जिस संस्कृति और संस्कारों को हम बिसरा रहे हैं वह विदेशी सीखने को लालायित है

जयपुर। एक कहावत है हमारे यहां घर का ज्योगी जोगना आन-बान का सिद्ध यानी अपने घर का जोगी जो घर का है पर आन-बान, बाहर को सिद्ध मानता जाता है। ठीक इसी तर्ज पर हमने अपनी वैदिक साहित्य संस्कृति और संस्कारों को बिसरा कर पश्चिमी सभ्यता को लपक कर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करते हैं। लेकिन इसके उलट ही वाराणसी के सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में टॉप करने वाली स्पेन की मारिया ने तीन साल पहले एयर होस्टेज की नौकरी छोड़ कर संस्कृत पढ़ने के लिए यहां आई थी। उन्होंने न सिर्फ शास्त्री पाठ्यक्रम में एडमिशन लेकर इस विषय को सीखा-समझा, बल्कि विश्वविद्यालय में टॉप करके जहां लोगों का ध्यान आकृष्ट किया वहीं मिसाल कायम की है।

दीक्षांत समारोह में राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने उपाधि सौंप कर बात की। मारिया ने मीमांसा विषय में स्नातकोत्तर किया है। वह हिन्दी, इंग्लिश, जर्मनी, स्पेनिश के अलावा अब संस्कृत भी बोलती है। उन्होंने गुरुकुल ट्रस्ट में रहकर पहले काशी आकर ही संस्कृत को जाना फिर एडमिशन लिया। अब वे संस्कृत में पीएचडी करने के बाद शिक्षक बन अपने देश में संस्कृत का प्रचार-प्रसार करेगी।

मारिया 12 साल से भारत आ रही थी। पहले वह ऋषिकेश आई फिर बनारस संस्कृति समझ कर इसे अपनाने के लिए इसमें रच बस कर इतनी प्रभावित हुई है कि इसके लिए अब समर्पित रहने को उद्भव है। एक हम है अपनी भाषा, शिक्षा, संस्कृति और संस्कारों को हेय भाव से देखते है, यह सोचनीय एवं चिंतनीय भी है।

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वाई.के. शर्मा
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