मोदी व्यक्ति नहीं एक सोच हैं….

मोदी व्यक्ति नहीं एक सोच हैं….

डॉ बी एन सिंह : देश के बहुत से लोग मोदी को एक व्यक्ति मानकर उनका मजाक उड़ाने मे ही अपनी सारी ऊर्जा नष्ट कर दे रहें है, दूसरी तरह ये लोग राहुल पर वंशवाद का आरोप लगाकर कांग्रेस को खारिज करते रहते हैं , इस काम मे आज मुसलमान , दलित , और जातिवादी यादव , कुर्मी , कोईरी , पासवान सोनकर , निषाद, राजभर लगे हैं। जब तक आप मोदी को एक व्यक्ति और राहुल को नेहरू के वंशवाद से जोड़ते रहेंगे और दलित , पिछड़े, मुसलमान कार्ड की वकालत करते रहेंगे , संघ का एक भी बाल बांका नही कर सकते । वास्तविकता इससे एकदम अलग है । मैंने इन्हीं लोगों से सुनता रहा हूँ अटल बहुत अच्छे आदमी थे लेकिन उनका दल अच्छा नही । हंसी आती है ऐसे लोगों पर। बबूल के पेंड़ मे आम पैदा करने वालों पर । परमानंद, सावरकर , हेडगवार, गोलवलकर , भागवत, मोदी , अटल ये व्यक्ति नही एक सोच हैं। 

सब चले गये , मोदी भी कल चला जायेगा , लेकिन संघी विचार सदियों से था ,कल भी था ,आज भी है और कल भी रहेगा। ये school of thought of fascism है । दूसरी तरफ कांग्रेस आजादी की लड़ाई की वाहक रही है, उसमे सभी विचार के लोग थे , ये फासिस्ट भी कभी कांग्रेस मे रहे थे। नेतृत्व गांधी का था , तब ये चूहे की तरह रहते थे। नेहरू कैबिनेट मे श्यामा प्रसाद जो १९४२ मे मुश्लिम लीग की सरकार मे मंत्री थे, आजाद भारत की नेहरू सरकार मे भी मंत्री थे। कांग्रेस मे सब थे गांधी इससे बेखबर नहीं थे। कांग्रेस में हिंदू नेशनलिस्ट और इंडियन नेशनलिस्ट दोनो थे । इंडियन नेशनलिस्ट में नेहरू, मौलाना आजाद जैसे मुट्ठी भर लोग थे, हिंदू नेशनलिस्टों की सरदार पटेल के नेतृत्व मे , राजेंद्र प्रसाद,जी.बी. पंत , पी.डी. टंडन , के. एम. मुंशी जैसे लोगों की भरमार थी । 

गांधी जानते थे अत: वे अपना उत्तराधिकारी नेहरू को चुनते हुृये यह बात साफ करदी थी कि मेरे जाने के बाद अगर कोई मेरी भाषा बोलेगा तो वह पं. नेहरू होंगे। पटेल गांधी के मीक फालोवर थे, गांधी के फैसले को मन से स्वीकार किया। गांधी की भाषा क्या थी? वही सेकुलरिज्म , विभिन्न जाति, धर्म, संप्रदाय को जोड़ने की भाषा। नेहरू गांधी की सोच पर पूरे १००% खरे जीवन भर रहे। कभी भी एकछण के लिये भी सेकुलरिज्म से समझौता नही किये। यह था नेहरू गांधी का school of thought of democracy and secularism . । एक तरफ संघ परिवार का school of thought of fascism तो दूसरी तरफ नेहरू परिवार की school of thought of demcracy and secularism. । नेहरू जब तक थे , फासिस्ट ताकते २ सीट की अपनी औकात में थी , कांग्रेस के हिंदू नेशनलिस्ट जो दिन मे दलितों से हाथ मिलाते तो जरूर थे ,लेकिन घर जाकर लईफबाय साबुन से हाथ को मल मल कर धोकर नहाते थे, को भी नेहरू उनकी औकात में रखते थे। नेहरू के बाद कौन ? का सवाल आते ही कांग्रेसी हिंदू नेशनलिस्ट कामराज के नेतृत्व मे अपने खोल से बाहर आकर कांग्रेस पर कब्जा करने की चाल चलने लगे , अपनी आपसी कलह से निजात न पाकर उनको लाल बहादुर शास्त्री को प्र. मंत्री बनाना पड़ा। शास्त्री नेहरू के मीक फालोअर थे , सबको साथ लेकर चलने का प्रयास किये । वे नेहरू जैसे सेकुलर तो नहीं थे लेकिन जितना उपर से सीधे दिखते थे उतने सीधे भी नही थे।

एक बार लाल बहादुर शास्त्री से कुलदीप नैयर ने पूछा, “आपके विचार से नेहरू के दिमाग में उनका उत्तराधिकारी कौन है?”

शास्त्री ने कहा, “उनके ज़हन में उनकी बेटी का नाम है। लेकिन यह उतना आसान नहीं होगा”

नैयर ने कहा, “आम धारणा यही है कि आप नेहरू के परम भक्त हैं और उनकी मृत्यु के बाद आप ख़ुद इंदिरा गाँधी के नाम का प्रस्ताव रखेंगे।”

शास्त्री ने जवाब दिया, “मैं उतना साधु भी नहीं हूँ, जितना आप मेरे बारे में कल्पना करते हैं।”

एक और बात… नेहरू ने लालबहादुर शास्त्री को धूर्त कहा था कभी….

नेहरू के कैबिनेट मंत्री तिरुवल्लुवर थाटाई कृष्णामाचारी, टीटीके के नाम से जाने जाते थे। टीटीके, जो शास्त्री के प्रधानमंत्री रहते भारत के वित्त मंत्री थे, ने कुलदीप नैयर को बताया था कि नेहरू ने एक बार उनसे शास्त्री के बारे में कहा था, “देखने में छोटा-सा लगने वाला वह व्यक्ति इतना धूर्त है, जो कभी भी आपकी पीठ में छुरा भोंक सकता है।”

जवाहरलाल नेहरू गुसलखाने में गिर पड़े। 27 मई 1964 की सुबह चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। नेहरू की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी के रूप में दो दावेदार उभरे। एक मोरारजी देसाई और एक लाल बहादुर शास्त्री।

हिंदू नेशनलिस्टों मे आमराय न होने पर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्छ के. कामराज ने यह घोषणा की कि नेहरू चाहते थे कि लालबहादुर शास्त्री उनके उत्तराधिकारी बनें। उसके बाद शास्त्री को बढ़त मिल गयी, इस बात में कहीं कोई सत्यता नही है कि नेहरू ने ऐसा कहा था। इसका कहीं कोई प्रमाण नहीं है कि नेहरू ने कहा था। नेहरू को अपनी बेटी को प्र. मंत्री. बनाना होता तो कोई रोक लेता क्या? 

उन दिनों सिंडिकेट इंदिरा गाँधी को सबसे ताक़तवर उत्तराधिकारी समझता था, जिन्हें वह गूंगी गुड़िया कहता था। उन्हें हटाने के लिये नेहरू के नाम का हिंदू नेशनलिस्टों ने सहारा लेकर चाल चली। 

इंदिरा गाँधी को इतना परेशान किया गया कि उन्होंने अपनी शेष ज़िंदगी लंदन में बिताने का मन बना लिया था । लेकिन शास्त्री ने नेहरू का कर्जा चुकाने के लिये या कह सकते हैं हिंदू नेशनलिस्टों को बैलेंस करने के लिये श्रीमती गांधी को बिना संसद सदस्य बने ही ही अपने कैबिनेट मे शामिल कर लिया। शास्त्री के प्र. मंत्री बनते ही ,पाकिस्तान ने युद्ध छेड़ दिया , देश युद्ध में फंस गया । शास्त्री नहीं भी रहते तो युद्ध का परिणाम वही होता। देश में एकता बनी रही। सब शांत थे। लेकिन जैसे ही शास्त्री की दुर्भाग्य से ताशकंद मे देहावशान की खबर मिली ,देश एक बार फिर उसी चैराहे पर कि नेहरू के बाद कौन? 

इस बार न चाहते हुये उसी गूंगी गुड़िया को फिर सामने लाना पड़ा , मोरार जी फिर नही माने, चुनाव लड़े और बुरी तरह हार गये। श्रीमती गांधी ने कांग्रेस को इंदिरा कांग्रेस बनाने मे कोई गलती नहीं की। कांग्रेस के हिंदू नेशनलिस्टों से लड़ने मे इंदिरा कांग्रेस को भी कई तरह के समझौते करने पड़े . न चाहते हुये भी मोरार जी को उप प्र. मंत्री बनाना पड़ा, फिर हटाना पड़ा । कांग्रेस पूरी तरह इंदिरा की कांग्रेस हो गयी। इंदिरा कांग्रेस के अध्यक्छ बरूआ ने तो सारे रिकार्ड तोड़ दिये और खुलेआम ” इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा ” कहकर चाटुकारिता की सारी सीमायें तोड़ दी। एक बात तो थी इंदिरा ने भी नेहरू की तरह सेकुलरिज्म से समझौता नहीं किया। लेकिन न इंदिरा नेहरू थी ,न कांग्रेस नेहरू गांधी की कांग्रेस रही। इंदिरा ने कार्यपालिका और न्याय पालिका को नेहरू के विपरित गुलाम बना कर देश मे एक पार्टी नही एक व्यक्ति का शासन स्थापित करने मे सफलता प्राप्त कर लिया । १९७१ मे बंगला देश बनवाकर अपनी स्थिति मजबूत कर ली । जैसे आज मोदी ने विरोध को लाचार कर दिया है, वैसे ही श्रीमती गांधी ने करदिया था । एक मायने मे कह सकते है ंकि कल की श्रीमती गांधी की जगह आज मोदी बैठ गये हैं। इंदिरा का घोषित आपातकाल था, मोदी का अघोषित । 

लोहिया नेहरू से ईर्ष्यां वश प्रतिद्वंदिता के कारण १९६३ में ही नेहरू के सामने ही संसद मे जाने के लिये गांधीं के हत्यारे जो राजनिती मे अछूत थे से हाथ मिलाकर उनको मुख्य धारा मे लाने का जो काम किया था , उसे नेहरू के जाने के बाद और तेज कर दिया । भारतीय राजनिति में अनैतिकता का बीजारोपड़ का काम लोहिया ने १९६७ मे खुलकर गैरकांग्रेसवाद के नाम पर खुलकर किया । जनसंघियों ने लोहिया के कंधे पर बंदूक रखकर कांग्रेस को कमजोर करना शुूरू किया । ९ राज्यों मे लोहिया ने जनसंघ, वामपंथी, स्वतंत्र पार्टी और सिंडिकेट कांग्रेस वालों के साथ मिलकर संविद सरकारे बनाकर फासिस्ट ताकतों को मजबूत कर दिया । १९७४ मे सब मिलकर सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिये, जे पी जैसे नेता ने फौज और पुलिस को सरकार का आर्डर न मानने का आह्वाहन करने लगे। देश मे संवैधानिक संकट खड़ा होने लगा , हाईकोर्ट ने श्रीमती गांधी का चुनाव सतही आरोप पर रद कर दिया , लिहाजा इंदिरा ने सत्ता न छोड़कर देश मे आपातकाल लगाकर सभी विरोधी नेताओं को जेल में डाल दिया । १९७७ मे आपातकाल खतम हुआ, सभी जेल से बाहर आकर अपने अपने नैतिकता और सिद्धांत को ताक पर रखकर वामपथी, दक्खिनपंथी ,जातिवादी सभी ने मिलकर जनता पार्टी बनाया ,जिसके नेता जे पी थे। कुत्ते बिल्ली संसद मे पंहुच गये । जगजीवन और बहुगुना जैसे कांग्रेसी भी जनता पार्टी ज्वाईन कर लिये । 

१९७७ में जेपी ने फासिस्टों को देशभक्ति का प्रमाण पत्र ही नही दिया बल्कि यहां तक कहा कि अगर वे फासिस्ट हैं तो हम भी फासिस्ट है, कहकर दिल्ली की सत्ता मे भागीदार बना कर देश में फासिज्म को स्थायी रूप से स्थापित कर दिया। तब तक देश मे सेकुलरिज्म कमजोर होकर जाति धर्म के कोटरे मे पड़कर बदबू देने लगा । सब नैतिकता को ताक पर रखकर सिर्फ सत्ता का खेल खेलने लगे। इंदिरा दुबारा सत्ता मे आयी तो जरूर लेकिन वो बात नहीं रही । खालिस्तान के नाम पर हत्यारों ने देश मे आतंकवाद शुरू किया, श्रीमती गांधी को उनके ही सुरक्छा गार्डों ने हत्या कर दिया। इसी हत्या का सहारा लेकर संघियों ने देश मे सिखों का कत्ले आम मचा दिया। नानाजी देशमुख जैसे लोग आग मे घी का काम किया। राजीव गांधी के एक गैर राजनितिक बयान को, “बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है” 

पता नही वे कहे थे या नही? लेकिन संघियों ने इसे उनके मुंह मे डालकर अकाली दल के साझेदार बन गये। राजीव ने शाहबानो केश मे सुप्रीम कोर्ट का फैसला हिंदू नेशनलिस्टों के जबाव मे संसद मे विल लाकर पलट कर मुश्लिमों को संतुष्ट करने ले , फिर बाबरी मस्जिद का ताला खोलकर हिंदुओं को संतुष्ट करने लगे, माया मिली न राम । वी पी सिह जयचंद बनकर संघियों के कंधे पर चढ़कर , वामपंथियों के सहयोग से प्र. मंत्री बन गये । फिर राजीव गांधी की भी हत्या हो गयी । नरसिम्हाराव ने संघियों से मिलकर बाबरी मस्जिद को नेस्तनाबूद करा दिया । मुसलमान और दलित कांग्रेस दूर हो गये । कांग्रेस पार्टी की दुर्गति हो गयी, सेकुलरिज्म कमजोर हो गया। अटल ने अपने ही भाषण , “भानुमति ने कुनबा जोड़ा…कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा” को किनारे करके पहले १३ दिन , फिर १३ महिने और २४ दलों का कुनबा जोड़कर ५ सालकी सरकार चलायी। सोनिया गांधी ने आकर मरती हुई कांग्रेस मे जान फूंकी और मनमोहन सिंह को प्र. मंत्री बनाकर तमाम जातिवादी गिरोहों को मिलाकर सरकार चलायी , अंत बड़ा बुरा हुआ , मोदी ने पहली बार आजाद भारत मे बी जे पी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर कांग्रेस को गड्ढे मे ढकेल दिया । पहली बार कांग्रेस २०१४ में विरोधी दल का नेता नही बना सकी। कुल सीट का १०% भी नही जीत पायी, वही हाल २०१९ में हुआ ५५ सीट भी नहीं जीत पायी । आज कांग्रेस कितनी लाचार है कि जिस बिहार में ३५ साल राज किया वहां एकएक सजायाफ्ता लालू के अनपढ़ पुत्र के शरण में जाना पड़ा । क्या अब कांग्रेस फासिस्ट मोदी को जातिवादी गिरोंहों के बल पर हरायेगी ? कांग्रेस के पास बहुत अच्छा मौका था बिहार मे अपने पैरों पर खड़ा होने का। जिस पार्टी के कार्य कर्ता २० साल से अपने विधान सभा मे हाथ के सिंबल को देखे नही ,वहां कांग्रेस कैसे अपने पैरों पर खड़ी होगी , यही असली सवाल है ? कांग्रेस को अगर बीजेपी का विकल्प बनना है तो मुसलमानों , दलितों को कांग्रेस मे लाये , अपनी गलतियों के लिये अगर कुछ जाने अनजाने मे हुआ हो तो खेद प्रकट करे । गांधी नेहरू के रास्ते पर चलने का बचन दे। नही तो देश में हिटलर का राज स्थायी रूप से हो जायेगा। संविधान , लोकतंत्र और सेकुलरिज्म सदा के लिये गांधी नेहरू के देश से लुप्त हो जायेगा। आगे कांग्रेस को सोचना है ?….

 

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