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	<title>समाज &#8211; The Harishchandra &#8211; Hindi</title>
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		<title>भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 13 Sep 2023 15:02:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="980" height="603" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds.jpg 980w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-300x185.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-768x473.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-696x428.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-683x420.jpg 683w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-356x220.jpg 356w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-313x193.jpg 313w" sizes="(max-width: 980px) 100vw, 980px" title="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट 4">भारत में अब पक्षियों की सुध ली जाने लगी है। हालांकि इस देश में वन्य प्राणियों, जिनमें पक्षी भी शामिल हैं, के संरक्षण की सनातन परंपरा रही है। पक्षी न केवल प्रकृति के शक्तिशाली सांस्कृतिक प्रतीक होते हैं बल्कि वे प्रकृति की तंदरुस्ती का बहाली प्रकार पता भी देते हैं। विशेषकर सैकड़ों किलोमीटर दूर से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="980" height="603" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds.jpg 980w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-300x185.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-768x473.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-696x428.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-683x420.jpg 683w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-356x220.jpg 356w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/09/Indian-Birds-313x193.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 980px) 100vw, 980px" title="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट 8">


<p>भारत में अब पक्षियों की सुध ली जाने लगी है। हालांकि इस देश में वन्य प्राणियों, जिनमें पक्षी भी शामिल हैं, के संरक्षण की सनातन परंपरा रही है। पक्षी न केवल प्रकृति के शक्तिशाली सांस्कृतिक प्रतीक होते हैं बल्कि वे प्रकृति की तंदरुस्ती का बहाली प्रकार पता भी देते हैं। विशेषकर सैकड़ों किलोमीटर दूर से खास मौसम में अल्प प्रवास के लिए उड़ कर आने वाले पक्षियों के अध्ययन का हमारे यहां लंबा इतिहास रहा है। भारत के अपने पक्षियों की स्थिति पर अब पहली बार विस्तृत विवेचना करती रिपोर्ट का आना शुभ संकेत है। भारत में पाए जाने वाली अधिकांश पक्षी प्रजातियों की स्थिति का मूल्यांकन करती ‘स्टेट ऑफ इंडियाज़ बर्ड्स’ की दूसरी रिपोर्ट पिछले दिनों जारी हुई है जो अपनी सर्वव्यापकता और पारिस्थितिक महत्व के साथ, एक व्यापक, राष्ट्रीय स्तर के मूल्यांकन के रूप में, देश के पक्षियों की संरक्षण आवश्यकताओं के बारे में जानकारी देती है। जैव विविधता के नुकसान को रोकने और पारिस्थितिक तंत्र को बहाल करने का संकल्प लेते हुए भारत ने दिसंबर 2022 में ‘द स्टेट ऑफ बर्ड्स द ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क’ (जीबीएफ) को भी अपनाया है। इस फ्रेमवर्क के चार लक्ष्यों में से एक है खतरे में पड़ी पक्षी प्रजातियों की मानव-प्रेरित विलुप्ति को रोकना। इससे पहले वर्ष 2020 में पक्षियों की प्रवासी प्रजातियों पर  गांधीनगर में हुए कन्वेंशन में भारत के पक्षियों की स्थिति पर पहली रिपोर्ट जारी हुई थी, जिसके साथ, हमारा देश उन देशों के समूह में शामिल हो गया जो नियमित रूप से अपने पक्षियों की स्थिति का आकलन करते हैं। अब पक्षियों की स्थिति का आकलन करती यह दूसरी रिपोर्ट आई है। इस नई रिपोर्ट में 2020 के बाद के चार साल के दौरान एकत्र किये गए अतिरिक्त 20 मिलियन आंकड़ों को जोड़कर, पक्षियों की स्थिति का मूल्यांकन किया गया है। वर्ष 2020 की पहली रिपोर्ट में 867 पक्षी प्रजातियों के मुक़ाबले इस रिपोर्ट में 942 प्रजातियों का अध्ययन शामिल हैं। इसके साथ ही पिछली बार की अपेक्षा वैज्ञानिक विश्लेषण पद्धति में भी कई परिशोधन किये गए हैं जिससे हालात को बेहतर तरीके से समझ जा सके।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://1.bp.blogspot.com/-V4vsNjs6Kw4/XmuJgEDOb3I/AAAAAAAAAWg/zR-oCY-LBHog1V2fcngoUzpecC9uPPB8ACLcBGAsYHQ/s1600/thirsty-birds.jpg" width="1200" height="800" alt="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट" title="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट 5"></p>
<p>अपनी जैव विविधता के हालात का आकलन करने की सभी देशों को आवश्यकता है, लेकिन वह किस तरीके से किया जाए यह एक जबरदस्त चुनौती सबके सामने होती है। वैज्ञानिकों ने प्रमाणित किया है कि जैव विविधता का आकलन पक्षियों के हालात पर अध्ययन से किया जा सकता है। पक्षी हर जगह होते हैं। उन्हें अपेक्षाकृत आसानी से पहचाना जा सकता है। इसलिए उन्हें हम समग्र रूप से जैव विविधता के संकेतक के रूप में भी देख सकते हैं। क्योंकि वे गतिशील होते हैं इसलिए उन पर परिवर्तन का असर होता है। उनकी प्रजातियां एक सार्थक पैटर्न दिखा सकती है। उन पर हो रहे प्रभाव आम तौर पर अन्य समूहों को भी प्रतिबिंबित करते हैं। सबसे बढ़ कर तो यह बात कि पक्षियों की निगरानी अपेक्षाकृत आसानी से की जा सकती है। इन्हीं कारणों से दुनिया भर में पक्षियों की स्थिति का आकलन करने के प्रयास किये जाते हैं। आम तौर पर बड़े पैमाने पर और वैज्ञानिक तरीके से नागरिक निगरानी से मिलने वाली जानकारी पर इस तरह के आकलन आधारित होते हैं। भौगोलिक या टैक्सोनोमिक दायरे में अधिक सीमित विशिष्ट वैज्ञानिक निगरानी कार्यक्रम इनके पूरक होते हैं। जैसा कि दुनिया भर में ऐसे अन्य सभी आकलनों के साथ होता है, भारत में भी बड़े पैमाने पर मूल्यांकन के पीछे पक्षी प्रेमियों और प्रकृति से प्यार करने वाले उत्साही और भावुक लोगों का योगदान होता है। वे पक्षियों पर नज़र रखते हैं, अपने अवलोकनों का रिकॉर्ड रखते हैं और उन्हें सार्वजनिक प्लेटफार्मों पर उपलब्ध कराते हैं। इस प्रकार का नागरिक योगदान एकमात्र तरीका है जिससे जैव विविधता आकलन के लिए जानकारी एकत्र की जा सकती है। भले ही वह कम या अधिक समन्वित तरीके से हो सकता है। इस बार की ‘स्टेट ऑफ इंडियाज़ बर्ड्स’ रिपोर्ट देश भर के विभिन्न कोनों में फैले 30,000 पक्षी प्रेमियों से प्राप्त 30 मिलियन रिकॉर्ड पर आधारित है। वैज्ञानिक जानकारी जुटाने में जन भागीदारी का यह अनुपम उदाहरण है। इसलिए इन आकलनों का समग्र परिणाम काफी हद तक वैश्विक प्रवृत्ति को भी दर्शाता है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://tfipost.in/wp-content/uploads/sites/2/2021/10/pigeons-750x375.jpg" width="750" height="375" alt="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट" title="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट 6"></p>
<p>इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले शोधकर्ताओं ने, 13 संरक्षण और अनुसंधान संगठनों के सहयोग से, 942 प्रजातियों का विश्लेषण किया, जिनके पास उनकी संरक्षण प्राथमिकता को उच्च, मध्यम या निम्न के रूप में निर्धारित करने के लिए पर्याप्त आंकड़े थे। यह डेटा देश भर में फैले बर्ड वाचर्स ने संकलित किये थे। उन्होंने अपने-अपने इलाकों में कम से कम 30 मीटर की दूरी से पक्षियों का अवलोकन किया एर अपने अपने अवलोकनों के परिणाम ऑनलाइन डेटाबेस में दाखिल किये। इस रिपोर्ट ने भारत में लगभग 1,350 पक्षी प्रजातियां दर्ज की हैं और 942 पक्षी प्रजातियों पर भारत के पक्षी प्रेमियों और संरक्षण संगठनों से एकत्र किए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया है। यह रिपोर्ट पक्षियों के हालात का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए हमें चेताते हुए पक्षियों की 178 प्रजातियों के संरक्षण के लिए प्राथमिकता से तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता बताती है। इसमें यहां नियमित रूप से पाई जाने वाली लगभग 1,200 प्रजातियों में से में 101 प्रजातियों को उच्च संरक्षण चिंता के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यह रिपोर्ट जिन प्रजातियों के लिए उच्च संरक्षण चिंता बताती है उनमें 34 ऐसी प्रजातियां हैं जो प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (आईयूसीएन) की “लाल सूची” में दर्ज नहीं हैं, जिससे वे विश्व स्तर पर खतरे में नहीं है। इसी प्रकार यह रिपोर्ट भारतीय रोलर बर्ड (नीलकंठ)सहित 14 प्रजातियों की स्थिति के तत्काल पुनर्मूल्यांकन की भी सिफारिश करती है जिसे प्रकृति के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ द्वारा &#8220;कम से कम चिंता&#8221; के रूप में ही सूचीबद्ध किया गया है, जिनमें से कुछ को पहले सामान्य और व्यापक माना जाता था। ‘स्टेट ऑफ इंडियाज़ बर्ड्स रिपोर्ट’ में पक्षियों की प्रजातियों में चिंताजनक गिरावट बताई गई है। यह रिपोर्ट लगभग महाद्वीपीय पैमाने पर पक्षियों की कई प्रजातियों की स्थिति को सही परिप्रेक्ष्य में लाती है। रिपोर्ट से जो समझ बनेगी वह पक्षियों की प्रजातियों को बचाने के लिए रणनीति बनाने में संरक्षणवादियों की मदद करेगी। इसमें पाया गया है कि 25 वर्षों की दीर्घकालिक अवधि में अध्ययन की गई 348 प्रजातियों में से लगभग 60 प्रतिशत में गिरावट देखी गई है और अल्पावधि (2015 से) में मूल्यांकन की गई 359 प्रजातियों में 40 प्रतिशत में गिरावट देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रैप्टर और बत्तख की आबादी में सबसे अधिक गिरावट आई है, जबकि ग्रेट ग्रे श्राइक जैसी कई सामान्य प्रजातियों की संख्या में भी गिरावट आ रही है। ऐसा पाया गया है कि गैर-प्रवासी पक्षियों की तुलना में प्रवासी पक्षियों की संख्या में अधिक तेजी से कमी आ रही है। आहार के आधार पर वर्गीकृत, मांसाहारी, कीटभक्षी और अनाज खाने वाले पक्षियों में फल और मधु खाने वाले प्रकारों की तुलना में अधिक तेजी से गिरावट देखी गई। इसी प्रकार बंजर भूमि के रूप में वर्गीकृत घास के मैदानों और झाड़ियों जैसे विशिष्ट आवासों में पक्षियों की संख्या भी खुले आवासों की तुलना में अधिक तेजी से कम हुई है। हालांकि पक्षियों की प्रजातियों की आबादी में गिरावट के सटीक कारण अभी तक स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आए हैं, लेकिन रिपोर्ट में भूमि-उपयोग परिवर्तन, शहरीकरण, पारिस्थितिकी तंत्र में गिरावट, मोनोकल्चर, बुनियादी ढांचे के विकास, प्रदूषण और जलवायु बिगड़ने को खतरे के रूप में चिन्हित किया गया है। रिपोर्ट के प्रकाशकों ने इन कारणों पर और शोध करने का आह्वान किया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://media.istockphoto.com/id/583710512/photo/rainbow-lorikeet-close-up.jpg?s=612x612&amp;w=0&amp;k=20&amp;c=1UeJ-9dw_hDmRiG_ktoRU8YWYDSZtYmkomo1-tL7fy0=" width="612" height="408" alt="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट" title="भारत के पक्षियों की सुध लेती पहली महत्वपूर्ण रिपोर्ट 7"></p>
<p>रिपोर्ट के दूसरे संस्करण में भारत के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से प्रत्येक में संरक्षण पर ध्यान देने की आवश्यकता वाली चार प्राथमिकता वाली प्रजातियों पर ध्यान दिलाया गया है। वह कहती है कि मध्यम संरक्षण प्राथमिकता के तहत सूचीबद्ध प्रजातियों के लिए चेतावनी के प्रारंभिक संकेतों की पहचान करने के लिए अधिक काम की आवश्यकता है। इसके साथ ही कम संरक्षण प्राथमिकता वाली प्रजातियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसमें शामिल समूहों में से एक, ‘नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन’ के अनुसार हमें सामान्य प्रजातियों को सामान्य बनाए रखने के लिए काम करने की जरूरत है। रिपोर्ट में पक्षियों की 217 प्रजातियां ऐसी पाई गईं जो स्थिर थीं या उनकी संख्या बढ़ रही थीं। रिपोर्ट के अनुसार जंगली रॉक कबूतर, एशियाई कोयल और भारतीय मोर अच्छा प्रदर्शन करते पाए गए हैं, लेकिन अन्य, अधिक कमजोर प्रजातियों पर उनकी बढ़ती संख्या का प्रभाव की जानकारी नहीं है। बया वीवर और पाइड बुशचैट जैसे सामान्य पक्षी भी अपेक्षाकृत स्थिर पाए गए हैं। रिपोर्ट के प्रकाशकों ने सार्वजनिक भागीदारी को बहुत महत्व दिया, लेकिन उन्होंने यह भी दर्ज किया कि दुर्लभ और निशाचर पक्षियों के लिए अधिक शोध और डेटा एकत्र करने की आवश्यकता है, जो आम तौर पर पक्षी देखने वालों द्वारा दर्ज नहीं किए जाते हैं। हालांकि समूची दुनिया में जैव विविधता बुरी हालात में है। लेकिन भारत की पक्षी आबादी पर आई एक यह नई रिपोर्ट देश की कई पक्षी प्रजातियों के हालात की एक गंभीर तस्वीर तो पेश करती ही है वह जैव विविधता को पहुंच रहे नुकसान का पता भी देती हैं और साथ ही मानव कल्याण के लिए भी खतरे की घंटी बजाती है। रिपोर्ट निष्कर्षों का सारांश यह है कि देश में पक्षी संरक्षण के लिए व्यापक तौर पर काम करने की जरूरत है। आशा की जानी चाहिए कि देश के नीतिकार भी इस रिपोर्ट को पढ़ेंगे और कदम उठायेंगे।</p>
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		<title>डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 10 Aug 2023 14:35:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="630" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती।" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading.jpeg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-300x158.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-1024x538.jpeg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-768x403.jpeg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-696x365.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-1068x561.jpeg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-800x420.jpeg 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/08/print_v_digital-concept-of-reading-313x164.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती। 11">जब चवन्नी क्लास में सिनेमा देखने जाने वाली आबादी के लिए सी ग्रेड फिल्में बनती थीं; जब किशोर स्कूलों से भाग कर फिल्में देखते थे; जब बुधवार की रात आठ बजे लोग घरों में और बाज़ार में दुकानों पर रेडियो सीलोन पर अमीन सयानी का बिनाका गीतमाला प्रोग्राम सुनने के लिए वैसे ही जमा होते [&#8230;]]]></description>
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<p>जब चवन्नी क्लास में सिनेमा देखने जाने वाली आबादी के लिए सी ग्रेड फिल्में बनती थीं; जब किशोर स्कूलों से भाग कर फिल्में देखते थे; जब बुधवार की रात आठ बजे लोग घरों में और बाज़ार में दुकानों पर रेडियो सीलोन पर अमीन सयानी का बिनाका गीतमाला प्रोग्राम सुनने के लिए वैसे ही जमा होते थे जैसे किसी धार्मिक कथा में; जब लोग चूड़ीबाजे में चाबी भर कर उस पर रिकॉर्ड चलाते और तीन मिनट का गाना सुन कर निसार हो जाते थे; जब पंप से हवा भर कर तथा पिन से उसका नोज़ल साफ कर रसोई में स्टोव जलाते थे, तभी वह वक़्त भी था जब जासूसी कहानियां तथा रोमांस वाले उपन्यास खूब पढे जाते थे। भले ही इनका पढ़ना घरों में त्याज्य था। बड़ों की निगाह बचा कर ही पढ़ना पड़ता था। हालांकि घर के बड़े भी सफर में समय बिताने के लिए ऐसे उपन्यास खरीद कर गटक लेते थे। इसीलिए ऐसे उपन्यास अधिकतर रेलवे स्टेशनों और बसों के अड्डों पर लगी किताबों पर ही सजे मिलते थे। किशोर, पढ़ाई की किताबों में छुपा कर ऐसी कहानियों, उपन्यासों की किताबें और मेग्जीनें पढ़ते थे। उस साहित्य को “लुगदी साहित्य” माना जाता था जो कम दाम पर बेचने के लिए शीघ्र पीले पड़ जाने वाले सस्ते अखबारी कागज पर छापा जाता था। आज की पीढ़ी को यह जान कर हैरानी हो सकती है कि यह साहित्य किताबों की दुकानों तथा विशेष लाइब्रेरियों से प्रतिदिन के हिसाब से किराये पर लाकर भी पढ़ा जाता था। इसी “लुगदी साहित्य” ने पिछली सदी के पांचवें दशक की पीढ़ी में पढ़ने की लत डाली जो उन्हें क्लासिक पढ़ने तक आगे ले जा सकी। उसी पीढ़ी ने घरेलू लाइब्रेरी योजना के सदस्य बन कर हर माह दस पॉकेट बुक्स भी मंगवाई और पढ़ी और उसके जरिए भारतीय और विश्व साहित्य और उनके महान लेखकों से पहला परिचय पाया। इस प्रकार उस पीढ़ी को पढ़ने की जो लत लगी वह ताउम्र उसके साथ रही। कहा भी जाता है कि किशोर वय में जो चीज सीख ली जाती है वह उम्र भर साथ नहीं छोड़ती। लेकिन यह भी सच है कि विद्यार्थियों में पढ़ने की लत हमारी संस्थागत शिक्षा व्यवस्था नहीं डाल सकी और आज हम ऐसे मुकाम पर अपने को पाते हैं जब हर तरफ कहा जा रहा है कि किताबों को अब कौन पढ़ता है? अब तो सभी अपने स्मार्ट फ़ोनों में आंखें गड़ाए रहते हैं। किन्तु दूसरी तरफ हम अपने आसपास तो यही देखते हैं कि धड़ाधड़ किताबें छप रही हैं। इतने नए-नए लेखक और कवि सामने आ रहे हैं, भले ही अनेक रचनाकार अपने खुद के पैसों से अपनी किताबें छपवा रहे हों। लोग धुआंधार लिख रहे हैं और राजकोष से वित्त पोषित अकादमियां उन्हें ढेर सारे इनाम ही नहीं दे रही बल्कि उनको प्रकाशन सहयोग भी दे रहीं हैं। ऐसे में आज के डिजिटल समय में यह पड़ताल जरूरी भी है कि सच में किताबें अब कौन पढ़ रहा है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://chronicle.brightspotcdn.com/4b/ff/f04733a04b378cb1e336b300bef8/lang-june21-gettyimages-1204348106-v2.jpg" width="5184" height="3456" alt="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती।" title="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती। 12"></p>
<p>किताब उस मुद्रण युग की देन है जो ज्ञान के मौखिक प्रसारण और डिजिटल युग के बीच का काल है। यह काल पश्चिमी जर्मन के शहर मैन्ज़ से शुरू होता है, जहां गुटेनबर्ग ने 1455 में अपना पहला छापाखाना स्थापित किया। गुटेनबर्ग के नवाचार के कारण ही पुस्तकों का छप कर पाठकों के हाथों में पहुंचना संभव हुआ और प्रकाशन व्यवसाय का विकास हो सका। बहुत से अध्येता तो यह भी मानते हैं कि प्रिंटिंग प्रेस के जरिए ही संस्कृति, धर्म और ज्ञान में बदलाव आ सके और आगे बढ़ा जा सका। यह भी माना जा रहा है कि डिजिटल के अनुसरण में आगे और भी क्रांतियां होंगी जो मुद्रण की शुरुआत के बाद हुई धार्मिक और सामाजिक उथल-पुथल को प्रतिध्वनित करेंगी। ऐसा मानने वालों को लगता है कि “राष्ट्र” और “राज्य” के विचार को इस नई प्रौद्योगिकी से ही चुनौती मिलेगी। इससे पुराने सामाजिक मानदंड भी बदलेंगे। वे कहते हैं कि पहचान की राजनीति जैसी ऑनलाइन बहसों को जो लोग खारिज करेंगे वे नए ज़माने को समझने का अवसर खो देंगे। इस पड़ताल में एक चीज स्पष्ट नज़र आती है कि छपाई के इतिहास पर तो अनगिनत किताबें लिखी गई हैं, किन्तु पढ़ने के इतिहास पर बहुत कम किताबें हैं। हम कैसे पढ़ते हैं, इस विज्ञान को समझने की ओर ध्यान कम ही गया है। उन्नीसवीं सदी के मध्य में मुद्रण का बहुत बड़ा विस्तार हुआ। समाचार पत्र, पत्रिकाएं, पोस्टर, बिल बोर्ड और सस्ते उपन्यास जैसा इतना सामने आया कि दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपने समय को &#8220;पढ़ने का युग&#8221; कहा। लेकिन उन्हें इस बात की भी चिंता थी कि पाठक के सामने जिस गति और मात्रा में साहित्यिक भोज परोसा जाएगा तो क्या वह कुछ ले भी पाएगा? पश्चिम में वैज्ञानिक प्रयोग करके यह समझने की कोशिश करते रहे हैं कि वास्तव में क्या होता है जब लोग पढ़ते हैं? इन प्रयोगों के मूल में यह विचार रहा कि पढ़ना कोई निष्क्रिय कार्य नहीं है। वह एक सक्रिय काम है। पढ़ने की वैज्ञानिक जांच करने वालों में एक चार्ल्स हब्बार्ड जुड हुए हैं जिन्होंने पढ़ते समय आंखों की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए उपकरण विकसित किया। इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण एडमंड बर्क ह्युई थे, जिनकी कृति ‘द साइकोलॉजी एंड पेडागॉजी ऑफ रीडिंग’ ने 1908 में क्रांति ला दी। जब हम पढ़ते हैं तो हम क्या करते होते हैं, की समझ पर उन्होंने पहली बार प्रकाश डाला। ‘टैचिस्टोस्कोप’ का उपयोग करते हुए उन्होंने पाया कि शब्दों को अनुभव से पहचाना जाता है। इस प्रकार, पढ़ना केवल दृष्टि का मामला नहीं है, बल्कि वह याद किए गए, पूर्वानुमानित और अनुमानित अर्थों का मामला भी होता है। उनकी इस अवधारणा ने इस विचार को प्रोत्साहित किया कि पढ़ने को सोचने के रूप में सिखाया जाना चाहिए। इसी प्रकार 1940 के दशक में, एक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक, सैमुअल रेनशॉ ने विमानों की तेजी से पहचान में सुधार करने की कोशिश के अपने युद्धकालीन अनुभव का उपयोग करते हुए हुए ‘स्पीड रीडिंग’ का ज्ञान विकसित किया जिसने 20वीं सदी में, सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करने में मदद की क्योंकि तब तक लोकतंत्र के विकास को सुनिश्चित करने में साक्षरता और पढ़ने का महत्व समझा जा चुका था। इस प्रकार स्कूलों में पढ़ना सिखाने का दृष्टिकोण, और सार्वजनिक पुस्तकालयों द्वारा निभाई गई भूमिका दुनिया भर में आबादी के बड़े हिस्से को छपी हुई चीजें पढ़ा कर ही लोकतांत्रिक समाज को जोड़ने में महत्वपूर्ण बनी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full" src="https://www.mozaweb.com/mozaLibraryMicrocurriculum/dl_88/preview.png" width="964" height="528" alt="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती।" title="डिजिटल समय में पढ़ने की पुरानी अवधारणा को गम्भीर चुनौती। 13"></p>
<p>एक अध्येता जिसका नई समझ पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा वह है मार्शल मैक्लुहान। उसके ‘द गुटेनबर्ग गैलेक्सी’ (1962) ने मीडिया युग के &#8220;नैतिक आतंक&#8221; के बारे में लोगों के विचारों को गहराई तक प्रभावित किया। उसका तर्क था कि समाज को यह समझने में देर हो गई है कि &#8220;माध्यम ही संदेश है&#8221;। मैकलुहान ने यह भी कहा कि मुद्रित पृष्ठ &#8220;मन की अनोखी आदतों का निर्माता&#8221; होता है। इस अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए अनुभूति की मानसिक प्रक्रियाओं पर स्क्रीन-रीडिंग के प्रभाव में रुचि रखने वाले न्यूरोवैज्ञानिकों ने हाल के दिनों में वर्तमान तकनीकी रीडिंग के प्रभावों के बारे में चिंता जताई है। अमरीका के नेशनल असेसमेंट ऑफ एजुकेशनल प्रोग्रेस के अनुसार, 2017 और 2019 के बीच 17 अमेरिकी राज्यों में साक्षरता में गिरावट देखी गई जिसके लिए पढ़ने में आए बदलाव को जिम्मेवार माना जा रहा है। किन्तु क्या यूट्यूब और टिकटॉक के युग में पढ़ना अब भी एक जरूरी कौशल के रूप में देखा जाना चाहिए जिसमें सभी नागरिकों को दक्ष हों? अध्येताओं का कहना है कि पढ़ने के कौशल, और जो पढ़ा जाता है उसकी समझ, को सभी के लिए, विशेषकर युवाओं के लिए कैसे सुलभ बना सकते हैं इस पर काम करना जरूरी है क्योंकि इसका उनके जीवन की संभावनाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ने वाला है। पढ़ने और लिखने दोनों के क्षेत्र में अब चैट जीपीटी प्रवेश कर चुका है जिसके लिए तो यहां तक कहा जाने लगा है कि इससे हमें खुद पाठों (टेक्स्ट) को पढ़ने और समझने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी। हमारा यह बोझ कंप्यूटर का ‘एल्गोरिद्म’ उठा लेगा। इस प्रकार मशीनी बुद्धि ‘एआई’ द्वारा सक्षम किए गए अत्यधिक “डेटाफिकेशन” के कारण हमें पारंपरिक पढ़ने को बड़ी चुनौती मिलती दिख रही है। हालांकि अतीत में किताबों का वृहद उत्पादन और पढ़ने का अभ्यास जबरदस्त तरीके से प्रभावशाली रहा है, मगर अब आगे क्या होगा जब एल्गोरिद्म मनुष्यों की तुलना में अधिक रीडिंग करने लगेगा? उससे समाज कैसे बदल जाएगा उसकी चिंता बहुतों को सता रही है। पब्लिशर्स वीकली ने भी हाल ही में बताया कि इस साल की पहली छमाही के लिए किताबों की बिक्री एक बार फिर कम हो गई है। किताबों की बिक्री में गिरावट कोविड महामारी के बाद से ही जारी है। अनेक पाठक अब कागज की बंधी किताब को छोड़ कर जब ‘किंडल’ (डिजिटल किताब) की राह पर भी हो लिए हैं जिसे मशीन बोल कर सुना भी सकती है। फिर भी ऐसे लोग अब तक बचे हुए हैं जो भौतिक रूप में किताबों को पसंद करते हैं। किताबों की गंध, उनका अनुभव, पढ़ने का संवेदी अनुभव उन्हें सुकून देता है। वे सीने पर किताब रखे सो भी जाते है। ऐसे लोग भी हैं जो किताब खरीदना एक नेक काम मानते हैं। ऐसे ही नेक लोग “किताबें कौन पढ़ता है” के झंझावात में नांव को थामे रखने की अपनी भूमिका निभा रहे हैं। यह भरोसा देता है कि किताबें रहेंगी और हाथ में लेकर उन्हें पढ़ने वाले भी रहेंगे।</p>
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		<title>अपने पाठक से बतियाने लगती है मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Jul 2023 11:05:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="689" height="429" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="प्रेमचंद का किसान क्या आज भी हाशिए पर है?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand.jpg 689w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-300x187.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-675x420.jpg 675w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-313x195.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 689px) 100vw, 689px" title="अपने पाठक से बतियाने लगती है मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं 15">हिंदी साहित्य के अद्वितीय , अनूठे और अमर कहानीकार एवं उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित लगभग तीन सौ कहानियों और बारह उपन्यासों का अध्ययन करते समय पाठकों के मन, मस्तिष्क और हृदय में गाॅवो का सहज , सरल,  ठेठ , देशज और देहाती अंदाज तथा गरीब और गांव की व्यथा सजीव होने लगती हैं। आधुनिक [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="689" height="429" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="प्रेमचंद का किसान क्या आज भी हाशिए पर है?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand.jpg 689w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-300x187.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-675x420.jpg 675w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/07/munshi-Premchand-313x195.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 689px) 100vw, 689px" title="अपने पाठक से बतियाने लगती है मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं 16">


<p>हिंदी साहित्य के अद्वितीय , अनूठे और अमर कहानीकार एवं उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित लगभग तीन सौ कहानियों और बारह उपन्यासों का अध्ययन करते समय पाठकों के मन, मस्तिष्क और हृदय में गाॅवो का सहज , सरल,  ठेठ , देशज और देहाती अंदाज तथा गरीब और गांव की व्यथा सजीव होने लगती हैं। आधुनिक हिंदी साहित्य को अत्यंत समृद्धशाली बनाने और बुलंदी प्रदान करने वाली उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियों और उपन्यासों को पढ़कर पाठक पिढि- दर- पिढि संवाद करता हुआ नजर आता है। उनके उपन्यास हो या कहानियां अपने पाठकों खुलकर स्वछंद भाव से बतियाने लगती है। पाठक और कहानियां एक दूसरे से इस तरह घुल-मिल जाती हैं जैसे एक दूसरे से जान-पहचान बहुत पुरानी हो ।  मुंशी प्रेमचन्द की साहित्यिक प्रतिभा इस दृष्टि से उत्कृष्ट है कि &#8211; उनकी कहानियों के चरित्र वर्तमान दौर के पाठकों से सहज संवाद करती हैं । उनकी कहानियों  के चरित्र और उनके दौर से रूबरू होना हमारे समाज की एक स्वाभाविक जरुरत बन जाता है ।  हिन्दी साहित्य परम्परा में मुंशी प्रेमचंद की महानता यह है कि-उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से काल्पनिक, तिलिस्मी, अय्यारी, देव लोक की सुन्दर परियों और स्वर्ग  -नरक की किस्सों कहानियों से भरी लेखन परम्परा को ध्वस्त कर गाँवों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक  जन-जीवन का यथार्थवादी चित्र परोसने का उत्कट और साहसिक प्रयास किया। मुंशी प्रेमचंद की साहित्यिक कुशाग्रता इस दृष्टि से अनूठी है कि -उन्होंने अपनी कहानियों में चुन-चुन कर देशज शब्दों का प्रयोग किया है और भाषा शैली भी देशज है। इसके साथ उनकी कहानियों के किरदार आम जनजीवन की समस्यायों से लड़ता -जूझता आम आदमी है। इसलिए उनकी कहानियां वर्तमान को जागरूक और संघर्ष के लिए उत्प्रेरित करती नजर आती हैं।</p>
<p>दो सौ वर्षों की ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं की प्रतिपूर्ति में भारतीय गाॅवो की आत्मनिर्भरता, स्वावलंबन, स्वाधीनता और सुख-चैन  का क्रूरता और निर्लज्जता से दमन कर दिया था। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा इन लूटे-पिटे गाॅवो की दुर्दशा तथा दुर्व्यवस्था और इसमें रहने वाले लोगों की व्यथा ,विवशता और जलालत और जहालत भरी जिन्दगी की दुश्वारियों को अपनी रचनाओं के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद ने मार्मिक और यथार्थवादी रूप से प्रस्तुत करने का श्लाघनीय प्रयास किया है। सामंतवाद, पुरोहितवाद और महाजनी व्यवस्था के सम्मिलित शोषण से कराहते आम आदमी की कातर कराहो और चीखो को अपनी रचनाओं में मुंशी प्रेमचंद ने प्रखर आवाज दिया हैं। सामंतवाद के शोषणकारी हंथकंडो, आम आदमी को आर्थिक रूप से निचोडने वाले पुरोहितवाद के कर्म-काण्डो और महाजनी व्यवस्था के लूट-खसोट और सफेदपोश डाकाजनी  पर विविध कहानियों के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद ने करारा प्रहार किया है। मुंशी प्रेमचंद की साहित्यिक प्रतिभा इस दृष्टि से अद्वितीय है कि- उन्होंने आम आदमी से लेकर रसूखदार लोगों के भाव, स्वभाव, मनोभावों, मनोविकारों और मनुष्य के मन,  मस्तिष्क और हृदय में उमडती- घूमड़ती विविध हलचलों की अपनी सर्जनाओं द्वारा सटीक, तार्किक और वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की है। इसके साथ ही समाज में प्रभुत्त्वशाली वर्ग द्वारा स्थापित परम्पराओं, रीति-रिवाजों और कुसंस्कारो के समक्ष नतमस्तक आम आदमी की विवशता को भी मुंशी प्रेमचंद ने तार्किक और न्यायसंगत तरीके प्रस्तुत किया है। मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी &#8221; सदगति &#8221; में कर्मकाण्डो के समक्ष आम आदमी की विवशता साफ-साफ दिखाई देती है। दलित समुदाय से आने वाला &#8221; दुखी&#8221; महज साइत निकलवाने के लिए पंडित घासीराम की बेगारी करते करते मर जाता हैं।</p>
<p>इस दौर में जब देश के चन्द पूंजीपतियों ,औद्योगिक घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में सरकारें किसानों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर रही हैं मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कहानी &#8216; पूस की रात &#8216; के मुख्य पात्र हलकू किसान का संघर्ष वर्तमान दौर के छोटे और मझोले किसानों को प्रेरणा और उर्जा प्रदान करता है। हांड कपा देने वाली ठंड भरी रात में कर्ज में डूबा हलकू बर्बर जंगली जानवरों से फसल की रक्षा करने के लिए खेत अगोरने के लिए निकल पडता है। इस तरह अपने जमीन के एक टुकड़े के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन न्योछावर कर देना देश के अंदर चल रहे अनगिनत किसान आंदोलनों को प्रेरणा दे सकता हैं। कर्जदारी और खेती-किसानी की अन्य समस्याओं से उजडते किसानों की व्यथा तथा बेदखली से किसान से मजदूर के रूप में बदलते किसानों की पीड़ा को पूष की रात की कहानी के माध्यम से समझा जा सकता है। स्वाधीनता उपरांत औपचारिक रूप से जमींदारी और जागीरदारी को समाप्त कर दिया गया। परन्तु आधुनिक समय में बहुराष्ट्रीय कंपनियों, पूँजीपतियों और औद्योगिक घरानों के रूप में नये जमींदारों और जागीरदारों का उदय हुआ है। इन नये नवेले जमींदारों के पक्ष मे सरकारे कर्ज की जंजीर और जंजाल में डूबे लाखों करोड़ों किसानों को जमीन से बेदखल कर रही हैं , जिससे छोटी जोत के किसान आज तेजी से मजदूर बनते जा रहे हैं।</p>
<p>मुंशी प्रेमचंद की हर कहानी मनुष्यता को स्थापित करने का सार्थक प्रयास है। ईदगाह जैसी कहानी में पुरूखो के प्रति सम्मान और समर्पण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। नन्हा सा बालक हमीद मेले में खेल-खिलौने न खरीद कर अपनी दादी के लिए चिमटा खरीद कर लाता है। इस कहानी में बाल मन की कोमलता, अपनी दादी के प्रति सहज प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच जाता है। इस कहानी ने भावनाओं के ईमानदार लेखक के रूप में मुंशी प्रेमचंद को अमर कर दिया। अंग्रेजों की न्याय व्यवस्था खर्चीली, उबाऊ और समयघोटु थी। इसकी प्रतिक्रया में मुंशी प्रेमचंद ने भारतीय जनमानस में प्रचलित पंचायत प्रणाली द्वारा न्याय व्यवस्था का पंच परमेश्वर की कहानी के माध्यम से स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इस पंच परमेश्वर की कहानी  में भारतीय न्याय व्यवस्था में व्याप्त  निष्पक्षता और इंसानियत का बेहतर चित्रण किया है। पंच परमेश्वर की कहानी में न्यायाधीश के रूप में अलगू चौधरी दोस्ती और दुश्मनी से ऊपर उठकर न्याय करते हैं। पंच परमेश्वर की कहानी में न्याय के अतिरिक्त हिन्दू और मुस्लिम जीवन पद्धति में बढते साहचर्य, समन्वय और सहकार का तार्किक चित्रण पाया जाता हैं।</p>
<p>वर्तमान दौर में बढती प्रतीकात्मक राजनीति को उस दौर में मुंशी प्रेमचंद ने दूरदर्शिता पूर्वक समझने, परखने और रेखांकित करने का प्रयास किया था। वर्तमान दौर में व्यापक और बुनियादी हितों के बजाय प्रतीकात्मक और भावनात्मक मुद्दों पर राजनीति का चलन-चलन बढता जा रहा हैं। बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण और बेहतर चिकित्सा जैसे मुद्दे संसद और विधानसभा के पटल से लेकर टीवी चैनलों पर होने वाली बहसों से गायब है।  ईमानदारी, सच्चाई और सचरित्रता जैसी भावात्मक चीजे भौतिक वस्तुओं की तरह खरीदी-बेची जा सकती हैं। बढते बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति में भौतिक वस्तुओं की तरह भावात्मक चीजे भी खरीदने- बेचने का विषय बनती जा रही है। इसको मुंशी प्रेमचंद ने अपने दौर में समझ लिया था। नमक के दरोगा की कहानी में ईमानदार दरोगा अलोपीदीन को बेहतर वेतन और सुविधाओं द्वारा उसी भ्रष्ट सेठ द्वारा सम्मानित किया जाता हैं जिसके अवैध कारोबार को ईमानदार अलोपीदीन ने पकड़ा था। मुंशी प्रेमचंद मानव मन के सर्वश्रेष्ठ व्याख्याकार के साथ-साथ बेहतर मानव जीवन के लिए संघर्ष के उत्कट प्रेरक हैं। मुंशी प्रेमचंद कार्ल मार्क्स, हीगल, जरमी बेंथम और जान स्टुअर्ट मिल जैसे राजनीतिक और दार्शनिक विचारकों की परम्परा के दार्शनिक और विचारक नहीं थे। परन्तु उनकी कहानियों और उपन्यासों में राजनीतिक व्यवस्था में व्याप्त शोषण के औजारों का बौद्धिक, तार्किक, वैज्ञानिक और सार्थक व्याख्या पाई जाती है और जनता के व्यापक हितों के पक्ष में जनक्रांति की वकालत करते हैं। लम्ही में पैदा हुए मुंशी प्रेमचंद ने कहा था कि- व्यक्ति की चेतना उसकी सामाजिक परिस्थितियों का निर्माण नहीं करती बल्कि सामाजिक परिस्थितियाॅ चेतना का निर्माण करती हैं। अपने दौर की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों का विश्लेषण करने वाला साहित्यकार युगांतरकारी और कालजयी हो जाती हैं। अपनी उत्कृष्टतम साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद भारतीय सीमाओं को पार कर वैश्विक विभूतियों में शामिल हो गये। वैश्विक स्तर पर मुंशी प्रेमचंद की तुलना महान रसियन उपन्यासकार मैक्सिम गोर्की के साथ की जाती हैं। मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित गोदान का वैश्विक साहित्य में वही स्थान है जो मैक्सिम गोर्की द्वारा रचित प्रसिद्ध उपन्यास माॅ { mother} का हैं। प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अध्यक्ष महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की स्मृतियों को नमन करता हूँ।</p>
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		<title>आदिवासियत और हमारा रवैया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[सुसंस्कृति परिहार]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Jul 2023 08:25:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="448" height="298" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/adivasi-samaj.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="आदिवासियत और हमारा रवैया" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/adivasi-samaj.jpg 448w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/adivasi-samaj-300x200.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/adivasi-samaj-313x208.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 448px) 100vw, 448px" title="आदिवासियत और हमारा रवैया 17">आदिवासी समाज अंग्रेजी शासन के काल से लगातार प्रताड़ना झेल रहा है यूं तो कहना यह चाहिए कि वह सदियों से प्रताड़ना का दंश झेल रहा है किंतु बाहरी आक्रमणकारी जब उनकी धरा भारत भू पर आए तब तथाकथित सभ्य कहे जाने इन आक्रमणकारियों से वे लड़े नहीं अपितु जंगल और पहाड़ों के सुदूर क्षेत्रों [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="448" height="298" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/adivasi-samaj.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="आदिवासियत और हमारा रवैया" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/adivasi-samaj.jpg 448w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/adivasi-samaj-300x200.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/adivasi-samaj-313x208.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 448px) 100vw, 448px" title="आदिवासियत और हमारा रवैया 18">


<p>आदिवासी समाज अंग्रेजी शासन के काल से लगातार प्रताड़ना झेल रहा है यूं तो कहना यह चाहिए कि वह सदियों से प्रताड़ना का दंश झेल रहा है किंतु बाहरी आक्रमणकारी जब उनकी धरा भारत भू पर आए तब तथाकथित सभ्य कहे जाने इन आक्रमणकारियों से वे लड़े नहीं अपितु जंगल और पहाड़ों के सुदूर क्षेत्रों में शांतिपूर्वक रहने चले गए। तब से वे अब तक जंगलों और पहाड़ों में अपना कठिन जीवन जी रहे हैं किंतु उनके चेहरे पर शिकन नज़र नहीं आती वे मस्ती से रहते हैं।  रात नाचते गाते और झूमते हैं।  इन्हीं  आदिवासियों के बीच से कर्मा, सैला, मुद्रिका, जैसे महत्वपूर्ण लोकनृत्यों से दुनियां में भारत की साख है।  स्कूल ,कालेज, विश्वविद्यालय से लेकर महत्वपूर्ण सांस्कृतिक उत्सवों की ये पहचान है जान हैं।</p>
<p>आदिवासियत की सबसे बड़ी पहचान उनका स्वाभिमान है वे जीवन में कभी संग्रह नहीं करते।  एक मेहनत कश की तरह वे रोज कमाते खाते हैं कल की चिंता नहीं करते। ये प्राकृतिक धर्म है जैसे पशु-पक्षी और जानवर करते हैं।  इससे प्रकृति सुरक्षित है घने जंगलों और पहाड़ों में। उनके यहां जीवन बड़ा सरल और सहज है। स्त्री को बराबरी का दर्जा है।  पूर्वांचल के नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम आदि में अभी भी मातृसत्तात्मक समाज मिलता है।  उनके यहां लिंगानुपात में फीमेल आगे हैं।    वे लड़की और लड़के में कोई भेदभाव नहीं करते।   लड़कियों को अपनी पसंद का वर चुनने का अधिकार है बस्तर में तो अभी भी घोटुल बने हुए हैं जहां लड़के लड़कियां साथ रहकर वर वधु चुनते हैं चयन के बाद लड़के वाले वधु पक्ष से लड़की लेने के एवज में उल्टा उन्हें दहेज अपनी गुंजाइश के मुताबिक देते हैं।  वे जंगलों पहाड़ों की औषधियों का भरपूर ज्ञान रखते हैं।  वे आमतौर पर मोटे अनाजों मक्का,ज्वार ,बाजरा,रागी का इस्तेमाल करते हैं जो पौष्टिकता से भरपूर है।   जिसकी बदौलत वे पहाड़ और जंगलों में विचरण कर रोजाना पेट भरने की जुगत कर पाते हैं। उनके इन अनाजों, औषधियों , पहाड़ों और वन संसाधनों पर आजकल जमकर डाका डाला जा रहा है। ये तमाम चीजें शहरी उपभोक्ता के पास पहुंच रहे हैं।  सस्ते में वनोपज लेकर कारपोरेट बहुत ऊंचे दामों में बेच भारी भरकम मुनाफा कमा रहा है जिससे आदिवासी अब भोजन में राशन में मिल रहा कीड़े लगा अनाज खाने विवश हैं।</p>
<p>चिंताजनक यह है कि अब उनके जल, जंगल, ज़मीन और जीव जंतुओं से घिरे परिवेश पर सतत हमले हो रहे हैं।  विचित्र बात ये कि उन्हें मूलधारा में  लाने का उपक्रम ही बेतुका है। मूलधारा तो उनकी ही है जिनको हम तहस नहस करने उतारु हैं।  कथित विकास की तमाम कोशिशों ने उन्हें ना घर का रखा ना घाट का। वे जब से भारत गणराज्य में आदिवासी जनजाति की हैसियत से जुड़े हैं उनके भोले-भाले सांसद विधायक का भरपूर दोहन किया गया। उनका जब चाहा जैसा इस्तेमाल किया गया।  जब वे पढ़ लिख कर तथाकथित मूल धारा में शामिल होना चाहते हैं तो उनके साथ वही सलूक हो रहा है जो भारत में सदियों से दलितों के साथ हुआ है।</p>
<p>हालांकि आदिवासियत को सुरक्षित रखने हमारे संविधान में पर्याप्त व्यवस्थाएं मौजूद हैं पर जब सरकार को उनकी ज़मीन,जल और जंगल की ज़रुरत  होती है तो वह कहीं अभयारण्य में पर्यटन के नाम पर तो कभी उद्योग धंधों के नाम वहां की खनिज सम्पदा का दोहन कर रही है। निष्कासित हो जाने पर नाम मात्र का मुआवजा उन्हें मिलता है जिससे वे ना घर बना पाते हैं और ना ही भोजन जुटा पाते हैं ऐसे आदिवासी मज़बूरी में कहीं रिश्ते खींचते नज़र आते हैं या कहीं चंद पैसों के लिए अपने स्वाभिमान को गिरवी रख देते हैं। झारखंड में तो सैकड़ों महिलाएं अपने तन को बेचकर भोजन जुटा पाती हैं।  शुद्ध हवा और जल से वंचित होने के साथ ही वे पोष्टिक आहार भी नहीं पाते।   लगता है,आहिस्ता आहिस्ता उनकी आदिवासियत उनसे छिन जाएगी और वे एक दलित की भांति हमारे समाज में शामिल हो जाएंगे।</p>
<p>सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब यह सिद्ध हो चुका कि वे कतई हिंदू नहीं हैं तो सरकार उन्हें हिंदू क्यों मान रही है। पूर्वांचल में नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम में वे चर्च ज़रुर जाते हैं पर जब धर्म की बात आती है तो वे प्राकृतिक धर्म के तहत वृक्षों, जानवरों, पक्षियों विविध जीव-जंतुओं जल स्त्रोतों आदि की ही पूजा करते हैं। आज भी शहरों , महानगरों में रहने के बावजूद वे शिव के सिवाय किसी की आराधना नहीं करते। शिव पर्वतीय हैं उनका आचार विचार रहन सहन आदिवासियों सा है संभवतः इसी लिए वे उनसे जुड़ गए होंगे।  उनकी आदिम संस्कृति को छेड़कर उन्हें कपोल कल्पित विचार देकर हम उनके सर्वनाश में जुटे हैं।</p>
<p>उन्हें एस टी का दर्जा देकर सरकार ने उनके लिए शिक्षा और रोजगार के दरवाजे खोले हैं किंतु उनकी तरक्की से क्या वे खुश हैं यह गंभीर चिंतन का विषय है वे आज भी सम्मानित नहीं है।  निरंतर अपमान सहन रहे हैं सीधी का पेशाब कांड इस सत्य को हाल ही में  सामने लाया है। पढ़े लिखे बच्चों को रोज़गार के नाम हजारों हजार वाहन  दिलाया गया ये सरकार कहती है किंतु पड़ताल करने पर पता चलता है उनके नाम का उपयोग कर सब्सिडी का फायदा लेकर वाहन लिया ज़रुर गया पर वह वाहन किसी और के पास है जिसने कुछ रुपए देकर उसे चुप करा दिया है। यह हकीकत है। आदिवासी कल्याण के नाम पर जो कुछ हो रहा है उस पर आदिवासियों को एकजुटता से समाधान ढूंढना चाहिए।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>संघ की ओर से आदिवासियत को समाप्त करने की एक और मुहिम बड़े शालीन तरीके से चलाई जा रही है उन्हें &#8216;वनवासी &#8216;कहा जा रहा है जो उनकी पहचान को ख़त्म करने का उपक्रम है।  आज मणिपुर में संघ के प्रवेश के बाद आदिवासी समाज की महिलाओं के साथ जो घिनौनी हरकत हुई है वह शर्मनाक है। कूकी समाज यहां अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।  इससे पहले त्रिपुरा में संघ की घुसपैठ वहां भी जो किया वह हमने देखा है।  कश्मीर फाईल्स बनाकर जो परोसा गया वह संघी विचारधारा का प्रतीक है जिसे प्रमोट करने वाले देश के मुखिया थे जो शर्मनाक है। यह उनके मन की बात बताता हूं।</p>
<p>खुशी की बात है कि  मध्यप्रदेश के आदिवासी  नेता हीरालाल अलावा ने घोषणा की है कि वे धार,  झाबुआ,  बड़वानी, खरगौन और रतलाम जिलों में निवेश क्षेत्र के नाम पर आदिवासियों की एक इंच भी ज़मीन नहीं देंगे आज आदिवासी समाज जागृत हुआ है वे अपने संसाधनों पर हो रहे हमलों से नागालैण्ड , मणिपुर,  छत्तीसगढ़ में जूझ रहे हैं। उनकी हिफाजत हम सबकी जिम्मेदारी है वे हमारी आदिम संस्कृति की ना केवल पहचान है बल्कि उनसे हम सब बहुत कुछ ज्ञानार्जन कर सकते हैं। जब आज हम पर्यावरण संकट के दौर से गुज़र रहे है,स्त्री के प्रति नफ़रत चरम पर है, पूंजीवादी कारपोरेट व्यवस्था का शोषण निरंतर उफान पर है तब उनके आदिम संस्कार हमारे मार्गदर्शक बन सकते हैं। आदिवासियत ही हमें  प्राकृतिक प्रकोपों से बचा सकती है। कायनात वे ही बचाए हुए हैं। उन्हें हर हाल में बचाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।</p>
<p>हमें सोचना होगा। आदिवासियों के प्रति जो रवैया हमने अख़्तियार किया है उसे बदलना होगा है।  जिन्हें हम असभ्य कह कर उनकी उपेक्षा कर रहे हैं उन्हें जानिए वे बहुत सभ्य और सुसंस्कृत हैं हुज़ूर।</p>
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		<title>पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही : हरीश ऐठानी </title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजकुमार सिंह परिहार]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 18 Jul 2023 15:43:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1156" height="520" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही : हरीश ऐठानी " style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005.jpg 1156w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-300x135.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-1024x461.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-768x345.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-696x313.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-1068x480.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-934x420.jpg 934w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-313x141.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1156px) 100vw, 1156px" title="पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही : हरीश ऐठानी  19">बागेश्वर/ पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष हरीश ऐठानी ने कपकोट के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दो दिवसीय पैदल भ्रमण कर आपदा से हुए नुकसान का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने क्षेत्र की बंद पड़े मोटर मार्गों खोलने एवं क्षतिग्रस्त पेयजल लाइनों को तत्काल ठीक करने व प्रभावित परिवारों को अन्यत्र विस्थापित कर सुरक्षित करने की मांग [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1156" height="520" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही : हरीश ऐठानी " style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005.jpg 1156w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-300x135.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-1024x461.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-768x345.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-696x313.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-1068x480.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-934x420.jpg 934w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230718-WA0005-313x141.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1156px) 100vw, 1156px" title="पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही : हरीश ऐठानी  20">



<p>बागेश्वर/ पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष हरीश ऐठानी ने कपकोट के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दो दिवसीय पैदल भ्रमण कर आपदा से हुए नुकसान का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने क्षेत्र की बंद पड़े मोटर मार्गों खोलने एवं क्षतिग्रस्त पेयजल लाइनों को तत्काल ठीक करने व प्रभावित परिवारों को अन्यत्र विस्थापित कर सुरक्षित करने की मांग करी।</p>



<p>&#8211; आपदा राहत में पूरी तरह से विफल है सरकार व ज़िला प्रशासन </p>



<p>&#8211; आठ परिवारों को बना हुआ है जान-माल का खतरा </p>



<p>&#8211; सड़क, संचार व बिजली सभी आपदा की चपेट में आने से टूटा मुख्यालय से सम्पर्क </p>



<p>&#8211; किलपारा में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से बन रही सड़क 50 मीटर से अधिक पूरी तरह ध्वस्त से पैदल चलना भी हुआ मुश्किल </p>



<p>पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष हरीश ऐठानी ने तहसील कपकोट के दूरस्थ क्षेत्र धूर, उंगिया, तीख, डौला, बदियाकोट, सोराग व किलपारा आदि क्षेत्रों का भ्रमण कर आपदा से हुए नुकसान का जायजा लिया। इस दौरान उन्होंने आपदा से प्रभावित परिवारों से मुलाकात कर उन्हें हरसंभव मदद का आश्वासन भी दिया। ग्रामीणों ने बताया कि बदियाकोट के तोक कुमतोली में पैदल पुलिया टूटने से आवागमन बाधित हो गया है। जिसके चलते बच्चों के स्कूल जाने का भी मार्ग बाधित हो गया है। पशुपालन विभाग के भवन की सुरक्षा दिवार टूटने से खतरा बना हुआ है। इस क्षेत्र के कई पुल इसकी आपदा की चपेट में आने से क्षतिग्रस्त हैं जिस कारण लोगों को जान  खतरा बना हुआ है। </p>



<p>उन्होंने बताया कि पटाक के इण्टर कॉलेज से प्राथमिक विद्यालय व एएनएम सेंटर को जाने वाला मार्ग जगह-जगह टूटने से लोगों के मुसीबत बना हुआ है। वही बच्चे जान जोखिम में डालकर इस मार्ग से चलने को मजबूर हैं उनकी सुध लेना वाला सरकार व प्रशासन में कोई नही है। सोराग में जगह जगह भू धसान होने के कारण लोगों को भारी नुक़सान हुआ है। उनकी फसल क्षतिग्रसत हो गयी है। सड़क किनारे नालिया न होने के कारण जगह-जगह सड़क मार्ग बाधित है, वहीं छोटी गाड़ियाँ निकलने में भी हो रही भारी दिक़्क़तें। वहीं किलपारा में कई लोगों के घरों में मलवा व पानी घुसने से जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है। लोगों को जान का खतरा बना हुआ है। </p>



<p>उन्होंने कहा कि दो दिन पूर्व उंगिया में बादल फटने से भारी तबाही मची है। आवासीय भवनों को खतरा बना हुआ है। भ्रमण के दौरान केशर सिंह पुत्र आन सिंह सहित आठ परिवारों ने पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष के माध्यम से प्रशासन से अन्यत्र सिफ्ट करने की मांग की है। उन्होंने बताया कि मोटर मार्ग के साथ बसे निचले गांव में 08 मकान हैं, इनमें पानी व मलबा घुसने से नुकसान हुआ है और एक मकान पूरी तरह से आपदा की जद में है। जिस कारण आवसीय मकानों में बड़े बड़े दरारें पड़ गयी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन उन्हें जल्द किसी सुरक्षित जगह पर विस्थापित कर उचित मुआवज़ा दिया जाये। </p>



<p>जगह जगह अतिवृष्टि से सड़क मार्ग, विधुत व संचार सुविधाएँ क्षतिग्रस्त हो गयी है। जिससे हमारा संपर्क तहसील एवं जिला मुख्यालय से कट गया है। जबकि किलपारा में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से बन रही सड़क 50 मीटर से अधिक पूरी तरह ध्वस्त हों गयी है जिसके चलते लोगों का पैदल चलना भी मुसीबत बना हुआ है। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष ने उपजिलाधिकारी कपकोट को आपदा प्रभावित क्षेत्र का निरीक्षण कर आपदा से हुए नुकसान,  लोनिवि व पीएमजीएसवाई के बंद पड़े मोटर मार्गो को यातायात के लिए सुचारू करने की मांग की। </p>



<p>उन्होंने अपने इस दो दिवसीय पैदल भ्रमण पर जगह-जगह लोगों से मुलाक़ात कर आपदा का जायज़ा लेते हुए प्रशासन पर आरोप लगाया है कि आपदा के सभी दावे खोखले हैं। एक ही बरसात ने सरकार व प्रशासन के दावों की पोल खोलकर रख दी है। उन्होंने कहा कि पिंडर घाटी की सुध लेने वाला कोई नही है, सभी भगवान भरोसे चल रहा है। गनीमत रही है कि इस तबाही में जानी नुकसान नहीं हुआ है। इस दो दिवसीय पैदल भ्रमण में पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य ख़िलाफ़ दानू, नैन सिंह दानू, भगवत दानू व खजान सिंह साथ रहे।</p>
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		<title>सोच बदलिए, तभी महिलाओं की दशा बदलेगी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राकेश दुबे]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Jul 2023 12:00:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="768" height="522" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सोच बदलिए, तभी महिलाओं की दशा बदलेगी" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment.png 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment-300x204.png 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment-696x473.png 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment-618x420.png 618w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment-313x213.png 313w" sizes="auto, (max-width: 768px) 100vw, 768px" title="सोच बदलिए, तभी महिलाओं की दशा बदलेगी 21">आज़ादी के 75 साल बाद भारत में महिलाओं की दशा दोयम दर्जे पर है। जहां भारत सरकार के केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी ‘भारत में महिला एवं पुरुष 2022 रिपोर्ट’ बताती है, विगत एक दशक में महिला-पुरुषों के मध्य वेतन असमानता बढ़ी है। वहीं इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन रिपोर्ट बताती है कि विश्वभर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="768" height="522" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment.png" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सोच बदलिए, तभी महिलाओं की दशा बदलेगी" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment.png 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment-300x204.png 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment-696x473.png 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment-618x420.png 618w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/women-empowerment-313x213.png 313w" sizes="auto, (max-width: 768px) 100vw, 768px" title="सोच बदलिए, तभी महिलाओं की दशा बदलेगी 22"><p>आज़ादी के 75 साल बाद भारत में महिलाओं की दशा दोयम दर्जे पर है। जहां भारत सरकार के केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी ‘भारत में महिला एवं पुरुष 2022 रिपोर्ट’ बताती है, विगत एक दशक में महिला-पुरुषों के मध्य वेतन असमानता बढ़ी है। वहीं इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन रिपोर्ट बताती है कि विश्वभर में किसी कार्य हेतु पुरुषों को यदि 100 रुपये मिलते हैं तो महिलाओं को प्रदत्त श्रमदेय 73 रुपये (भारत में 71 रुपये) रहता है।</p>
<p>नैसकॉम की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की तकनीकी उद्यमिता में लगभग 30 प्रतिशत महिलाएं सम्मिलित हैं लेकिन उनका औसत वेतन पुरुषों से 29 प्रतिशत कम है। रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक़, रिटेल वर्कफोर्स में महिला सहभागिता 70 प्रतिशत होने के बावजूद उनका वेतन पुरुषों की अपेक्षा 33 प्रतिशत कम है। मासिक आय का यह अंतर कृषि क्षेत्र में 3,812 रुपये, मैन्युफैक्चरिंग में 5,904 रुपये, सर्विस सेक्टर में 4,435 रुपये तथा ट्रेडिंग में 6,020 रुपये है।</p>
<p>वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट के मुताबिक़, देश की कुल श्रमिक आय में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 18 प्रतिशत है, क्योंकि अधिकांश महिलाएं कम आय वाले व्यवसाय से ताल्लुक रखती हैं। इस संदर्भ में भारतीय ग्राम्य भूभागों का संज्ञान लें तो औसत पुरुष दिहाड़ी 393 रुपये है तथा महिला श्रमदेय 265 रुपये है। शहरी क्षेत्रों में यह क्रमशः 483 तथा 333 रुपये है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, सर्वाधिक अंतर केरल राज्य में दृष्टिगोचर हुआ। यहां गांवों में पुरुषों का औसत पारिश्रमिक 842 रुपये (प्रतिदिन) है तो महिलाओं का 434 रुपये है।</p>
<p>पंजाब, हरियाणा, हिमाचल तथा राजस्थान में महिला दिहाड़ी पुरुषों की अपेक्षा लगभग 85 प्रतिशत होने के कारण स्थिति बेहतर आंक सकते हैं। गुजरात, मध्यप्रदेश, झारखंड में यह 80 प्रतिशत तथा उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बंगाल में पुरुषों के मुक़ाबले 70 प्रतिशत है। उत्तराखंड देश का एकमात्र राज्य है, जहां महिला श्रमदेय पुरुषों के मुक़ाबले अधिक पाया गया। 19 में से 11 बड़े राज्यों के मध्य स्थित अंतर वर्ष 2011-12 की अपेक्षा और बढ़ा है। पं. बंगाल, गुजरात, छत्तीसगढ़ में यह 10 प्रतिशत से अधिक रहा।</p>
<p>मैकेंजी की ताज़ा रिपोर्टानुसार, विश्वभर में महिलाओं की वरिष्ठ पदों पर भागीदारिता मात्र 14 प्रतिशत है, जिसके चलते मानदेय निर्धारित करने में 86 प्रतिशत पुरुषों की भूमिका प्रभावी हो जाती है। करिअर की अपेक्षा परिवार महिलाओं की प्राथमिकता है; वैतनिक भेद के पीछे यह मानसिकता भी प्रबल रहती है।राष्ट्रीय स्तर पर कारण खोजें तो मुख्य कारण हैं समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच। इसके चलते महिलाओं को नियुक्ति, पदोन्नति, भुगतान आदि में पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है, भले ही उनकी योग्यता-अनुभव पुरुष सहयोगियों के समकक्ष हो। पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के दृष्टिगत दीर्घकालीन अवकाश, नौकरी के स्वरूप-समय संबंधी पाबंदी, प्रशिक्षण तथा शैक्षणिक कार्यक्रमों के लिए अपेक्षित समय न निकाल पाना, परिवहन उपलब्धता-सुरक्षा के दृष्टिगत समस्याएं पेश आना, मौक़े अपेक्षाकृत कम होने के कारण ऊंचे वेतनमान के लिए अधिक मोलभाव न कर पाना आदि अनेकानेक कारण इस अंतर को बढ़ावा देते हैं।</p>
<p>वही कानूनी स्थिति देखें तो 1976 में पारित ‘समान पारिश्रमिक अधिनियम’ सार्वजनिक अथवा निजी सभी संगठनों के नियमित-अनियमित कर्मचारियों को दायरे में लेते हुए, बिना किसी लिंग भेदभाव समान कार्यों के लिए समान वेतन प्राप्त करना सुनिश्चित करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39(डी) तथा अनुच्छेद 42 इस विषय में समानता की पूर्ण गारंटी देते हैं। वर्ष 2013 में पारित ‘यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध तथा प्रतिशोध) अधिनियम’ कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा आवश्यक बनाने सहित वेतनमान समानता भी सुनिश्चित करता है।</p>
<p>सामयिक आवश्यकता के मद्देनज़र वर्ष 2017 को संशोधित ‘मातृत्व लाभ अधिनियम’ के तहत मातृत्व अवकाश की अवधि 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दी गई। इसी प्रकार, वर्ष 2022 में ‘भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड’ (बीसीसीआई) ने ‘भुगतान समता नीति’ के अंतर्गत, केंद्रीय रूप से अनुबंधित महिला-पुरुष खिलाड़ियों को समान फीस देने संबंधी घोषणा की,किंतु महज़ कानून बनाने भर से इस अंतर को पाटना संभव नहीं है। केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी ‘भारत में महिला एवं पुरुष 2022 रिपोर्ट’ बताती है, विगत एक दशक में महिला-पुरुषों के मध्य वेतन असमानता बढ़ी है। उच्च वेतन स्तर पर अंतराल और अधिक बढ़ गया।</p>
<p>भेदभाव की गहरी खाई पाटने हेतु समग्र मानसिकता में बदलाव लाना आवश्यक है। समावेशी तथा सुसंचालित राजनीतिक-सामाजिक नीतियां सर्वपक्षीय असमानता दूर करने में निर्णायक योगदान दे सकती हैं। मौजूदा कानूनों में अपेक्षित संशोधन करने के साथ समयानुकूल नव विधान लाना एवं संबद्ध कानूनों को कड़ाईपूर्वक लागू करना समय की मांग है। आवश्यक है कि महिला कर्मचारियों को कौशल एवं ज्ञानवृद्धि हेतु प्रशिक्षण तथा विकास के पर्याप्त अवसर मुहैया करवाएं जाएं, जो कि करिअर में आगे बढ़ने तथा बेहतर अवसर पाने में सहायक सिद्ध हो सकें।</p>
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		<title>मुझे दूसरों के लिए जीना है अपने लिए नहीं- मध्यमवर्ग</title>
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		<dc:creator><![CDATA[द हरिश्चंद्र स्टाफ]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Jul 2023 09:23:21 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="715" height="429" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281729.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="मुझे दूसरों के लिए जीना है अपने लिए नहीं- मध्यमवर्ग" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281729.jpeg 715w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281729-300x180.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281729-696x418.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281729-700x420.jpeg 700w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/images281729-313x188.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 715px) 100vw, 715px" title="मुझे दूसरों के लिए जीना है अपने लिए नहीं- मध्यमवर्ग 23">अपरिहार्य रूप से मध्यमवर्ग आय पिरामिड के शीर्ष पर रहने वाले लोगों और निचले पायदान पर मुफ्त चाहने वालों के बीच फंसा हुआ पाता है जब तक वह बोलेंगे नहीं उनकी स्थिति ऐसी ही बनी रहने वाली है हर कुछ महीनों में भारत का मध्यम वर्ग किसी ऐसे नीतिगत फैसले को लेकर खुद को तेज [&#8230;]]]></description>
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<p>अपरिहार्य रूप से मध्यमवर्ग आय पिरामिड के शीर्ष पर रहने वाले लोगों और निचले पायदान पर मुफ्त चाहने वालों के बीच फंसा हुआ पाता है जब तक वह बोलेंगे नहीं उनकी स्थिति ऐसी ही बनी रहने वाली है हर कुछ महीनों में भारत का मध्यम वर्ग किसी ऐसे नीतिगत फैसले को लेकर खुद को तेज विमर्श में फंसा पाता है जिससे उनके उचित और समृद्धि की भावना आहत होती है समकालीन राजनीतिक में यह कहानी काफी हद तक दोतरफा है! नीतिगत निर्णय को संबद्धता के नजरिए से इस तरह तौला जाता है जैसे प्रत्येक निर्णय अच्छा है या फिर सारे निर्णय बेकार है और ऐसे में अक्सर तर्क और मध्यमवर्ग की आवाज को खामोश कर दिया जाता है!</p>



<p>पिछले दिनों विदेश यात्रा के दौरान इंटरनेशनल डेबिट या क्रेडिट कार्ड से लेन-देन पर लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस)की ढाई लाख रुपए की सीमा के तहत उच्च कर थोकने के लिए आक्रोश था पहले इस पर 5% कर लगाने का प्रावधान था लेकिन जुलाई, 2023 से प्रभावी नई योजना के तहत 20 % कर लगाया जाएगा। सरकार ने विदेशी मुद्रा लेनदेन के लिए ₹700000 की सीमा को भी समाप्त कर दिया है इस कर को स्रोत पर एकत्रित कर (टीसीएस) के रूप में वर्गीकृत किया जाता था, इसके लिए अनिवार्य रूप से करदाता को जिम्मेदार माना जाता है, जब तक कि कुछ और सिद्ध न हो।</p>



<p>यह सच है कि वार्षिक कर देनदारी के वार्षिक वर्ष के अंत में क्षतिपूर्ति के नियम हटा दिए गए हैं!। यह भी उतना ही सच है कि इसका अनुपालन कठिन होगा, जिसमें कई चरण और दस्तावेज शामिल होंगे एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिक की मुश्किल की कल्पना कीजिए जिसे रिटर्न भरने की जरूरत नहीं है और यदि वह पोते-पोतियो से मिलने के लिए विदेश यात्रा करें या उस असहाय नागरिक के बारे में विचार करें जो रिटर्न भरने तथा रिफंड का दावा करने के लिए बैंक, कार्ड कंपनी और आईटी विभाग के चक्कर लगा रहा होता है।</p>



<p>सच यह है कि लोग अपनी वह बचत खर्च करते हैं जिस पर भी कर चुका होते हैं।इसलिए प्रभावी रूप से नया नियम मेहनत से अर्जित की गई बचत पर 20% का उपभोग कर लगाएगा। चार्टर्ड अकाउंटेंट और स्टार्टअप निवेशक *मोहनदास पई ने कहा* लोगों को केवल रिफंड का दावा करने के लिए भुगतान क्यों करना चाहिए? व्यापार सुगमता और ईमानदार करदाता के हित में 20 फ़ीसदी टीसीएस को वापस लेना चाहिए यदि जरूरी हो तो 2% कर लगाना चाहिए। हम बेईमान नहीं हैं।</p>



<p>इसमें बदलाव को लेकर जो आक्रोश था, उस पर सरकार ने एक स्पष्टीकरण जारी किया 1 जुलाई 2023, से एल आर एस के तहत छोटे लेन-देन के लिए टीसीएस के औचित्य को लेकर चिंता जताई गई है।किसी भी अस्पष्टता से बचने के लिए यह निर्णय लिया गया है कि किसी व्यक्ति द्वारा अपने अंतरराष्ट्रीय डेविड या क्रेडिट कार्ड का उपयोग करके प्रति वर्ष ₹700000 रूपये तक के भुगतान को एल आर एस सीमा से बाहर रखा जाएगा और इसके लिए कोई टीसीएस नहीं लगेगा।<br />जीवन सुगमता और व्यवसाय सुगमता के घोषित उद्देश्य और निश्चित परिणाम के लिए अपनाए जाने वाले तरीके के बीच का विरोधाभास हैरान करने वाला है। मौजूदा शासन स्वरोजगार को बढ़ावा दे रहा है और यह घोषणा करने में गर्व महसूस करता है कि भारत रोजगार सृजको॔ की अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है,फिर भी यह उन पेशेवरों पर 18% जीएसटी लगाने पर कायम है जिनके पास खर्चों पर भुगतान किए गए जीएसटी की भरपाई करने का अवसर नहीं है। वास्तव में भुगतान किए गए सभी करो॔ काय के योग जीएसटी को आयकर के साथ जोड़ देने से आय पर करके सही स्तर का पता चलता है। नीत के मनसा को लेकर स्पष्टता और सूचना की कमी के कारण मध्यमवर्ग की परेशानियां अक्सर बदतर हो जाती हैं जरा तथ्यों पर विचार कीजिए भारत 37 खरब डॉलर से अधिक की जीडीपी के साथ सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है ।ऐसा नहीं हो सकता कि मजबूत राजस्व संग्रह को देखते हुए इसका उद्देश्य अपने खजाने के लिए ब्याज मुक्त नकदी प्रवाह एकत्र करना होगा,यह विदेशी मुद्रा की कमी के कारण भी नहीं हो सकता है। कुछ दिनों पहले रिजर्व बैंक ने बताया कि विदेशी मुद्रा भंडार में 599.53 अरब डॉलर है और चालू खाता बचत में भी सुधार हुआ है।</p>



<p>विगत मई माह में जब रिजर्व बैंक ने 2000 के नोट की चरणबद्ध तरीके से वापसी की घोषणा की तो सोशल मीडिया और व्हाट्सएप समूह में भी लोगों ने इसका जश्न मनाया।यह कोई रहस्य नहीं है कि आपात स्थिति के लिए हर परिवार घर पर एक-दो लाख नगदी रखता है घरों में महिलाओं भी विवाह या बच्चों के लिए बचत करती हैं इस मामले में सबसे बुरी बात है कि कुछ बैंकों ने घोषणा पत्र और पहचान सत्यापन के लिए प्रपत्र मुद्रित किये।शुक्र है कि बेहतर समझ बनी और उम्मीद है कि नोटबंदी के दौरान देखे गये दिनो॔ की पुनरावृति नहीं होगी।लोकप्रिय धारणाएं बताती हैं कि इससे चुनाव पूर्व नगदी की जमाखोरी करने वाले राजनेता फंस जाएंगे। जबकि इतिहास बताता है कि नोटबंदी के बाद 15.41 लाख करोड़ रुपए में से 99.3% से अधिक सफलतापूर्वक परिवर्तित कर दिया गया था। दरअसल भ्रष्टाचार राजनीतिक फंडिंग की अपारदर्शी व्यवस्था में शरण लिए हुए है।<br />मध्यमवर्ग राहत की सांस ले सकता है,लेकिन यह अल्पकालिक होगा रिपोर्टों से पता चलता है कि सरकार अपने कर आधार को बढ़ाने के लिए विदेश यात्रा करने वाले, ज्यादा बिजली बिल भरने वाले,फर्टिलिटी क्लीनिक की सेवा लेने वाले जैसे बड़े खर्च करने वालों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्रों में मतदाताओं की ताकत का पता चलता है जिनसे सबसे निचले आय वर्ग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है और यह मध्यमवर्ग ही है जो कम से कम सरकार के खर्च का कुछ हिस्सा चुका रहा है। उदाहरण के लिए कांग्रेश द्वारा जारी 2 करोड़ गारंटी कार्डों की पूर्ति के लिए कर्नाटक पर 50,000 करोड़ रुपए से अधिक लागत आने का अनुमान है।ऐसी ही योजनाओं की घोषणा अन्य राज्यों द्वारा की जा रही है स्वास्थ्य एवं शिक्षा के बदले मुफ्त दिए जा रही है मध्यमवर्ग को यह सवाल पूछना चाहिए कि किसकी कीमत पर किसको फायदा हो रहा है।</p>



<p>जॉर्ज बर्नार्ड शाॅ ने अपने नाटक पैरग्मेलियन में मध्यम वर्ग के भाग्य का स्पष्ट वर्णन किया था &#8216;मुझे दूसरों के लिए&#8217; जीना है, अपने लिए नहीं: यह मध्यम वर्ग की नैतिकता है।</p>



<p>लेखक : रामाश्रय यादव जिला अध्यक्ष राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद, जनपद मऊ।</p>
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		<title>कर्मठ और जुझारू प्रशासनिक दक्षता के साथ: सामाजिक सरोकार से गहरे जुड़ी थीं निर्मला बुच।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[सुसंस्कृति परिहार]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Jul 2023 16:02:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="489" height="391" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230709-WA0002.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="कर्मठ और जुझारू प्रशासनिक दक्षता के साथ: सामाजिक सरोकार से गहरे जुड़ी थीं निर्मला बुच।" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230709-WA0002.jpg 489w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230709-WA0002-300x240.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230709-WA0002-313x250.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 489px) 100vw, 489px" title="कर्मठ और जुझारू प्रशासनिक दक्षता के साथ: सामाजिक सरोकार से गहरे जुड़ी थीं निर्मला बुच। 25">दरअसल निर्मला बुच उस वक़्त सुर्ख़ियों में आई थी जब सुकमा जिले के कलेक्टर रहे एलेक्स पॉल मेनन का नक्सलियों ने अपहरण कर लिया था। यह साल था 2012। अपहरण के बाद नक्सलियों और सरकार के बीच वार्ता हुई। नक्सलियों की मांग पर सरकार ने वार्ता के लिए मध्यस्थों की नियुक्ति की तब डॉ रमन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="489" height="391" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230709-WA0002.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="कर्मठ और जुझारू प्रशासनिक दक्षता के साथ: सामाजिक सरोकार से गहरे जुड़ी थीं निर्मला बुच।" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230709-WA0002.jpg 489w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230709-WA0002-300x240.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/07/IMG-20230709-WA0002-313x250.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 489px) 100vw, 489px" title="कर्मठ और जुझारू प्रशासनिक दक्षता के साथ: सामाजिक सरोकार से गहरे जुड़ी थीं निर्मला बुच। 26">



<p>दरअसल निर्मला बुच उस वक़्त सुर्ख़ियों में आई थी जब सुकमा जिले के कलेक्टर रहे एलेक्स पॉल मेनन का नक्सलियों ने अपहरण कर लिया था। यह साल था 2012। अपहरण के बाद नक्सलियों और सरकार के बीच वार्ता हुई। नक्सलियों की मांग पर सरकार ने वार्ता के लिए मध्यस्थों की नियुक्ति की तब डॉ रमन सिंह की सरकार की तरफ से निर्मला बुच और पूर्व मुख्य सचिव एसके मिश्रा को मध्यस्थ बनाया गया जबकि नक्सलियों की ओर से पूर्व प्रशासनिक अधिकारी बीडी शर्मा और हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हरगोपाल ने मध्यस्थता की थी।इस वार्ता का नतीजा यह निकला की माओवादियों ने कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन को सकुशल रिहा कर दिया। हालाँकि अगवा करने के दौरान माओवादियों ने मेनन के सुरक्षाकर्मी की हत्या कर दी थी लेकिन तब निर्मला बुच छग और मध्यप्रदेश में एक बड़ी शख्सियत बतौर पहचानी गई।</p>



<p>निर्मला बुच वर्ष 1960 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में आई। 1961 में मसूरी अकादमी में प्रशिक्षण के बाद उनकी पहली पोस्टिंग जबलपुर में हुई। इसके बाद कई जिलों में पदस्थ रही। बुच सेवानिवृत्ति के बाद समाज कल्यण के कार्यों में सक्रिय रही।उनका जन्म 11 अक्टूबर 1925 में उत्तरप्रदेश के खुर्जा जिले में हुआ था। वे मध्यप्रदेश सरकार में 1975 से 1977 तक वित्त सचिव एवं शिक्षा सचिव और 1991 से 1992 में मुख्य सचिव के पद पर रही हैं।बेखौफ छवि रखने वाली निर्मला बुच पूर्व सीएम सुंदरलाल पटवा के कार्यकाल में मध्यप्रदेश की चीफ सेक्रेटरी बनी थीं। उमा भारती जब प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, तो उन्होंने निर्मला बुच को अपना सलाहकार बनाया। मुख्य सचिव निर्मला बुच भारत सरकार के योजना आयोग में 1988 से 89 में सलाहकार भी रही हैं, उन्होंने महिला सशक्तिकरण की दिशा में पहला कदम उठाते हुए मध्यप्रदेश ग्रामीण विकास में पंचायती राज की रूपरेखा तैयार की थी।प्रशासनिक पदों पर रहते हुए निर्मला जी ने सरकार और गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर शोध, प्रबंधन और निर्बल समाज को ताकत देने के लिए लगातार कई काम किए हैं। उन्होंने विभिन्न पदों पर रहते हुए विकास का जो मॉडल तैयार था वह मील का पत्थर साबित हुआ था, उन्होंने महिला के विकास के लिए भी कदम आगे बढ़ाए थे श्रीमती बुच का समूचा कार्यकाल साफ-सुथरा रहा। इसके चलते सेवानिवृत्ति के बाद भी वह प्रशासनिक क्षेत्र की रोल मॉडल बनी।</p>



<p>सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनकी सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता बनी रही। उन्होंने चाइल्ड राइट्स ऑब्जर्वेटरी, महिला चेतना मंच जैसी संस्थाओं की स्थापना की। वर्किंग वुमन होस्टल खुलवाए। उनके चीफ सेक्रेटरी रहते हुए मध्यप्रदेश में महिला एवं बाल विकास विभाग अस्तित्व में आया था। संयोग से मुझे भी चाईल्ड राइट्स आब्जर्वेटरी मध्यप्रदेश का सदस्य निर्मला जी ने ही बनाया था उस समय बच्चों की समस्याओं पर लगातार मेरे लेख प्रदेश के अखबारों में प्रकाशित हो रहे थे। मुझे नवनिर्मित दमोह की पहली बाल्य कल्याण समिति का सदस्य भी बनाया गया था।जब भी हम सब मीटिंग में एकत्रित होते वे समय से पूर्व आतीं और बच्चों से जुड़ी किसी महत्वपूर्ण समस्या सामने रखतीं और समिति द्वारा जो परामर्श दिया जाता उस पर सक्रियता से जिला बाल अधिकार मंच से काम करातीं थी। उनकी प्रशासनिक क्षमता यहां भी सहजता से देखने मिली। काम के प्रति उनकी दीवानगी का आलम ये था कि कर्मचारी कभी कभी परेशान हो उठते थे। इस सबके बावजूद वे काम करने वालों की भरपूर प्रशंसा करती थीं।वे प्रतिवर्ष अपने पति पूर्व मुख्य सचिव नीलकंठ बुच की स्मृति में प्रतिवर्ष शानदार व्याख्यान आयोजित करती थीं जो भोपाल के यादगार कार्यक्रम में शुमार होता रहा है।निर्मला बुच ने कई किताबें भी इस बीच लिखीं जिनकी चर्चा कम हुई है।</p>



<p>बहरहाल,97वर्ष तक अपनी कर्मठता के बलबूते पर उन्होंने अपनी जो छवि निर्मित की वह ना केवल पहली और अब तक की प्रमुख महिला सचिव की है बल्कि उनकी कार्यप्रणाली और सेवानिवृत्त होने के बाद महिलाओं और बच्चों के प्रति जो प्रतिबद्धता चेतना मंच और चाईल्ड राइट्स आब्जर्वेटरी के ज़रिए दिखाई वो उन्हें हमेशा ज़िंदा रखेगी।</p>
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		<title>यूपी के इस 21 वर्षीय युवा के अनुभव से समाज कार्य और नवाचार के चैप्टर सीखेंगे दुनियाभर के युवा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[अमन कुमार]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 27 Jun 2023 15:44:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="332" height="396" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230501-WA00138.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="यूपी के इस 21 वर्षीय युवा के अनुभव से समाज कार्य और नवाचार के चैप्टर सीखेंगे दुनियाभर के युवा" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230501-WA00138.jpg 332w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230501-WA00138-252x300.jpg 252w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230501-WA00138-313x373.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 332px) 100vw, 332px" title="यूपी के इस 21 वर्षीय युवा के अनुभव से समाज कार्य और नवाचार के चैप्टर सीखेंगे दुनियाभर के युवा 27">यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल साइंटिफिक एंड कल्चरल आर्गेनाइजेशन (यूनेस्को) ने युवा सशक्तिकरण और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे ट्यौढी गांव के युवा अमन कुमार को अपनी ग्लोबल यूथ कम्यूनिटी में शामिल किया है जिसमें वह देश के युवाओं का प्रतिनिधित्व करेंगे। यूनेस्को द्वारा इस ग्लोबल यूथ कम्यूनिटी में दुनियाभर के चुनिंदा युवाओं [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="332" height="396" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230501-WA00138.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="यूपी के इस 21 वर्षीय युवा के अनुभव से समाज कार्य और नवाचार के चैप्टर सीखेंगे दुनियाभर के युवा" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230501-WA00138.jpg 332w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230501-WA00138-252x300.jpg 252w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230501-WA00138-313x373.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 332px) 100vw, 332px" title="यूपी के इस 21 वर्षीय युवा के अनुभव से समाज कार्य और नवाचार के चैप्टर सीखेंगे दुनियाभर के युवा 28"><p>यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल साइंटिफिक एंड कल्चरल आर्गेनाइजेशन (यूनेस्को) ने युवा सशक्तिकरण और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे ट्यौढी गांव के युवा अमन कुमार को अपनी ग्लोबल यूथ कम्यूनिटी में शामिल किया है जिसमें वह देश के युवाओं का प्रतिनिधित्व करेंगे। यूनेस्को द्वारा इस ग्लोबल यूथ कम्यूनिटी में दुनियाभर के चुनिंदा युवाओं और युवा संगठनों को शामिल किया जाता है। वर्तमान में अमन, नेहरू युवा केन्द्र बागपत और विज्ञान प्रसार से संबद्ध उड़ान युवा मंडल के अंर्तगत विभिन्न प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे है।</p>
<p>युवा विकास केंद्रित इस नेटवर्क में अमन अपने समाज कार्य और नवाचार के अनुभवों को विभिन्न देशों के युवाओं के साथ साझा करेंगे। समुदाय में अमन के प्रयासों से नवाचार से सामाजिक बदलाव की सोच को आकार मिलेगा। अमन ने कहा कि यह उनके लिए गौरव का क्षण है जब भारत के परिप्रेक्ष्य में उनके द्वारा किए गया कार्यों में अंतर्राष्ट्रीय संगठन रुचि ले रहे है और निश्चित ही वह यूनेस्को के उद्देश्यों के अनुरूप सतत विकास लक्ष्यों को बढ़ावा देने के लिए कार्य करेंगे। हाल ही में फिनिश संस्था हंड्रेड ने भी अमन को 150 नवाचार विशेषज्ञों के पैनल में शामिल किया था।</p>
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		<title>बैंगलोर थियोसोफिकल सोसायटी के समर कैम्प में फालुन दाफा व्यायाम सिखाये गए </title>
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		<dc:creator><![CDATA[द हरिश्चंद्र स्टाफ]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Jun 2023 15:09:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1280" height="960" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="बैंगलोर थियोसोफिकल सोसायटी के समर कैम्प में फालुन दाफा व्यायाम सिखाये गए " style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022.jpg 1280w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-300x225.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-1024x768.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-768x576.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-696x522.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-1068x801.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-560x420.jpg 560w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-80x60.jpg 80w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-265x198.jpg 265w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-313x235.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" title="बैंगलोर थियोसोफिकल सोसायटी के समर कैम्प में फालुन दाफा व्यायाम सिखाये गए  29">बैंगलोर स्थित थियोसोफिकल सोसायटी ने 5 मई 2023 को बच्चों के लिए एक समर कैंप आयोजित किया। इस कैंप में जीवन कौशल, शिष्टाचार, कला और क्राफ्ट, नाटक और गायन जैसी कई गतिविधियाँ शामिल थीं।  कैंप के दूसरे दिन, सोसायटी ने बच्चों और शिक्षकों के लिए फालुन दाफा अभ्यासियों को बुलाया। अभ्यासियों ने फालुन दाफा अभ्यास [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1280" height="960" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="बैंगलोर थियोसोफिकल सोसायटी के समर कैम्प में फालुन दाफा व्यायाम सिखाये गए " style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022.jpg 1280w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-300x225.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-1024x768.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-768x576.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-696x522.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-1068x801.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-560x420.jpg 560w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-80x60.jpg 80w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-265x198.jpg 265w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/06/IMG-20230615-WA0022-313x235.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1280px) 100vw, 1280px" title="बैंगलोर थियोसोफिकल सोसायटी के समर कैम्प में फालुन दाफा व्यायाम सिखाये गए  30">



<p>बैंगलोर स्थित थियोसोफिकल सोसायटी ने 5 मई 2023 को बच्चों के लिए एक समर कैंप आयोजित किया। इस कैंप में जीवन कौशल, शिष्टाचार, कला और क्राफ्ट, नाटक और गायन जैसी कई गतिविधियाँ शामिल थीं। </p>



<p>कैंप के दूसरे दिन, सोसायटी ने बच्चों और शिक्षकों के लिए फालुन दाफा अभ्यासियों को बुलाया। अभ्यासियों ने फालुन दाफा अभ्यास और इसके कई स्वास्थ्य लाभों को परिचय देने वाले तीन प्रस्तुतियाँ दीं। बच्चे बहुत रुचि दिखाए और कई सवाल पूछे। उन्हें विशेष रूप से व्यायामों में रुचि थी, जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। फालुन दाफा अभ्यास हमेशा निःशुल्क सिखाया जाता है। </p>



<p>अभ्यासियों ने बच्चों के लिए व्यायामों का प्रदर्शन किया, और वे स्वयं इन्हें आजमाने के उत्साहित थे। अभ्यासियों ने बच्चों को फालुन दाफा के बारे में और जानकारी देने वाली फ्लायर्स भी दिए। उन्होंने बच्चों को अधिक जानने और यदि उनके पास कोई और सवाल हो तो अभ्यासियों से संपर्क करने की प्रोत्साहना दी। </p>



<p>सोसाइटी के सदस्यों और बच्चों के माता-पिता ने फालुन दाफा के प्रस्तुति से बहुत प्रसन्नता जाहिर की। उन्हें बच्चों की फालुन दाफा में रुचि और अभ्यासियों के ज्ञान और उत्साह से प्रभावित हुए। </p>



<p>प्रस्तुति के बाद, सोसायटी के सदस्यों में से एक ने फालुन दाफा के बारे में और अधिक जानने के लिए अभ्यासियों को कॉल किया। उसे लाल बाग अभ्यास स्थल के लिए निर्देशित किया गया, और वह खुद फालुन दाफा का अभ्यास शुरू करने की योजना बना रही है। फालुन दाफा एक प्राचीन आध्यात्मिक अभ्यास है जो ध्यान, चीगोंग और नैतिक सिद्धांतों को मिलाकर होता है। स्वास्थ्य और नैतिक सुधार लाभों के कारण दुनिया भर में लाखों लोगों द्वारा फालुन दाफा को  अपनाया गया है।</p>



<p>थियोसोफिकल सोसायटी एक गैर-लाभकारी संगठन है जो धर्म, दर्शन और विज्ञान का अध्ययन प्रोत्साहित करती है। सोसायटी का समर कैंप एक वार्षिक आयोजन है जो बच्चों को विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं के बारे में जानने का मौका प्रदान करता है। फालुन दाफा के अभ्यासियों थियोसोफिकल सोसायटी के समर कैंप में बच्चों और शिक्षकों से बात करने का आभार व्यक्त करते हैं। उन्हें आशा है कि उनकी प्रस्तुति फालुन दाफा और उसके अनेक लाभों के बारे में जागरूकता बढ़ाने में मदद करेगी।</p>
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