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	<title>आंदोलन &#8211; The Harishchandra &#8211; Hindi</title>
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		<title>जिला बनाने की मुराद को लेकर 250 किमी की पदयात्रा पर निकल पड़े 10 दीवानें</title>
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		<dc:creator><![CDATA[कैलाश सनोलिया]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Apr 2023 14:35:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1080" height="810" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/IMG-20230430-WA0003.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="जिला बनाने की मुराद को लेकर 250 किमी की पदयात्रा पर निकल पड़े 10 दीवानें" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" fetchpriority="high" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/IMG-20230430-WA0003.jpg 1080w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/IMG-20230430-WA0003-300x225.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/IMG-20230430-WA0003-1024x768.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/IMG-20230430-WA0003-768x576.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/IMG-20230430-WA0003-696x522.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/IMG-20230430-WA0003-1068x801.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/IMG-20230430-WA0003-560x420.jpg 560w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/IMG-20230430-WA0003-80x60.jpg 80w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/IMG-20230430-WA0003-265x198.jpg 265w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/04/IMG-20230430-WA0003-313x235.jpg 313w" sizes="(max-width: 1080px) 100vw, 1080px" title="जिला बनाने की मुराद को लेकर 250 किमी की पदयात्रा पर निकल पड़े 10 दीवानें 1">नागदा। जन-जन की एक मांग मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में स्थित नागदा को जिला बनाने की मुराद को लेकर इतना जोश एवं जूनून सवार हुआ कि वे राजधानी भोपाल में जनता की बात की दस्तक देने के लिए 250 किमी का सफर पैदल तक तय करने के लिए निकल पड़े। रविवार को सैकड़ों&#160; लोग [&#8230;]]]></description>
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<p>नागदा। जन-जन की एक मांग मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में स्थित नागदा को जिला बनाने की मुराद को लेकर इतना जोश एवं जूनून सवार हुआ कि वे राजधानी भोपाल में जनता की बात की दस्तक देने के लिए 250 किमी का सफर पैदल तक तय करने के लिए निकल पड़े। रविवार को सैकड़ों&nbsp; लोग उनकी दीवानगी के साक्षी बने और भोपाल के लिए विदाई दी। बड़ी संख्या में महिलाओं ने भी भागीदारी की। इस कहानी के मुख्यपात्र एवं नई सोच के किरदार युवा कांग्रेस नेता बसंत मालपानी है। जिनके संग कुल 10 युवाओं की एक टीम सीएम हाउस तक जनता की मुराद के लिए रवाना हुई।&nbsp; ना घूप, ना भूख&nbsp; ना प्यास की परवाह ये लोग पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 13 दिनों के बाद भोपाल पहुंचेंगे .पदयात्रियो की बिदाई के पहले शहर के मुख्य मार्गो से संगीत की स्वर लहरियों के साथ जूलूस निकाला गया। हर जगह पर&nbsp; ने पुष्प बरसा कर&nbsp; दीवानगी का स्वागत किया। सुबह लगभग 11. 30 बजे किरण टाकिज चौराहे से काफिला शुरू हुूआ। जो जवाहर मार्ग कन्याशाला चौराहा, महात्मागांधी मार्ग , गुर्जर मोहल्ला, तिलक मार्ग से गुजरता हुआ बस स्टैड पर पहुंुचा।&nbsp; इंगारिया रोड स्थित ब्रिज से भीड़ ने इन्हे शुभकामनाओं के साथ बिदाई दी।</p>



<p>&nbsp;कांग्रेस विधायक समेत भाजपा के लोग</p>



<p>शहर के मुख्य मार्गो से निकले जलसे में कांग्रेस विधायक दिलीपसिंह गुर्जर ने किरण टाकिज चौराहे पर पहुुचकर मांग का समर्थन किया। वे भी शहर के मुख्य मार्गो से गुजरे। साथ ही पदयात्रियों की हौसला अफजाई की। कई काग्रेस पार्षदांे के अलावा वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व नपा उपाध्यक्ष बंशीलाल मालपानी एवं भाजपा के पदाघिकारी भी शामिल हुए।&nbsp; वरिष्ठ भाजपा नेता पूर्व नपा उपाध्यक्ष राजेश धाकड, पूर्व नपा अध्यक्ष राजेंद्र अवाना, भाजपा पार्षद बबीता रघुवंशी एवं नपा अध्यक्ष प्रतिनिधि ओपी गेहलोत आदि ने भी स्वागत किया। आप पार्टी के उज्जैन जिला ग्रामीण अध्यक्ष सुबोध स्वामी भी साक्षी बने। अभिभाषक संध अध्यक्ष विजय वर्मा,लायंस क्लब एवं प्रेस क्लब के पदाघिकारियों आदि समेत कई संस्थाओं के प्रमुखों एवं व्यापारियों ने भागीदारी की।</p>



<p>संभवत होंगे गिरफतार</p>



<p>अभी यह पुष्ट नही है लेकिन यह संभावना व्यक्त कि जा रही हैकि पदयात्री भोपाल में&nbsp; 11 मई को सीएम हाउस के सामने प्रदर्शन करेंगे। ऐसी स्थिति में इनकी गिरपतारी की संभावना से इंकार नहीं किया जा&nbsp; सकता है। कयास लगाए जा रहे हैकि भोपाल में आयोजित प्रदर्शन में उज्जैन जिले की अन्य विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस विधायक भी इस प्रर्दशन में शुमार हो सकते हैं। पदयात्रा में दिलीप फतरोड, चेतन नामदेव, जुम्मन खान, श्रवण सोलकी,अनिल भाट,, शशिकांत सौलंकी, आरिफ खान, आकाश शर्मा, एवं लाखन परमार आदि शामिल हुए हैं।</p>



<p>नवीन नागदा जिले की तस्वीर</p>



<p>कमलनाथ सरकार में नागदा को जिला बनाने का परीक्षण हुआ और 18 मार्च 2020 को मंत्रिमंडल में स्वीकृति मिली। आगेे की प्रक्रिया दावे आपत्यिों एवं अधिसूचना की कार्यवाही पूरी हांेने के पहले ही कांग्रेस की अंर्तकलह से कमलनाथ सरकार गिर गई। उसके बाद से यह अधूरी प्रकिया पेंिड्रग&nbsp; पड़ी है। नागदा को जो नवीन जिला बनाया जाने की प्रोजेक्ट जो कलेक्टर उज्जैन से वल्लभ भवन भोपाल को वर्ष 2019 में जो जानकारियां भेजी गई उसके अनुसार नवीन नागदा जिले में कुल 561 गांव एवं 301 पंचायते शामिल है। नागदा क्षेत्र के 114 गांव, खाचरौद के 110 महिदपुर 114त्र झारड़ा, 113 एवं रतलाम जिले की आलोट तहसील के 11ृ0गांवों का मुख्यालय नागदा होगा। उन्हेल कस्बा के 28 गांव भी इस नवीन जिले में प्र्रस्तावित है। इन कुल 28 गांवों&nbsp; की आबादी 42 हजार 18 आंकी गई है।</p>



<p>आबादी 7 लाख 77 हजार 201</p>



<p>प्रस्तावित नागदा जिले की आबादी जनगणना 2011 के अनुसार 7 लाख, 77 हजार 201 प्रस्तावित है। जिन तहसीलों को नवीन नागदा जिले में शामिल किया जा रहा है उसके अनुसार नागदा क्षेत्र की आबादी 2 लाख 37 हजार, 996, खाचरौद- 1 लाख, 61 हजार 270, महिदपुर- 1 लाख 51 हजार, 736 आलोट- 1 लाख 11 हजार 636 झारड़ा- 1 लाख 7 हजार 563 शामिल होगी।</p>
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		<title>असहमति के लिए जगह बनी रहना लोकतंत्र के लिए जरूरी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[राजेन्द्र बोड़ा]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 08 Apr 2023 10:35:37 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[आंदोलन]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="675" height="379" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="असहमति के लिए जगह बनी रहना लोकतंत्र के लिए जरूरी" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929.jpeg 675w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929-313x176.jpeg 313w" sizes="(max-width: 675px) 100vw, 675px" title="असहमति के लिए जगह बनी रहना लोकतंत्र के लिए जरूरी 3">लोकतंत्र में एकाधिकारवादी शासन नहीं होता। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सबकी सहमति बनाई जाती है। भले ही शासन की बागडोर प्रतिस्पर्धात्मक निर्वाचन से सौंपी जाती है किन्तु राज्य का संचालन आम सहमति बना कर चलाना ही लोकतान्त्रिक नेताओं की असली उपलब्धि होती है। लोकतंत्र की पहली शर्त यही होती है कि उसमें प्रत्येक नागरिक को लगे [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="675" height="379" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="असहमति के लिए जगह बनी रहना लोकतंत्र के लिए जरूरी" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929.jpeg 675w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2022/11/images285929-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 675px) 100vw, 675px" title="असहमति के लिए जगह बनी रहना लोकतंत्र के लिए जरूरी 4"><p>लोकतंत्र में एकाधिकारवादी शासन नहीं होता। लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सबकी सहमति बनाई जाती है। भले ही शासन की बागडोर प्रतिस्पर्धात्मक निर्वाचन से सौंपी जाती है किन्तु राज्य का संचालन आम सहमति बना कर चलाना ही लोकतान्त्रिक नेताओं की असली उपलब्धि होती है। लोकतंत्र की पहली शर्त यही होती है कि उसमें प्रत्येक नागरिक को लगे कि वह अपने तरीके से जीवन जीने को स्वतंत्र है। इस स्वतंत्रता में उसकी किसी परमेश्वर में आस्था के साथ किसी परमेश्वर को न मानने की भी आस्था, उसका रहन सहन, उसकी बोली, उसका खानपान, पहनावा सब शामिल होता है।</p>
<p>भारतीय संविधान उसे अपनी बात कहने का, अपना मत रखने का, और उसे अभिव्यक्त करने का पूरा हक़ देता है। संविधान उसे यह हक़ भी देता है कि वह बिना कोई लोभ, लालच, प्रलोभन या दबाव दिये दूसरों को अपने मत का बनाने के लिए प्रयत्न कर सके। नागरिकों के लिए इन्ही अधिकारों को पाने के लिए देश की आज़ादी के लिए लंबी जंग लड़ी गई थी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, भारत के स्वाधीनता संग्राम के मूलभूत मूल्यों में से एक थी। अंग्रेजों ने असहमति के स्वर को कुचलने का भरसक प्रयास किया परंतु स्वाधीनता सेनानियों को यह एहसास था कि देश में प्रजातांत्रिक संस्कृति के जड़ पकड़ने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपरिहार्य है। स्वाधीनता संग्राम के कई नेताओं को निडरता से अपनी बात रखने की बड़ी कीमत अदा करनी पड़ी। उन्हें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों द्वारा हर तरह से प्रताड़ित किया गया। स्वाधीनता के बाद, हमारे संविधान में इस तरह के प्रावधान किए गए जिनसे अभिव्यक्ति की आज़ादी को कोई सरकार समाप्त न कर सके।</p>
<p>इन अधिकारों में प्रत्येक नागरिक को असहमति का अधिकार भी शामिल है जो संविधान की उसी धारा में समाहित है जिसमें प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी दी गई है। असहमति और कुछ नहीं बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 में निहित प्रतिबंधों के अधीन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का विस्तार ही है। ये एक ऐसा अधिकार है जिसे बनाये रखने की हमने शपथ ले रखी है। जब भी कोई चीज़ हमारी अंतरात्मा के ख़िलाफ़ जाती है तो हम इसे मानने से इनकार कर देते हैं। अपना कर्तव्य समझते हुए हम ऐसा करने से इनकार करते हैं। संविधान हमें ऐसा अधिकार देता है कि हम ऐसी किसी बात को मानने से इनकार करें जो हमारी अंतरात्मा के ख़िलाफ़ है।</p>
<p>यही बात महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन से हमें सिखाई। देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने भी हाल ही में टिप्पणी की कि सवाल करने और असहमतियों के लिए जगह ख़त्म करना राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक तरक्की के आधार को ख़त्म करना है। इस लिहाज़ से असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व है। इसका मतलब है कि लोकतंत्र में असहमतियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए न कि उन्हें कुचला जाना चाहिए। शर्त बस इतनी ही है कि असहमति शांतिपूर्ण हो और वह हिंसा में तब्दील न हो।</p>
<p>असहमति का अर्थ विरोध नहीं होता, इसलिए हमारे यहां इसकी जगह पक्ष और प्रतिपक्ष की अवधारणा है। हमारे संवैधानिक सदनों में कोई विरोधी पक्ष नहीं होता, प्रतिपक्ष होता है। असहमति जीवंत लोकतंत्र का प्रतीक है। लोकतान्त्रिक शासन में असहमति की तार्किक अभिव्यक्ति आम सहमति बनाने के लिये ही होती है। लेकिन हम पाते हैं कि भारतीय समाज में विभिन्न मुद्दों पर विपरीत विचारधारा के लिये असहिष्णुता बढ़ रही है। यह चिंता की बात है।</p>
<p>दुर्भाग्य से कई बार असहमति का विकृत रूप भी देखने को मिलता है। ऐसा प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति के कारण होता है जहां असहमति के लिए लोगों को भड़काया जाता है जिसका नतीजा जनसमूह के हिंसक हो जाने की घटनाएं के रूप में सामने आता है। असहमति व्यक्त करने के लिए शुरू में शांतिपूर्ण तथा अहिंसक तरीके से धरना-प्रदर्शन और बंद का आयोजन किया जाता है लेकिन उसे हिंसक होने में देर नहीं लगती। यह भी महत्वपूर्ण है कि हिंसा का माहौल आंदोलनकारियों के कृत्य से बनता है या राज्य की ताकत की प्रतीक पुलिस के असंयमित कदम से।</p>
<p>लेकिन हिंसक गतिविधियों को ‘असहमति’ के दायरे में नहीं माना जा सकता। हिंसा भौतिक ही नहीं होती है। असंयमित भाषा, क्रूर भाषा और गाली -गलौच वाली भाषा, किसी को देख लेने की धमकी देने वाली भाषा और किसी की आस्था का अमर्यादित मजाक उड़ाना हिंसा का प्रतिरूप ही माना जा सकता है। अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार के इस्तेमाल के नाम पर किसी व्यक्ति या समुदाय के बारे में कटुता फैलाने की आज़ादी भी हमारा संविधान नहीं देता। हाल के समय में नि:संदेह विवादास्पद कृषि कानून, नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसे कई मुद्दों पर प्रतिस्पर्धी राजनीति के माहौल के कारण समाज में उत्तेजना रही है।</p>
<p>इसके पीछे वैचारिक विमत प्रमुख रहा है। यह भी तथ्य है कि इन्हीं आन्दोलनों के दौरान कई स्थानों पर हिंसा भी हुई। सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के लिये आरक्षण सहित ऐसे अनेक विषय हैं, जिन्हें लेकर विभिन्न संगठनों और समूहों ने आन्दोलन शुरू किये, लेकिन आगे चलकर इनका रूप बदल गया और इसमें हिंसा भी शामिल हो गयी। सरकार के रवैये से नाराज होकर किये जाने वाले आंदोलनों के दौरान हिंसा और तोड़फोड़ होना भी आम है।</p>
<p>इसीलिए लोकतंत्र में असहमति और असहमति व्यक्त करने के लिये हिंसा, तोड़फोड़ करने या फिर विघटनकारी गतिविधियों का सहारा लेने जैसे कृत्यों के बीच अंतर करने और असहमति के स्वरूप को परिभाषित करने की भी आवश्यकता महसूस की जाती रही है। असहमति के दायरे के निर्धारण के अभाव में आज समाज के हर वर्ग और समूह के लोग विभिन्न मुद्दों पर अपनी असहमति असंयमित और अमर्यादित भाषा से व्यक्त करने लगे हैं।</p>
<p>अभिव्यक्ति की आजादी का बोलबाला सोशल मीडिया पर अधिक नज़र आता है जहां राजनीतिक दलों, नेताओं के साथ ही न्यायपालिका और इसके सदस्यों के बारे में भी मनमर्जी की टिप्पणियां आम होती हैं। इसी वजह से ऐसा महसूस किया जाता है कि सोशल मीडिया पर की जा रही अनर्गल और बेबुनियाद टिप्पणियों पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। इस समय उच्चतम न्यायालय में राजद्रोह के अपराध से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए को असंवैधानिक घोषित करने के अनुरोध के साथ अनेक याचिकाएं लंबित हैं। इन याचिकाओं में भी असहमति की आवाज उठाने वालों के प्रति धारा 124 ए के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया है। न्यायालय भी ‘औपनिवेशिक काल’ के राजद्रोह संबंधी दंडात्मक कानून के ‘दुरुपयोग’ से चिंतित है और उसने कहा भी है कि एक गुट दूसरे समूह के लोगों को फंसाने के लिए इस प्रकार के (दंडात्मक) प्रावधानों का सहारा ले सकता है।</p>
<p>यही नहीं, यदि कोई विशेष पार्टी या लोग विरोध में उठने वाली आवाज नहीं सुनना चाहते हैं, तो वे इस कानून का इस्तेमाल दूसरों को फंसाने के लिए कर सकते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमलों के पीछे कई कारण हो सकते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का एक तरीका हमने सन् 1975 के आपातकाल में देखा। उस समय देश में बोलने की आज़ादी पर रोक लगाने में राज्य की सबसे बड़ी भूमिका रही।</p>
<p>इन दिनों जो हो रहा है उसमें राज्य की भूमिका तो है ही, परंतु इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि साम्प्रदायिकता के ज़हर से लबरेज़ लोग अपने स्तर पर साम्प्रदायिकता के विरोधियों की आवाज़ को कुचल रहे हैं, उन पर जानलेवा हमले कर रहे हैं। आज न केवल धर्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा का वातावरण बन गया है बल्कि उनके प्रति भी जो प्रजातांत्रिक और बहुवादी मूल्यों के हामी हैं। समाज में असहिष्णुता तेजी से बढ़ी है। ऐसे में अनेक सवाल उठते है। समाज का साम्प्रदायिकीकरण क्यों हो रहा है? हम इतने असहिष्णु क्यों होते जा रहे हैं? जो लोग प्रजातांत्रिक मूल्यों के पैरोकार हैं, उनकी जान क्यों ली जा रही है? जो लोग स्वाधीनता संग्राम और भारतीय संविधान के मूल्यों को बढ़ावा देते हैं उन पर हमले क्यों हो रहे हैं? साम्प्रदायिक विचारधाराएं, प्रजातंत्र विरोधी होती हैं और उनकी बढ़ती ताकत के चलते ही देश में अलगाव बढ़ता है। विचारधारा और असहिष्णुता व हत्याओं के परस्पर संबंध को समझने के लिए यदि हम कुछ पीछे मुड़कर देखें तो स्वाधीन भारत में वैचारिक कारणों से हत्या की सबसे पहली और सबसे प्रमुख घटना थी महात्मा गांधी की हत्या।</p>
<p>किसी भी प्रजातांत्रिक समाज के लिए यह आवश्यक है कि वहां सभी लोगों को अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार हो और सभी के विचारों पर स्वस्थ्य बहस के लिए जगह हो। नि:संदेह, असहमति संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(ए) में प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी को प्रतिबिंबित करती है। प्रत्येक नागरिक को बोलने की स्वतंत्रता प्रदान करने वाले अनुच्छेद 19 (1)(ए) और इस संबंध में अनेक न्यायिक व्यवस्थाओं में स्पष्ट किया गया है कि अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार निर्बाध नहीं है और आवश्यकता पड़ने पर नियंत्रित किया जा सकता है। इसीलिए दूसरी तरफ असहमति को परिभाषित करने और इसकी लक्ष्मण रेखा खींचने की आवश्यकता भी महसूस की जाती रही है। अभिव्यक्ति और विचार की स्वतंत्रता राज्य की उदारता से नहीं मिलती। यह नागरिकों का मूलभूत अधिकार है। अभिव्यक्ति का सरकारी दमन असत्य को उजागर करने को अधिक कठिन तो बना सकता है, उसे कम नहीं कर सकता। भारत के प्रत्येक नागरिक को खुली, गतिशील तथा तर्कसंगत अभिव्यक्ति का अधिकार ही नहीं नागरिक कर्तव्य भी है। क्या बोला गया है उसके आधार पर जब सरकार सार्वजनिक चर्चा को व्यवस्थित करने का प्रयास करती है तो वह अभिव्यक्ति की आज़ादी को बांधने की चेष्टा होती है।</p>
<p><span style="color: #999999;"><em>Disclaimer: इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। </em></span></p>
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		<title>मुख्यमंत्री महोदय, यह कैसी सरकार है जो सालों से जनता की मांग को अनसुना कर रही है?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[कैलाश सनोलिया]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 13 Mar 2023 11:25:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[आंदोलन]]></category>
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										<content:encoded><![CDATA[<img width="960" height="639" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/IMG-20230313-WA0002.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="मुख्यमंत्री महोदय, यह कैसी सरकार है जो सालों जनता की मांग को अनसुना कर रही है?" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/IMG-20230313-WA0002.jpg 960w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/IMG-20230313-WA0002-300x200.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/IMG-20230313-WA0002-768x511.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/IMG-20230313-WA0002-696x463.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/IMG-20230313-WA0002-631x420.jpg 631w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/IMG-20230313-WA0002-313x208.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" title="मुख्यमंत्री महोदय, यह कैसी सरकार है जो सालों से जनता की मांग को अनसुना कर रही है? 6"><p>नागदा। कमलनाथ सरकार के मंत्रिमंडल में तीन नवीन जिले नागदा, चाचौड़ा एवं मैहर के सर्जन की स्वीकृति 18 मार्च 2020 को मिली। इस सरकार के गिरने के बाद नागदा को जिला बनाने की प्रक्रिया,  गजट नोटिफिकेशन एवं दावा /आपत्तियों को ग्रहण लगा है। तकरीबन ढाई बरसों से यह मामला पेड़ से गिरा खजूर पर अटका की कहावत को चरितार्थ कर रहा है। इन दिनों इस मसले को लेकर सियासती घमासान मचा है। शहर की तस्वीर &#8211; तकदीर  बदलने की इस मांग की लड़ाई अब एक चौराहे पर तो खडी, एक नई राह की तलाश में भी हैं। अब लगभग यह तस्वीर तो साफ हो गई हैकि जनता की इस ख्वहिश  की गैंद शिवराज सरकार के पाले में है।  कमलनाथ सरकार मंत्रिमंडल की स्वीकृति को बस अमली जामा पहनाना बाकी है। इस मामले में भाजपा विचारक एवं कांग्रेस के बीच में सियासत मची है। कांग्रेस सवाल खड़े कर रही है तो भाजपा बचाव की मुद्रा में हैं। इस सियासती  खेल ने अभी-अभी नई करवट ली है। अकस्मात दो दिनों के अंतराल में चार समीकरण  उभर कर सामने आए हैं । (1) जिले की दरकार को लेकर मुखिया शिवराज से कर्नाटक के राज्यपाल डॉ थावरचंद गेहलोत के संग एक प्रतिनिधि मंडल मिला(2) कांग्रेस विधायक दिलीपसिंह गुर्जर के नेतृत्व मे मांग को लेकर धरना  प्रदर्शन। (3)  मांग के पक्षधर मप्र शासन में कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त असंगठित कर्मकार  कल्याण मंडल के अध्यक्ष श्रीसुल्तानसिंह ने एक पत्र सीएम शिवराज को सौंपा। जिसमे  नागदा को जिला बनाने की सीएम की घोषणा की स्मृति को ताजा किया (4) प्रेस क्लब ने जनमत संग्रह एवं बुद्धिजीवियों से रायशुमारी पर केंद्रित  परिचर्चा का ऐलान किया।</p>
<p><strong>डॉक्टर जटिया एक ताकतवर राजनेता</strong><br />
उक्त चारों मसलों पर चर्चा के पहले बड़ा एक मसला प्रासंगिक है।  शिवराज से जो प्रतिनिधि मंडल मिला उसमे  उज्जैन जिले के एक वजनदार राजनेता डॉ सत्यनारायण जटिया को शामिल नहीं करना  एक बड़ी चूक है। डॉ जटिया अतीत में भारत सरकार में कैबिनेट मंत्री के ओहदे से नवाजे गए थे, इन दिनों आप भाजपा केंद्रीय संसदीय बोर्ड के सदस्य है। बोर्ड सदस्य के किरदार में यह चेहरा हिंदुस्तान की सियासत में टॅांप 10 हस्तियों में शुमार है। सीएम से मिले प्रतिनिधि मंडल की यह खासियत रही कि भाजपा संगठन को कोई वजनदार राजनेता शामिल नहीं था। यह बात सामने आ रही हैकि सीएम से इस मसले पर प्रतिनिधि मंडल में  डा जटिया की प्रतिभागिता वरदान साबित होती। प्रतिनिधि मंडल की मुलाकात  पहले तो यह सोशल मीडिया तक सीमित रही। कोई ठोस वजह समानें नहीं आई। तीन दिन बाद पूर्व विधायक दिलीपसिंह शेखावत ने मीडिया से चर्चा में इसको रंग -रोगन किया और खुलासा किया कि जिस प्रतिनिधि मंडल में वे स्वयं शामिल थे, उनके साथ महामहिम भी थे। वे बोले , नागदा को जिला बनाने केा लेकर सीएम से चर्चा हुई। शिवराज के मुढ को आपने पढा और यह भी भांप लिया कि  वे सकारात्मक नजर आए। लेकिन  नागदा जिले के सर्जन में शामिल होने वाली तहसील खाचरौद, आलोट एवं महिदपुर की आपत्तियों को लेकर निराशा एवं  हताशा भी इजाहर कर दी।</p>
<p><strong>बस्ती बसी नहीं शेर का भय</strong><br />
नवीन जिले के प्रार्दुभाव में  आपतियां भोगोलिक स्तर की ही वजनदार  होती है। किसी राजनेता का विरोध  वैधानिक  रूप से रोडा नहीं बनता।  इतिहास साक्षी हैकि आगर, अलिराजपूर, नीमच, सिंगरौली, और डिडौरी जितने भी नवीन जिलों का सर्जन  हुआ सब में दर्जनों आपतियां आई, लेकिन, खारिज हुई। उन आपतियों  पर मात्र  विचार होता जो जिले की भोगेलिक सीमा, प्राकृतिक आपदा मतलब नदी नाले की अड़चन आदि की बुनियाद पर टिकी होती है। उनका समाधान  भी तलाशा जाता। महज अखबारों मे विरोध या दल विशेष के नेता की  असहमति रोड़ा नही बनती।  यह तर्क अब हास्यास्पद हैकि नागदा को जिला बनाने में  आपतियों रोडा बनेगी।  जब सरकार ने आपतिया अभी आंमत्रित ही  नहीं की तो पहले से यह भय पैदा करना की यह कारण बाधक बन जाएगा। मतलब बस्ती बसी नहीं और शेर के आने का डरावना भय। यह नकारात्मक इच्छाशक्ति का परिचायक है। जहां तक महिदपुर की तत्कालीन कांग्रेस विधायक स्व कल्पना परूलेकर की आपति का हवाला दिया जा रहा है तो इस पत्रकार के पास वे प्रमाणिक दस्तावेज है जो  वर्ष 2012 में नागदा को जिला बनाने के  लिए आई आपत्तियों के प्रमाण है। तत्कालीन अवर सचिव  राजस्व विभाग  श्री अशोक गुप्ता हस्ताक्षार का वह दस्तावेज इस पत्रकार के पास सुरक्षित है।  इस अभिलेख में लिखा हैकि नागदा को जिला बनाने  के खिलाफ 3 अप्रैल 2012 को महिदपुर से कुल 7 आपतिया आई।  जिसमें महिदपुर के अभिभाषक एवं सामाजिक संगठनों के नाम शुमार है।  यह प्रमाणित  प्रोसडिंग 9 मई 2012 है। अवर सचिव के इस खुलासे में कल्पना के नाम का कोई दस्तावेज नही है। यह बात सत्य हैकि कल्पना की आपति समाचारों तक सीमित रही। इसी प्रकार से महिदपुर के वर्तमान विधायक श्री बहादुरसिंह चौहान ने भी उस समय में महिदपुर को जिला बनाने की मांग की थी। जब विरोध में कल्पना का नाम लिया जा रहा है तो महिदपूर भाजपा विधायक के नाम का तर्क  चतुराई से प्रकट नहीं किया। इनहोने भी समाचार पत्रों में महिदपुर को इस तथ्य के साथ जिला बनाने की मांग उठाई थीकि रियासत काल में महिदपुर जिला था। इसलिए इसी को जिला बनाया जाए।</p>
<p><strong>यह तो नैतिक जिम्मेदारी</strong><br />
अब यदि ये फिर विरोध करते है तो भाजपा की  नैतिक जिम्मेदारी  िक वे अपनी पार्टी के विधायक को राजी करें।  इसी प्रकार से नागदा जिले में आलोट तहसील को शामिल करने का विरोध वहां के कांग्रेस विधायक मनोज चावला करें तो नागदा के कांग्रेस विधायक श्री गुर्जर की नैतिक जिम्मेदारी हैकि उन्हे राजी करें।</p>
<p>यहा गौर करने लायक बात हैकि एक बार नागदा को जिला बनाने का प्रस्ताव आपतियों के आधार पर प्रस्ताव निरस्त नहीं हुआ था एक राजस्व विभाग के अवर सचिव ने  सोची समझी रणनीति के तहत यह कहकर प्रस्ताव निरस्त किया थाकि नागदा को जिला बनाने के तथ्य उभर कर सामने नहीं आ रहे हैं। यह प्रस्ताव 2 जून 2012 को निरस्त हुआ। पत्र क्रमांक डी- 853/1777/ 2008 के माध्यम से निरस्त प्रस्ताव की सूचना जारी की गई। (इस अभिलेख के प्रमाण सुरक्षित है।)</p>
<p><strong>विवाद के भंवरजाल में सीएम मुलाकात</strong><br />
प्रतिनिधि मंडल की सीएम से मुलाकात पर  कांग्रेस विधायक श्री गुर्जर ने सवाल खडे किए हैकि सीएम से जिले को लेकर महामहिम की जो चर्चा हुई  और मांग पत्र सौपा गया उसको सार्वजनिक किया जाए। गौरतलब हैकि प्रमाणिकता और सीएम के आश्वासन का प्रमाणिक  प्रसारण जब तक जनता के सामने ना आया तब तक तो प्रतिनिधि मंडल की बात जंगल में मौर नाचा किसने देखा की कहावत चरितार्थ है।</p>
<p>वैसे तो नागदा को जिला बनाने की मांग की अनुशंसा तत्कालीन  भाजपा राष्ट्रीय महासचिव श्री  थावरचंद गेहलोत ने 16 सितंबर 2010 को शिवराज के नागदा आगमन पर  की थी। यह मांगपत्र  भाजपा संगठन ने सौंपा था।( प्रमाण इस पत्रकार के पास सुरक्षित है। अब डॉ गेहलोत कर्नाटक के राज्यपाल के संवैघानिक एवं मर्यादित पद पर आसीन है। डॉ जटिया आज की स्थिति में भाजपा में एक वजनदार किरदार है। जिस भी राजनेता ने शिवराज से प्रतिनिधि मंडल का तानाबाना बूना वे संभवत बड़ी चूक कर गए कि डॉ जटिया को इस प्रतिनिधि मंडल में शामिल करने की भूल कर गए।</p>
<p><strong>सांसद एवं प्रभारी मंत्री को याद करते</strong><br />
बेहत्तर होता प्रतिनिधि मंडल में  सांसद श्री अनिल फिरोजिया प्रभारी मंत्री श्रीजगदीश देवडा और उज्जैन जिले कें निवासी उच्च शिक्षा मंत्री डा मोहन यादव भाजपा प्रदेश अध्यक्षश्री वीडी शर्मा  उज्जैन जिला भाजपा अध्यक्ष श्री बहादुरसिंह बोरमुंडला को भी शामिल किया जाता। ये सभी भाजपा के उर्जावान लोग हैं।</p>
<p><strong>कांग्रेस की गूंज अभी सीमित</strong><br />
कांग्रेस विधायक दिलीप सिंह गुर्जर ने जिला बनाने की मांग को लेकर घरना आंदोलन कर दिया।  वे बोल रहे हैकि-  नागदा कागजी दस्तावेजों में तो जिला  बन चुका है। कमलनाथ सरकार ने स्वीकृति प्रदान कर दी । बस अब दावे- आपतियों  पर सारा दारोमदार टिका है।  यहां पर यह कहावत भाजपा एवं कांग्रेस पर दोनों पर चरितार्थ हो गई कि कुलडी में गुड़ फोड़ लिया । कांग्रेस ने कोई बड़ा आंदोलन का मार्ग अख्तार नहीं किया।  जिसकी  गूंज भोपाल हाउस या वल्लभ्ठा भवन तक जाए।  इसी प्रकार से सीएम से मिले प्रतिनिधि मंडल पर भी यह कहावत  चरितार्थ होती है।</p>
<p><strong>मंत्री दर्जा राजनेता की पेशकश</strong><br />
अभी तक के हालातों में इस मसले पर भाजपा खेमे से  पूर्व विधायक दिलीपसिंह शेखावत मोर्चा संभाले हुए हैं। लेकिन मप्र शासन में कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त असंगभित कामगार बोर्ड के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ भाजपा नेता सुल्तानसिंह शेखावत ने सीएम के नाम पत्र भेजकर पूर्व विधायक श्री शेखावत की इस मसले पर जारी एकाधिकार की सियासत को ओवरटेक करने का प्रयास  किया है। उन्होंने मीडिया को बकायदा उस पत्र की प्रति जारी की है जोकि सीएम के नाम है जो  सकारात्मक  व जनहित की पक्षधर है। उन्होंने  पत्र में सीएम शिवराज को याद दिलाया  हैकि नागदा को जिला बनाने की स्वयं  ने 26 नवंबर 2018 को घोषणा की थी। उसको अब आगे बढाया जाए। हालांकि एक सप्ताह पहले विधान सभा में विधायक  श्री गुर्जर के सवाल पर  यह खुंलासा हुआ कि हैकि ऐसी कोई घोषणा सीएम नहीं की थी ।</p>
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		<title>नागदा जिला- स्वयंबर का धनुष तोड़ने में नकारा साबित हुए सत्ता के सूरमा।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[कैलाश सनोलिया]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Mar 2023 16:43:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="640" height="480" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="नागदा जिला- स्वयंबर का धनुष तोड़ने में नकारा साबित हुए सत्ता के सूरमा।" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729.jpeg 640w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729-300x225.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729-560x420.jpeg 560w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729-80x60.jpeg 80w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729-265x198.jpeg 265w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729-313x235.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" title="नागदा जिला- स्वयंबर का धनुष तोड़ने में नकारा साबित हुए सत्ता के सूरमा। 7">नागदा।&#160; रामायण काल में जनकपूरी में एक स्वयंबर हुआ था। इस स्वयंबर&#160; का असली चिंतन&#160; तो यह थाकि सुरमा कौन है। शक्तिशाली कौन है। इस स्वयंबर&#160; का पैमाना यह थाकि&#160; रखा धनुष को जो भी सूरमा तोड़ देगा, वह&#160; उस मकसद का असली किरदार&#160; होगा। धनुष&#160; तोड़ने की जिसमें सामर्थ्य वहीं सूरमा होगा। फिर जनक [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="640" height="480" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="नागदा जिला- स्वयंबर का धनुष तोड़ने में नकारा साबित हुए सत्ता के सूरमा।" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729.jpeg 640w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729-300x225.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729-560x420.jpeg 560w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729-80x60.jpeg 80w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729-265x198.jpeg 265w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/03/images282729-313x235.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" title="नागदा जिला- स्वयंबर का धनुष तोड़ने में नकारा साबित हुए सत्ता के सूरमा। 8">



<p>नागदा।&nbsp; रामायण काल में जनकपूरी में एक स्वयंबर हुआ था। इस स्वयंबर&nbsp; का असली चिंतन&nbsp; तो यह थाकि सुरमा कौन है। शक्तिशाली कौन है। इस स्वयंबर&nbsp; का पैमाना यह थाकि&nbsp; रखा धनुष को जो भी सूरमा तोड़ देगा, वह&nbsp; उस मकसद का असली किरदार&nbsp; होगा। धनुष&nbsp; तोड़ने की जिसमें सामर्थ्य वहीं सूरमा होगा। फिर जनक की बेटी का हाथ थामने की जो उनकी मुराद है वह पूरी होगी।&nbsp; वहां पहुचे कई सूरमाओं में से अधिकांश ने धनुष तोड़ने की प्रकिया के वक्त ऐसा आंडम्बर किया कि जैसा उनसे बलशाली&nbsp; और कोई नहीं है। धनुष उठाने के पहले ही स्वयंभू बने और अपने बल और पराक्रम का गुणगान ऐसे&nbsp; करते दिखे जैसे उनके बराबरी का कोई पराक्रमी नहीं है। उन आंडंबरियों का हश्र यह हुआ कि और कोई जो दूूर खड़ा था उसने अपनी ताकत का एहसास उन सारे आंडंबरी सूरमाओं को दिखा दिया। उस काल का यह प्रसंग हाल में नागदा की उपेक्षा कर रीवा जिले के एक मऊगंज को जिला बनाने की घोषणा से सामंजस्य कर गया। बाजी मऊगंज मार गया। नागदा के सत्ता के सूरमाआ शक्तिहीन और सामर्थ्यहीन साबित हुए। जनता सत्ता से ही उम्मीद करती है, लेकिन यहां तो सत्ता के सूरमा मुंह लटकाए खड़े&nbsp; और बाजी और कोई मार गया।</p>



<p>उधर, शिवराज ने मऊगंज जाकर&nbsp; जिला बनाने की घोषणा की।&nbsp; जनता को इतना भी आश्वासन दिया कि स्वाधीनता दिवस का तिरंगा अब नए जिले मऊगंज में ही लहराएगा। जबकि प्रदेश में नागदा समेत अन्य दो नवीन जिलों के सृजन का प्रस्ताव कमलनाथ&nbsp; मंत्रिपरिषद&nbsp; में 18 मार्च 2020 को मप्र शासन&nbsp; तत्कालीन मुख्य सचिव एम गोपाल रेड्डी के हस्ताक्षर से अस्तित्व में है। नागदा, मैहर एवं चाचौड़ा को नवीन जिला सृजन की स्वीकृति मिली थी।</p>



<p>सरकार बदलते लटकाने की नीति</p>



<p>हाल में श्री अभय चौपड़ा के सूचना अधिकार में जो&nbsp; जानकारी मिली (जो इस पत्रकार के पास भी सुरक्षित है) । उसके अनुसार नागदा को जिला बनाने के लिए पुनः नए सिरें से प्रक्रिया करने का&nbsp; दाव कमलनाथ सरकार गिरने के बाद भाजपा सरकार ने खेला । ऐसा सरकार ने क्यों किया यह जनता को समझना होगा।</p>



<p>नागदा में विकास यात्रा आई तो सत्ता के किसी भी सूरमा ने इस मामले पर कोई बात नहीं की। यह हास्सास्पद बात हुई कि नागदा को 53 वां जिला बनाने के लिए पोस्टकार्ड अभियान चलाया जाएगा। यह बात विपक्षी कांग्रेस करती तो जनता&nbsp; के गले भी उतरती। इस बात का यह हश्र हुआ कि 53 वां जिला बनाने के लिए यहां आंडबर हो रहा था और यह क्रम तो रीवा जिले के मऊगंज को नसीब हो गया। नागदा&nbsp; के स्थानीय सत्ता के सूरमाओं की ताकत और सामर्थ्य का असली चेहरा सामने आ गया। बेहत्तर होता नागदा के स्थानीय सूरमा यह दलील पेश करते कि नवीन मऊगंज&nbsp; का सर्जन करने के पहले जिन तीन जिलों की मंजूरी वल्लभ भवन मे पड़ी है उस पर पहले अमल में लाए। जाहिर हैकि या तो स्थानीय सत्ता के सूरमाओं को इस मसले पर शिवराज ने तव्वजों नहीं दी। या स्वयं की इच्छा शक्ति नहीं है।</p>



<p>जिला बनाने के नाम पर वोट मांगे</p>



<p>लेकिन जनता को वह बात भी तो याद हैकि भाजपा उम्मीदवार श्री दिलीपसिंह शेखावत ने वर्ष 2013 का विधानसभा चुनाव नागदा को जिला बनाने की पहली प्राथमिकता के साथ लड़ा था। जीत भी मिली लेकिन जनता की मुराद पूरी नहीं हुई।&nbsp; तीसरा कारण यह भी संभव हैकि फिर जैसा विपक्ष बार-बार आरोप लगा रहा हैकि ग्रेसिम इस मामले में अवरोघक बना हुआ है। शायद इसी बात को लेकर जनता की मुराद पर कुठाराघात हो रहा है।</p>



<p>आंदोलन का धर्म कांग्रेस&nbsp; निभाए</p>



<p>इस मांग को पहले कांग्रेस विधायक दिलीपसिंह गुर्जर ने 2008 में उठाया था। पहले तो भाजपा इस मांग पर मुंह मोड़ती रही फिर अनमने मन से साथ में हुई। स्थानीय भाजपा संभव इसलिए मूंह मोड़ रही थीकि कांग्रेस विधायक की यह मांग है। श्री गुर्जर को कही श्रेय ना मिल जाए इसलिए कन्नी काटी। अभी भी भाजपा सहमी और डरी हुई कि यदि जिला बनाए जाने की अधूरी प्रकिया को पूरी कर दिया जाएगा तो दिलीपसिंह गुर्जर को श्रेय मिलेगा। कारण कि कमलनाथ सरकार ने महज 15 महिनों में घोषणा कर दी तो भाजपा की सरकार 15 बरसों में नहीं कर पाई।&nbsp; &nbsp; बेहत्तर होगा विपक्ष कांग्रेस अब विधानसभा में प्रश्न एवं याचिका के अलावा सीधे&nbsp; आक्रामक जनआंदोलन के लिए आगे आए। शहर बंद भोपाल में घेराव कार्यकताओं की गिरफतारी जैेसे कदम उठाए और अपने विपक्ष&nbsp; के धर्म को निभाए। अन्यथा जनता के साथ नाइंसाफी होगी .l</p>



<p>आप पार्टी के लिए सुनहरा मौका</p>



<p>अब इस मसले को आप पार्टी को लपकना होगा। स्थानीय स्तर पर इस पार्टी का नेतृत्व अब सुबोध स्वामी के हाथों में है। ये कांग्रेस का जिला कार्यवाहक अध्यक्ष&nbsp; पद छोडकर आप पार्टी में आए हैं। सुबोध को जन आंदोलन खड़ा कर देना चाहिए। आंदोलन भी ऐसा कि उसकी गंूज राजधानी में गूंजना चाहिए। जबकि कांग्रेेस में कुबत हैकि इस प्रकार का आंदालन करें यदि आप पार्टी ऐसा करेंगी तो कांग्रेस&nbsp; भी मजबूर हो जाएगी।&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;</p>



<p>ये सुलगत सवाल :&nbsp;</p>



<p>&nbsp;(1)&nbsp; विधायक श्री दिलीप सिंह गुर्जर के विधानसभा के एक&nbsp; सवाल पर सबसे पहले नागदा को जिला बनाने का जो परीक्षण&nbsp; हुआ था उसे भाजपा सरकार में जून 2112 में यह कह कर खारिज कर दिया कि नागदा को जिला बनाने के तथ्य उभर सामने नहीं आए। यह प्रस्ताव जब अधिकारियों ने खारिज किया तब सत्ता&nbsp; सूरमा क्यां कर रहे थे। जनता सत्ता पक्ष से ही उम्मीद करती है।</p>



<p>(2) जिस प्रस्ताव को भाजपा शासन काल में 2012 में निरस्त किया गया वहीं प्रस्ताव कमलनाथ के 15 माह के शासन काल में मान्य हो गया।</p>



<p>(3) भाजपा उम्मीदवार श्री दिलीपसिंह शेखावत ने वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में पहली प्राथमिकता नागदा को जिला बनाने के लिए&nbsp; जनता से वोट मांगे और जीत भी मिली। वे बैंरग घर लौट आए। नागदा जिला नहीं बना। प्रदेश में भाजपा की ही सरकार थी।</p>



<p>(4)&nbsp; कमलनाथ सरकार में 18 मार्च 2020 को नागदा को जिला बनाने की मंजूरी मिली बाद में सरकार गिर गई।&nbsp; इस मंजूरी को आगे बढाने के बजाय इस मसले&nbsp; को लटकाने के लिए भाजपा सरकार के 4 मंत्रियों की समिति ने पुनःपरीक्षण की मांग रख दी। यहा बात गौर करने लायक हैकि ऐसा क्यों किया गया। लेकिन समझदार अधिकारी ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया।</p>



<p>(5) कमलनाथ सरकार का प्रस्ताव आज भी अब वैधानिक रूप से अस्तित्व में है। सत्ता के सूरमा उसके प्रति खामौश क्यों है। यह प्रस्ताव तीन वर्ष से इंतजार कर रहा है।</p>



<p>(6) नागदा को जिला बनाने के लिए वजनदार राजनेता श्री थावरचंद गेहलोत ने कवरिंग पत्र के साथ मांग पत्र सीएम&nbsp; शिवराज को नागदा आगमन पर दिया था। यह मांग पत्र 16 सितंबर 2010 कौ सौंपा गया।इस मांग पत्र पर श्री लालसिंह राणावत, श्री दिलीपसिंह शेखावत, डॉ तेजबहादुरसिंह चौहान और घर्मेंश जायसवाल के हस्ताक्षर थे। इन बडे़ राजनेताओं की मांग को अनदेखा किया गया। यह&nbsp; ज्ञापन 12 वर्ष पहले दिया था। इसके पहले मऊगंज जिला बन गया।</p>



<p>(7 )भाजपा बहुमत की नपा परिषद&nbsp; नागदा ने 30 अप्रैल 2010 को इस शहर को जिला बनाने का प्रस्ताव सवानुमति से पारित किया। कांग्रेस पार्षदों ने भी सहमति जताई। अपनी ही सरकार में यह प्रस्ताव 13 वर्षो के बाद मूर्तरूप नहीं ले पाया। मजेदार बात नपा का यह प्रस्ताव वल्लभ भवन भी नहीं पहॅुुचा।</p>



<p>&nbsp;( 8) मुख्यमंत्री ने नागदा में जिला बनाने कीघोषणा आर्शीवाद यात्रा में की जिसको भाजपा ने बहुत प्रचारित भी किया लेकिन हाल में विधायक गुर्जर के एक सवाल पर विधानसभा में सरकार ने इस घोषणा को भी नकार दिया।</p>



<p>( 9) नागदा से कब आबादी वाला शहर आगर, अलिराजपूर एवं मउगंज जिला बन गया और यहां के वाशिदों देखते रह गए। यह तो बड़े- बडे राजनेताओं का शहर है।</p>



<p>(10) कमलनाथ सरकार का प्रस्ताव अक्टूबर 2020 सें अस्तित्व में है। लगभग ढाई बरस बीत गए इसकी सूंध लेने की जिम्म्मेदारी किसकी थी। जनता सत्ता से ही तो उम्मीद रखती है।</p>
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		<title>सहजानंद की क्रांतिकारी विरासत हड़पने की भाजपाई साजिश को बिहार करेगा नाकाम : प्रेस विज्ञप्ति</title>
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		<dc:creator><![CDATA[द हरिश्चंद्र स्टाफ]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Feb 2023 10:57:01 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[आंदोलन]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="800" height="400" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सहजानंद की क्रांतिकारी विरासत हड़पने की भाजपाई साजिश को बिहार करेगा नाकाम" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation.jpg 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation-300x150.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation-768x384.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation-696x348.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation-313x157.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px" title="सहजानंद की क्रांतिकारी विरासत हड़पने की भाजपाई साजिश को बिहार करेगा नाकाम : प्रेस विज्ञप्ति 9">पटना 25 फरवरी 2023 : किसान आंदोलन के महान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती की क्रांतिकारी विरासत को भाजपा द्वारा हड़पने और उन्हें एक जाति नेता के बतौर स्थापित कर देने की साजिशों व कोशिशों को बिहार की जनता निश्चित रूप से नाकामायाब करेगी. भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल, अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय महासचिव राजाराम [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="800" height="400" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="सहजानंद की क्रांतिकारी विरासत हड़पने की भाजपाई साजिश को बिहार करेगा नाकाम" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation.jpg 800w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation-300x150.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation-768x384.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation-696x348.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/cpiml-liberation-313x157.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px" title="सहजानंद की क्रांतिकारी विरासत हड़पने की भाजपाई साजिश को बिहार करेगा नाकाम : प्रेस विज्ञप्ति 10"><p>पटना 25 फरवरी 2023 : किसान आंदोलन के महान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती की क्रांतिकारी विरासत को भाजपा द्वारा हड़पने और उन्हें एक जाति नेता के बतौर स्थापित कर देने की साजिशों व कोशिशों को बिहार की जनता निश्चित रूप से नाकामायाब करेगी.</p>
<p>भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल, अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय महासचिव राजाराम सिंह और खेग्रामस के राष्ट्रीय महासचिव धीरेन्द्र झा ने आज संयुक्त बयान जारी करके कहा कि सहजानंद की विरासत बिहार और पूरे देश में क्रांतिकारी किसान आंदोलन की विरासत है, जिसकी असली उत्तराधिकारी भाकपा-माले है.</p>
<p>नेताओं ने आगे कहा कि सहजानंद सरस्वती ने तो बिहार में किसानों के पक्ष में भूमि सुधार की लड़ाइयां लड़़ीं थीं. वे खेतिहर मजदूरों, छोटे-बटाईदारों के हक-अधिकार के पक्ष में उठ खड़े होने वाले नेता थे, लेकिन भाजपा तो काॅरपोरेटों और बड़े भूस्वामियों के पक्ष में खड़ी रहने वाली किसानों-मजदूरों की दुश्मन नंबर एक पार्टी रही है. आज वह किस मुंह व किस अधिकार से सहजानंद की जयंती मना रही है?</p>
<p>उन्होंने सवाल किया कि किसानों के मसले पर लंबी- चौड़ी डींगें हांकने वाली भाजपा क्या यह बतलाएगी कि वह काॅरपोरेटों के पक्ष में और किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने वाले कृषि कानून लेकर क्यों आई थी? पूरा देश जानता है कि उन कानूनों को वापस कराने के लिए कितनी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी. किसानों के उस आंदोलन को बदनाम करने के लिए भाजपाइयों ने क्या &#8211; क्या नहीं किया था, लेकिन अंततः उसे किसानों के व्यापक आंदोलन के सामने झुकना पड़ा. अभी बक्सर में किसानों को अपनी जमीन के मुआवजे के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है, क्योंकि केंद्र सरकार ने इस मसले को उलझा कर रख दिया है. भाजपा, दरअसल देश में काॅरपोरेटों व कंपनियों का शासन चाहती है और वह किसानों को उनकी जमीन से बेदखल कर सबकुछ अंबानी-अडानी के हवाले करने का खेल खेल रही है.</p>
<p>भाजपा राज में यूरिया की किल्लत लगातार बनी हुई है. बटाईदार किसानों को केंद्र सरकार किसान का अधिकार ही नहीं देती. उन्हें किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता नहीं मिलती. बिहार में भूमि सुधार की प्रक्रिया यदि आगे नहीं बढ़ पाई तो उसके पीछे भी भाजपा है. कृषि मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलता. मनरेगा में काम करने वाले मजदूरों का भी यही हाल है. किसान मजदूर समागम करने वाली भाजपा यह बताए कि केंद्र सरकार ने मनरेगा की राशि में कटौती क्यों किया? मनरेगा में कटौती करके उसने अपना मजदूर विरोधी चेहरा ही उजागर किया है.</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>रेत माफिया के सामने नतमस्तक सरकार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[द हरिश्चंद्र स्टाफ]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 23 Feb 2023 09:40:10 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[समाज]]></category>
		<category><![CDATA[आंदोलन]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="600" height="384" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/madhya-pradesh-ret-mafiya.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="रेत माफिया के सामने नतमस्तक सरकार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/madhya-pradesh-ret-mafiya.jpg 600w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/madhya-pradesh-ret-mafiya-300x192.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/madhya-pradesh-ret-mafiya-313x200.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 600px) 100vw, 600px" title="रेत माफिया के सामने नतमस्तक सरकार 11">राकेश अचल : मध्यप्रदेश की डबल इंजिन की सरकार धर्म माफिया के बाद अब रेत माफिया के सामने नतमस्तक हो गयी है .सरकार ने गंभीर रूप से विलुप्तप्राय घड़ियाल, लालमुकुट कछुआ और विलुप्तप्राय गंगा सूंस की रक्षा के लिए बनाये गए राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य के 208 हैक्टेयर इलाके को &#8216; डि-नोटीफाई &#8216; कर दिया है [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="600" height="384" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/madhya-pradesh-ret-mafiya.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="रेत माफिया के सामने नतमस्तक सरकार" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/madhya-pradesh-ret-mafiya.jpg 600w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/madhya-pradesh-ret-mafiya-300x192.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/madhya-pradesh-ret-mafiya-313x200.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 600px) 100vw, 600px" title="रेत माफिया के सामने नतमस्तक सरकार 12"><p>राकेश अचल : मध्यप्रदेश की डबल इंजिन की सरकार धर्म माफिया के बाद अब रेत माफिया के सामने नतमस्तक हो गयी है .सरकार ने गंभीर रूप से विलुप्तप्राय घड़ियाल, लालमुकुट कछुआ और विलुप्तप्राय गंगा सूंस की रक्षा के लिए बनाये गए राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य के 208 हैक्टेयर इलाके को &#8216; डि-नोटीफाई &#8216; कर दिया है ताकि रेत माफिया स्वच्छंद होकर रेत का वैध उत्खनन कर सकें ।</p>
<p>चंबल नदी देश की सबसे स्वच्छ नदियों में से एक है । चम्बल नदी पर राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के संधि क्षेत्र पर सन् 1978 में 5,400 वर्ग किमी (2,100 वर्ग मील) पर राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य बनाया गया था । अभयारण्य के भीतर चम्बल नदी अपने मूल प्राकृतिक रूप में बीहड़ खाईयों और पहाड़ियों से गुज़रती है और उसपर कई रेतीले किनारों पर वन्यजीव पनपते हैं ,यही इलाका रेत के अवैध उत्खनन के लिए भी सोने की खान जैसा है ।प्रति वर्ष तीनों राज्यों का रेत माफिया इसी अभ्यारण्य से अरबों रूपये का रेत अवैध रूप से निकालता हैं ।</p>
<p>मध्यप्रदेश सरकार ने रेत माफिया से जूझने के बजाय उनके लिए रास्ता खोलना ज्यादा आसान समझा और इसी लिए इस अभ्यारण्य का 207 हैक्टेयर का इलाका डि-नोटिफाई कर दिया अब इस इलाके से प्रशासनिक निगरानी में रेत का उत्खनन किया जाएगा ।सरकार पर इस इलाके को अभ्यारण्य से बाहर करने का दबाब था । दबाब डालने वाले सत्तारूढ़ दल से जुड़े रेत माफिया के लोग ही थे । इस इलाके से केवल सत्तापक्ष के ही नहीं विपक्ष के नेताओं का पेट भी पलता आया है ।</p>
<p>गजट नोटिफिकेशन के मुताबिक़ अब चंबल के श्योपुर जिले के कुनहाजापुर और बड़ौदिया घात ,मुरैना जिले के खाड़ौली ,कैथरी,भानपुर और पिपरई घाट को अभ्यारण्य से बाहर कर दिया गया है। सरकार ने रेत माफिया को फायदा पहुँचाने के लिए एक अजीब तर्क का सहारा लिया है की बीते दो दशक में चंबल के जल परवाह में 3 । 5 प्रतिशत की कमी आई है । लोग तमाम प्रशासनिक रोकथाम के बावजूद चंबल से इन इलाकों से अवैध रूप से रेत का उत्खनन करते आ रहे हैं ।</p>
<p>चंबल से रेत के अवैध कारोबार की वजह से जैव विवधता खतरे में पड़ गयी है।  इस नदी में घड़ियाल अभ्यारण्य भी है । नदी में डॉल्फिन भी हैं ,विलुप्त जाती के कछुए भी हैं,लेकिन इनकी चिंता किसी को नहीं है।  ये सब वोट नहीं देते,सरकारें बनाते और बिगाड़ते नहीं हैं,इसलिए इनके इलाके की फ़िक्र किसी को नहीं है । सरकार ने नदी की जैव विविधता को वोटों की खातिर दांव पर लगा दिया है । सरकार का दावा है कि हम जैव विविधता पर इस रेत खनन के प्रभाव का आकलन दो साल में करेंगे,हालाँकि सरकार के पास फिलहाल इस काम के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं है,इसे विकसित किया जाएगा । यहां आपको बता दें की चंबल नदी से रेत के उत्खनन को 2006 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिबंधित किया गया था ।</p>
<p>अभ्यारण्यों के साथ खिलवाड़ करने का प्रदेश का ये कोई पहला मामला नहीं है।  मध्यप्रदेश सरकार इससे पहले भी वोटों की खातिर ग्वालियर जिले के सोन चिड़िया अभयारण्य के 23 गांवों को डी-नोटिफाई करा चुकी है । इसके लिए आज के केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एड़ी-छोटी का जोर लगाया था । सरकार का कहना था कि अभ्यारण्य में कि सोनचिड़िया नहीं होने के कारण अभ्यारण्य क्षेत्र में 23 गांव की 111। 73 वर्ग किलोमीटर की राजस्व जमीन को अभ्यारण्य से बाहर करने से इस क्षेत्र में विकास और बसाहट के रास्ते खुलेंगे। इस सोन चिरैया अभ्यारण्य से पत्थर का अवैध उत्खनन होता था ।</p>
<p>करीब 512 वर्ग किलोमीटर में फैले सोन चिरैया अभयारण्य क्षेत्र में सफेद पत्थर की कई पहाड़ियां हैं।  यह पत्थर मप्र व देश के अलावा विदेश तक सप्लाई होता है।  क्षेत्र के लोग अवैध खनन कर पत्थर बेचते हैं।  अभ्यारण्य को डि-नोटिफाइड कर अब खुद सरकार वैध तरीके से पहाड़ियों का आवंटन कर रही है जिससे पत्थर का कारोबार से सरकार को करोड़ों रुपए का राजस्व मिलने लगा है ।</p>
<p>राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य गंभीर रूप से लुप्तप्राय घड़ियाल (छोटे मगरमच्छ), रेड क्राउन टोर्टयज़ और लुप्तप्राय गंगा नदी डॉल्फ़िन का आवास है।  चंबल जंगली में घड़ियाल की सबसे बड़ी आबादी का समर्थन करता है।  ये अभ्यारण्य एकमात्र ज्ञात स्थान जहाँ भारतीय स्किमर्स के घोंसले बड़ी संख्या में दर्ज किये जाते हैं।  चंबल अभ्यारण्य देश में पाए जाने वाले 26 में से 8 दुर्लभ कछुओं की प्रजातियों का संरक्षण करता है क्योंकि चंबल देश की सबसे स्वच्छ नदियों में से एक है।  चंबल में 320 से अधिक निवासी और प्रवासी पक्षियों का घर भी है ।</p>
<p>आपको बता दें कि इस अभ्यारण्य से अवैध रेत का उत्खनन रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बाकायदा एक टास्क फ़ोर्स है लेकिन आजतक कोई भी रेत के अवैध उत्खनन को रोकने का टास्क पूरा नहीं कर सका।  रेत माफिया इतना ताकतवर है कि उसके सामने जिला प्रशासन,वन विभाग और पुलिस हमेशा बौना साबित होता आया है।  पिछले दो दशक में वन और पुलिस विभाग के दर्जनों कर्मचारी इस रेत माफिया से जूझते हुए अपनी जान से हाथ धो चुके हैं।  किसी भी दल की सरकार हो इस रेत माफिया को नेस्तनाबूद नहीं कर पायी। इसी का नतीजा है कि इस इलाके से चुने जाने वाले एक दर्जन से अधिक विधायकों में से आधे मंत्री बनते हैं और कुछ तो अपनी अवैध कमाई से &#8216;व्हाइट हाउस&#8217; की अनुकृतियाँ तक बना लेते हैं । अतीत में मंत्रियों के परिजनों ने इस अवैध उत्खनन के खिलाफ कार्रवाई का विरोध करते हुए मामा सरकार के खिलाफ आंदोलनों कि अगुवाई तक की,</p>
<p>चंबल में रेत के अवैध उत्खनन से हजारों परिवारों का पेट भी पलता है ,रेत उत्खनन एक उद्योग की तरह है। भीमकाय जेसीबी ,विशालकाय डम्पर और ट्रेक्टर ट्रालियों के जरिये यहां अवैध उत्खनन होता आया है।  इसी साल चम्बल संभाग में अवैध उत्खनन के 1290 मामले दर्ज किये गए ,पुलिस ने 424 ,खनिज विभाग ने 728 और वन विभाग ने 138 मामले दर्ज किये गए। बेमन से की गयी कार्रवाई में भी 84724 घन मीटर रेत जब्त की गयी।  इसकी कीमत 4 करोड़ रूपये से अधिक है।  इसी कार्रवाई में 49 ट्रक,304 ट्रेक्टर ,57 डम्पर पुलिस ने 287 ट्रक,36 डम्पर 94 ट्रेक्टर खनिज विभाग ने सबसे कम 2 ट्रक,65 ट्रेक्टर और 53 दूसरे वाहन जब्त किये । अब डि-नोटिफिकेशन के बाद इस सब कार्रवाई की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि अब सब वैध तरिके से चंबल का सीना खोद सकेंगे । ये राष्ट्रीय अभ्यारण्य केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के संसदीय क्षेत्र में आता है । इसे बर्बाद करने में उनकी भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता ।</p>
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		<title>बेहतर मतदाता ही बेहतर नेता का चुनाव कर सकता हैं</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Feb 2023 18:41:42 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[भारत]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="बेहतर मतदाता ही बेहतर नेता का चुनाव कर सकता हैं" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="बेहतर मतदाता ही बेहतर नेता का चुनाव कर सकता हैं 13">लोकतंत्र एक गतिशील अवधारणा हैं। बेहतर लोक तंत्र बनाने के लिए सबसे पहले बेहतर जनमानस बेहतर समाज और बेहतर जनप्रतिनिधि चुनने वाला बेहतर मतदाता बनाना होगा। इसलिए सामाजिक, आर्थिक सांस्कृतिक और अन्य परिवर्तनों के अनुरूप लोकतंत्र का स्वरूप बनता-बिगडता रहा है। पाश्चात्य जगत में ज्ञान-विज्ञान के पालना के साथ-साथ लोकतंत्र की जन्मभूमि के रूप में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="739" height="415" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229.jpeg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="बेहतर मतदाता ही बेहतर नेता का चुनाव कर सकता हैं" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229.jpeg 739w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-300x168.jpeg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-696x391.jpeg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/images28229-313x176.jpeg 313w" sizes="auto, (max-width: 739px) 100vw, 739px" title="बेहतर मतदाता ही बेहतर नेता का चुनाव कर सकता हैं 14">



<p>लोकतंत्र एक गतिशील अवधारणा हैं। बेहतर लोक तंत्र बनाने के लिए सबसे पहले बेहतर जनमानस बेहतर समाज और बेहतर जनप्रतिनिधि चुनने वाला बेहतर मतदाता बनाना होगा। इसलिए सामाजिक, आर्थिक सांस्कृतिक और अन्य परिवर्तनों के अनुरूप लोकतंत्र का स्वरूप बनता-बिगडता रहा है। पाश्चात्य जगत में ज्ञान-विज्ञान के पालना के साथ-साथ लोकतंत्र की जन्मभूमि के रूप में विख्यात यूनान के एथेंस में दास प्रथा खुलेआम प्रचलित थी। इसको अनुचित गैर प्रजातांत्रिक नहीं माना जाता था। परन्तु आज वर्तमान लोकतंत्र में दास प्रथा, छूआ-छूत और अन्य सामाजिक भेदभाव की कुव्यवस्थाओं को लोकतंत्र के मस्तक पर कलंक माना जाता है। इतिहास में अनगिनत संघर्षों के उपरांत आज आधुनिक लोकतंत्र का जो सर्वमान्य और सर्वव्यापी स्वरूप उभर कर आया है वह कुछ बुनियादी स्तम्भों पर टिका होता हैं । वह बुनियादी स्तम्भ है सत्ता का विकेन्द्रीकरण, जनता में अंतिम रूप से सम्प्रभुता का निवास अर्थात लोक सम्प्रभुता, तार्किक और बौद्धिक बहस तथा अभिव्यक्ति की पर्याप्त आजादी, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद तथा सूचना- संचार के साधनों को पूरी स्वतंत्रता । लोकतंत्र की सकारात्मक गतिशीलता स्वस्थ , तार्किक और बौद्धिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुरूप जनमत निर्माण की परम्परा और प्रक्रिया निर्भर करती है।&nbsp;</p>



<p>लोकतंत्र, जनतंत्र और प्रजातंत्र, इन तीनों शब्दों का निहितार्थ हैं जनता का राज। लोकतंत्र में आम जनमानस स्वतन्त्रता और समानता का एहसास करते हुए अपनी इच्छा के अनुरूप एक निश्चित अवधि के लिए अपना शासक चुनता है। देश के जनमानस की इच्छा, अभिव्यक्ति और अभिमत को ही राजनीति विज्ञान की भाषा में जनमत कहा जाता हैं। जनतंत्र की गुणवत्ता का आकलन जनमत से ही किया जाता&nbsp; है। एक स्वस्थ लोकतंत्रिक देश में जनमत का निर्माण उस देश के नेताओं , समाचार पत्रों, पत्रिकाओं सहित सम्पूर्ण प्रिंट मीडिया , इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सहित सूचना संचार के साधनों , लोकतंत्र में आस्था रखने वाले बौद्धिक समुदाय द्वारा सम्पन्न गोष्ठियों ,न्यायिक निर्णयों और न्यायविदों की टिप्पणियों , राजनीतिक दलों के विभिन्न कार्यक्रमों तथा सम्मेलनों और जनमानस के बीच होने वाली चर्चा परिचर्चा और विचार- विमर्श द्वारा होता हैं । सचरित्र, ईमानदार, बचनबद्ध ,सच्ची जनसेवा की भावना रखने वाले&nbsp; और पढें-लिखें नेता अपने भाषण और विचार द्वारा&nbsp; तार्किक, बौद्धिक, विवेकसम्पन्न , जागरूक , वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण और सक्रिय जनमत का निर्माण करते हैं। इसके विपरीत चुनावी मौसम भाॅपकर गिरगिटों की तरह रंग बदलने वाले, बेईमान, धूर्त, आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे, घोर जातिवादी और साम्प्रदायिक मानसिकता से ग्रसित नेता कुंठित, संकीर्ण, उन्मादी , नकारात्मक और निष्क्रिय जनमत का निर्माण करते हैं। इसी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक सूचना संचार के औजार स्वस्थ, सहिष्णु, सचेत और बौद्धिक&nbsp; जनमत का निर्माण करते हैं। जबकि दिन-रात सत्ता की चौखटो का चालीसा गाने वाले तथा चाट-भारण परम्परा के सूचना संचार के औजार कूपमंडूक , अंधभक्ति से परिपूर्ण और भेंड चाल वाले जनमत का निर्माण करते हैं। देश के बौद्धिक समुदाय द्वारा भी जनमत का निर्माण किया जाता हैं। जब बौद्धिक समुदाय ईमानदारी, निष्पक्षता और निःस्वार्थ भावना से देश की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर अपना विचार प्रस्तुत करता है तो बौद्धिक, तार्किक और विवेक पूर्ण जनमत का निर्माण करते हैं। इसके विपरीत सत्ता सुख की चाहत रखने वाले तथा चाॅदी के सिक्कों पर बिकने वाले बुद्धिजीवी संकीर्ण, सतही और संकुचित सोच वाला जनमत तैयार करते हैं। जबतक स्वस्थ, स्वतंत्र, निर्भीक, बौद्धिक, जागरूक और सक्रिय जनमत नही होगा तब तक जनमानस को सुयोग्य, सचरित्र, ईमानदार और उर्जावान नेतृत्व नहीं मिल पाएगा।</p>



<p>स्वतंत्रता और समानता लोकतंत्र की प्राणशक्ति है। स्वतंत्रता का निहितार्थ हैं मनुष्य अपनी इच्छा और विवेक के अनुसार अपने जीवन का निर्धारण कर सकें। राजनीतिक दृष्टि से समानता का तात्पर्य है कि-प्रत्येक&nbsp; व्यक्ति को बारी-बारी से शासन संचालन का अवसर मिलना चाहिए। प्रकारांतर से प्रजातंत्र में जनता को स्वयं अपने राजनीतिक भाग्य को निर्धारित और संचालित करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। जिस समाज में अंधविश्वास और भय मुक्त वातावरण में तर्क , वितर्क, चिंतन मनन करने की स्वतंत्रता रहती हैं निश्चित रूप से वहाँ स्वस्थ जनमत का निर्माण होता हैं।&nbsp;</p>



<p>जनमत और नेतृत्व में गहरा संबंध पाया जाता हैं। कुशल, दूरदर्शी, प्रगतिशील और सर्वसमावेशी नेतृत्व द्वारा निर्भीक, निष्पक्ष और जागरूक जनमत का निर्माण किया जाता हैं। स्वाधीनता संग्राम के दौरान राजाराम मोहन राय, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, केशव चन्द्र सेन, महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, बाल गंगाधर तिलक तथा महात्मा गांधी ने निर्भीक, साहसी, अनुशासित और संघर्षशील जनमत का निर्माण किया। इन समस्त विभूतियों ने यथाशक्ति चिरपोषित असंगत धारणाओं , परस्पर व्याप्त दुराग्रहों, प्रचलित मिथकों और मताग्रहों, विभिन्न प्रकार की संकीर्णताओं, अंधविश्वासों, पाखंडो और बुद्धिहीनता का भण्डाफोड किया। इसके स्थान पर इन विभूतियों ने एक सभ्य लोकतंत्रिक समाज के लिए आवश्यक तार्किक, बौद्धिक और जागरूक जनमत तथा जन समुदाय का निर्माण किया । लोकतंत्र में लोकमत राजनीतिक मत की अपेक्षा व्यापक अवधारणा हैं। क्योंकि लोकमत में राजनीतिक मत के साथ- साथ सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक अभिमत भी समाहित रहता हैं। सार्वजनिक रूप से अभिवृत्तियों की स्पष्ट और औपचारिक अभिव्यक्ति को &#8220;मत &#8221; अथवा अभिमत कहा जाता हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि- मनुष्य के मन मस्तिष्क में संचरित&nbsp; अभिवृत्तियों, प्रवृत्तियों, भावनाओं और विचारों का निरूपण सामाजिक और ऐतिहासिक वातावरण में होता हैं। इसलिए किसी देश में लोकमत के निर्धारण में लोक आस्थाओं, लोक मान्यताओं, लोक परंपराओं और रीति- रिवाजों की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं।&nbsp;</p>



<p>जनमत एक गतिशील अवधारणा हैं। जो समय, नेतृत्व, सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक परिवर्तन के लिहाज़ से बदलती रहती है। कभी-कभी सत्य की साधना में साधनारत दूरदर्शी व्यक्तियों द्वारा उद्घाटित विचारों से भी जनमत का निर्माण होता हैं। सुकरात, गैलीलियो, कोपरनिकस और दयानंद सरस्वती इस तरह के दूरदर्शी व्यक्तियों के रूप&nbsp; में लोकमानास में स्वीकार किए जाते हैं। हालांकि जन समुदाय इन महापुरुषों के विचारों को तात्कालिक रूप से स्वीकार नहीं करता है। परन्तु जैसे-जैसे जन मानस की सामूहिक समझदारी बढती जाती हैं वैसे-वैसे इन सत्य के साधकों के विचार जन मानस में प्रचलित और प्रवाहमान होने लगते हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र में लोकमत नमनीय तथा परिवर्तनशील होता हैं। लोकहित में प्रकट किए गए नवीनतम&nbsp; विचारों, संकल्पनाओ , अवधारणाओं और सिद्धांतों के अनुरूप लोकमत धीरे-धीरे परिवर्तित होता रहता हैं। एक सफल राजनेता वही होता हैं जो जनसमुदाय को नकारात्मक, विध्वंसक प्रवृत्तियों, निस्सारता तथा निराशा से बाहर निकाल कर उसमें&nbsp; आशा और कर्मठ्ता का संचार करें। इसलिए संकीर्ण राजनीतिक&nbsp; स्वार्थों की पूर्ति के लिए नेताओं को नकारात्मक, विध्वंसक और उन्मादी जनमत के निर्माण से परहेज करना चाहिए। प्रगतिशील तथा विकासोन्मुखी जनमत ही देश को शक्तिशाली और सामर्थ्यवान नेतृत्व प्रदान कर सकता हैं। जब देश की नेतृत्वकारी शक्तियां लोकतंत्र को महज एक शासन प्रणाली के रूप न स्वीकार कर लोकतंत्र को जीवन दर्शन कर लेती तो जनमत का निर्माण समझदारी, बुद्धिमत्ता पूर्ण और दूरदर्शिता पूर्ण तरीके से करना पड़ता हैं। जिससे लोकतंत्र महज राजनीतिक जीवन की चहारदीवारी से बाहर निकल कर हमारे नागरिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में स्थापित होने लगता है।&nbsp;</p>



<p>बुनियादी मुद्दों और बुनियादी समस्याओं पर होने सच्चे, ईमानदार, अनुशासित और अहिंसक जन आन्दोलनो से भी जनमत का निर्माण होता हैं तथा जन समुदाय का शिक्षण- प्रशिक्षण होता हैं। पराधीनता काल में 1857 से लेकर 1947 तक होने वाले विभिन्न आन्दोलनों ने भारतीय जनमानस को राजनीतिक रूप से शिक्षित-प्रशिक्षित किया। इन आन्दोलनों के कारण ही देश की जनता अंग्रेजों के विरुद्ध तन कर खडी हूई और अंततः अंग्रेजों को देश छोड़कर पलायन करना पडा। आजादी के बाद भी बहुत से आन्दोलन भारत में हुए। 1977 मे श्रीमती इन्दिरा गाँधी द्वारा देश में आपातकाल लगाए जाने के विरुद्ध लोक नायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में देश भर एक सशक्त आन्दोलन हुआ। इस आन्दोलन के फलस्वरूप एक ऐसा जनमत तैयार हुआ जिसनें आजादी के बाद लगभग तीस वर्ष से लगातार&nbsp; शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया। दक्षिण अफ्रीका में डाक्टर नेल्सन मंडेला के नेतृत्व मे गांधीवादी तरीके से रंग भेद नीति के खिलाफ एक लम्बा आंदोलन किया गया। जिससे स्वस्थ जनमत का निर्माण हुआ । 1990 से दक्षिण अफ्रीका में&nbsp; लगातार रंग भेद रहित लोकतंत्रिक व्यवस्था चल रही हैं। हमारे पडोसी देश नेपाल में नब्बे के दशक से राजतंत्र के विरुद्ध लगातार आंदोलन चलता रहा। जिसके फलस्वरूप नेपाल में धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रीक संविधान का निर्माण हुआ है और राजतंत्र का पूरी तरह खात्मा हो गया है। अभी भारत में हाल में लगभग तेरह महीने तक लम्बा ऐतिहासिक किसान आंदोलन चला। जिसके फलस्वरूप ऐसा जनमत तैयार हुआ जिसके समक्ष पूर्ण बहुमत की सरकार को झुकना पड़ा।&nbsp;</p>



<p>निष्कर्षतः लोकतंत्र में जनमत की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं। भारत सहित तिसरी दुनिया के देशों में धार्मिक और सामाजिक समस्याओं में जनमत की अभिव्यक्ति तीव्रता से होती हैं जबकि राजनीतिक, आर्थिक और बुनियादी समस्याओं पर जनमत की अभिव्यक्ति कमजोर होती हैं। इधर मंडल और कंमडल के बाद भारतीय राजनीति में जातिवादी और साम्प्रदायिक नेताओं की लम्बी कतार उभर आई हैं।&nbsp; समाज में धार्मिक परम्पराएं और भावनाएं बहुत ही क्रियाशील सामाजिक शक्ति हुआ करती हैं। इसलिए धार्मिक और जातिवादी भावनाओं को भड़काने वाले नेताओं का प्रभाव जनमानस देखा जा रहा हैं। यह स्वस्थ जनमत निर्माण और स्वस्थ लोकतंत्र की दृष्टि खतरनाक प्रवृत्ति हैं। राजनीतिक, आर्थिक और बुनियादी समस्याओं पर जनमत का निर्माण करने की आवश्यकता है। जनमत मतदान आचरण और व्यवहार को भी प्रभावित करता है। स्वस्थ जनमत द्वारा हम स्वस्थ मतदान आचरण और व्यवहार अपना कर ईमानदार और जनता के पक्ष में काम करने वाली सरकार चुन सकते हैं। तभी भारतीय लोकतंत्र को महज मस्तक गणना करने वाला नहीं बल्कि जागरूक और जिन्दा मस्तिष्क वाला लोकतंत्र बना सकते हैं।&nbsp;</p>
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		<title>यूपी में स्थानीय जलवायु कार्यवाही की यह इन्द्रधनुषी रणनीति है खास</title>
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		<dc:creator><![CDATA[द हरिश्चंद्र स्टाफ]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Feb 2023 12:32:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[आंदोलन]]></category>
		<category><![CDATA[पर्यावरण]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1162" height="774" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="Climate change" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change.jpg 1162w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-300x200.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-1024x682.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-768x512.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-696x464.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-1068x711.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-631x420.jpg 631w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-313x208.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1162px) 100vw, 1162px" title="यूपी में स्थानीय जलवायु कार्यवाही की यह इन्द्रधनुषी रणनीति है खास 15">साल 2019 में, संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव ने तीन स्तरों पर सतत विकास गोल (एसडीजी) के लक्ष्य हासिल करने के लिए एक दशक भर की कार्रवाई का आह्वान किया था। इस आह्वान में शामिल थे अधिक संसाधन और बेहतर समाधान प्रदान करने के लिए बेहतर नेतृत्व के साथ वैश्विक कार्रवाई; प्रभावी नीतियाँ, बजट, सशक्त संस्थान और सरकारें, युवा समूह के साथ [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="1162" height="774" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="Climate change" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change.jpg 1162w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-300x200.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-1024x682.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-768x512.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-696x464.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-1068x711.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-631x420.jpg 631w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2021/02/Climate-change-313x208.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1162px) 100vw, 1162px" title="यूपी में स्थानीय जलवायु कार्यवाही की यह इन्द्रधनुषी रणनीति है खास 16"><p>साल 2019 में, संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव ने तीन स्तरों पर सतत विकास गोल (एसडीजी) के लक्ष्य हासिल करने के लिए एक दशक भर की कार्रवाई का आह्वान किया था। इस आह्वान में शामिल थे अधिक संसाधन और बेहतर समाधान प्रदान करने के लिए बेहतर नेतृत्व के साथ वैश्विक कार्रवाई; प्रभावी नीतियाँ, बजट, सशक्त संस्थान और सरकारें, युवा समूह के साथ साथ स्वयंसेवी संस्थाएं, मीडिया, निजी क्षेत्र, यूनियनों, शिक्षाविदों और अन्य हितधारकों सहित एक जन आंदोलन, और शहरों और स्थानीय प्राधिकरणों के नियामक ढांचे में आवश्यक बदलावों को लेन वाली स्थानीय कार्रवाई जैसे आवश्यक परिवर्तन।</p>
<p>जलवायु परिवर्तन सतत विकास के लिए एकमात्र सबसे बड़ा खतरा बन कर खड़ा है और इसके व्यापक और अभूतपूर्व प्रभाव सबसे गरीब और सबसे कमजोर लोगों पर असमान रूप से अधिक दुष्प्रभाव डालते हैं। जलवायु परिवर्तन को रोकने और इसके दुष्प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई सभी सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को सफलतापूर्वक प्राप्त करने का अभिन्न अंग है। इस कार्रवाई के लिए सामूहिक रूप से 2015 के बाद के तीन एजेंडे &#8211; पेरिस समझौता, सतत विकास के लिए 2030 एजेंडा, और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंदाई फ्रेमवर्क &#8211; बदलती जलवायु के तहत कम कार्बन और लचीले सतत विकास की नींव डालते हैं।</p>
<p>तापमान में निरंतर वृद्धि के कारण जलवायु परिवर्तन के प्रभाव समय बीतने के साथ और भी बदतर होने का खतरा है। चरम मौसम की घटनाओं के लिए भारत अत्यधिक संवेदनशील देश है, और राष्ट्रीय परिस्थितियों की मांग है कि भारत के अनुकूलन और लचीलेपन के प्रयासों को और तेज और स्थानीय बनाया जाए। नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों में जलवायु कार्रवाई को मुख्यधारा में लाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कई पहल भी की गई हैं। देश द्वारा प्रस्तुत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) को देश की विकासात्मक अनिवार्यताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है और यह सर्वोत्तम प्रयास के आधार पर है। भारत की जी-20 अध्यक्षता जलवायु कार्रवाई प्राथमिकताओं को निर्धारित करती है। इनमें हरित विकास, जलवायु वित्तीय व्यवस्था, त्वरित, समावेशी और लचीला विकास, और पर्यावरण के लिए जीवन शैली (LiFE) शामिल है।</p>
<p>उत्तर प्रदेश (यूपी), लगभग 58,000 से अधिक ग्राम पंचायतों और 750 शहरी स्थानीय निकायों के साथ 250 मिलियन से अधिक की आबादी के साथ सबसे बड़ी उप-राष्ट्रीय इकाई होने के नाते, जलवायु-प्रेरित आपदाओं सहित जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिए अत्यधिक संवेदनशील है। इनके परिणामस्वरूप मानव और पशु जीवन का व्यापक के साथ साथ निजी और सार्वजनिक संपत्ति तथा पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। 1969 और 2019 के बीच, राज्य ने 2539 बाढ़ की घटनाओं, 17144 विनाशकारी शीत लहर के दिनों, 6726 विनाशकारी गर्मी की लहर के दिनों और 720 आकाशीय बिजली के दिनों का सामना किया। राज्य के 75 जिलों में से, लगभग 50 जिले उच्च से मध्यम रूप से जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील हैं और यह संवेदनशीलता मध्य शताब्दी के दौरान जलवायु संबंधी खतरों के बढ़ते जोखिम के कारण और बढ़ना अनुमानित है। इस परिदृश्य को देखते हुए, यूपी ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव के स्पष्ट आह्वान पर समय पर प्रतिक्रिया दी है और मजबूत सात कदमों से बने एक तरह के इंद्र्धानुषीय दृष्टिकोण के साथ  जलवायु कार्रवाई को स्थानीय बनाने के लिए जी 20 शिखर सम्मेलन के उद्देश्य से कदम मिलाते हुए आगामी दशक हेतु एक आक्रामक कार्यवाई प्रारंभ कर दी है।<b><br />
</b></p>
<p><b>मजबूत जलवायु योजना और राज्य स्तर पर कार्यान्वयन</b><br />
सबसे पहले, निकट-अवधि के लक्ष्यों के साथ एक सुसंगत और दीर्घकालिक दृष्टि लक्षित कर, राज्य ने एसडीजी 2030 विज़न को समन्वित करते हुए यूपी राज्य जलवायु परिवर्तन के लिए कार्य योजना (एसएपीसीसी) को संशोधित और नए सिरे से इसका क्रियान्वयन शुरू कर दिया है। यूपीएसएपीसीसी नौ मिशनों यथा सतत कृषि; जल; ऊर्जा दक्षता; वानिकी; स्वास्थ्य; नवी<wbr />करणीय ऊर्जा; आपदा प्रबंधन; मानव आवास (शहरी और ग्रामीण); और रणनीतिक ज्ञान विकास के तहत कार्यों को प्राथमिकता देता है। यूपीएसएपीसीसी जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन एवं शमन कि कार्यवाई के नियोजन के साथ साथ इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता एवं व्यवस्था, क्रियान्वयन की एकीकृत निगरानी और मूल्यांकन का ढांचा तथा तंत्र की संरचना सुनिश्चित के सम्बन्ध में उचित मार्गदर्शन करता है।</p>
<p><b>उत्तर प्रदेश में जलवायु कार्रवाई का स्थानीयकरण</b><br />
संसाधनों और आजीविका के लिए कृषि, जल और कृषि -वानिकी जैसे जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों पर अपनी उच्च निर्भरता के कारण, यूपी ने दूसरे चरण के रूप में जलवायु अनुकूलन और लचीलापन के स्थानीयकरण के लिए महत्वपूर्ण अभिनव प्रयासों का बीड़ा उठाया है। सेक्टरवार  और भौगोलिक व्यापक जलवायु जोखिम के आकलन के आधार पर राज्य में स्थानीय जलवायु कार्रवाइयों को प्राथमिकता दी गई है। राज्य ने अपनी तरह का पहला पंचायत सम्मेलन (सीओपी) 2022 आयोजित किया, जिसमें राज्य के सर्वोच्च नेतृत्व ने 58,000 से अधिक ग्राम पंचायतों (जीपी) को राज्य में स्थानीय जलवायु गतिविधियों को बढ़ाने का आह्वान किया। सीओपी 2022 ने जीपी को जमीनी स्तर के जलवायु नायकों के साथ बातचीत करने के लिए एक मंच प्रदान किया जिसने उन्हें स्थानीय जलवायु कार्यों को बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। स्थानीय जलवायु कार्यवाई को मजबूत करने के लिए जलवायु परिवर्तन पर जिला कार्य योजना (डीएपीसीसी) और क्लाइमेट स्मार्ट ग्राम योजनाएं भी विकसित की जा रही हैं। जलवायु कार्रवाई के स्थानीयकरण में राज्य के प्रयासों को मान्यता देते हुए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राज्य को शर्म अल शेख, मिस्त्र, में सीओपी 27 के दौरान भारत के पवेलियन में &#8220;रोड टू रेजिलिएन्स 2030: जिला और ग्राम स्तर पर जलवायु कार्रवाई को स्थानीय बनाने के लिए अभिनव दृष्टिकोण&#8221; शीर्षक से एक साइड इवेंट की मेजबानी करने के लिए आमंत्रित किया। इस इवेंट के माध्यम से यूपी ने जलवायु संबंधी कार्यों को स्थानीय विकास में एकीकृत किये जाने की सफलता को प्रदर्शित किया।</p>
<p><b>क्षमता विकास</b><br />
बदलती जलवायु से स्थानीय समुदाय सबसे पहले प्रभावित होते हैं। साथ ही, प्रभावी सामुदायिक संस्थान और स्थानीय समूह ऐसे प्रभावों के लिए प्रतिक्रिया देने वालों में अग्रणी होते हैं। इसके मद्देनज़र तीसरे कदम के रूप में, यूपी ने 58000 ग्राम पंचायतों की क्षमता को मुख्यधारा में लाने और ग्राम पंचायत विकास योजनाओं (जीपीडीपी) के माध्यम से स्थानीय नियोजन प्रक्रिया में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन और लचीलेपन को एकीकृत करने की महत्वपूर्ण यात्रा शुरू की है। स्कोपिंग आकलन के माध्यम से क्षमता निर्माण के लिए महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना (एमकेएसपी) के लक्षित समूह, पंचायती राज संस्थान (पीआरआई), एसएचजी, किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), पानी पंचायत आदि की पहचान की गई है। राज्य में दीनदयाल उपाध्याय स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट, उत्तर प्रदेश; वन प्रशिक्षण संस्थान (एफटीआई), कानपुर; बैंकर्स इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट (BIRD), लखनऊ और पंचायती राज इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रेनिंग (PRIT), लखनऊ की छत्रछाया में क्षेत्रीय स्तर के 17 और जिला-स्तरीय 31 ग्रामीण विकास संस्थानों के नेटवर्क के माध्यम से उक्त लक्षित समूहों के लिए एक क्षमता-विकास पैकेज तैयार कर शुरू किया गया है ।</p>
<p><b>वित्तीय संसाधनों में वृद्धि</b><br />
चौथा, यूपीएसएपीसीसी (2021-<wbr />2030) के कार्यान्वयन के लिए, कन्वर्जेन्स के माध्यम से वित्तीय संसाधनों को बढ़ाने के लिए लाइन विभागों/एजेंसियों के परामर्श से एक विस्तृत रणनीति एवं कार्य-वार वित्तीय संसाधन मानचित्रण किया गया है। यूपीएसएपीसीसी के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक कुल वित्तीय आवश्यकता  ₹ 1,12,482.48 करोड़ अनुमानित है, जिसमें से 72% वित्तीय संसाधन मौजूदा विभागीय योजनाओं के कन्वर्जेन्स के माध्यम से जुटाया जा सकता है, जबकि 28% वित्तीय आवश्यकता कि पूर्ति बाहरी द्विपक्षीय/बहुपक्षीय स्रोतों अथवा लोकोपकार हेतु वित्तीय सहायता के माध्यम से जुटाया जा सकता है। डीएपीसीसी और क्लाइमेट स्मार्ट विलेज एक्शन प्लान के लिए वित्तीय संसाधनों की मैपिंग भी की जा रही है ताकि वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता पर अधिक बारीकियां ज्ञात कर वित्तीय संसाधन जुटाएं जा सकें।</p>
<p><b>जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी सामरिक ज्ञान का विकास</b><br />
पांचवें कदम के रूप में, यूपी ने नॉलेज प्रोडक्टस के विकास और प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिसमें बाढ़ की मैपिंग, जलभराव वाले क्षेत्रों का आकलन, लिडार मैपिंग परियोजनाएं, यूटिलिटी मैपिंग आदि शामिल हैं। बुंदेलखंड क्षेत्र में पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं के अनुकूलन पर एक अध्ययन किया गया है। जलवायु परिवर्तन विज्ञान-नीति-प्रैक्टिस कनेक्शन को मजबूत करने और क्रॉस-सेक्टोरल सहयोग में इसे मजबूती से स्थापित करने के लिए, राज्य में एक बहु-हितधारक और सहयोगी क्लाइमेट चेंज नॉलेज नेटवर्क  स्थापित किया गया है। इस नॉलेज नेटवर्क के अंतर्गत राज्य और केंद्र सरकार के संगठनों के साथ-साथ वैज्ञानिक और शैक्षणिक संस्थान, निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि और कॉर्पोरेट संस्थाएं, गैर सरकारी संगठन, मीडिया और समुदाय-आधारित संगठन शामिल हैं। अत्याधुनिक ज्ञान उत्पादों के निर्माण के लिए लखनऊ में एक जलवायु परिवर्तन नॉलेज सेंटर स्थापित किया जा रहा है। राज्य ने जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ पर्यावरण नॉलेज पोर्टल को एकल पोर्टल रिपॉजिटरी (और अन्य समान रिपॉजिटरी की एक मास्टर रिपॉजिटरी) के रूप में विकसित किया है ताकि विभिन्न हितधारकों के बीच समय पर जानकारी के आदान प्रदान के साथ साथ प्रासंगिक ज्ञान आसानी से उपलब्ध और प्राप्त हो सके। राज्य व्यक्तियों, संगठनों और कॉर्पोरेट के लिए क्षमता निर्माण और जागरूकता गतिविधियों के साथ विघटनकारी अनुसंधान और प्रौद्योगिकियों के निर्माण के लिए एक पारिस्थितिकी तंत्र को भी बढ़ावा दे रहा है। राज्य ने शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के बीच विचारों के नियमित आदान-प्रदान के लिए एक मंच भी विकसित किया है ताकि विज्ञान-नीति-कार्यवाई  के बढ़ते इंटरफ़ेस का लाभ उठाया जा सके और विज्ञान और नीति के अंतर को कम किया जा सके।</p>
<p><b>जलवायु परिवर्तन शमन की प्रभावी रणनीति</b><br />
राज्य अपनी उच्च जनसंख्या के बावजूद भारत के GHG उत्सर्जन (293 Mt CO2e: 2018) में केवल 9% का योगदान देता है। राज्य में प्रति व्यक्ति GHG उत्सर्जन (2018) भारत के 2.24 t CO2e और विश्व के 6.49 t CO2e के मुकाबले मात्र 1.32 t CO2e है। उक्त के बावजूद भी छठे कदम के रूप में, यूपी संशोधित एनडीसी के अनुरूप जलवायु परिवर्तन के शमन को स्थानीय बनाने में भारत के प्रयासों का नेतृत्व कर रहा है। सबसे पहले, राज्य ने मौजूदा प्रयासों को मजबूत करने के लिए सौर, बायोमास और इलेक्ट्रिक वाहनों पर कई प्रमुख नीतियां बनाईं। आज तक, यूपी की सोलर पॉवर की कुल स्थापित क्षमता 2.4 GW है और लगभग 3.8 GW पाइपलाइन चरण में है। राज्य ने 2022 में नई सौर नीति को भी अधिसूचित किया, जिसका उद्देश्य 2027 तक 22 GW सौर लक्ष्य प्राप्त करना है। इसके अलावा, इसका उद्देश्य राज्य में 17 नगर निगमों को नीति के हिस्से के रूप में की गयी अच्छी वित्तीय व्यवस्था के माध्यम से सोलर सिटी बनाना है। इसमें से 14 GW यूटिलिटी-स्केल सौर परियोजनाओं से, 6 GW आवासीय सोलर रूफटॉप से, और 2 GW वितरित सौर उत्पादन (टेल एंड प्लांट्स और कृषि उपयोग-मामले) से उपलब्ध होगी। इसके अलावा, यह नीति स्कूलों, अस्पतालों आदि में अपनी तरह की पहली नेट मीटरिंग सुविधाओं जैसी अत्याधुनिक रणनीति, वाणिज्यिक और औद्योगिक (सी एंड आई) सेगमेंट में नेट-बिलिंग की सुविधाएं सहित सौर ऊर्जा चालित फेरीज़ को बढ़ावा देती है। 2022 में अपनी जैव-ऊर्जा नीति के माध्यम से, राज्य ने 2026-27 तक कंप्रेस्ड बायो गैस (CBG) के 1,000 टन प्रति दिन (टीपीडी), जैव-कोयला के 4,000 टीपीडी और बायोएथेनॉल और बायोडीजल के 2,000 किलो लीटर प्रति दिन उत्पादन करने का 1040.75 करोड़ रुपये की कुल सब्सिडी,दस वर्ष के लिए बिजली शुल्क में छूट, स्टाम्प शुल्क एवं विकास शुल्क की माफी और पट्टे पर किराया मुक्त भूमि के माध्यम से राज्य भर में 350 जैव ऊर्जा इकाइयों की स्थापना का लक्ष्य रखा है। । हाल ही में जारी नई इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण और गतिशीलता नीति का उद्देश्य राज्य में ईवी को अपनाने में वृद्धि करना और राज्य को इलेक्ट्रिक मोबिलिटी विकास और विनिर्माण के लिए एक वैश्विक केंद्र बनाना है। राज्य ने हरित हाइड्रोजन नीति का मसौदा संस्करण जारी करके अपनी टोपी में एक और पंख जोड़ा है, जिसका उद्देश्य हरित हाइड्रोजन की मांग और अंतर्देशीय जलमार्गों विशेषकर वाराणसी-हल्दिया जलमार्ग के माध्यम से उत्तर प्रदेश में सस्ते और कम उत्सर्जन वाले कार्गो परिवहन को बढ़ावा देना है।</p>
<p><b>अतिरिक्त कार्बन सिंक की स्थापना</b><br />
सातवां, यूपी 2030 तक अतिरिक्त वन और वृक्षों के आवरण के माध्यम से 2.5 से 3 GtCO2e के कार्बन सिंक की स्थापना सम्बन्धी भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) में योगदान करने के लिए सक्रिय कदम उठा रहा है। भले ही प्रदेश के पास वृक्षारोपण के लिए सीमित जगह है लेकिन <b>वूड इज़ गुड</b> की अवधारणा के तहत कृषि -वानिकी मूल्य श्रृंखला को बढ़ावा दे कर यूपी अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाने की चुनौती का सामना कर रहा है । स्वैच्छिक कार्बन बाजार के माध्यम से कृषि -वानिकी को कार्बन वित्तपोषण से जोड़ने में राज्य के अग्रणी कदम ने कृषि &#8211; वानिकी क्षेत्र को एक मजबूत प्रोत्साहन प्रदान किया है। राज्य ने 175 मिलियन tCO2e के अतिरिक्त कार्बन सिंक की स्थापना का लक्ष्य निर्धारित किया है और मुख्य रूप से कृषि -वानिकी के माध्यम से इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए वृक्षारोपण के लिए एक नीति तैयार की है। राज्य में पिछले पांच वर्षों के दौरान 1 बिलियन से अधिक पेड़ लगाए हैं और अगले पांच वर्षों में 1.75 बिलियन पेड़ लगाए जाएंगे। राज्य काष्ठ की मांग को बढाने के लिए भवन और निर्माण क्षेत्र में लकड़ी और लकड़ी के अवशेषों के उत्पादों के उपयोग की भी वकालत कर रहा है जिससे उत्पादन बढ़ेगा और अधिक उत्पादन होने से उत्पादों के मूल्य में कमी आयेगी। लकड़ी का अधिक उपयोग न केवल कार्बन को लकड़ी में कैद रखेगा बल्कि उच्च सन्निहित ऊर्जा निर्माण सामग्री के स्थान पर कम ऊर्जा काष्ठ आधारित निर्माण सामग्री का विकल्प भी प्रदान करेगा।</p>
<p>इस प्रकार, यूपी ने वैश्विक और राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए स्थानीयकृत जलवायु कार्रवाई के दशक की रणनीति बनाकर संयुक्त राष्ट्र महासचिव के आह्वान पर तात्कालिक प्रभावी कार्यवाई प्राम्भ की है। भारत के माननीय प्रधान मंत्री द्वारा &#8216;प्रो-प्लैनेट पीपल&#8217; का एक राष्ट्रीय और वैश्विक नेटवर्क बनाने और पोषित करने के लिए शुरू किया गया मिशन LiFE, न सिर्फ जलवायु कार्रवाई के लिए एक प्राथमिकता है, बल्कि इस साल, जब भारत G20 शिखर सम्मेलन के नेतृत्व के दृष्टिगत और भी प्रासंगिक हो जाता है। यूपी द्वारा सेवन स्टेप रेनबो एप्रोच के साथ की जा रही क्लाइमेट कार्यवाई को मिशन LiFE निश्चित रूप से मजबूती प्रदान करेगा।</p>
<p><span style="color: #999999;"><i>लेखक उत्तर प्रदेश सरकार में वरिष्ठ नौकरशाह हैं। मनोज सिंह, आईएएस (1989 बैच), पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं, और आशीष तिवारी, आईएफएस (1995 बैच), इसी विभाग में सचिव हैं। <em>इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। </em></i></span></p>
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		<title>मंहगाई, भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण पर नियंत्रण और उपयुक्त आर्थिक नीतियों द्वारा दूर हो सकती हैं गरीबी!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[मनोज कुमार सिंह]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 01 Feb 2023 15:44:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<img width="960" height="637" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="मंहगाई, भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण पर नियंत्रण और उपयुक्त आर्थिक नीतियों द्वारा दूर हो सकती हैं गरीबी!" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495.jpg 960w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-300x199.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-768x510.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-696x462.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-633x420.jpg 633w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/02/FB_IMG_1675266137495-313x208.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 960px) 100vw, 960px" title="मंहगाई, भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण पर नियंत्रण और उपयुक्त आर्थिक नीतियों द्वारा दूर हो सकती हैं गरीबी! 17">स्वाधीनता उपरांत गरीबी भारत में एक प्रमुख चुनौती रही हैं जो कमोबेश आज भी एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है। इसलिए आमजनता को चट्टी चौराहों पर चुनावी चर्चा के दौरान जातिवादी समीकरणों की जोड़-तोड करने के बजाय गरीबी भूखमरी और कुपोषण जैसी चुनौतीपूर्ण समस्याओं के कारण और निवारण पर बहस करना चाहिए। स्वाधीनता उपरांत केन्द्र [&#8230;]]]></description>
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<p>स्वाधीनता उपरांत गरीबी भारत में एक प्रमुख चुनौती रही हैं जो कमोबेश आज भी एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है। इसलिए आमजनता को चट्टी चौराहों पर चुनावी चर्चा के दौरान जातिवादी समीकरणों की जोड़-तोड करने के बजाय गरीबी भूखमरी और कुपोषण जैसी चुनौतीपूर्ण समस्याओं के कारण और निवारण पर बहस करना चाहिए। स्वाधीनता उपरांत केन्द्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों ने गरीबी जैसी समस्या से निजात पाने के लिए तमाम नीतियां बनाई परन्तु आज भी गरीबी भूखमरी और कुपोषण जैसी समस्याएं&nbsp; हमारे नीति निर्माताओं के समक्ष एक गम्भीर चुनौती बनी हुई है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी सच्चे सनातनी और सच्चे वेदांती थे तथा विशुद्ध आध्यात्मिक प्रवृत्ति के राजनेता थें। परन्तु उन्होंने वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण अपनाते हुए स्वीकार किया था कि-&#8220;गरीबी अभिशाप नहीं बल्कि मानव निर्मित षड्यंत्र है&#8221;। यह विचार प्रकट करते हुए महात्मा गांधी कल्याणकारी अर्थशास्त्रियों की परम्परा के प्रखर अर्थशास्त्री नजर आते हैं तथा एक जिम्मेदार और समाज के प्रति संवेदनशील राजनेता का परिचय देते हैं। भारत में गरीबी और दरिद्रता को दूर करने के लिए महात्मा गाँधी ने&nbsp; अंत्योदय का सिद्धांत प्रस्तुत किया था। समाज के प्रति संवेदनशील जिम्मेदार और ईमानदार बुद्धिजीवी, राजनेता और शासक कभी भी गरीबी को अभिशाप या आसमानी प्रकोप नहीं मान सकते हैं। गरीबी को अभिशाप मानना बुद्धिजीवी राजनेता और शासक-प्रशासक के लिए अपनी बौद्धिक, राजनैतिक , सामाजिक और शासकीय जिम्मेदारियों से मुंह मोडना हैं। विश्व के अधिकांश विकसित देशों ने दूरगामी और दूरदर्शितापूर्ण आर्थिक&nbsp; नीतियों के माध्यम से आम जनमानस को गरीबी और गुरूबत से बाहर निकालने का सफलतापूर्वक प्रयास किया है। ज्ञान विज्ञान के चमत्कार और आम जनमानस में उद्यमिता की चेतना विकसित कर आधुनिक काल में अधिकांश पश्चिमी दुनिया के देशों ने लोगों का जीवन स्तर उपर उठाने का प्रयास किया। विश्व के प्राचीन, अर्वाचीन और आधुनिक समाज के आर्थिक विकास- क्रम का ऐतिहासिक विश्लेषण किया जाए तो स्पष्टतः परिलक्षित होता हैं कि-शासक वर्ग द्वारा उत्पादकों और श्रमजीवियों का शोषण गरीबी का अनिवार्य कारण रहा हैं। राजतंत्रीय शासन व्यवस्थाओं में कुलीन वर्ग और पुरोहित वर्ग जन साधारण का मनमाना शोषण करते रहे हैं। इन राजतंत्रीय शासन व्यवस्थाओं में शासक अपने भोग-विलास शौक तथा शान-ओ-शौकत के लिए जनता पर मनमाना कर थोपते रहते थे। इसके साथ पुरोहित भी भोली-भाली जनता को अशुभ और अमंगल से भयाक्रांत कर तथा स्वर्ग-नरक का खेल दिखाकर भरपूर शोषण करते रहे हैं ।</p>



<p>स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के नारों के साथ लडी गई फ्रांसीसी क्रान्ति में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता हैं कि-फ्रांस में आम जनमानस ने कुलीनो और पादरियों के शोषण से तंग आकर तीव्रता से संघर्ष किया। फ्रांसीसी क्रान्ति की तरह आम जनमानस का शोषण करने वाले शासकों से आजिज आकर रूस सहित अन्य देशो के जन साधारण वर्ग द्वारा सफल संघर्ष किया गया। इस तरह विश्व की अधिकांश शासन व्यवस्थाओं में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से व्याप्त शोषण गरीबी के लिए स्पषट रूप से उत्तरदायी कारक रहा है। इसलिये प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अर्थव्यवस्था में सक्रिय शोषण के समस्त औजारों को भोथरा करके आम जनमानस को गरीबी से मुक्ति दिलाई जा सकती हैं। आज विश्व की अधिकांश अर्थव्यवस्थाएं सामंतवादी अर्थव्यवस्था से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था&nbsp; में परिवर्तित हो चुकी हैं तथा शोषण के औजार भी बदलते दौर के लिहाज़ से बदल चुके हैं। बदलते दौर के लिहाज़ से शोषण के नये औजारों को चिन्हित करना और उन्हें समाप्त करना जनतांत्रिक सरकारों की अनिवार्य जिम्मेदारी है। कुछ विश्लेषको के अनुसार भारतीय सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था अर्द्ध सामंती तथा अर्द्ध पूंजीवादी प्रवृत्ति की हैं। इसलिए भारत में गरीबी से&nbsp; निजात पाने के लिए सांमती और पूंजीवादी दोंनो व्यवस्थाओं की शोषणकारी प्रवृत्तियों पर प्रहार करना होगा।&nbsp;</p>



<p>ज्ञान विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में जब अगणित आविष्कार होने लगे तो उद्योग धंधों का विकास होने लगा। उद्योग-धंधों के विकास के फलस्वरूप बाजारवादी अर्थत्ंत्र अस्तित्व में आया। बाजारवादी अर्थत्ंत्र में कालाबाजारी मुनाफाखोरी और जमाखोरी जैसे नये तरह के शोषण के&nbsp; औजारों का विकास हुआ तथा नये तरह के शोषकों का अभ्युदय हुआ। सरकार जब बाजार में अहस्तक्षेप की नीति का पालन करने लगती हैं तथा बाजार पर&nbsp; सरकार का&nbsp; नियंत्रण कमजोर हो जाता हैं तो जमाखोरी मुनाफाखोरी कालाबाजारी और मिलावटखोरी की प्रवृत्ति पूरी निर्लज्जता के साथ अपनी पराकाष्ठा पर होती हैं। जिसका स्वाभाविक परिणाम यह होता हैं कि-आवश्यक वस्तुएँ आम जनमानस की पहुँच से दूर होने लगती हैं तथा लोग गरीबी के दलदल में फंसते चले जाते हैं। अधिकांश विकासशील देश इन्हीं समस्याओं के कारण निर्धनता के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। मुंशी प्रेमचंद ने अपने विभिन्न नाटकों और कहानियों में ग्रामीण जन-जीवन में व्याप्त&nbsp; मुख्यतः तीन प्रकार के शोषण का उल्लेख किया है।&nbsp;</p>



<p>मुंशी प्रेमचंद के अनुसार सामंतवाद, पुरोहितवाद और महाजनी व्यवस्था आम जनमानस के शोषण के सबसे सशक्त माध्यम थे। वर्तमान आधुनिक लोकतंत्र में भी चुने हुए जनप्रतिनिधियों में सामंतवादी चेतना गहरे रूप से व्याप्त है। जनता के उत्थान के लिए संचालित योजनाओं में लूट-खसोट करके निर्वाचित जनप्रतिनिधि बेशुमार दौलत के मालिक होते जा रहे हैं। इसी तरह तरह धर्म के आधुनिक ठेकेदार आस्था निष्ठा और श्रद्धा का बाजार खडा करके खूब काली कमाई कर रहे हैं। इसी तरह महाजनी व्यवस्था की प्रवृत्तियाँ आज भी बाजारवादी अर्थत्ंत्र में अपनी पराकाष्ठा पर हैं। भूमंडलीकरण उदारीकरण और निजीकरण के नारों के साथ 1991 में जिस नई अर्थव्यवस्था का आगाज किया गया वह विशुद्ध प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा पर आधारित है। जिसमें अधिकतम मुनाफा प्राप्त करने के लिए मिलावट खोरी जमाखोरी को औजार बनाया गया। जमाखोरी बाजार की शक्तियों का एक ऐसा&nbsp; घिनौना षड्यंत्र है जिसके द्वारा बाजार में आवश्यक वस्तुओं के अभाव का शोर मचाया जाता हैं। इस कृत्रिम अभाव के शोर से आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगते हैं। स्वाभाविक रूप से आवश्यक वस्तुओं के क्षेत्र में बेतहाशा बढती मंहगाई निर्धन लोगों की संख्या में बढोतरी करने में सहायक है।</p>



<p>भारत में स्वाधीनता उपरांत कल्याणकारी अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देते हुए मिश्रित को अपनाया गया। कल्याणकारी अर्थव्यवस्था में आर्थिक संसाधनों का वितरण इस तरह से किया जाता हैं कि-अधिकतम लोगों की अधिकतम भलाई सुनिश्चित हो सके तथा सरकार आम जनमानस के पक्ष में बाजार को समय-समय पर निर्देशित और नियंत्रित करती रहे। स्वाधीनता उपरांत भारत में निर्धनता को दूर करने के लिए सुनियोजित तरीके से कोशिश की गई। भारतीय अर्थव्यवस्था का गम्भीरता से अवलोकन किया जाए तो ज्ञात होता है कि- भारत में&nbsp; निर्धनो की सर्वाधिक संख्या भूमिहीन श्रमिको के रूप मे पाई जाती है। भूमिहीन श्रमिको को गरीबी रेखा से बाहर निकालने के लिए भूमि सुधार कार्यक्रम चलाया गया। स्वाधीनता उपरांत बनने वाली भारत की प्रथम केन्द्रीय सरकार ने एक झटके में जमींदारी रैयतवारी और महालवाडी जैसी व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया गया। पश्चिम बंगाल और केरल में भूमि सुधार के कार्यक्रमो द्वारा निर्धनता की समस्या को काफी हद तक दूर करने का प्रयास किया गया। इसके अतिरिक्त प्रख्यात गांधीवादी संत विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन के माध्यम से भूमिहीन मजदूरों को गरीबी रेखा से उपर उठाने का सार्थक प्रयास किया। इसके अतिरिक्त मानव संसाधन का समुचित विकास कर भी लोगों को गरीबी रेखा से उपर उठाया जा सकता है। केरल की सरकार ने मानव संसाधन के विकास के लिए शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में भरपूर निवेश किया। इस के प्रतिफल स्वरूप केरल विकसित राज्यो की श्रेणी में आ गया। भारत में गरीबी का एक महत्वपूर्ण कारण पराधीनता के समय ब्रिट्रिश साम्राज्य द्वारा अपनाई जानें वाली औपनिवेशिक नीतियाँ थी। इन औपनिवेशिक नीतियों के तहत अंग्रेजी सरकार ने परम्परागत भारतीय कृषि व्यवस्था और हस्तकला को बुरी तरह चौपट कर दिया था। इसलिए सत्तर के दशक में भारतीय कृषि में गतिशीलता लाने के लिए हरित क्रांति लाई गई। हरित क्रान्ति के फलस्वरूप पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के जीवन में सम्पन्नता आई । प्रकारांतर से हरित क्रांति ने पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोगों को गरीबी रेखा से उपर उठाया।</p>



<p>हरित क्रान्ति की तरह श्वेत क्रांति और नीली क्रान्ति के माध्यम से पशुपालकों और मत्स्य पालको के जीवन में सम्पन्नता आई। महाराष्ट्र में सत्तर के दशक में सुनिश्चित रोजगार कार्यक्रमों द्वारा आम जनमानस को&nbsp; गरीबी रेखा से उपर उठाने का प्रयास किया गया। कालांतर में सुनिश्चित रोजगार कार्यक्रम सम्पूर्ण देश में चलाए गए । जो देश की अधिकांश आबादी को गरीबी रेखा से उपर उठाने मे सहायक सिद्ध हूए। इन कार्यक्रमों के अतिरिक्त आवश्यक खाद्य पदार्थों के क्षेत्र में सार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू कर लोगों को गरीबी रेखा से उपर उठाने का प्रयास किया गया। जो तमिलनाडु जैसे राज्य में पर्याप्त रूप से सफल रहा।&nbsp;</p>



<p>आज हम चाॅद पर कदम रख चुके हैं परन्तु आज भी हर संवेदनशील व्यक्ति के मन मस्तिष्क  को मर्मान्तक पीड़ा पहुंचाने वाला तथ्य हैं कि- भारत में उन्नीस करोड़ लोग भूखे पेट सोते हैं तथा लगभग पैत्तीस करोड लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। उस दौर में जब भारत अंतराष्ट्रीय रंगमंच पर स्वयं को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहा है यह आंकड़ा अत्यंत भयावह और भारत की एक बदरंग तस्वीर पेश कर रहा है। भारत में लगभग हर चौथा व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा है। विश्व के अधिकांश देशों की उतनी आबादी नहीं है जितनी भारत में     गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर करने वालों की आबादी हैं। कौशल विकास कार्यक्रमों द्वारा भारतीय युवाओं में उद्यमिता की चेतना जाग्रत कर , कालाबाजारी, जमाखोरी, मिलावटखोरी और मुनाफाखोरी जैसी प्रवृत्तियों पर लगाम लगाकर तथा कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण स्थापित कर आम जनमानस को गरीबी के दलदल में फंसने से बचाया जा सकता हैं । तकनीकी एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा स्वास्थ में पर्याप्त निवेश द्वारा सुदक्ष और सक्षम मानव संसाधन का विकास करना गरीबी रेखा से उपर उठाने के लिये आवश्यक है। फलतः देश के नीति नियंताओं को दूरदर्शी तथा दूरगामी आर्थिक नीतियां बनाकर गरीबी के दुष्चक्र से भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहर निकालना होगा । इसके साथ मंहगाई और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, कृषि आधारित लघु कुटीर उद्योगो को बढावा देकर, भूमि सुधार कानून को ईमानदारी से लागू कर और शिक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से मानव संसाधन में निवेश कर अधिकांश लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया जा सकता है। </p>
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		<title>स्थापित राजनीति से हटकर पद्म पुरस्कारों की नई राजनीति</title>
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		<dc:creator><![CDATA[हर्ष वर्धन त्रिपाठी]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 29 Jan 2023 16:17:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[चर्चा]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>
		<category><![CDATA[आंदोलन]]></category>
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					<description><![CDATA[<img width="1200" height="675" src="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/padma-awards-2023.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="स्थापित राजनीति से हटकर पद्म पुरस्कारों की नई राजनीति" style="display: block; margin: auto; margin-bottom: 5px;max-width: 100%;" link_thumbnail="" decoding="async" loading="lazy" srcset="https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/padma-awards-2023.jpg 1200w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/padma-awards-2023-300x169.jpg 300w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/padma-awards-2023-1024x576.jpg 1024w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/padma-awards-2023-768x432.jpg 768w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/padma-awards-2023-696x392.jpg 696w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/padma-awards-2023-1068x601.jpg 1068w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/padma-awards-2023-747x420.jpg 747w, https://theharishchandra.com/hindi/wp-content/uploads/sites/2/2023/01/padma-awards-2023-313x176.jpg 313w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" title="स्थापित राजनीति से हटकर पद्म पुरस्कारों की नई राजनीति 19">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में समझी जाने वाली सबसे आसान बात हो गई है कि, उनकी राजनीति एकदम अलग होती है और इस नई राजनीति के लिए पहले नरेंद्र मोदी स्थापित राजनीति को पूरी तरह से ध्वस्त कर देते हैं। यह इस तरह से होता है कि, कई बार तो नरेंद्र मोदी के घनघोर [&#8230;]]]></description>
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<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में समझी जाने वाली सबसे आसान बात हो गई है कि, उनकी राजनीति एकदम अलग होती है और इस नई राजनीति के लिए पहले नरेंद्र मोदी स्थापित राजनीति को पूरी तरह से ध्वस्त कर देते हैं। यह इस तरह से होता है कि, कई बार तो नरेंद्र मोदी के घनघोर समर्थक भी आश्चर्यचकित रह जाते हैं और आज के नये मीडिया के युग में ऐसा लगने लगता है कि, नरेंद्र मोदी ने अपने समर्थकों की संख्या तेजी से घटा ली है। ऐसा ही कुछ हाल ही में घोषित पद्म पुरस्कारों के एलान के साथ हुआ है। पद्म पुरस्कारों में अब राजनीतिक जुगाड़ न के बराबर लगता है। यूँ भी कह सकते हैं कि, नरेंद्र मोदी ने पद्म पुरस्कारों की राजनीति ही पूरी तरह से ख़त्म कर दी, लेकिन यह भी सच है कि, नरेंद्र मोदी ने पद्म सम्मानों की नई राजनीति स्थापित की है। वर्ष 2023 के लिए राष्ट्रपति ने 106 पुरस्कारों का एलान किया। इसमें 6 पद्म विभूषण, 9 पद्म भूषण, 91 पद्म श्री सम्मान शामिल हैं। पद्म सम्मान प्राप्त करने वालों में 19 महिलाएँ हैं, 2 व्यक्ति विदेश में रहते हैं और, 7 व्यक्तियों को मरणोपरांत यह सम्मान मिला है। मरणोपरांत सम्मान पाने वालों में ही छठवाँ नाम है, देश के पूर्व रक्षा मंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का। मुलायम सिंह यादव समाजवादी राजनीतिक धड़े से निकले नेता थे। उत्तर प्रदेश में मंडल बनाम कमंडल की राजनीतिक को उन्होंने अपने पक्ष में सलीके से उपयोग किया और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी बना ली। स्वयं तीन बार मुख्यमंत्री रहे और बेटे अखिलेश यादव को भी एक बार मुख्यमंत्री बना दिया।</p>
<p>यह अलग बात है कि, समाजवादी बुनियाद पर खड़ी समाजवादी पार्टी ने समाजवाद की सारी अवधारणाओं को ध्वस्त कर दिया। समाजवादी से विशुद्ध रूप से पिछड़ी जातियों की राजनीति से सिमटते यादव और मुसलमान की राजनीति और मुलायम सिंह यादव के रहते ही यादवों में भी पूरी तरह से उनके परिवार में ही समाजवादी पार्टी पूरी तरह से सिमट गई। इसका परिणाम यह भी हुआ कि, भारतीय जनता पार्टी को यादवों के अलावा अन्य पिछड़ी जातियों में प्रतिनिधित्व को लेकर उभर रहे असंतोष को अपने पक्ष में उपयोग करने का अवसर मिल गया। रामजन्मभूमि आंदोलन ने भारतीय जनता पार्टी में पिछड़ी जातियों के कई प्रभावी नेताओं को तैयार किया। पिछड़ी जाति से आने वाले नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद पिछड़ी जातियों में यह संदेश स्पष्ट हुआ कि, भारतीय जनता पार्टी भी पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधित्व वाली दूसरी पार्टियों की ही तरह उन्हें अपने साथ लेकर चल सकती है। पद्म पुरस्कारों की राजनीति पर बात करते समाजवादी पार्टी और उसके संस्थापक नेता मुलायम सिंह यादव पर बात करते आपको लग रहा होगा कि, भटकाव हो रहा है, लेकिन यह भटकाव नहीं है। सन्दर्भों को ठीक से समझने के लिए आवश्यक है।</p>
<p>उत्तर प्रदेश में लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी के सामने मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी के तौर पर समाजवादी पार्टी और उसके बाद बहुजन समाज पार्टी का नाम आता है। इसके बावजूद मुख्य प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक पार्टी के संस्थापक को मरणोपरांत देश सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित करने पर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता, समर्थक शायद इस तरह से गुस्से में न दिखते और नये मीडिया पर नरेंद्र मोदी सरकार के इस निर्णय की आलोचना भी न करते, लेकिन मुलायम सिंह यादव के साथ दो ऐसी कड़वी यादें जुड़ी हैं जो भाजपा और संघ परिवार से जुड़े लोगों को व्यथित करती हैं।</p>
<p>उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड के अलग होने की माँग करने वाले उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों पर गोली चलवाने और उस दौरान हुआ अकल्पनीय दुर्व्यवहार लोगों को भूला नहीं है। इसके साथ ही मुलायम सिंह यादव के साथ सबको छोड़कर मुसलमानों के जुड़ जाने की सबसे बड़ी वजह यही रही कि, मुलायम सिंह यादव के राज में ही रामभक्त कारसेवकों पर गोलियाँ चलाई गईं। भारतीय जनता पार्टी के नेता बेहद आक्रामक तरीके से हमलावर रहते हुए मुलायम सिंह यादव को मुल्ला मुलायम कहा करते थे। मुलायम सिंह यादव एकमुश्त यादव-मुसलमान और बहुतायत पिछड़ों के मत मिलने से प्रसन्न रहते हुए रणनीतिक तौर पर चाहते थे कि, मुल्ला मुलायम वाली छवि पुख्ता ही रहे। इसका लाभ भी मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी को मिलता रहा।</p>
<p>2012 में जब मुलायम सिंह यादव ने बेटे अखिलेश यादव को सत्ता सौंपी तो लगा था कि, अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह यादव से आगे की राजनीति करेंगे, लेकिन हुआ उल्टा ही। समाजवादी पार्टी पर मुलायम सिंह यादव जैसा प्रभाव अखिलेश यादव नहीं छोड़ पाए। चाचा शिवपाल यादव से हुए झगड़े में पार्टी दो फाड़ हो गई। भले पार्टी की शक्ति अखिलेश यादव के साथ ही रही। मुलायम सिंह यादव बीमारी से अशक्त हो चले थे, लेकिन यादव मतदाताओं के लिए पूज्य बने रहे। अब ऐसे लोगों के सामने अगर कोई नरेंद्र मोदी की बेवजह आलोचना करेगा तो उसे तल्ख़ प्रतिक्रिया मिल सकती है। मुलायम सिंह यादव को मरणोपरांत सम्मानित करने से बहुत पहले मुलायम सिंह यादव से नरेंद्र मोदी ने जाने कब निजी रिश्ते बना लिए। हालाँकि, निजी रिश्ते बनाने की नरेंद्र मोदी की कला कई बार पहले भी दिख चुकी है। नरेंद्र मोदी यादव परिवार के समारोह में शामिल होने गए। मोदी के कान में फुसफुसाते मुलायम सिंह यादव का चित्र खूब चर्चित हुआ। संसद में मुलायम सिंह यादव ने नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी भी कर दी थी। इस सबका परिणाम यादव मतदाताओं पर पड़ा।</p>
<p>2014 के लोकसभा चुनावों में यादव मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में भाजपा लगभग असफल रही थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी के नाम पर भाजपा को थोड़ी बहुत सफलता मिल गई। हालाँकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में यादव फिर से अपने अखिलेश भइया के साथ ही पूरी तरह से चला गया। उत्तर प्रदेश विधानसभा 2022 के चुनाव के समय प्रयागराज के फूलपुर की बाजार में कई मुसलमान और यादव एक साथ बैठे थे। एक मुसलमान बोल पड़ा, इनसे पूछा। ए सब जने मोदी क वोट देहे रहेन। मौलाना 2019 के लोकसभा चुनाव की बात कर रहे थे। नरेंद्र मोदी ने मुलायम सिंह यादव को मरणोपरांत तब पद्म विभूषण दिया है, जब रामंदिर की सारी बाधाएँ दूर हो चुकी हैं। भव्य राम मंदिर 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले बनकर तैयार हो जाएगा। सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास और सबका विश्वास सिर्फ नरेंद्र मोदी का नारा भर नहीं है।</p>
<p>दरअसल, यही वो मंत्र है, जिसके जरिये 2024 में भारतीय जनता पार्टी 350 के पार जाने की बात कर रही है। उत्तर प्रदेश के पड़ोसी और भारतीय जनता पार्टी के लिहाज से बेहद कठिन यादव मतदाता बहुल राज्य बिहार में भी मुलायम सिंह यादव को मरणोपरांत पद्म विभूषण देने की जमकर चर्चा हो रही है। उग्र भाजपा समर्थक पूछ रहे हैं कि, अब अगला पद्म विभूषण लालू प्रसाद यादव को मिलेगा। मुलायम सिंह यादव ने रामभक्त कार सेवकों पर गोलियाँ चलवाईं थीं तो, लालू प्रयास यादव ने सोमनाथ से अयोध्या की लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोककर गिरफ्तारी करा दी थी, लेकिन यहाँ यह भी ध्यान में रखना आवश्यक है कि, इतने सबके बाद भी यादव मतदाता लालू और मुलायम के साथ मजबूती से खड़ा रहा। जातीय आधार छोड़ भी दें तो भी एक बड़ा वर्ग है जो, लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव को सामाजिक न्याय का बड़ा मसीहा मानता रहा है।</p>
<p>अब लालू प्रसाद यादव को अगली बार पद्म सम्मान मिलेगा या नहीं, लेकिन इससे पहले शरद पवार को मोदी सरकार में ही पद्म विभूषण मिल चुका है। प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है। गुलाम नबी आजाद, तरुण गोगोई, मुजफ्फर हुसैन बेग, एससी जमीर, पीए संगमा और तोखेहो सेमा भी घोर भाजपा विरोधी नेता रहे हैं, लेकिन देश के एक वर्ग में इन नेताओं की बड़ी पहचान है। नरेंद्र मोदी इस बात को बखूबी समझते हैं। हालाँकि, नरेंद्र मोदी जिस रास्ते चल रहे हैं, बेहद कठिन है, लेकिन यह भी सच है कि, कठिन रास्तों पर चलकर ही नरेंद्र मोदी ने असंभव से लगने वाले लक्ष्य अब तक प्राप्त किए हैं। यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया तो विपक्षी राजनीति के लिए 2024 के बाद बहुत कठिन समय होने वाला है।</p>
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<p><span style="color: #999999;"><em>Disclaimer: यह लेख मूल रूप से हर्ष वर्धन त्रिपाठी के ब्लॉग पर प्रकाशित हुआ है। इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं। </em></span></p>
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