गत चुनाव में शेखावत की 5112 वोटो की पराजय  के बाद अबकि बार  कई दावेदारों के नाम इस दलील के साथ  सामने आ रहे हैंकि  तीन में से 2 बार प्रत्याशी शेखावत की हार से चेहरा बदला जा सकता है। हालांकि शेखावत का नाम भी दौड़ में शुमार है। भाजपा से लगभग एक दर्जन प्रत्याशियों के नाम एक अनार सौ बीमार कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। इस सीट के इतिहास की खासियत हैकि कांग्रेस ने पिछडा वर्ग के उम्म्मीदवार पर दांव खेला है, तो भाजपा ने ठाकुर प्रत्याशियों को ही टिकट से नवाजा है</p>
<p>अबकि बार ये दावेदार- अबकि बार भाजपा में राजपूत  उम्मीदवारों की बात की जाए तो मप्र शेखावत, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के पूर्व अध्यक्ष तथा पूर्व विधायक लालसिह शासन में कैबिनेट मंत्री का दर्जा मप्र शासन असंगठित कामगार कल्याण बोर्ड अध्यक्ष सुल्तानसिंह राणावत, पूर्व विधायक दिलीपसिंह शेखावत, भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य डॉ तेजबहादुरसिंह चौहान एवं मोतीसिंह शेखावत के  नामों की चर्चा है।  मोतीसिंह  बोर्ड अध्यक्ष सुल्तानसिंह के बेटे हैं। गैर ठाकुर प्रत्याशियों में पूर्व नपा अध्यक्ष शोभायादव  पूर्व नपा उपाध्यक्ष राजेश धाकड़, भाजपा जिला महामंत्री धर्मेश जायसवाल , किसान नेता दयाराम धाकड़ एवं विहिप नेता भेरूलाल टांक के नामों की सुगबुगाहट है। उंट किस करवट बैठेगा  कहा नहीं जा सकता। भाजपा यहां देने में फूंक -फूंक कर कदम रख रही है। पिछले चुनाव की टिकट की पुनरावृति होगी या परिवर्तन इसमें अभी संशय है।</p>
<p><strong>8 बार ठाकुरों ने मैंदान संभाला</strong></p>
<p>जातिगत समीकरण देखा जाए तो नागदा ठाकुर पिछडा वर्ग बाहुल्य सीट है। भाजपा के अस्तित्व में आने के बाद 1985 से लगातार इस सीट से पार्टी ने ठाकुरों को 8 बार मैदान में उतारा है। जिस में से ठाकुर प्रत्याशी 3 बार चुनाव जीते और 5 बार हारे हैं। भाजपा के राजपूत उम्मीदवार 1990, 1998 एवं 2013 में  कामयाब हुए। जबकि 1985, 1993, 2003, 2008 एवं 2018 में पराजय का सामना करना पड़ा। दो बार लालंिसंह राणावत 1990 एवं 1998 में  विधायक बने। जबकि  2013 में दिलीपसिंह शेखावत विधानसभा पहुंचे।</p>
<p>भाजपा के अस्तित्व में आने के पहले की बात की जाए तो इसी दल की विचारधारा के वीरेंद्रसिंह कंचनखेड़ी 1957 में हिंद महासभा से तथा 1967 एवं 1972 में भारतीय जनसंघ की टिकट से विधायक बने। 1967 में संविद सरकार में मंत्री भी बने। इधर, कांग्रेस ने पिछडा वर्ग पर भरोसा किया और अधिकांश बार  गुर्जर समाज के उम्मीदवार पर दाव खेला। वर्ष 1985 के चुनाव में पिछड़ा  वर्ग के रणछोड़लाल आंजना ने भाजपा के ठाकुर प्रत्याशी लालसिंह राणावत को 3828 मतों से पटकनी दी । वर्ष 1990 में भाजपा के राणावत चुने गए। वर्ष 1993 में  दिलीपसिंह गुर्जर पहली बार कांग्रेेस की टिकट पर विधायक बने। वर्ष 1998 में इस सीट को भाजपा ने कांग्रेस से छिन ली और भाजपा के राणावत विधायक चुने गए । इस बार कांग्रेस के बाबूलाल गुर्जर 4731 मतों से पराजित हुए। उधर, कांग्रेस खेमे की बात की जाए तो गुर्जर समाज के दिलीपसिंह गुर्जर चार बार क्रमशः 1993, 2003, 2008 एवं 2018 में विधायक बने । वर्ष 2003 में कांग्रेस से  टिकट कटने पर श्री गुर्जर ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और 14, 429 वोटों से विजयी हुए। उस दौरान कांग्रेस उम्मीदवार की जमानत जप्त हुई और भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा।</p>
<p><strong>जैन एवं ब्राह्मण उम्मीदवार जीते</strong></p>
<p>इस सीट पर भाजपा के अस्तित्व में आने के पहले गैर समाज के उम्मीदवार भी जीते हैं। पहला चुनाव  1952 में स्वाधीनता सैनानी स्व रामचंद्र नवाल ने कांग्रेस की टिकट पर जीता। उस समय महिदपुर का हिस्सा भी शामिल था।   1962 में जैन समाज के स्व भैरव भारतीय ने निर्दलीय बाजी मारी। 1977 में हलधर चिन्ह से जनता पार्टी की टिकट पर तथा 1980 में कमल फूल चिन्ह पर स्व पुरूषोत्म विपट ने जीत दर्ज की । वे बाहाण समाज के थे। उन्हें दो बार जीत नसीब हुई।</p>
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		<title>पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही : हरीश ऐठानी </title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजकुमार सिंह परिहार]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 18 Jul 2023 15:43:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1156" height="520" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही : हरीश ऐठानी " style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005.jpg 1156w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-300x135.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-1024x461.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-768x345.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-696x313.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-1068x480.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-934x420.jpg 934w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-313x141.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1156px) 100vw, 1156px" title="पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही : हरीश ऐठानी  7">बागेश्वर/ पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष हरीश ऐठानी ने कपकोट के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दो दिवसीय पैदल भ्रमण कर आपदा से हुए नुकसान का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने क्षेत्र की बंद पड़े मोटर मार्गों खोलने एवं क्षतिग्रस्त पेयजल लाइनों को तत्काल ठीक करने व प्रभावित परिवारों को अन्यत्र विस्थापित कर सुरक्षित करने की मांग [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1156" height="520" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही : हरीश ऐठानी " style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005.jpg 1156w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-300x135.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-1024x461.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-768x345.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-696x313.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-1068x480.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-934x420.jpg 934w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-313x141.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1156px) 100vw, 1156px" title="पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही : हरीश ऐठानी  8">



<p>बागेश्वर/ पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष हरीश ऐठानी ने कपकोट के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दो दिवसीय पैदल भ्रमण कर आपदा से हुए नुकसान का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने क्षेत्र की बंद पड़े मोटर मार्गों खोलने एवं क्षतिग्रस्त पेयजल लाइनों को तत्काल ठीक करने व प्रभावित परिवारों को अन्यत्र विस्थापित कर सुरक्षित करने की मांग करी।</p>



<p>&#8211; आपदा राहत में पूरी तरह से विफल है सरकार व ज़िला प्रशासन </p>



<p>&#8211; आठ परिवारों को बना हुआ है जान-माल का खतरा </p>



<p>&#8211; सड़क, संचार व बिजली सभी आपदा की चपेट में आने से टूटा मुख्यालय से सम्पर्क </p>



<p>&#8211; किलपारा में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से बन रही सड़क 50 मीटर से अधिक पूरी तरह ध्वस्त से पैदल चलना भी हुआ मुश्किल </p>



<p>पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष हरीश ऐठानी ने तहसील कपकोट के दूरस्थ क्षेत्र धूर, उंगिया, तीख, डौला, बदियाकोट, सोराग व किलपारा आदि क्षेत्रों का भ्रमण कर आपदा से हुए नुकसान का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने आपदा से प्रभावित परिवारों से मुलाकात कर उन्हें हरसंभव मदद का आश्वासन भी दिया। ग्रामीणों ने बताया कि बदियाकोट के तोक कुमतोली में पैदल पुलिया टूटने से आवागमन बाधित हो गया है। जिसके चलते बच्चों के स्कूल जाने का भी मार्ग बाधित हो गया है। पशुपालन विभाग के भवन की सुरक्षा दिवार टूटने से खतरा बना हुआ है। इस क्षेत्र के कई पुल इसकी आपदा की चपेट में आने से क्षतिग्रस्त हैं जिस कारण लोगों को जान  खतरा बना हुआ है। </p>



<p>उन्होंने बताया कि पटाक के इण्टर कॉलेज से प्राथमिक विद्यालय व एएनएम सेंटर को जाने वाला मार्ग जगह-जगह टूटने से लोगों के मुसीबत बना हुआ है। वही बच्चे जान जोखिम में डालकर इस मार्ग से चलने को मजबूर हैं उनकी सुध लेना वाला सरकार व प्रशासन में कोई नही है। सोराग में जगह जगह भू धसान होने के कारण लोगों को भारी नुक़सान हुआ है। उनकी फसल क्षतिग्रसत हो गयी है। सड़क किनारे नालिया न होने के कारण जगह-जगह सड़क मार्ग बाधित है, वहीं छोटी गाड़ियाँ निकलने में भी हो रही भारी दिक़्क़तें। वहीं किलपारा में कई लोगों के घरों में मलवा व पानी घुसने से जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है। लोगों को जान का खतरा बना हुआ है। </p>



<p>उन्होंने कहा कि दो दिन पूर्व उंगिया में बादल फटने से भारी तबाही मची है। आवासीय भवनों को खतरा बना हुआ है। भ्रमण के दौरान केशर सिंह पुत्र आन सिंह सहित आठ परिवारों ने पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष के माध्यम से प्रशासन से अन्यत्र सिफ्ट करने की मांग की है। उन्होंने बताया कि मोटर मार्ग के साथ बसे निचले गांव में 08 मकान हैं, इनमें पानी व मलबा घुसने से नुकसान हुआ है और एक मकान पूरी तरह से आपदा की जद में है। जिस कारण आवसीय मकानों में बड़े बड़े दरारें पड़ गयी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन उन्हें जल्द किसी सुरक्षित जगह पर विस्थापित कर उचित मुआवज़ा दिया जाये। </p>



<p>जगह जगह अतिवृष्टि से सड़क मार्ग, विधुत व संचार सुविधाएँ क्षतिग्रस्त हो गयी है। जिससे हमारा संपर्क तहसील एवं जिला मुख्यालय से कट गया है। जबकि किलपारा में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से बन रही सड़क 50 मीटर से अधिक पूरी तरह ध्वस्त हों गयी है जिसके चलते लोगों का पैदल चलना भी मुसीबत बना हुआ है। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष ने उपजिलाधिकारी कपकोट को आपदा प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण कर आपदा से हुए नुकसान,  लोनिवि व पीएमजीएसवाई के बंद पड़े मोटर मार्गो को यातायात के लिए सुचारू करने की मांग की। </p>



<p>उन्होंने अपने इस दो दिवसीय पैदल भ्रमण पर जगह-जगह लोगों से मुलाक़ात कर आपदा का जायज़ा लेते हुए प्रशासन पर आरोप लगाया है कि आपदा के सभी दावे खोखले हैं। एक ही बरसात ने सरकार व प्रशासन के दावों की पोल खोलकर रख दी है। उन्होंने कहा कि पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही है, सभी भगवान भरोसे चल रहा है। गनीमत रही है कि इस तबाही में जानी नुकसान नहीं हुआ है। इस दो दिवसीय पैदल भ्रमण में पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य ख़िलाफ़ दानू, नैन सिंह दानू, भगवत दानू व खजान सिंह साथ रहे।</p>
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		<title>किसने कह दिया मोदी 24 में सत्ता छोड़ ही देंगे ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[श्रवण गर्ग]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Jul 2023 11:24:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="764" height="401" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="निर्वाचन आयोग की गतिविधियां संदिग्ध कौन करे निगरानी ?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection.jpeg 764w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-300x157.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-696x365.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-313x164.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 764px) 100vw, 764px" title="किसने कह दिया मोदी 24 में सत्ता छोड़ ही देंगे ? 9">बहस बंद कर देना चाहिए कि लोकसभा की 543 सीटों के लिए अगले साल होने वाले चुनावों में अगर भाजपा को बहुमत प्राप्त नहीं होता है तो मोदी सत्ता से बाहर हो जाएँगे और विपक्ष की सरकार दिल्ली में क़ाबिज़ हो जाएगी । जनता को विपक्ष से उसके पीएम चेहरे का नाम-पता पूछना हाल-फ़िलहाल के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="764" height="401" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="निर्वाचन आयोग की गतिविधियां संदिग्ध कौन करे निगरानी ?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection.jpeg 764w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-300x157.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-696x365.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/01/modiandelection-313x164.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 764px) 100vw, 764px" title="किसने कह दिया मोदी 24 में सत्ता छोड़ ही देंगे ? 10"><p>बहस बंद कर देना चाहिए कि लोकसभा की 543 सीटों के लिए अगले साल होने वाले चुनावों में अगर भाजपा को बहुमत प्राप्त नहीं होता है तो मोदी सत्ता से बाहर हो जाएँगे और विपक्ष की सरकार दिल्ली में क़ाबिज़ हो जाएगी । जनता को विपक्ष से उसके पीएम चेहरे का नाम-पता पूछना हाल-फ़िलहाल के लिए बंद कर देना चाहिए। जो विपक्षी दल पटना के बाद बैंगलोर में जमा होकर भाजपा को सत्ता से हटाने की रणनीति पर विचार करने वाले हैं हो सकता हैं उन्होंने अपना नया एजेंडा तैयार भी कर लिया हो।</p>
<p>‘मोदी सत्ता नहीं छोड़ेंगे’ के सिलसिले में जनता को दो-चार घटनाक्रमों पर बारीकी से बहस प्रारंभ कर देना चाहिए। पहली तो यह कि महत्वाकांक्षी ‘सेंट्रल विस्टा’ परियोजना के दूसरे कामों को रोक सबसे पहले नया संसद भवन तैयार करवाने के पीछे कोई तो ज़बर्दस्त कारण रहा होगा ! वह क्या था ? दूसरे यह कि देश का ध्यान इतनी चतुराई के साथ पवित्र ‘सेंगोल’ अथवा ‘राजदंड’ विवाद में जोत दिया गया कि किसी ने पूछा ही नहीं कि नए संसद भवन में लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 888 और राज्य सभा की 245 (250) से बढ़ाकर 384 करने के पीछे मंतव्य क्या हो सकता है ? इन बढ़ी हुई सीटों का 2024 के चुनावों से क्या संबंध माना जाए ?</p>
<p>मोदी सरकार अगर सत्ता में वापसी की तैयारियों में ज़ोर-शोर से जुटी है और नए संसद भवन की बढ़ी हुई सीटों से उनका कोई संबंध है तो हाल के कुछ घटनाक्रमों पर नज़र दौड़ाई जा सकती है। इन घटनाक्रमों में जद(यू) सांसद हरिवंश नारायण सिंह की पिछले दिनों बिहार के मुख्यमंत्री और विपक्षी एकता के सूत्रधार नीतीश कुमार के साथ पटना में हुई डेढ़ घंटे की बातचीत को भी शामिल किया जा सकता है।</p>
<p>कोई तो महत्वपूर्ण विषय रहा होगा कि जद(यू) सांसद रहते हुए भाजपा के साथ केंद्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हरिवंश नारायण सिंह ने अरसे के बाद नीतीश कुमार के साथ इतनी लंबी चर्चा करना ज़रूरी समझा ! हरिवंश नारायण सिंह सबसे ज़्यादा चर्चा में तब आए थे जब राज्यसभा की आसंदी पर उनकी उपस्थिति के दौरान विवादास्पद कृषि क़ानूनों से संबंधित विधेयक को सदन की स्वीकृति प्राप्त हुई थी ।उसके बाद देश में जो कुछ घटित हुआ था उसकी स्मृतियाँ आज भी क़ायम हैं। काले कृषि क़ानूनों को वापस लेने की माँग को लेकर चले लंबे आंदोलन के दौरान सात सौ से अधिक लोगों को अपना बलिदान देना पड़ा था।</p>
<p>जो गतिविधियां इस समय मौन रूप से चल रहीं हैं उन पर गौर किया जाए तो विधानसभा चुनावों में लगातार हो रही पराजयों के बीच भाजपा सरकार का अचानक से प्रेम देश की महिलाओं को लोकसभा में आरक्षण प्रदान करने के प्रति जाग उठा है ! क्या अचंभा नहीं व्यक्त किया जाना चाहिए कि मोदी सरकार का यह प्रेम तब जगा है जब नए चुनाव होने जा रहे हैं ! पिछले नौ सालों में पत्ता भी नहीं हिला ! कोई तो कारण होगा ! चर्चा है कि साल 2010 से (या उसके भी पहले से ) लंबित महिला आरक्षण विधेयक अब कभी भी पेश किया जा सकता है !</p>
<p>गौर करने की बात यह हो सकती है कि चूँकि पुराना विधेयक तब की संसद के अवसान के साथ लैप्स हो चुका है, नया विधेयक संभवतः पुराना वाला नहीं होगा। यानी महिलाओं को आरक्षण दिया जाना तो प्रस्तावित होगा पर न तो वर्तमान की 543 सीटों में से ही एक तिहाई पर और न ही पूर्व में सुझाई गई प्रक्रिया (यानी ‘आरक्षित सीटों का राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में चक्रीय-रोटेशनल-आधार पर आवंटन’ ) के अनुसार।</p>
<p>गणित समझाया जा रहा है कि 2024 के चुनावों में भाजपा की सीटें अगर कम भी हो जाएँ पर उसका वोट शेयर 2019 वाला ही क़ायम रहे तब भी महिला आरक्षण सरकार की सत्ता में वापसी करा देगा। कैसे ? बताया जाता है कि 543 सीटों पर तो चुनाव पूर्व की तरह होंगे पर लोकसभा में महिलाओं के लिए 280 नई सीटें जोड़ दी जाएँगी। इन 280 पर चुनाव नहीं होंगे।लोकसभा चुनावों में राजनीतिक दलों को राज्यों में जो भी वोट शेयर प्राप्त होगा उसी के अनुपात में (आनुपातिक प्रतिनिधित्व) उन दलों की महिलाओं को इन 280 सीटों में से स्थान मिल जाएगा। इसके लिए प्रत्येक दल को 280 महिलाओं की सूची प्राथमिकता के क्रम में सौंपनी होगी।</p>
<p>मतलब यह कि राजद और जद(यू) अगर चाहेंगे तो वोट शेयर के आधार पर मिलने वाली अपनी कुछ या सभी सीटें पिछड़ी जाति की महिलाओं को दे सकेंगे। स्मरण दिलाया जा सकता है कि पिछले विधेयक का सबसे मुखर विरोध लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और नीतीश कुमार के जद(यू) ने पिछड़ी जाति की महिलाओं के हितों को मुद्दा बनाकर किया था।</p>
<p>जिस तरह का तर्क भाजपा के क्षेत्रों में चर्चा में है उसके अनुसार ,1984 के चुनावों में भाजपा को सीटें चाहे दो ही मिली थीं , वोट शेयर के मामले में कांग्रेस के बाद वही थी। कांग्रेस का 404 सीटों के साथ वोट शेयर 49.10 प्रतिशत था जबकि भाजपा का दो सीटों के बावजूद 7.74 प्रतिशत। (भाजपा तब 96 सीटों पर पार्टी दूसरे क्रम पर रही थी। इनमें से 84 पर भाजपा ने 1989 में जीत प्राप्त कर ली थी।) तर्क यह है कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर महिला आरक्षण होता तो 1984 में भाजपा की सीटें कहीं ज़्यादा होतीं।</p>
<p>जो तर्क भाजपा की खुशहाली के संदर्भ में दिया जा रहा है वही कांग्रेस को खुश करने के लिए भी बाँटा जा रहा है। समझाया जा रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 37.35 प्रतिशत वोट शेयर पर 303 सीटें मिलीं थीं जबकि 19.49 प्रतिशत वोट शेयर प्राप्त कर दूसरे क्रम पर रहने के बावजूद कांग्रेस को सिर्फ़ 52 ही सीटें प्राप्त हुईं। अगर आनुपातिक प्रतिनिधित्व के साथ महिला आरक्षण होता तो कांग्रेस की सीटें भी बढ़ जातीं और उसे विपक्ष का नेता बनने का हक़ भी मिल जाता।</p>
<p>उपसंहार में यही कहा जा सकता है कि भाजपा मानकर चलने लगी है कि 2024 में उसकी सीटें काफ़ी कम होने वाली हैं पर उसे यक़ीन है उसका वोट शेयर (कर्नाटक की तरह) पूर्ववत रहेगा। महिला आरक्षण के ज़रिए लंबे समय के लिए उसकी सरकार में वापसी हो सकती है।</p>
<p>देखना यही रह जाता है कि महिला आरक्षण विधेयक कब, कैसे और किस शक्ल में पेश होता है ! शायद राज्य सभा में ही पहले पेश होगा । असली चुनौती भी वहीं है। कृषि क़ानून विधेयक का स्मरण कीजिये। नीतीश कुमार ,केजरीवाल और केसीआर आदि के चेहरे आँखों के सामने तैराइये। हरिवंश नारायण सिंह की नीतीश कुमार के साथ पटना में क्या चर्चा हुई होगी उसका अनुमान लगाइए। अमित शाह की चेतावनी और जाँच एजेंसियों की क्षमताओं का ध्यान कीजिए और अंत में ‘मन की बात’ सुनिए कि 2024 के चुनावों के बाद सत्ता में वापसी के लिए भाजपा क्या-क्या कर सकती है ? क्या विपक्षी पार्टियाँ सरकार के विधेयक का समर्थन कर देंगी ? नहीं करेंगी तो देश की राजनीतिक परिस्थितियां क्या बनेंगी ? सोचकर यह भी देखिए कि लाड़ली-बहनों की उपस्थिति से उज्जवल 823-सदस्यीय नई लोकसभा कैसी नज़र आने वाली है ?</p>
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		<title>राजनीतिक वादे और सुप्रीम कोर्ट की चिंता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राकेश दुबे]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 07 Jul 2023 21:17:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281629.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="राजनीतिक वादे और सुप्रीम कोर्ट की चिंता" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281629.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281629-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281629-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281629-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="राजनीतिक वादे और सुप्रीम कोर्ट की चिंता 11">मध्यप्रदेश सहित पाँच राज्य विधानसभा चुनाव की दहलीज़ पर खड़े हैं। इन राज्यों में एक समान नौटंकी शुरू होने जा रही है, वादों की नौटंकी। यह विडंबना ही है कि जनता के हितों की दुहाई देकर सत्ता में आने पर राजनीतिक दलों द्वारा किए गये वादे और प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। वे दावे तो आसमान [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281629.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="राजनीतिक वादे और सुप्रीम कोर्ट की चिंता" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281629.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281629-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281629-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281629-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="राजनीतिक वादे और सुप्रीम कोर्ट की चिंता 12">



<p>मध्यप्रदेश सहित पाँच राज्य विधानसभा चुनाव की दहलीज़ पर खड़े हैं। इन राज्यों में एक समान नौटंकी शुरू होने जा रही है, वादों की नौटंकी। यह विडंबना ही है कि जनता के हितों की दुहाई देकर सत्ता में आने पर राजनीतिक दलों द्वारा किए गये वादे और प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। वे दावे तो आसमान से तारे तोड़ लाने के करते हैं लेकिन जमीनी हकीकत निराशाजनक ही होती है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि थोड़े से काम को इस तरह प्रचारित किया जाता है जैसे धरती पर स्वर्ग उतर आया हो। जबकि हकीकत में जनता के करों से अर्जित धन को निर्ममता से प्रचार-प्रसार में उड़ाया जाता है।</p>



<p>विकास की प्राथमिकताओं को नजरअंदाज करके सरकारी धन को विज्ञापनों व फिजूलखर्ची में उड़ाने वाली एक राज्य सरकार, दिल्ली सरकार की कारगुजारियों पर शीर्ष अदालत की फटकार को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। अदालत ने सख्त लहजे में कहा भी कि ऐसा क्यों है कि लोगों को मूलभूत सुविधाओं के विस्तार के लिये सरकार के पास पैसा नहीं है? तो फिर विज्ञापनों पर अनाप-शनाप खर्च होने वाला धन कहां से आ रहा है?</p>



<p>दरअसल, दिल्ली सरकार ने शीर्ष अदालत के निर्देश के बावजूद रैपिड रेल परियोजना के लिये आर्थिक योगदान देने में वित्तीय संकट का रोना रोया था। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जनहित की योजनाओं में योगदान करने से कतराने वाली सरकारें  विज्ञापनों तथा अन्य गैर जरूरी काम के लिये धन कहां से ला रही है? यही वजह है कि दिल्ली सरकार की नीयत को भांपते हुए शीर्ष अदालत ने विज्ञापनों पर खर्च किये गये उस धन का विवरण मांगा है जो पिछले तीन वित्तीय वर्षों में व्यय किया गया। ऐसी पूछताछ सभी सरकारों से होना चाहिए।</p>



<p>जानकार सूत्र बता रहे हैं कि जिस रैपिड रेल परियोजना में दिल्ली सरकार ने योगदान देने से मना किया था वह दिल्ली को राजस्थान व हरियाणा से जोड़ सकती है। जिससे सड़कों पर ट्रैफिक के दबाव को कम करने में मदद मिल सकती थी। निश्चय ही यह लोकतंत्र में जनधन के दुरुपयोग की पराकाष्ठा है। शर्मनाक ढंग से गैर उत्पादक कार्यों में अंधाधुंध पैसा लुटाया जा रहा है।</p>



<p>ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जनता को सब्जबाग दिखाकर व मुफ्त का प्रलोभन देकर सत्ता में आये राजनीतिक दलों का वास्तविक चरित्र क्या है? ऐसे दलों की कथनी और करनी की वास्तविकता क्या है? अंधाधुंध विज्ञापनों पर खर्च करके राजनीतिक दल क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या यह प्रचार की भूख है या अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने का असफल प्रयास?</p>



<p>किसी भी राज्य की जनता की याददाश्त इतनी कमजोर भी नहीं कि उसे याद न हो कि वोट मांगते समय पार्टी के सुप्रीमो सरकारों की फिजूलखर्ची और राजनीतिक दलों के थोथे प्रचार पर जनधन खर्च करने पर सवाल उठाते  हैं । जनता ने आप के दावों पर भरोसा भी किया और समर्थन देती है मगर परिणाम वही ढाक के तीन पात रहते है । सारी राज्य सरकार को की रीतियां-नीतियां पुरानी सरकारों के ढर्रे पर चल रही  हैं,जिसके केंद्र में घोटाले हैं कहीं छोटे तो कहीं बड़े । यह स्थिति देश के राजनेताओं के कथनी-करनी के अंतर को भी दर्शाती है। इसी सब से  जनता की उस धारणा को भी बल मिलता  है कि सत्ता में आने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारों का चरित्र एक जैसा ही हो जाता है। यदि पिछले कुछ समय में चुनावों के दौरान मतदान के प्रतिशत में गिरावट दर्ज की गई है तो उसका एक बड़ा कारण राजनेताओं की कथनी-करनी का अंतर भी है।</p>



<p>कमोबेश पूरे देश में ही जनता में सरकारों के प्रति मोहभंग जैसी स्थिति है। लोग अब राजनेताओं की सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं। इस दिशा में शीर्ष अदालत की सचेतक भूमिका की सराहना की जानी चाहिए। निस्संदेह, इससे जनधन के दुरुपयोग की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकेगी।</p>
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		<title>समान नागरिक संहिता भेद करके नहीं लागू हो सकती</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Jul 2023 15:27:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="678" height="452" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="समान नागरिक संहिता भेद करके नहीं लागू हो सकती" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002.jpg 678w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-300x200.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-630x420.jpg 630w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-313x209.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 678px) 100vw, 678px" title="समान नागरिक संहिता भेद करके नहीं लागू हो सकती 13">समान नागरिक संहिता का मुद्दा एक बार फिर उछल कर सामने आया है और इस बार लग रहा है कि इसे लागू करने की भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में से एक की प्रत्याशा शायद पूरी हो जाय। प्रधानमंत्री ने जिस प्रकार इसका समर्थन किया है उससे यह और भी स्पष्ट हो गया है [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="678" height="452" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="समान नागरिक संहिता भेद करके नहीं लागू हो सकती" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002.jpg 678w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-300x200.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-630x420.jpg 630w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230706-WA0002-313x209.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 678px) 100vw, 678px" title="समान नागरिक संहिता भेद करके नहीं लागू हो सकती 14">



<p>समान नागरिक संहिता का मुद्दा एक बार फिर उछल कर सामने आया है और इस बार लग रहा है कि इसे लागू करने की भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में से एक की प्रत्याशा शायद पूरी हो जाय। प्रधानमंत्री ने जिस प्रकार इसका समर्थन किया है उससे यह और भी स्पष्ट हो गया है कि मौजूदा केंद्र सरकार समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए तत्पर है और उस तरफ आगे बढ़ रही है। भारत के विधि आयोग द्वारा इस विषय पर सार्वजनिक नोटिस जारी कर सभी से राय और टिप्पणियां मांगने को नया कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू करना ही माना जा सकता है। बहुत से राजनीतिक प्रेक्षक यह भी मानते हैं कि समान नागरिक संहिता पर बहस की शुरुआत करके सत्तारूढ़ दल एक तरह से अगले चुनावों के लिए एजेंडा तय कर रहा है। विधि आयोग ने पांच साल के अंतराल के बाद अपनी फ़ाइलों में दबा यह मुद्दा फिर उठाया है। बहुत से लोग तो यह भूल भी चुके थे कि 21वें विधि आयोग ने अगस्त 2018 में इसी मुद्दे पर एक परामर्श पत्र जारी किया था। विधि आयोग की नई अधिसूचना में कहा गया है कि “विषय की प्रासंगिकता और महत्व के साथ-साथ इससे संबंधित अदालती आदेशों को देखते हुए, भारत के 22वें विधि आयोग ने इस विषय पर फिर से विचार करना आवश्यक समझा है।” आयोग ने अपने नोटिस के जरिए जनता के विचारों को आमंत्रित किया है और इस संबंध में धार्मिक संगठनों से भी पक्ष रखने का कहा है। हमेशा यही कहा जाता रहा है कि इस मुद्दे पर आम सहमति के साथ आगे बढ़ना चाहिए तथा इसे सभी दलों, सभी पक्षों, राजनीतिज्ञों, ग़ैर राजनीतिज्ञों और जनता के साथ इस पर व्यापक स्तर पर चर्चा के बाद ही कोई कदम उठाया जाना चाहिये। इसके लिए सरकार ने चर्चा छेड़ दी है। उधर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि विशेषज्ञों की एक समिति ने राज्य में इसे लागू करने के वास्ते मसौदा तैयार कर लिया है।</p>



<p>भले ही भारत में सभी नागरिकों के लिए एक आपराधिक संहिता लागू है, मगर समान नागरिक संहिता हमेशा ही भारतीय राजनीति में एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। संविधान सभा में भी इस पर गंभीर चर्चा हुई थी जब इसे भारतीय संविधान में निदेशक सिद्धांत के रूप में शामिल किया गया था। भारतीय संविधान के अध्याय चार के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि, &#8220;राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।&#8221; समान नागरिक संहिता का मतलब है प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिए एक समान कानून, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। अगर ये लागू होता है तो शादी, तलाक़, बच्चा गोद लेना और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में सभी भारतीयों के लिए एक जैसे नियम होंगे। समान नागरिक संहिता को लागू करना 1998 और 2019 के चुनावों के लिए भाजपा के चुनाव घोषणापत्र का हिस्सा रहा है। नवंबर 2019 में, संसद नारायण लाल पंचारिया ने गैर सरकारी बिल के रूप में इसे संसद में पेश किया था, लेकिन विपक्ष के विरोध के कारण इसे वापस ले लिया। मार्च 2020 में सांसद किरोड़ीलाल मीणा फिर से ऐसा निजी बिल लेकर आए, लेकिन इसे संसद में पेश नहीं किया गया। विवाह, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार से संबंधित कानूनों में समानता की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी अनेक याचिकाएं दायर हो चुकी हैं। विधि आयोग के 2018 के परामर्श पत्र में भी कहा गया था कि भारत में विभिन्न पारिवारिक कानून व्यवस्थाओं के भीतर कुछ प्रथाएं महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करती हैं और इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। तलाक के बाद गुजारे भत्ते को लेकर 1985 में शाह बानो मामले में एक मुस्लिम महिला के अधिकारों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि &#8220;संसद को एक सामान्य नागरिक संहिता की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए क्योंकि यह एक ऐसा साधन है जो राष्ट्रीय सद्भाव और कानून के समक्ष नागरिकों को समानता सुनिश्चित करता है।&#8221; एक अन्य मामले में 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ईसाई कानून के तहत ईसाई महिलाओं को अपने बच्चों के &#8220;प्राकृतिक अभिभावक के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है&#8221;,  भले ही हिंदू अविवाहित महिलाएं अपने बच्चे की &#8220;प्राकृतिक अभिभावक&#8221; हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तब भी कहा था कि समान नागरिक संहिता &#8220;एक संवैधानिक अपेक्षा” बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की व्याख्या भी की, और उन महिलाओं को संपत्ति में विरासत का अधिकार और पैतृक संपत्ति में समान सहदायिक अधिकार को मान्यता दी थी जो 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन के समय और उसके बाद जीवित थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2021 में संसद से समान पारिवारिक कानून बनाने पर विचार करने के लिए कहा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि देश के नागरिक विभिन्न विवाह कानूनों के कारण आ रही बाधाओं के बिना &#8220;स्वतंत्र रूप से मिल-जुल सकें&#8221;। उच्च न्यायालय ने धर्मांतरण और अंतरधार्मिक विवाह से संबंधित एक मामले में कहा था कि “समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगी।” उत्तराधिकार के मुद्दे को 1985 में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम पर 110वीं रिपोर्ट में भी विधि आयोग ने पारसी सहित विभिन्न धर्मों के बीच उत्तराधिकारियों की परिभाषा में बदलाव और विरासत कानूनों को सुव्यवस्थित करने की सिफारिश की थी। लेकिन कई प्रस्तावित परिवर्तनों को धार्मिक समुदायों के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा, और अधिनियम में संशोधन पारित नहीं हो सका। इन कठिनाइयों को समझते हुए 2018 में विधि आयोग ने बीच का रास्ता सुझाया कि समान नागरिक संहिता को देखने के बजाय विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों में &#8220;जहां भी आवश्यक हो, टुकड़ों टुकड़ों में बदलाव करके अधिकारों को समेटा जा सकता है&#8221;। परंतु वह भी संभव नहीं हुआ। अब, न्यायमूर्ति ऋतुराज अवस्थी की अध्यक्षता वाले 22वें विधि आयोग ने परामर्श के लिए जारी नए सिरे से नोटिस के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुद्दे पर बहस और चर्चा कैसे आगे बढ़ती है?</p>



<p>ब्रिटेन और अधिकांश यूरोप में, जो अब बहु-धार्मिक समाज हैं, ईसाई, मुस्लिम, यहूदी, हिंदू आदि सभी को समान आपराधिक, नागरिक और व्यक्तिगत कानूनों का पालन करना पड़ता है। ऐसे में स्वाभाविक ही यह सवाल पूछा जा सकता है कि भारतीय संविधान के बनने के इतने लंबे समय बाद भी यहां के नागरिक समान नागरिक संहिता अपनाने के प्रति इतने अनिच्छुक क्यों हैं और क्यों नहीं एक धर्मनिरपेक्ष संविधान के साथ एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा साकार हो पा रही है? सबसे प्रबल विरोध इस तर्क के साथ होता है कि समान नागरिक संहिता लोगों के धर्म में हस्तक्षेप करेगी। यह धार्मिक स्वतंत्रता तथा रस्म-रिवाज़ में दखलअंदाज़ी होगी। मगर दूसरी तरफ यह सवाल भी उठाया जाता है कि क्या रस्म-रिवाज़ नागरिकों को वे अधिकार पाने से महरूम रख सकते हैं जिन्हें संविधान सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित करता है? राज्य तथा सभी नागरिकों का रिश्ता एक ही स्तर पर क्यों नहीं होना चाहिये। जब संविधान सबकी समानता की बात करता है तब स्त्री और पुरुष के बीच रस्म रिवाजों जनित असमानता क्योंकर स्वीकार की जानी चाहिये और सबको एक जैसे अधिकार क्यों न मिलने चाहिये, तथा सबके लिए एक जैसे दायित्व क्यों न हों। सभी मानते हैं कि समान नागरिक संहिता आगे बढ़ने वाला प्रगतिशील कदम होगा। व्यक्तिगत कानून काफी हद तक पितृसत्तात्मक और महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण होते हैं। समान नागरिक संहिता से महिलाओं को स्वतंत्रता और समानता सुनिश्चित होगी। पढे लिखे और समझदार मुसलमानों का भी कहना है कि इससे उनके ईमान पर कोई खतरा नहीं है। हिंदुस्तान के मुसलमानों को आगे बढ़ कर यह अधिकार लेना चाहिए और पुरानी मनोदशा से बाहर निकल कर पढ़-लिख कर देश की आर्थिक मुख्य धारा में आना चाहिये।</p>



<p>सभी नागरिकों के बीच एक समान कानून लागू होने से राष्ट्रीय एकता की भावना को बढ़ावा मिलेगा और उससे एक ऐसे धर्मनिरपेक्ष समाज की स्थापना सुनिश्चित होगी जिसमें प्रत्येक नागरिक को अपनी निजी आस्था के साथ अन्यों के साथ बराबरी का हक मिलेगा। इसी बीच एक संसदीय स्थायी समिति ने भी समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर सोमवार को विधि आयोग और विधि मंत्रालय के प्रतिनिधियों के साथ विमर्श किया है। मगर उसमें दिया गया संसदीय समिति के अध्यक्ष का बयान इस मुद्दे पर नया विवाद खड़ा कर सकता है। संसदीय समिति के अध्यक्ष का पूर्वोत्तर सहित आदिवासियों को किसी भी संभावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के दायरे से बाहर रखने की वकालत करना सरकार के कदम को धक्का पहुंचाने वाला ही माना जाएगा। उनकी यह टिप्पणी कि आदिवासियों को किसी भी प्रस्तावित समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखा जा सकता है क्योंकि सभी कानूनों में अपवाद होते हैं। यह कहना कि केंद्रीय कानून कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में उनकी सहमति के बिना लागू नहीं होते हैं केंद्र की बीजेपी सरकार पर लगने वाले इस आरोप को आधार देता है कि समान नागरिक संहिता सिर्फ मुस्लिम समुदाय पर केंद्रित कर रही है। इसलिए यह पूछा जाना समीचीन है कि क्या यही स्टैन्ड केंद्र सरकार लेने वाली है? यदि ऐसा होता है तो समान नागरिक संहिता की अवधारणा ही समाप्त हो जाती है। संहिता यदि सब पर एक समान लागू नहीं की जाती है तो वह सत्तारूढ़ दल की नीयत में खोट का ही प्रदर्शन होगा और सभी विवेकशील लोगों को आशा है कि ऐसा नहीं होगा।                                               </p>
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		<title>फिर राज्यपाल पद बौना साबित हुआ ?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राकेश दुबे]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 03 Jul 2023 16:17:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="714" height="429" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="फिर राज्यपाल पद बौना साबित हुआ ?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529.jpeg 714w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529-300x180.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529-696x418.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529-699x420.jpeg 699w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529-313x188.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 714px) 100vw, 714px" title="फिर राज्यपाल पद बौना साबित हुआ ? 15">पहली बार संविधान की हदें पार की गई हैं कि तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन.रवि ने,पहले कुछ  निर्णय लिया फिर उसे पलट दिया । उन्होंने तमिलनाडु के  मुख्यमंत्री स्टालिन की सलाह के बिना ही, कथित भ्रष्ट मंत्री वी. सेंथिल बालाजी को बर्खास्त कर दिया फिर केंद्र के इशारे पर पूर्व के आदेश को स्थगित भी कर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="714" height="429" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="फिर राज्यपाल पद बौना साबित हुआ ?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529.jpeg 714w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529-300x180.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529-696x418.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529-699x420.jpeg 699w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281529-313x188.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 714px) 100vw, 714px" title="फिर राज्यपाल पद बौना साबित हुआ ? 16">



<p>पहली बार संविधान की हदें पार की गई हैं कि तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन.रवि ने,पहले कुछ  निर्णय लिया फिर उसे पलट दिया । उन्होंने तमिलनाडु के  मुख्यमंत्री स्टालिन की सलाह के बिना ही, कथित भ्रष्ट मंत्री वी. सेंथिल बालाजी को बर्खास्त कर दिया फिर केंद्र के इशारे पर पूर्व के आदेश को स्थगित भी कर दिया । भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से दागदार मंत्री न्यायिक हिरासत में है। प्रवर्तन निदेशालय की जांच के बाद मंत्री गिरफ्तार किए गए , लेकिन जेल की बजाय वह एक निजी अस्पताल में हैं। कहा जा रहा है कि उनके दिल का ऑपरेशन किया गया है।</p>



<p>राज्यपाल के सामने जांच के जो तथ्य रखे गए, उनमें भ्रष्टाचार के आरोप, नौकरी के बदले नोट, धन शोधन और अन्य घोटालों को गंभीर पाया गया। मंत्री जांच की प्रक्रिया, साक्ष्यों और न्यायिक कार्रवाई को प्रभावित कर सकते हैं, लिहाजा राज्यपाल ने अपना ‘प्रसाद’, ‘प्रसन्नता’ और ‘कृपा’ (प्लेजर) वापस ले ली और मंत्री को बर्खास्त कर दिया। बेशक संविधान के अनुच्छेद 164 में उल्लेख है कि मंत्री राज्यपाल के ‘प्रसादपर्यन्त’ ही अपने पद पर रह सकता है। राज्यपाल ने उसी संवैधानिक भावना को शाब्दिक तौर पर ग्रहण किया और मंत्री को बर्खास्त करने का निर्णय लिया। सर्वोच्च अदालत और उच्च न्यायालय ने कई बार संविधान के विवेच्य अनुच्छेद की व्याख्या कर राज्यपाल की भूमिका और उनकी संवैधानिक शक्तियों को स्पष्ट किया है। दरअसल खुद राज्यपाल न तो किसी को मंत्री बना सकता है और बर्खास्त करना तो बिल्कुल ‘असंवैधानिक’ है। वह सिर्फ मुख्यमंत्री और कैबिनेट की ‘सलाह’ और ‘सिफारिश’ पर ही काम कर सकते हैं।</p>



<p>इसका उल्लेख भी अनुच्छेद 164 में है। संविधान ने राज्यपाल को कोई भी कार्यकारी शक्ति नहीं दी है। हालांकि गणतांत्रिक और स्वतंत्र भारत में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को ही बर्खास्त किया था, लेकिन 1994 के एसआर बोम्मई केस और 2020 के शिवराज सिंह चौहान प्रकरण में सर्वोच्च अदालत की ऐतिहासिक स्थापना सामने आईं कि बहुमत का फैसला सदन में ही किया जाएगा। उसी के आधार पर मुख्यमंत्री और सरकार का स्थायित्व तय होगा। राज्यपाल अपने आधार पर ही मुख्यमंत्री या मंत्री को बर्खास्त नहीं कर सकते। बहरहाल इन न्यायिक निर्णयों के बाद यह घोर असंवैधानिक परंपरा समाप्त हुई। अब तमिलनाडु के राज्यपाल ने संविधान और उसकी भाषा के साथ खिलवाड़ करते हुए मंत्री को बर्खास्त किया है। हालांकि गुरुवार देर रात ‘राजभवन’ ने मुख्यमंत्री स्टालिन को पत्र लिख कर सूचित किया कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के आग्रह पर एडवोकेट जनरल तथा अन्य संविधान विशेषज्ञों की सलाह ली जाएगी, लिहाजा फैसले को फिलहाल रोक लिया गया है। यह कैसा मजाक है?</p>



<p>राज्यपाल एक बार असंवैधानिक, क्रूर और अभूतपूर्व फैसला ले चुके हैं। अब वह उसे रोक लें अथवा अदालत उसे खारिज कर दे, सवाल यह है कि राज्यपाल सरीखे संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति ‘पूर्वाग्रह’ के तहत फैसले कैसे ले सकता है? तमिलनाडु में राज्यपाल रवि और मुख्यमंत्री स्टालिन के बीच, लंबे अंतराल से, तनावपूर्ण संबंध रहे हैं, क्योंकि राज्यपाल जानबूझ कर, विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर, कुंडली मार कर बैठे रहे हैं। राज्यपाल-मुख्यमंत्री संबंध तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब आदि राज्यों में भी बेहद तनावपूर्ण हैं।</p>



<p>ये संबंध केंद्र-राज्य के रिश्तों और देश के संघीय ढांचे को सवालिया बनाते हैं। सभी जानते हैं कि राज्यपाल भारत सरकार का प्रतिनिधि होता है और राज्य में विपक्षी दल की सरकार हो सकती है। यहां जिन राज्यों का जिक्र आया है, उन राज्यों में विपक्ष के ऐसे दलों की सरकारें हैं, जो बुनियादी तौर पर भाजपा-विरोधी हैं। ऐसे में खुन्नस की भावना से काम किया जाएगा, तो वह देशहित में नहीं होगा। संविधान की गरिमा और प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं होगा और आम नागरिक को सहज न्याय प्राप्त नहीं होगा। दागदार मंत्री कानून के कठघरे में है। मुख्यमंत्री उन्हें बिना विभाग का मंत्री रखना चाहते हैं, तो यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल का हालिया उदाहरण हमारे सामने है, जिन्होंने सत्येन्द्र जैन को कई माह तक मंत्री बनाए रखा, हालांकि वह जेल में कैद थे। संविधान की आड़ में सियासत खेलना उचित नहीं है।</p>


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		<title>जय पराजयों के बीच: राहुल गांधी की सुदृढ़ता</title>
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		<dc:creator><![CDATA[सुसंस्कृति परिहार]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 19 Jun 2023 07:38:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="720" height="476" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="जय पराजयों के बीच: राहुल गांधी की सुदृढ़ता" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak.jpg 720w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak-300x198.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak-696x460.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak-635x420.jpg 635w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak-313x207.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 720px) 100vw, 720px" title="जय पराजयों के बीच: राहुल गांधी की सुदृढ़ता 17">आज राहुल गांधी का जन्मदिन है। यह बताने की ज़रूरत नहीं है वे कौन हैं?सारी दुनिया उन्हें कांग्रेस के लाड़ले युवा नेता के रुप में जानती है ।उनका बचपना दादी के प्रधानमंत्री काल में बीता किशोर अवस्था आने से पूर्व ही दादी की कारुणिक मौत को उन्होंने देखा।पिता राजीव गांधी को कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="720" height="476" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="जय पराजयों के बीच: राहुल गांधी की सुदृढ़ता" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak.jpg 720w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak-300x198.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak-696x460.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak-635x420.jpg 635w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/10/rahulgandhikarnatak-313x207.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 720px) 100vw, 720px" title="जय पराजयों के बीच: राहुल गांधी की सुदृढ़ता 18"><p>आज राहुल गांधी का जन्मदिन है। यह बताने की ज़रूरत नहीं है वे कौन हैं?सारी दुनिया उन्हें कांग्रेस के लाड़ले युवा नेता के रुप में जानती है ।उनका बचपना दादी के प्रधानमंत्री काल में बीता किशोर अवस्था आने से पूर्व ही दादी की कारुणिक मौत को उन्होंने देखा।पिता राजीव गांधी को कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री बनाया ।मां के सख़्त विरोध के बावजूद वे राजनीति में आए और एक दिन बम ब्लास्ट में दुनिया से कूच भी कर गए। कांग्रेस की मंशानुरूप काफी सोच-विचार के बाद मां सोनिया ने राजनीति में पदार्पण किया वे कांग्रेस अध्यक्ष बनीं और उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने अच्छी सफलता अर्जित की ।वे प्रधानमंत्री चुनी गई पर सुषमा स्वराज और उमा भारती का मान रखते हुए यह पद छोड़ा। भाजपा और संघ तब यही कहती रही कि सोनिया विदेशी मूल की हैं राहुल प्रियंका में से कोई होता तो उन्हें आपत्ति नहीं होती।</p>
<p>बहरहाल, इस बात की चुनौती स्वीकार करते हुए राहुल ने अपना सारा समय कांग्रेस को समर्पित कर दिया वे कांग्रेस के महासचिव और अध्यक्ष रहे ।लोकसभा चुनाव बराबर जीतते रहे। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह उन्हें मंत्री बनाना चाहते थे वे नहीं बने जबकि उनके हम उम्र तमाम साथी मंत्री बने ।बाद में अपनी दूसरी पारी में  मनमोहन सिंह जी राहुल को प्रधानमंत्री बनाने आतुर रहे पर राहुल तैयार नहीं हुए। कतिपय लोगों का ऐसा ख्याल है कि यदि उन्होंने तब जिम्मेदारी संभाल ली होती तो कांग्रेस को ये राहु केतु परेशान ना कर पाते लेकिन उनकी सहृदयता ने उन्हेंपीछे धकेल दिया और नकेल ऐसे लोगों को मिल गई जो झूठ की फसल लहलहाने में आज तक लगे हैं।ऐसे झूठे और मतलबी दौर में वे पप्पू कहलाए। अफ़सोसनाक ये भी उनके अपनी पार्टी के साथियों ने भी दलबदल कर ये संदेश भी दिया कि वे आज के आचरण को अपनाएं। लेकिन वे दृढ़ संकल्पित हैं अपने परिवार के सदाचार के ताबीज के साथ और यह कहने में संकोच नहीं करते कि उनकी शादी क्रांग्रेस पार्टी के साथ हो चुकी है। कांग्रेस से हो रहे पलायन को वे सता सुख की भूख मानते हैं।इसके लिए इस दौर को दोषी ठहराते है।</p>
<p>उनकी राजनैतिक रणनीतियों में जमीनी स्तर की सक्रियता पर बल देना, ग्रामीण जनता के साथ गहरे संबंध स्थापित करना और कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिश करना प्रमुख हैं।इन दिनों कांग्रेस निरंतर पिछड़ रही है लेकिन वे पार्टी को उठाने निरंतर प्रयास जारी रखे हैं ।उनके सुझावों पर जिस तरह भाजपा देर सबेर अमल करती है वह राहुल की दूरदर्शिता का परिचायक है।वे कांग्रेस की हार पर निराश नहीं होते बल्कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहते हैं -&#8221; कि उम्मीद न हारें। उन्होंने कहा, &#8220;डरने की ज़रूरत नहीं है, हम मेहनत करते रहेंगे और अंततः जीत हमारी ही होगी।&#8221;यकीनन वे अब पके हुए राजनीतिज्ञ हैं ।कठिन संघर्षों के बीच से निकला सुदृढ़ व्यक्तित्व है राहुल का।</p>
<p>आज नहीं तो कल राहुल गांधी का यह विकट संघर्ष कांग्रेस को उत्कर्ष तक ले जाएगा ।ऐसी उम्मीद राजनैतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी जताई है।परले दर्जे की झूठी राजनीति का खेल अब समाप्ति की ओर है ।बंगाल ने भाजपा का चाल चरित्र और चेहरा जिस तरह उजागर कर दिया उसकी आवाज दूर तलक तक पहुंची है भाजपा से घर वापसी का दौर शुरू हो चुका है उनकी कठिनाई भरी भारत जोड़ो यात्रा ने देश भर मोहब्बत का जो पैगाम दिया है वह अनमोल है देशवासियों को इसकी ज़रूरत थी।इस यात्रा से भारत सरकार परेशान हो गई उन्हें अडानी की लूट पर बोलने नहीं दिया गया तथा एक कूट रचित प्लान में संसद से बाहर कर दिया। वे और मुखर हुए देश ही नहीं विदेश में उनका जलवा कायम हुआ। कर्नाटक की हार से बुरी तरह विक्षिप्त सरकार इन दिनों बौखलाई हुई है।जबकि राहुल गांधी अपनी मोहब्बत की दूकान को चमकाकर भारतीय संस्कृति के सनातन स्वरूप को बल दे रहे हैं।</p>
<p>लगता है अब 2024 आने से पहले हालत में बहुत बड़ा परिवर्तन आयेगा तब राहुल गांधी मज़बूत स्थिति में होंगे।जन प्रतिरोध का सर्वाधिक फायदा कांग्रेस को ही मिलेगा। कहते हैं झूठे का मुंह काला और झूठ ज्यादा दिन नहीं टिकता ।सत्य ही अंततः विजयी होता है। राहुल गांधी के इन साहसी प्रयासों का सलाम। वे अप्रतिम और दृढ़ निश्चयी है वे अपने अभियान में कारगर होकर देश में उन ताकतों को नेस्तनाबूद करेंगे जो मुल्क को बर्बाद कर रहे हैं।</p>
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		<title>डॉक्टरों के ट्रांसफर के विरोध में कांग्रेस ने किया प्रदर्शन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजकुमार सिंह परिहार]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 Jun 2023 15:59:25 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1280" height="720" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="डॉक्टरों के ट्रांसफर के विरोध में कांग्रेस ने किया प्रदर्शन" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004.jpg 1280w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-300x169.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-1024x576.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-768x432.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-696x392.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-1068x601.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-747x420.jpg 747w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-313x176.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" title="डॉक्टरों के ट्रांसफर के विरोध में कांग्रेस ने किया प्रदर्शन 19">बागेश्वर- एक साथ कई डॉक्टरों के स्थानांतरण और अस्पताल में ओटी की वैकल्पिक व्यवस्था की मांग को कांग्रेस ने प्रदेश सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। उन्होंने कहा कि इससे मरीजों की परेशानी बढ़ जाएगी। इसलिए आदेश को तुरंत प्रभाव से रद्द किए जाने की मांग को लेकर सरकार का पुतला दहन किया। बागेश्वर एसबीआई [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1280" height="720" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="डॉक्टरों के ट्रांसफर के विरोध में कांग्रेस ने किया प्रदर्शन" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004.jpg 1280w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-300x169.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-1024x576.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-768x432.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-696x392.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-1068x601.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-747x420.jpg 747w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230612-WA0004-313x176.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" title="डॉक्टरों के ट्रांसफर के विरोध में कांग्रेस ने किया प्रदर्शन 20">



<p>बागेश्वर- एक साथ कई डॉक्टरों के स्थानांतरण और अस्पताल में ओटी की वैकल्पिक व्यवस्था की मांग को कांग्रेस ने प्रदेश सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। उन्होंने कहा कि इससे मरीजों की परेशानी बढ़ जाएगी। इसलिए आदेश को तुरंत प्रभाव से रद्द किए जाने की मांग को लेकर सरकार का पुतला दहन किया।</p>



<p>बागेश्वर एसबीआई तिराहे पर कांग्रेस पार्टी के जिलाध्यक्ष भगवत सिंह डसीला के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार व प्रदेश के मुख्यमंत्री व भाजपा के स्थानीय जनप्रतिनिधियों के कुशासन व जनपद से 6 डॉक्टरों का एक साथ ट्रांसफर किए जाने साथ ही जिला चिकित्सालय में ऑपरेशन थिएटर का बंद होने और अल्ट्रासाउंड में हुई रही धांधली पर अभी तक मजिस्ट्रेट जांच का ना होने से नाराज कांग्रेस कार्यकर्ताओ ने विरोध प्रदर्शन करते हुए सरकार का पुतला दहन किया।</p>



<p>उन्होंने कहा की जनपद में लगातार प्रदेश सरकार की मनमानी से जिला अस्पताल का हाल बेहाल हो गया है। साथ ही जिला अस्पताल के जन औषधि केंद्र पर मरीजों को दवाइया तक नही मिल रही है जन औषधि केंद्र मात्र शोपीस बन गया है। लेकिन प्रदेश के अंधी बेहरी सरकार की आंखे खोलने के के बाद भी अनदेखा कर रही है। जिसे कांग्रेस पार्टी किसी भी रूप में बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने कहा की स्थानीय जनप्रतिनिधि भी इसके लिए जिमेदार है वह भी इतना होते देख उसे अनदेखा कर रहे है अपने इलाज के लिए ये लोग बाहर जा रहे है पर गरीब स्थानीय जनता की इनको कोई सुध नहीं है। उन्होंने कहा की इस कुशासन से भारतीय जनता पार्टी की भ्रष्टतम सरकार का दोहरा चरित्र उजागर होता है तथा जनपद में हो रही स्वास्थ्य संबंधित अव्यवस्थाओं को लेकर पुतला दहन कर सरकार की नाकामी को जनता के सम्मुख रखा जायेगा।</p>



<p>आपको बताते चलें कि बागेश्वर जिले के चार डॉक्टर स्थानांतरित हो गए हैं। इनमें तीन डॉक्टर जिला अस्पताल के हैं। एक एसीएमओ का भी स्थानांतरण हुआ है। स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के अनुसार जिला अस्पताल में कार्यरत डॉ. एलएस बृजवाल का तबादला सितारगंज हुआ है। निश्चेतक डॉ. विकास वर्मा का देहरादून, डॉ. गायत्री पांगती का तबादला नैनीताल हुआ है। एसीएमओ डॉ. एनएस टोलिया का स्थानांतरण हल्द्वानी, सीएचसी बैजनाथ के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. राजेश गुंज्याल का तबादला धारचूला, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कंधार के प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. नरेंद्र कीर्ति का तबादला ऊधमसिंह नगर हुआ है। चार डॉक्टर का तबादला कई स्थानों से जिले में हुआ है। जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. वीके टम्टा ने बताया कि फिलहाल एक डॉक्टर प्रतिस्थानी के तौर पर जिला अस्पताल को मिले हैं।</p>



<p>कांग्रेस ने लगाया कोतवाल पर दुर्व्यवहार का आरोप:</p>



<p>प्रदेश सरकार के पुतला दहन कार्यक्रम के दौरान कोतवाल कैलाश नेगी व कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हुआ विवाद। कांग्रेस कार्यकर्ताओ ने कोतवाल पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए पुलिस अधीक्षक से शिकायत कर कार्यवाही की मांग की। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि कोतवाल द्वारा पुतले को लात मारकर गिराया गया और उनके इस आन्दोलन को नुक़सान पहुँचाने का प्रयास किया। वही इस दौरान उनके द्वारा कोतवाल और बागेश्वर पुलिस के खिलाफ नारे बाजी भी की गई। इस मौके पर महिला जिलाध्यक्ष गोपा धपोला, कवि जोशी, किशन कठायत, गोकुल परिहार, राजेंद्र परिहार, हरीश परिहार, लक्ष्मी धर्मशक्तु, हरीश त्रिकोटी, नवीन, धना रौतेला, ललित बिष्ट, कुन्दन गिरी, नवीन साह आदि मौजूद रहे।</p>
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